सोमवार, 21 अप्रैल 2014

झूठा ब्लॉगर


अगर सादी-बियाह का न्यौता से आने के बाद कोनो अदमी दुल्हा-दुल्हिन का जिकिर नहीं करके, पकवान का जिकिर करे त समझ जाइये कि आप कोलकाता में हैं. पकवान का जिकिर भी बहुत सीरियसली अऊर एतना सुन्दर-सुन्दर सब्द के माध्यम से कि अगर आप बातचीत में सुरू से सामिल नहीं हैं, तो आपको लगेगा कि कोनो सुन्दरी के सौन्दर्ज का बरनन हो रहा है. आप कोनो निमंत्रन में चले जाइये, आपका आवभगत त जेतना बढिया से होगा ऊ त होबे करेगा, लेकिन चलते टाइम घर का लोग आपसे जरूर पूछेगा – रान्ना केमौन होएछे! (भोजन कैसा बना था). पकवान का सुन्दरता (स्वाद के नाम पर लोग जादातर शुन्दोर सब्द का प्रयोग करते हैं) बंगाल के मसहूर बिसेसन के साथ होता है – भीशौन शुन्दोर रशोगोल्ला छिलो! ‘भीसन’ सब्द का ऐसा इस्तेमाल हम बंगाल में ही देखे.

कुल मिलाकर, कोनो मामूली से मामूली चीज, चाहे बात भी किसी के बरनन से एतना खूबसूरत हो जाता है कि एकीन करना मोस्किल हो जाता है कि ओही चीज के बारे में कहा जा रहा है. असल में एही खूबी कोनो साधारन अदमी को कबि बना देता है. रोज निकलने अऊर डूबने वाला चाँद त सबलोग देखता है, बाकी ऊ चाँद में रोटी, कटोरा, अठन्नी, महबूबा त कोनो कबि चाहे सायर को ही देखाई देता है.

चचा गालिब का एगो मसहूर शे’र है:
ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयान अपना,
बन गया रक़ीब आख़िर, जो था राज़दान अपना.

माने पहिले त ऊ सुन्दरी परी के जइसा अऊर उसपर उसका सुन्दरता का बखान एतना सुन्दर कि दोस्त भी दुस्मन बन गया. सायद एही से लोग कहता है कि अदमी प्यार में सायर बन जाता है. जिसका सुन्दरता से दूर-दूर तक कोनो वास्ता नहीं, उसका खूबसूरती भी अइसा बयान करता है कि ऊ दुनिया का सबसे सुन्दर लड़की देखाई देने लगती है.

मगर सुन्दरता का बात खाली काहे कहते हैं. कभी-कभी कोनो घटना के बारे में कोई लोग अइसा फोटो खींच देता है कि लगता है आप आँख से देख रहे हैं. कोनो मामूली सा घटना भी किसी के सब्द का जादू से निखरकर एतना सुन्दर हो जाता है कि आपको अपना नजर पर सक होने लगता है कि धत्त ई त हम भी देखे थे, सच्चो एतना सुन्दर था! अऊर जो नहीं देखे रहता है, ऊ समझता है कि झूठ बोलता है, भला अइसन कहीं हो सकता है.

अपना ब्लॉग पर का मालूम केतना छोटा-बड़ा घटना हम आपलोग के साथ बाँटे होंगे. बहुत सा लोग ऊ घटना के बारे में जानकर खुस हुआ, चकित हुआ, मुग्ध हुआ, भावुक हुआ, नाराज हुआ, प्रेरित हुआ, दुखी हुआ, गौरवांवित हुआ, खीझ गया, लेकिन साथे-साथ अइसा भी लोग हमको मिला जो मुस्कुरा दिया अऊर बोला कि झूठमूठ का कहानी बनाता है. ई सब घटना इन्हीं के साथ काहे घटता है, हमरे साथ त कभी नहीं घटा!

अब हम का बताएँ. हमरे बात करने का तरीका में कोनो खोट रहा होगा कि सच्चो बात लोग को झूठ मालूम होता है. हम ऊ लोग से बिबाद, चाहे तर्क नहीं करते हैं, न कोनो सफाई देते हैं कि ई घटना सच है. बस चुपचाप आसमान के तरफ नजर उठाकर परमात्मा का सुक्रिया अदा करते हैं जो हमको उस घटना का पात्र या साक्षी बनाया अऊर अपने पूर्बज लोग को प्रनाम करते हैं कि उनके आसीस के बदौलत हमरे कलम में सचाई को ईमानदारी से बयान करने का ताकत मिला.

चार साल पहिले 21 अप्रैल 2010 में एगो बिहारी बोली में बतियाने वाला मामूली सा अदमी ब्लॉगर बनने का सपना लेकर एगो यात्रा सुरू किया था. आज चार साल हो गया अऊर पीछे पलट कर देखने पर बुझाता है कि बात-बात में एतना लम्बा रास्ता तय हो गया! परमात्मा से एही प्रार्थना है कि हमरे कलम का जोर ऐसहिं बनाए रखे कि लोग ई सोचने पर मजबूर हो जाए कि – चार साल हो गया ई अदमी को, झूट्ठा खिस्सा गढते हुये!!

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

हाय गजब कहीं तारा टूटा


अब त इयादो नहीं है कि आखरी बार जादू का सो कब देखे थे. बाकी जादू त जादूए होता है. एकदम नजर बाँध लेता है. एतना त समझ में आता है कि ई सब कोनो चमत्कार नहीं है, सब हाथ का खेला है, तइयो ई खेला में गजब का आनन्द आता है. जेतने अबिस्बसनीय, ओतने सच.

आजकल हमरे इधर भी एगो जादू का धूम मचा हुआ है - जादूगर बैताल. हमरा ऑफिस का इस्टाफ अऊर मकान मालिक का लइका भी जिद करने लगा कि चलिये देखने. अब हमरे पास त ऑफिस के बाद ब्लॉग पढने अऊर फेसबुक पर बतकुच्चन करने के अलावा कोनो काम त होता नहीं है. हम मान गये. छोटा थे त हमरे दादा जी अऊर बाद में हमरे मँझले फूफा जी हमसब बच्चा लोग को ले जाते थे सर्कस देखाने. हमहूँ सोचे कि जादू देखने के बहाने ऊ पुराना टाइम को फिर से जीने का अबसर मिलेगा. रंगीन तम्बू, प्लास्टिक का कुर्सी, चमचमाता हुआ इस्टेज, जोर-जोर से बजता हुआ गाना.

जादू का सो सुरू हुआ. बगले के गाँव का जादूगर था. बहुत कम उमर का 25-26 साल से जादा नहीं था. मगर बुझाता था कि बहुत सा सो कर चुका था, इसलिये उसका आत्मबिस्वास देखने लायक था. गाँव का सो था, इसलिये उसके जादू में लड़की लोग नहीं थी अऊर उसका असिस्टेंट सब उसी का भाई सब था. जादूगर के पिताजी इस्कूल के रिटायर्ड मास्टर थे अऊर गेट पर खड़ा होकर आने जाने वाले का स्वागत कर रहे थे. जादूगर अपना सो देखाने के बाद सब दर्सक से अनुरोध किया कि आजकल जादू, सर्कस त लोग सिनेमा चाहे टीवी का पर्दा पर देखना पसन्द करता है. ई टेक्नोलॉजी के कारन हमारा सांस्कृतिक धरोहर को बहुत नुकसान हुआ है. ई बात ऊ एतना मन से बोला कि मन भर आया!

बहुत लो बजट का सो होने के बाबजूद भी लगा कि जइसे ऊ जादू हमरे दिमाग में समा गया है अऊर हम जादू में गोता खाते हुए समय में बहुत पीछे चले गए. पटना का हार्डिंग पार्क में हमलोग सर्कस देखने जाते थे. तरह-तरह का जंगली जानवर का तमासा, सुन्दर सुन्दर लड़कियों का खेला अऊर नाटा-नाटा जोकर का मजाक. जबतक अगिला खेला चालू होता, तबतक जोकर का मजाक, आपस में लड़ाई, फटकारने वाला लकड़ी का तख्ता से मार-पीट, पीठ से पीठ जोड़कर उछलते हुये गोल चक्कर लगाना, आँख से, पीछे से पानी निकालना, एक हाथ से दोसरा हाथ में एक बार में का मालूम केतना गेन्दा उछालना, बिना गिराये हुए. राज कपूर का सबसे प्यारा सिनेमा एही सरकस पर आधारित था. अऊर ऊ जो बोल गए आखिर में ऊ आझो लोग मोहावरा के तरह इस्तेमाल करता है – द शो मस्ट गो ऑन!!


मगर सर्कस का जो हालत आज है ओही हालत राज कपूर साहब के “मेरा नाम जोकर” का हुआ. अब्बास साहब, जो राज कपूर के सब सिनेमा का कहानी लिखे थे, उनको भी ई बर्दास्त नहीं हुआ अऊर बोले कि एगो हिट फिलिम जरूर लिखेंगे ऊ. फिलिम लिखे “बॉबी” जो सुपर हिट हुआ. हम भी कहाँ से कहाँ भटक गये. गुलज़ार साहब कहते हैं कि इंसानी दिमाग भी ऐसने एगो सरकस के तरह है

एक तम्बू लगा है सरकस का,
बाज़ीगर झूलते ही रहते हैं
ज़हन ख़ाली कभी नहीं रहता!

अइसने एगो तम्बू लगा हुआ था साल 1994 में. उस समय भी हम बिहार के एगो गाँव में पोस्टेड थे अऊर ऊ गाँव में आया था एगो थियेटर. सब स्टाफ लोग मिलकर पूछा कि सर चलियेगा देखने. थियेटर बहुत बदनाम माना जाता था, इसलिये ऊ लोग डरते-डरते पूछा. हम पूछे कि का होता है इसमें. तब पता चला कि इसमें गाना बजाना होता है, नाटक-नौटंकी होता है.


अचानक हमरे मन में जाने का आया, हम तुरत तैयार हो गए. टिकट लेकर रात को खा पीकर तम्बू में जम गये. गाना सुरू हुआ, लड़की सब मेक-अप में आकर गाना  रही थी अऊर लड़का—लड़की मिलकर जुगल गीत भी गाते थे. अऊर बहुत सुन्दर गाना से भरपूर जबर्दस्त नाटक भी था उसमें. गाना से खुस होकर लोग ईनाम में रुपया भेंट करता था अऊर उनका नाम घोसित किया जाता था. कुछ लोग मजाक में नोट अपना जेब से देता था अऊर नाम अपना दोस्त का बता देता था. जब उनका दोस्त के नाम के साथ ईनाम का घोसना होता था सबलोग हँसने लगता था अऊर ऊ भाई साहब गरियाते हुए भुनभुनाते रहते थे. असल में लाउडिस्पीकर पर उनका नाम उनके घर तक सुनाई देता था अऊर घरे जाने पर घरवाली से पिटाई का खतरा भी था.

हम चुपचाप गाना-बजाना अऊर नाटक देख रहे थे. बाकी हमरे दिमाग में अलगे एगो खेला चल रहा था. लोग सीटी बजा रहा था, ताली बजा रहा था, बाह-बाह कर रहा था, मगर हम ऊ लिपिस्टिक से सना मुँह लिये हुये गीत गाने वाली एगो लड़की को देख रहे थे. जेतना अदा से ऊ गा रही थी

रहेगा इश्क़ तेरा ख़ाक में मिलाके मुझे,
हुए हैं इब्तिदा में रंज, इंतिहाँ के मुझे!

उसका चेहरा देखकर ई बुझाइये नहीं रहा था कि ऊ किसके लिये एतना बिभोर होकर गाना गा रही है. जबकि देखने वाला हर अदमी एही समझ रहा था कि ऊ उसी के लिये ई गाना गा रही है. हमरे दिमाग में का मालूम कऊन सोच डूब-उतरा रहा था. हमको ऊ लड़की हीरा बाई लग रही थी जो पता नहीं अपने कऊन हीरामन के लिये गाना गा रही थी. कोनो हीरामन था भी कि नहीं ऊ दर्सक मण्डली में.

थियेटर में बइठे हुये हमारे सामने फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ जी का ‘तीसरी कसम’ घूम गया. जब हम देखकर निकले, त हमरे पीछे से लाउडिस्पीकर पर गाना आ रहा था:

मारे गये गुल्फ़ाम, अजी हाँ मारे गये गुल्फाम!
उल्फ़त भी रास ना आई, अजी हाँ मारे गये गुल्फ़ाम!

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

हार की जीत की हार


बचपन में एगो कहानी पढ़े थे. अब हम कोनो अनोखा बच्चा त थे नहीं, आपलोग भी बच्चा रहे होंगे अऊर ओही कहानी आप भी पढ़े होंगे. कहानी था श्री सुदर्शन का ‘हार की जीत’. एतना ब्यौहारिक कहानी कि आज समाज से सम्बेदना मर जाने के बाद भी ऊ कहानी ओतने प्रासंगिक मालूम देता है. एगो डाकू, एगो साधु से भिखारी अऊर लाचार का भेस बनाकर उनका घोड़ा चोरा लेता है. साधु बाबा जाते-जाते उससे एही कहते हैं कि ई घटना का जिकिर तुम किसी से मत करना, नहीं त लोग का भरोसा गरीब लाचार पर से उठ जाएगा. डाकू का हिरदय परिबर्तन होता है अऊर ऊ चोराया हुआ घोड़ा वापस कर देता है. साथ में दू बूँद जिन्दगी का भी छोड़ जाता है – आँख का आँसू!

तीन-चार साल पहिले जब ब्लॉग के दुनिया में बड़े अरमान से पहिला कदम रक्खे थे, तब जो लोग का लिखना अच्छा लगता था, उनका अस्थान हमरे लिये कोनो सेलेब्रिटी से कम नहीं होता था. जइसे एगो बच्चा को साइकिल चलाना आ जाए, त ऊ घर के सामने वाली चाची के एहाँ भी साइकिले से जाता है, ओइसहिं जिसके ब्लॉग पर फोन नम्बर मिल जाता था उनसे बतियाने का भी मन करता था अऊर बात होने पर लगता था कि अमिताभ बच्चन से बतियाकर आए हैं.

एही बीच तनी खेल का नियम भी समझ में आने लगा अऊर ऊ सेर है न
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो!
का मतलब भी बुझाने लगा. बहुत सा लोग का असलियत भी समझ में आया. अऊर आखिर में हम भी ओही सतरंज का एगो मोहरा बन गये. फरक बस एतना था कि हमरा बिसात अपना था अऊर गेम का रूल भी. लोग बेनामी-फेनामी कहते-कहते नाम से जानने लगा अऊर धीरे-धीरे पहचान बनता चला गया. कोसिस एही किये कि हमको हमेसा ई याद रहे कि आदमी जब चढता है त सीढी से अऊर जब उतरता है त टप्प से लिफ्ट से नीचे आ जाता है.

कुछ लोग हमको बहुत सम्मान दिया अऊर कुछ लोग को हम बहुत सम्मान दिये. जिनको हम सम्मान दिये उनसे मिलने, बतियाने का लालसा तब भी रहता था अब भी रहता है. सतीश सक्सेना जी, पण्डित अरविन्द मिश्र, जनाब अली सैयद साहब, अनूप शुक्ल, निशांत मिश्र, संजय अनेजा, अनुराग जी... एहाँ तक कि समीर लाल जी, मनोज कुमार जी, अऊर बहुत सा लोग. स्वप्निल से पहले बतियाना अऊर बाद में मिलना हमरे लिये गोल्डेन मोमेण्ट से कम नहीं था.

ऊ टाइम में महिला ब्लॉगर को लेकर एतना हंगामा चलता था कि कुछ लोग का सम्मान करते हुये भी बतियाते हुये डर लगता था. कभी-कभी चैट पर कोई मिल गया त बतिया लिये. एही दरमियान अब याद नहीं का बात था लेकिन कोई बात को लेकर हमको एगो प्रतिष्ठित महिला ब्लॉगर से बतियाने का जरूरत महसूस हुआ. मगर उनका नम्बर नहीं था. उनके करीबी लोग में से दू लोग हमरे भी बहुत अच्छे दोस्त थे. ऊ दुनो से अलग-अलग चैट पर बतिया रहे थे एक रोज. याद आया त हम पूछ लिये कि अगर उनका नम्बर हो तो मुझे दो. एगो से उत्तर मिला कि हमरे पास नहीं है अऊर दोसरका ब्लॉगर चैट लाइन काट दिहिन. तब हमको लगा कि हम कुछ जादा इमोसनल हो रहे हैं. काहे कि एतना अक्किल त भगवान देबे किये हैं कि समझ जाते कि ऊ लोग बताना नहीं चाह रहा है. बात खतम हो गया अऊर हमारा सम्बन्ध ऊ लोग के साथ ओइसहिं बना रहा.

करीब एक साल के बाद ओही महिला ब्लॉगर का फोन हमको आया. हमारा नम्बर उनको उन्हीं से मिला था जो हमको उनका नम्बर देने से मना कर दिये थे. ऊ पहिला बात हमसे एही बोलीं, “एक रोज आपने हमारा नम्बर माँगा था, तो आपको नहीं मिला था, देखिए आज हम आपका नम्बर लेकर आपको फोन कर रहे हैं. आपको निमंत्रण देना है.” हम गये उनके घर, सबसे मिले अऊर हमारा रिस्ता आज भी बना हुआ है.

अइसहिं दीदी गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी के एगो कबिता का समीच्छा मनोज जी के ब्लॉग पर “आँच” में परकासित हुआ था. मगर ऊ सूचना देने के बाद भी नहीं आईं, त हम सोचे फोन से सूचित कर दें. ऊ दिन डेढ दर्जन कुलश्रेष्ठ का नम्बर नेट से खोजकर निकाले मगर दीदी का नम्बर नहिंए मिला. फिर याद आया उनका “एकलव्य” अऊर बड़े भाई राजेश उत्साही. उनको पूछे त ऊ बोले कि पता लगाकर एस एम एस करते हैं. खैर नम्बर मिला, दीदी से बात हुआ, पता चला कि ऊ सहर से बाहर हैं एही से नहीं देख पाईं. अब त घरेलू रिस्ता हो गया है उनसे.

अइसहिं एगो पुरुस ब्लॉगर, एगो महिला ब्लॉगर से उनका फोन नम्बर माँगा था. ऊ महिला भी अपना नम्बर दे दीं बाबा भारती के तरह उस पर भरोसा करके. उसके बाद एगो लम्बा सिलसिला चला टॉरचर का. ऊ महिला ब्लॉगर का परिबार बिखर गया. घर के अन्दर अदृस्य दीवार खड़ा हो गया. और पिछला दू साल से ई हाल है कि उनका जिन्नगी घर में बिछावन, हस्पताल में आई.सी.यू., नर्स, इंजेक्सन, दवाई, बेहोसी, लाचारी अऊर कमजोरी के बीच पिसकर रह गया है. हम जब फोन करते हैं त उनका एक्के रट रहता है – फ़ोन कर लिया करो बीच बीच में. अच्छा लगता है!

कहाँ आजकल मिलता है डाकू खड़गसिंह जो बाबा भारती के ई कहने पर कि ई बात किसी को मत बताना नहीं तो कोई भी महिला ब्लॉगर कोनो पुरुस ब्लॉगर को अपना फोन नम्बर देने में हजार बार सोचेगी- अपना आँख से दू बूँद आँसुए गिरा देता ताकि ऊ औरत जो हर पल अपना मौत का इंतजार कर रही है, उसको एगो आसान मौत मिल पाता!! 

(परमात्मा उनको लम्बी उम्र दे!)

शनिवार, 8 मार्च 2014

नारी


आज “सम्वेदना के स्वर” का कुछ पुरनका पोस्ट सब पढ रहे थे, तब अचानक नजर पड़ा हमारे अभिन्न चैतन्य आलोक जी के कबिता पर. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिबस पर जब 2011 में ई कबिता अपने ब्लॉग पर पर्कासित किए, त रचना जी इसको अपने ब्लॉग पर सेयर कीं. कोनो महिला बिसय पर लिखा जाना अऊर उसको रचना जी के द्वारा सेयर किया जाना, अपने आप में एगो बहुत बड़ा उपलब्धि है.

आज ई कबिता पढते हुए, फिर से आँख भीज गया. लगा आज इसको हम भी सेयर कर लेते हैं.  


वो मेरी तुमसे पहली पहचान थी
जब मैं जन्मा भी न था
मैं गर्भ में था तुम्हारे
और तुम सहेजे थीं मुझे.

फिर मृत्यु सी पीड़ा सहकर भी
जन्म दिया तुमने मुझे
सासें दीं, दूध दिया, रक्त दिया तुमने मुझे.

और जैसे तुम्हारे नेह की पतवार
लहर लहर ले आयी जीवन में

तुम्हारी उंगली को छूकर
तुमसे भी ऊँचा होकर
एक दिन अचानक
तुमसे अलग हो गया मैं.

और जिस तरह नदी पार हो जाने पर
नाव साथ नहीं चलती
मुझे भी तुम्हारा साथ अच्छा नहीं लगता था
तुम्हारे साथ मैं खुद को दुनिया को बच्चा दिखता था.

बचपन के साथ तुम्हें भी खत्म समझ लिया मैने
और तब तुम मेरे साथ बराबर की होकर आयीं थीं..

बादलों पर चलते
ख्याब हसीं बुनते
हम कितना बतियाते थे चोरी के उन लम्हों में
दुनिया भर की बातें कर जाते थे

मै तुम पर कविता लिखता था
खुद को पुरूरवा
तुम्हें उर्वशीकहता था.

और जैसा अक्सर होता है
फिर एक रोज़
तुम्हारे पुरूरवाको भी ज्ञान प्राप्त हो गया
वो उर्वशीका नहीं लक्ष्मी का दास हो गया

तुम फिर आयीं मेरे जीवन में
मैने फिर तुम्हारा साथ पाया

वह तुम्हारा समर्पण ही था
जिसने चारदीवारी को घर बना दिया
पर व्यवहार कुशल मैं
सब जान कर भी खामोश रह गया

और उन्मादी रातों में
तुम जब नज़दीक होती
यह पुरूरवा”, “वात्सायनबन जाता
खेलता तुम्हारे शरीर से और रह जाता था अछूत
तुम्हारी कोरी भावनाऑ से

सोचता हूं ?
इस पूरी यात्रा में
तुम्हें क्या मिला
क्या मिला

एक लाल
और फिर यही सब .....

और जब तुमने लाली को जना था
तो क्यों रोयीं थीं तुम
क्यों रोयीं थीं???

                     -    चैतन्य आलोक 

शनिवार, 1 मार्च 2014

मेरी आवाज़ ही पहचान है


एगो बहुत पुराना कहावत है कि जब आप किसी को इज्जत देते हैं, त आपको भी इज्जत मिलता है. ई बात जेतना सजीव लोग पर लागू होता है ओतने निर्जीव पर भी लागू होता है. सजीव माने आदमी, जानवर अऊर पेड़-पौधा अऊर निर्जीव माने...? तनी सोचिये कि निर्जीब चीज को का इज्जत देंगे हम अऊर ऊ हमको का इज्जत देगा. बाकी अइसा बात नहीं है.

चलिए एगो बात बताइये. आप लोग के साथ केतना बार अइसा हुआ होगा कि कोनो समान, चाहे जरूरी कागज, कोनो किताब कहीं रखा गया अऊर जब आप उसको खोजना सुरू किए त ऊ मिलबे नहीं किया. हर सम्भब जगह पर खोजने के बाद भी ऊ आपको देखाई नहीं दिया. आखिर में हारकर आप मने-मन पछताते हैं कि ठीक से रखे होते त एतना परेसानी नहीं होता. ओही घड़ी आपका बच्चा चाहे घर का कोनो आदमी आकर आपसे पूछता है, यही ढूँढ रहे थे न आप? ये रहा... आलमारी के निचले ख़ाने में रखा था!आप हैरान होते हैं कि तनी देर पहिले त आप पूरा आलमारी देख गये थे, निचलका खाना भी देखे थे. ओ घड़ी त ओहाँ नहीं था, अभी कइसे आ गया!!

तनी सोचिए कि ऊ कागज, चाहे समान जब एतना जरूरी था त उसको सम्भालकर, हिफाजत से रखना चाहिए था ताकि जरूरत के बखत आसानी से मिल जाए. मगर आप उसको इज्जत नहीं दिए अऊर जहाँ-तहाँ रख दिए. अब बताइये, जब आप इज्जत नहीं दीजियेगा, त आपको कहाँ से इज्जत मिलेगा. ऊ समान आपसे अपना बेज्जती का बदला लिया. एही नहीं, जब आप बाद में पछतावा किए, त आसानी से मिल गया, ओही जगह जहाँ आप केतना बार खोज चुके थे. कोई बाहरी अदमी ओहाँ नहीं धर गया, आप ही रखे थे अऊर आपको मिल गया. ऊ का कहते हैं - ऐज़ सिम्पल ऐज़ दैट!!

चलिए एगो अऊर बात बताते हैं. बताते का हैं बस अपना मन का फीलिंग है ओही कहते हैं. कोनो ज्ञानी त हैं नहीं कि हम जो बोलेंगे ऊ पत्थर का लकीर हो जाएगा. गुलजार साहब का सायरी/नज्म का एक खासियत है जिसके कारन हर कोई उनका दीवाना हो जाता है. रोमाण्टिक से रोमाण्टिक बात कहने के लिये ऊ अइसा-अइसा प्रतीक खोजकर लाते हैं अऊर अइसा-अइसा सब्द का प्रयोग करते हैं कि पढने-सुनने वाला बस मोहित हो जाता है. उनका एही खासियत के कारन हम अपना जवानी का दिन से उनका दीवाना हैं अऊर ऊ समय से लेकर आज का नौजवान पीढी तक का फेवरिट हैं ऊ. जो सब्द हमारा रोजाना का बोलचाल से गायब हो चुका था उसको फिर से जिन्दा करने का काम ऊ किये अऊर जो लोग का वाकफियत था ऊ सब्द से उनको अपना भुलाया हुआ माटी का महँक याद दिलाते गए.

असल में ई शब्द भी इज्जत देने से आपको बदला में सम्मान दिलाता है. अऊर जब आप सब्द को सम्मान देते हैं त सब्द आपके साथ एतना परेम से खेलता है कि आपका पहचान बन जाता है. दिनकर जी का रस्मिरथी हो, निराला का सरोज-स्मृति, बच्चन जी का मधुसाला, गुलजार साहब का नज्म हो, के.पी.सक्सेना साहब का कोई आलेख, अपना पहचान अलग से बना लेता है. सलीम-जावेद अऊर फिलिम ‘सोले’ का सम्बाद आज 39 साल बाद भी अपना असर बनाए हुए है, खाली इसलिये कि का कहना है, कोन सब्द को कइसे प्रयोग करना है, यानि हर शब्द को इज्जत दिया ऊ लोग अऊर आज ओही सब्द उनको इज्जत दिला रहा है, मान-सम्मान दिला रहा है.

बास्तव में हर सब्द का बहुत सा मतलब होता है अऊर बहुत सा सब्द को बहुत तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन कब, कहाँ, कोन अर्थ में, किस तरह कोई बात को कहना है, ऊ कमाल का बात है. हमारे पंजाब में शब्द के साथ खेलना एकदम लोक परम्परा के जइसा है. लोग का बातचीत, मजाक करने का ढंग, उनके खुसमिजाजी को चार चाँद लगा देता है. अपने संजय अनेजा (मो सम कौन...) जी के ब्लॉग पर कभी कमेण्ट देखिए अऊर उनका जवाब देखिए. इनसे हाथ मिलाने के बाद उँगली भले गिनकर मत देखिए, लेकिन अपने कमेण्ट में कोनो सब्द का इस्तेमाल बहुत सोच समझकर कीजिये. आपके हर बात का जवाब देने का तरीका एतना खास है कि पोस्ट के बाद इनका कमेण्ट बोनस का काम करता है.

लोग अस्लील, फूहड़, घटिया चाहे जो मर्जी कह ले (उसपर अलग से बहस), लेकिन स्टैण्ड-अप कॉमेडी में जो पंजाबी लोग कमाल दिखाया है, ऊ कोई नहीं. चाहे सुदेस हो, भारती हो, सिद्धू जी हो या अपना कपिल सर्मा. यसराज फिल्म्स के एगो सिनेमा में काम करने के कारन कपिल का सो हफ्ता में दू दिन के जगह पर खाली एक्के दिन देखाया जाएगा. कपिल बताया कि सूटिंग में बेस्त रहने के कारन समय नहीं मिल पाएगा एही से एक दिन बन्द करना पड़ा. सत्तर मिनट के प्रोग्राम में हर दस सेकण्ड में मजाक गढना कोई आसान काम नहीं है अऊर हफ्ता में दू दिन एही काम करना त अऊर मोस्किल है.

सब्द साधना हो चाहे हर बात को इज्जत देना हो जब सध जाता है तब्बे हम कहते हैं कि अदमी हाजिरजवाब है. सिद्धू जी का तात्कालिक तुकबन्दी हो या कपिल का दस सेकण्ड में बनने वाला तात्कालिक मजाक या (आतममुग्ध होते हुये) फेसबुक पर हमरा कमेण्ट सब्द को इज्जत से दिमाग में रखने से आता है, जिसके भुलाने का त सवाले पैदा नहीं होता है अऊर भुलाइयो जाए त खोजने का जरूरत नहीं पड़ता है!

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

ये कहानी है पुरानी

एगो राजा था. ऊ जंगल में एक रोज सिकार खेलने गया. साथ में सेनापति, मंत्री अऊर एगो नौकर भी था. जंगल में राजा को एगो हिरन देखाई दिया. पीछा करते-करते राजा अपना सब लोग से अलग हो गया. एही नहीं, सेनापति, मंत्री अऊर नौकर भी रस्ता भुलाकर जंगल में भटक गया सब.
रास्ता खोजते-खोजते नौकर को एगो कुटिया देखाई दिया, जिसके बाहर एगो साधु बाबा भगवान का नाम जप रहे थे. ऊ नौकर उनके पास गया अऊर बोला, ओ अन्धे! अभी तूने इधर से किसी को जाते हुए देखा है?
“मैं तो अन्धा हूँ. मुझे कहाँ कुछ दिखाई देता है!
थोड़ा देर के बाद राजा का सेनापति भी ओही कुटिया के पास आया अऊर साधु से पूछने लगा, ओ साधु! तुमने किसी को इधर से जाते हुए देखा है?
“मैं तो अन्धा हूँ. मुझे कहाँ कुछ दिखाई देता है!
सेनापति चला गया, तब भटकते हुए मंत्री जी भी ओहीं पर पधार गए. ऊ हो साधु से पूछ लिए, हे साधु महाराज! आपने किसी को इधर से जाते हुए देखा है क्या?
“मैं तो अन्धा हूँ. मुझे कहाँ कुछ दिखाई देता है!
आखिर में राजा जी भी रास्ता खोजते-खोजते ओही कुटिया के पास पहुँचे. साधु को ध्यान लगाये देख पूछ बैठे, प्रणाम ऋषिवर! क्या आपने किसी को यहाँ से जाते हुए तो नहीं देखा?
“महाराज की जय हो! मैं तो अन्धा हूँ. मुझे कहाँ कुछ दिखाई देता है! किंतु थोड़ी देर पहले आपका सेवक आपको खोजता हुआ इधर आया था, उसके पश्चात आपके सेनापति और फिर महामंत्री. वे सब लगता है आप ही को ढूँढ रहे थे. अब अंत में आप उन्हें खोजते हुए पधारे हैं!
राजा घोर अचरज में पड़ गया कि ई आदमी अन्धा है त इसको कइसे पता चला कि हमको खोजने वाला हमरा नौकर, सेनापति अऊर मंत्री था. अऊर हम महाराज हैं. ऊ साधु से पूछिए लिया, मुनिवर! आप नेत्रहीन हैं. फिर आपने मुझे ढूँढने वालों को कैसे पहचाना?
ऊ साधु हँसकर बोला, महाराज! बहुत आसान है. आदमी बातचीत से पहचाना जाता है. आपके नौकर ने मुझे ओ अन्धे कहकर पुकारा, आपके सेनापति ने ओ साधु कहकर और आपके मंत्री ने हे साधु महाराज कहा. अंत में जब आप आए तो आपने मुझे प्रणाम ऋषिवर कहकर सम्बोधित किया! यह सम्बोधन ही तो किसी व्यक्ति की पहचान हैं!

सायद छट्ठा सातवाँ किलास में ई कहानी पढे होंगे. बाकी अभी तक दिमाग में ताजा है. एतने नहीं, नौकरी भी अइसा मिला है कि जगह-जगह घूमकर समाज के हर तबका के अदमी के साथ दिन-रात उठना बइठना हो गया है. अब त बातचीत से पता चल जाता है कि कऊन जगह का अदमी का, का बिसेसता है अऊर बात करने वाला कम्पनी में कोन ओहदा पर काम कर रहा है. राजा वाला खिस्सा के जइसा बड़ा कम्पनी का डायरेक्टर जेतना सालीनता से बतियाता है, ओतने अकड़कर कम्पनी का चपरासी बात करता है. मगर अपबाद भी बहुत देखने को मिला है. अब का करें, हमलोग त सेवा छेत्र में हैं, इसलिए अपना आपा घरे रखकर आते हैं. न रहेगा मैं न होगा झंझट-तकलीफ.

अभी कुछ टाइम पहिले, बड़े भाई सतीस सक्सेना जी हमरे एगो कमेण्ट के जवाब में बोले -

शुक्रिया सलिल भाई,
बिना पढे टिप्पणी देने वाले ब्लॉगरों में सलिल जैसे (एहाँ पर जो सब्द लिखा था ऊ लिखना हम जरूरी नहीं समझते हैं) भी मुझे पढते हैं मेरे लिए यह कम गौरवशाली नहीं. आपके शब्द मुझे याद हैं और वे यकीनन प्रेरणादायक हैं.
आभार भाई!!
ई बात सतीस जी केतना बार कहे हैं अलग-अलग जगह पर. अऊर बात सच भी है. ऊ कहानी के हिसाब से आपके पोस्ट पर जेतना कमेण्ट आता है ना, ऊ कमेण्टवा सबको ध्यान से पढ़िये. आपको अपने बुझा जाएगा कि कऊन अदमी आपका पोस्ट पढने के बाद कमेण्ट किया है अऊर कऊन बिना पढे; किसको आपका कबिता समझ में आया है, किसको नहीं; कऊन आपका असली परसंसक है, कऊन नहीं.

बहुत सा लोग का कमेण्ट का लम्बाइये से आपको बुझा जाता है कि पूरा पढने के बाद आपका कहा हुआ हर बात के साथ सहमत चाहे असहमत होते हुए अपना बात लिख रहे हैं. अऊर का मजाल है कि उनका कहा हुआ कोनो बात का बुरा लग जाए. अइसा लोग का कमेण्ट अच्छा लिखने का प्रेरना के साथ-साथ, खुद का आकलन करने का मौका भी देता है. एही नहीं ब्लॉग जगत का एगो मोहावरा “आत्ममुग्ध होना” भी लिखने वाला के साथ नहीं चिपकता है.

ई त सोचने वाल बात है कि हर अदमी का लिखा हुआ सब पोस्ट आपको पसन्द आए, उसमें कहा हुआ हर बात से आप सहमत हों अऊर कोनो पोस्ट में कोई कमी नहीं देखाई दे. अइसा हालत में अच्छा लिखा है त खुलकर तारीफ कीजिए, बाकी कहीं कमी नजर आए त ऊ भी बताइये जरूर. बिगाड़ के डर से ईमान का बात न कहने से बहुत नोकसान हुआ है समाज में.

अंत में एगो अऊर छोटा सा कहानी ऊ लड़िका का, जो हर आने-जाने वाला राहगीर को पत्थर मारकर लुका जाता था. एक रोज एगो अदमी उधर से गुजरा त उसको भी ढेला मारा ऊ लड़िका. ऊ अदमी गुसियाया नहीं, बल्कि उसको बोलाकर चार आना का सिक्का धरा दिया. एतना सानदार ईनाम पाकर अगिला अदमी को बड़का पत्थर फेंककर मारा. ई अदमी उसको पकड़कर पीट दिया. इसलिये आप अपना कमेण्ट का चवन्नी देकर कहीं ऊ बच्चा का नोकसान त नहीं न कर रहे हैं. ज़रा सोचिये. जो अच्छा नहीं लगा उसको खुलकर बताइये. गदहा को गदहा कहिए, वैशाखनन्दन कहकर काहे हमारा इज्जत बढाते हैं. अपने मुनव्वर राना साहब भी कहते हैं कि

इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिए!

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

मेरे भैया - एक लघु-कथा

रामलाल के रिटायर होने के बाद, उसके सामने दो सबसे बड़ी ज़िम्मेवारी थी, सिर पर एक मुकम्मल छत और बेटी का ब्याह. रिटायरमेण्ट के पैसों से वो सिर पर पक्की छत का तो इंतज़ाम कर सका, ताकि इज़्ज़त से मकान में नहीं घर में रह सके. लेकिन ईमानदारी की नौकरी में उसने कोई जमा-पूँजी नहीं इकट्ठा की इसलिए रजनी की शादी की उसे बड़ी चिंता रहती थी. कहने को तो वो बड़े फ़ख्र से कहता था कि उसकी असली जमा पूँजी तो उसकी औलाद हैं, बेटा रमेश और बेटी रजनी. उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाकर इस क़ाबिल बना दिया है कि वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें.

रमेश अच्छी नौकरी पर लग गया और उसने पिछले साल दिल्ली में अपने साथ काम करने वाली एक लड़की से शादी कर ली. लड़की वाले जल्दी शादी करने पर इतना ज़ोर दे रहे थे कि समय कम होने के कारण रामलाल और रजनी शादी में शामिल नहीं हो पाए. हालाँकि शादी के महीने भर बाद वो अपनी पत्नी को उनसे मिलवाने ले गया. बहू की जमकर आवभगत हुई और फिर एक सप्ताह के बाद दोनों काम पर लौट गए. हर हफ्ते नियम से फ़ोन करते हैं दोनों.

रामलाल जब भी कभी रजनी की शादी की बात रमेश से करता है तो वो अपनी मजबूरी बता देता है कि नई नौकरी है, समय की कमी है, दिल्ली में उसकी बिरादरी के लड़के कहाँ मिलते हैं. घुमाफिराकर रामलाल को उसने यह भी कह दिया कि अब आप रिटायर हो चुके हैं तो बिरादरी में ढूँढिए, परिवार में देखिए, रिश्तेदारों को कहिए... ज़रूर अच्छा रिश्ता मिल जाएगा साथ यह भी जता दिया था कि उसने अभी नया घर बसाया है इसलिए पैसों की तंगी लगी रहती है.

रजनी पढ़ी लिखी लड़की थी, नौकरी की तैयारी भी कर रही थी. यह भी समझती थी वो कि उसका भाई उसके लिए कोई रिश्ता नहीं ढूँढेगा और बूढे बाप के लिए इधर उधर भटकना मुश्किल था. उसे किसी से प्यार भी तो नहीं था कि लव मैरिज का ही सन्योग बन जाता. उसकी शिक्षा और आत्मसम्मान ने उसके चरित्र को इतना मज़बूत तो बना ही दिया था कि वो किसी पर डोरे डालने जैसे स्तर तक भी नहीं जा सकती थी.

एक दिन रजनी की पक्की सहेली ने किसी से उसका परिचय करवाया. उसका व्यवहार बिल्कुल खुली किताब की तरह था. एक खुली खिड़की की तरह कोई भी उसके अन्दर झाँक सकता था. उसमें कोई भी ऐसा ऐब रजनी को नहीं दिखा, जिससे वो उससे दूर हो सके. उसने रामलाल को भी उससे मिलवाया. बूढ़ा बाप... उसे तो यूँ लगा मानो उसका रमेश उसे मिल गया हो.

जल्दी ही उसने रजनी के लिये बिरादरी  के अन्दर कुछ रिश्ते सुझाए.  उनमें से कुछ वाहियात लोग निकले, कुछ लड़के लोफर निकले.. लेकिन वो तो पता चल ही जाता है. शादी कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं. फिर भी रजनी ने उसपर भरोसा नहीं खोया. रामलाल को भी बस उसपर ही भरोसा था. उसने रजनी से कहा कि वो बस अपने शहर या उसके आस-पास ही रिश्ता चाहती है ताकि बाबा को जब चाहे आकर देख ले, मिल ले. अगर वो कहे तो किसी और शहर में भी अच्छे लड़के मिल सकते हैं. रजनी ने बाबा से बात की और बनारस या उसके पास लड़का देखने की बात बताई. सोचा बनारस में रजनी की बुआ रहती हैं, इसलिए लड़के के घर-परिवार का पता लगाने में सहूलियत रहेगी.

इसे संजोग कहें या रजनी की किस्मत. उसने तीन-चार रिश्ते बनारस, लखनऊ के बताए. बनारस के एक परिवार में बात आगे बढ़ी और उन्होंने साफ कह दिया कि उन्हें बस लड़की के गुण और व्यवहार की गारण्टी चाहिए, वे बिना दहेज शादी करने को तैयार हैं. रजनी की बुआ ने बताया कि उस परिवार में उनके ससुराल की रिश्तेदारी है. लड़का बड़ा सुशील है, कोई ऐब नहीं, अच्छी नौकरी है और रमेश से अच्छा कमाता है.

अगले ही हफ्ते रजनी रामलाल के साथ बनारस अपनी बुआ के पास चली गई. लड़के वालों को लड़की बहुत पसन्द आई. उन्होंने रजनी के पढ़ने या नौकरी करने से कोई ऐतराज़ नहीं जताया. शादी पक्की और सगाई की तारीख हफ्ते भर बाद की तय हो गई. बैंक से पैसे निकालकर, जल्दी-जल्दी रामलाल ने सारी तैयारियाँ की.

आज रजनी की सगाई है और वो जितना खुश अपनी सगाई से नहीं है, उससे ज़्यादा खुशी उसे इस बात की है कि उसके बाबा खुश हैं. रमेश भैया को ख़बर कर दी गई, लेकिन उसके पास कोई ज़रूरी प्रोजेक्ट था इसलिए वो नहीं आ सका. हाँ उसने ये वादा किया कि वो शादी पर ज़रूर आएगा भाभी के साथ.

इस खुशी और जश्न के माहौल में वो उसे कैसे भूल सकती थी, जिसकी वज़ह से ये खुशियाँ उसके जीवन में आई थीं. उसे इतना अच्छा रिश्ता मिला. उसने वो किया जो उसका सगा बड़ा भाई भी नहीं कर पाया. ख़ैर ये समय कड़वाहट का नहीं. उसने सोचा कि अपने इस "अनोखे भाई" को एकबार धन्यवाद तो कह दे.

उसने लैपटॉप ऑन किया और टाइप किया डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू. जोडियाँस्वर्गमेंबनतीहैं.कॉम. साइट के खुलते ही उसने मुस्कुराकर कहा – मेरे भैया! तुम्हें शुक्रिया कहते हुए शर्म आ रही है! तुम्हारी वज़ह से आज ये दिन नसीब हुआ है. लव यू भैया!!