रविवार, 6 जुलाई 2014

देख लो, आज हमको जी भर के


उसको अगर नबजुबती नहीं, त जुबती तो कहिए सकते हैं. नाम था सकीला. बातचीत करने का लहजा हैदराबादी था. अपना आदत है कि सामने वाला इंसान जऊन जुबान में बात कर रहा हो, कोसिस करते हैं कि उसके जुबान में बतिया लें उससे. अपने धन्धे में सम्बन्ध बहुत माने रखता है. बातचीत से सम्बन्ध बनता है अऊर सम्बन्ध से भरोसा. भरोसा हर धन्धे का बुनियाद है, हमरे धन्धे का उसूल.
सकीला बाजी के साथ बात करते हुए कब उनको बुझाने लगा कि हम बिस्वास करने जोग आदमी हैं, हमको नहीं पता चला. देखते-देखते हम भी भाई जान हो गये. हर महीने नियम से सकीला बाजी हमरे ऑफिस में आतीं अऊर हमसे हिसाब-किताब करवातीं – “अम्मी को पाँच हज़ार, नसरीन को तीन हज़ार... नहीं नहीं भाई जान नसरीन को आठ कर दो, बुआ को पाँच देना है.. पिछले महीने नसरीन उनो से लेकर अम्मा को दी... ज़ाफर को दो हज़ार. और मेरे अकाउण्ट में पन्दरह हज़ार! कित्ते हो गये भाई जान!”
“तैंतीस हज़ार!”
”ठीक है भाई जान! मेरे पन्दरह सिकोटी बैंक में जमा कर दो अऊर बाक़ी के नसरीन के खाते में तारा बैंक में.”
हमको मालूम था कि तारा बैंक का मतलब बैंक ऑफ इण्डिया (उसका लोगो एक बड़ा सा तारा है) अऊर सिकोटी बैंक था सिण्डिकेट बैंक जिसका तलफ्फुज़ सकीला बाजी का ओही था. दू चार महीना के बाद हम भी तारा बैंक अऊर सिकोटी बैंक बोलने लगे थे.

सकीला बाजी का काम एहीं खतम नहीं होता था. ऊ हमेसा बहुत फुर्सत में आती थीं. पइसा भेजने का काम हो जाने के बाद खत लिखकर बताना होता था कि नसरीन के खाता में जो पैसा जमा हुआ है उसमें से अम्मी, ज़ाफर अऊर बुआ को केतना देना है. उसके अलावा खत में खैरियत, नसरीन के बच्चे को पढने का नसीहत, ज़ाफर को मन लगाकर काम करने का सीख अऊर हर दो लाइन के बाद बहुत खुश है यहाँ सारजाह में. लगभग हर महीने खत में एही सब लिखा जाता था. हमको ई सब इसलिये मालूम है कि ऊ खत लिखने का काम हमारा था.

सकीला बाजी लगभग अनपढ थी. हमपर भरोसा था इसलिये घर का बहुत सा बात ऊ हमसे लिखवाती थी. असल में सुरू सुरू में ऊ हमको मुसलमान समझती थी. इसलिये जब हम पहिला बार खत लिखने से मना कर दिए काहे कि हमको उर्दू लिखना नहीं आता था, त ऊ बोली हिन्दी में लिख दो भाई जान. मजा तब आया जब हम ऊ खत पढकर सुनाए त उनका रिऐक्सन था – “कैसी बाताँ करते भाई जान. पूरा ख़त उर्दू में लिखा है, लेकिन आपकी उर्दू (देवनागरी) देखने में उर्दू जैसी नहीं लगती.”

एक रोज कहीं कोई गलती हो जाने के कारन सकीला बाजी को बोलाने का जरूरत पड़ा. काहे कि ऊ महीना में बस एक बार आती थीं, इसलिये दोबारा उनका आने का इंतजार में महीना भर निकल जाता. हमको जब हमारा स्टाफ बताया त हम फॉर्म पर दिया हुआ मोबाइल नम्बर पर फोन लगाए. उधर से ठेठ अरबी में कोई मर्द का आवाज सुनाई दिया. हम सकीला भर बोल पाए. उधरवाले को का बुझाया मालूम नहीं, फोन कट गया.

दोसरा दिन सकीला बाजी घबराई हुई आईं.
“क्या मसला हो गया भाई जान!”
हम बताए, कागज पर दस्तखत लिये अऊर काम खतम हो गया. जाते हुए ऊ बोली – “भाई जान! आइन्दा फोन मत किया कीजिये मोबाइल पर!”
हमको समझ में आ गया बन्द परदा के पीछे का हक़ीक़त. हम सिर हिलाकर बोले कि नहीं बाजी, ऐसा आइन्दा नहीं होगा!
सब कुछ पहिले जैसा चलने लगा. एक रोज सकीला बाजी एक बुज़ुर्गवार के साथ हमरे ऑफिस में आईं. ऊ बुजुर्ग सोफा पर बैठ गए अऊर हम सकीला बाजी के काम में लग गए. किसको केतना पैसा भेजना है अऊर उसके साथ खत में पैसा के बँटवारे का तफसील.
ई सब हो जाने के बाद हम धीरे से बोले – “मुलुक से अब्बू तशरीफ लाए हैं, बाजी?”
हमारा इसारा ऊ बुजुर्ग के तरफ था जो अरबी लिबास (दिशदशा) पहने सोफ़ा पर बइठे हुए थे.
“नहीं भाई जान! मुलुक से तो बस ख़त आते! ये तो हमारे मियाँ हैं!”

(कल बॉबी जासूस फ़िल्म में सुप्रिया पाठक को देखकर मुझे फ़िल्म ‘बाज़ार’ याद आ गई, जिसका सच मुझे इस घटना को देखकर पता चला... हैदराबाद से लड़कियों को ले जाकर खाड़ी देशों में बेच/ब्याह दिया जाना बूढे अरबी लोगों से... आँखों देखा सच!)

शनिवार, 10 मई 2014

कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी


“कविता मेरे लिये रिक्त घट भर देने वाला जल है, ज़मीन फोड़कर निकला हुआ अंकुर है, अन्धेरे कमरे में जलता हुआ दिया है, बेरोज़गार के लिये रोज़गार है या कि बेघर भटकते मन का ऐसा एकमात्र आश्रय है जहाँ बैठकर कुछ राहत मिल जाती है. कविता मेरी अंतरंग मित्र है, भीड़ में भी मेरे अकेलेपन की संगिनी. कविता के कन्धों का सहारा लेकर मैंने अब तक का ऊबड़ खाबड़ रास्ता सरलता से तय कर लिया. मैं कविता की ऋणी हूँ क्योंकि मेरी कुछ अनुभूतियाँ कविता की ममतामय गोद में जाकर रचना की संज्ञा पा लेती हैं.”
और ऐसी ही कुछ रचनाओं का संग्रह है – “कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी.” जैसा कि  शीर्षक से विदित है यह पंक्ति किसी नज़्म की पंक्ति सी प्रतीत होती है या फिर किसी गीत सी. तो यह है श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ के कुछ चुने हुए गीतों का संग्रह. उनकी अब तक प्रकाशित चौथी पुस्तक, जिसमें समाहित हैं उनके लगभग सत्तर गीत. इन गीतों में कुछ ग़ज़लें हैं और कुछ दोहे भी हैं. चुँकि दोनों विधाओं की रचानाएँ गायी जाती रही हैं, इसलिये उन्हें गीतों के मध्य गीत मान लेने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.


(बड़ी बहु सुलक्षणा कुलश्रेष्ठ) 

कविता को लेकर कवयित्री के ऊपर दिये गये विचार उन्होंने आत्मकथ्य में स्पष्ट किए है और जिस रचनाकार के लिये कविता का अर्थ इतना विस्तार लिये हो, उसके लिये तो सम्पूर्ण प्रकृति ही एक कविता है. और स्वयम को इस प्रकृति का एक अंश स्वीकारते हुये अपनी रचनाधर्मिता निभाना उनके लिये उस परमपिता की स्तुति से कम नहीं. गिरिजा जी का परिचय हमारे लिये उनके ब्लॉग “ये मेरा जहाँ” से है. किंतु उनका यह परिचय एक अत्यंत संकोची और अपनी रचनाओं को सुदामा के चावल की तरह छिपाने वाले व्यक्तित्व सा ही रहा है. उनके इस संग्रह में जितने भी गीत हैं, उन्हें पढने के बाद कोई उनके इस वक्तव्य से सहमत नहीं हो सकता कि जीवन के पाँच दशक पार करने के बाद भी मैं ख़ुद को पहली कक्षा में पाती हूँ.

इन गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रत्येक गीत की संरचना भिन्न है अर्थात यदि उन गीतों की स्वरलिपि लिखी जाए तो वह अनिवार्य रूप से हर गीत के लिये अलग होगी. यह बात इसलिये भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि कुछ ऐसे गीतकार भी देखे गए हैं जिनके लगभग समस्त गीतों की रचना एक ही धुन को आधार बनाकर की गई होती है. गिरिजा जी ने हर गीतों में स्थायी और अंतरे का विभाजन इतने सहज ढंग से किया है कि यदि उन्हें गाया जाए तो दोनों भागों के मध्य विभेद करने में असुविधा की कोई सम्भावना नहीं रह जाती. आधुनिक गीतों में इस तरह की व्यवस्था गीत/ काव्य संरचना में नहीं होती है (कविता और गीत दोनों को समान विधा मान लिये जाने के कारण), अत: इस आधार पर सारे गीतों को हम क्लासिकल कह सकते हैं. गीतों में लयात्मकता है और सभी गेय हैं.

गीतों के विषय इतनी विविधता लिये हैं कि पाठक एकरसता का शिकार नहीं होता जैसे – प्रकृति, ऋतुएँ, नववर्ष, पर्व त्यौहार आदि. साथ ही कुछ रचनाएँ नितांत व्यक्तिगत हैं जैसे अपने पुत्र के लिये, दूसरे पुत्र के जन्म दिवस पर, भाई के लिये बहन के उद्गार आदि. किंतु अपने पुत्र को केन्द्र में रखकर लिखा हुआ गीत भी जब आप पढते हैं तो आपको उसमें अपने पुत्र की झलक दिखाई देती है. मन्नू के जन्मदिन पर वो क्या कहती हैं देखिये

हर पल से तू हाथ मिलाना/खुलकर गले लगाना
रूठे हुये समय को भी/ देकर आवाज़ बुलाना
लक्ष्य नए कुछ तय करना/ संकल्पों का सन्धान
और भीड़ में खो मत देना/ अपनी तू पहचान.

इनकी कविताओं में व्यर्थ की घोषणाएँ, नारे और भाषणों का स्थान नहीं होता. इनके सन्देश इतने मुखर हैं कि उसके लिये किसी शोर का वातावरण दरकार नहीं.

अंग्रेज़ी की आदत क्यूँ हो/ इण्डिया माने भारत क्यूँ हो,
हृदय न समझे मतलब जिनका/ ऐसी जटिल इबारत क्यूँ हो
सरल भाव हों, सरल छन्द हों/ अपनी लय अपना स्वर हो
ऐसा नव-सम्वत्सर हो!

किसी भी रचनाकार के शब्दकोष का अनुमान उसकी दस पन्द्रह रचनाओं को पढकर लग जाता है. लेकिन गिरिजा जी की सत्तर रचनाओं को पढने के बाद भी बहुत कम शब्द पुनरावृत्त होते हुये दिखाई दिये. यह इनकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है. शब्दों का भण्डार, उचित शब्दों का चयन, शब्दों द्वारा भावों की अभिव्यक्ति, इतनी सुगठित है कि किसी एक शब्द को उठाकर आप कोई दूसरा शब्द बिठाना चाहें तो पूरी कविता काँच के बर्तन की तरह चकनाचूर हो जाती है.

कलुष विषाद बहाते/ भारवहन में हैं ये कच्चे
कोई कितना भी झूठा हो/ आँसू होते सच्चे
सूने-सूने आँगन में/ ये भावों का अमंत्रण हैं
आँसू मन का दर्पण हैं!

दोहे जितने भी हैं सब अपने क्लासिकल रूप में दो पंक्तियों में अपनी बात सीधा कह जाते हैं. यहाँ एक सुन्दर प्रयोग का उल्लेख करना चाहूँगा:

हर वन-उपवन बन गया, ब्यूटी-पार्लर आज,
सबकी सज्जा कर रही, सृष्टि हुई शहनाज़!

जब से इन्हें पढना आरम्भ किया है तब से मेरे अंतर्मन में यह प्रश्न हमेशा सिर उठाता था कि श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ की कविताओं पर महादेवी वर्मा जी का प्रभाव दिखता है. इस संग्रह में एक गीत उन्होंने महादेवी वर्मा जी को समर्पित किया है, जो परोक्ष रूप से मेरे सन्देह की पुष्टि करता है.

इतनी ख़ूबियों के साथ ही कुछ कमियाँ भी रही हैं, जिनकी चर्चा के बिना यह प्रतिक्रिया संतुलित नहीं कही जा सकती.

गीतों के साथ प्रणय का अन्योनाश्रय सम्बन्ध है. जहाँ हम सब जानते हैं कि हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं, वहीं हम सब यह मानते हैं कि प्रेम में हर व्यक्ति कवि बन जाता है. गिरिजा जी के गीतों में दर्द का एक सुर , व्यवस्था से नाराज़गी, पर्यावरण नष्ट करने वालों के प्रति आक्रोश तो दिखता है, किंतु प्रणय-गीत की अनुपस्थिति एक प्रश्न करती है उनसे, भले ही उनकी क्षमताओं पर प्रश्न चिह्न न लगाये. कालिमा, गरल, रुद्ध, हुँकार, रक्तरंजित, पीड़ा, धूमिल, विगलित, करुणा – इन शब्दों का चयन उनके अन्दर के अवसाद को प्रकट करता है. दूसरी ओर जहाँ उनके दोहे चकित कर देते हैं, वहीं ग़ज़लों में मूलभूत भूल दिखाई दे रही है. उन्होंने स्वयम स्वीकार किया है कि गज़ल की विधा से वे पूर्णत: परिचित नहीं हैं.

गुलज़ार साहब की एक पुस्तक है – पन्द्रह पाँच पचहत्तर. प्रथम दृष्टि में यह कोई दिनाँक प्रतीत होता है. परंतु उस संग्रह में पन्द्रह विभागों के अंतर्गत उनकी चुनी हुई पाँच-पाँच नज़्में हैं. गिरिजा जी को भी चाहिये था कि वे रचनाएँ जो इस संग्रह में बिखरी हुई हैं, एक मुख्य विषय (प्रकृति, रिश्ते, ऋतुएँ, सरोकार आदि) के अंतर्गत विभक्त कर संकलित की जानी चाहिए थीं.

यह संग्रह श्री अरुण चन्द्र राय के ज्योतिपर्व प्रकाशन, इन्दिरापुरम द्वारा प्रकाशित हुआ है. पुस्तक सजिल्द आवरण के साथ है और कवर बहुत ही आकर्षक है. छपाई की गुणवत्ता किसी भी स्थापित प्रकाशक से कमतर नहीं है. पुस्तक को देखते ही हाथ में उठाने की तबियत होती है और हाथ में लेते ही पढने की जिज्ञासा जागृत होती है.

इस संग्रह के गीतों को पढते हुये मुझे जो अनुभव हुआ, उसे इस गीत के माध्यम से ही व्यक्त किया जा सकता है: जैसे सूरज की गर्मी से तपते हुये तन को मिल जाए तरुवर की छाया!

रविवार, 4 मई 2014

वर्मा फ़िल्म्स


एगो बहुत पुराना कहावत है कि काठ का हाण्डी दोबारा नहीं चढता है. अऊर एगो बहुत बड़ा अदमी का कहा हुआ बात है कि आप एक टाइम में ढेर सा लोग को अपना झूठ से फुसला सकते हैं, चाहे एगो अदमी को ढेर देर तक बहला सकते हैं, लेकिन ढेर सारा लोग को ढेर देरी तक झूठ बोलकर नहीं फँसा सकते हैं. अब आप कहियेगा कि इसमें कऊन अइसन बिसेस बात है, सब लोग पढा-लिखा है अऊर सबको ई मालूम है. त हम माफी चाहते हैं, बतवा एतने सिम्पुल होता त हम एहाँ नहीं कहते.

आज सौ साल से बहुत सा लोग का गुट आप सब लोग को झूठ-मूठ का कहानी सुनाकर फुसला रहा है अऊर आप, ऊ लोग का कहानी सुनकर कभी खुस होते हैं अऊर कभी आँसू बहाते हैं. अरे जब सबलोग समझदार हैं, त काहे नहीं झूठ धर लेते हैं. एक्के झूठ सिचुएसन बदल-बदल कर सामने आता है अऊर आप लोग तारीफ करते नहीं थकते.  

तीन घण्टा रुपहला पर्दा पर चलने वाला रोसनी अऊर परछाईं का खेला हम लोग सौ साल से देखते आ रहे हैं. सब नकली है जानते बूझते हुए भी आझो ऊ खेला हँसाता है, रोलाता है, डराता है, बहलाता है, फुसलाता है, प्यार जताता है, भक्ति जगाता है, जोस भर देता है, नफरत देखाता है. एतना नकली होता है कि देखने के बाद रोने वाला अदमी चुपचाप रुमाल से अन्धेरा में आँसू पोंछ लेता है अऊर देखता है कि कोई देख त नहीं न रहा है.

अब त हमको कहने का जरूरत नहीं है कि हम सिनेमा के बारे में बतिया रहे हैं. सिनेमा का आकर्सन कहियो कम नहीं हुआ, देविका रानी से लेकर दीपिका पदुकोन तक अऊर पृथ्वीराज कपूर से लेकर रनबीर कपूर तक. हमको तो नसा है सिनेमा का. बाकी अपने आप को सिनेमा के पर्दा (टीवी के पर्दा) पर देखने का खाहिस अपना सादी का वीडियो से आगे नहीं बढ पाया. ऐक्टिंग करने के बाबजूद भी सिनेमा वाला बात मन में फाँस के तरह लगले रह गया. एही नहीं,  बेटा के अन्दर भी सिनेमा बनाने बीमारी समा जाएगा कभी सोचे नहीं थे. माने हमको ऐक्टिंग करने का अऊर बेटा को सिनेमा बनाने का. बस हो गया घोड़ा को कुँआ के पास ले जाने का इंतजाम.

कहानी का कोई चिंता नहीं था, लेकिन कलाकार का समस्या था. हम दुनो बाप-बेटा के अलावा घर में कोई ऐक्टर नहीं, सब के सब समिक्छक हैं. बेटी कैमरा उठाने से आगे तैयार नहीं. एही से श्री सत्यजीत राय का एगो कहानी “टेलिफ़ोन” चुना गया जिसमें खाली दू गो चरित्र था. बेटा का कहना था कि ऊ सिनेमा खाली हमारे ऐक्टिंग के लिये है, काहे कि ऊ लोग हमारा ऐक्टिंग कभी देखा नहीं था. कहानी में दू आदमी का टेलिफोन पर बातचीत था. कैमरा हमारे ऊपर था अऊर हमारे साथ टेलिफोन के दोसरा ओर का सम्बाद बोल रहा था हमारा बेटा, हमको साथ देने के लिये!

जब पूरा फिलिम सूट हो गया त हमको लगा कि बेटा का आवाज़ है त उसको अन्धेरा में रखकर उससे भी ऐक्टिंग करवाया जाए त मोनोटॉनी खतम हो जाएगा. बस उसका सारा सम्बाद दोबारा बोलाया गया अऊर उसका सीन सूट हो गया. बाद में एडिटिंग के बाद एतना बढिया फिलिम बना कि का बताएँ. कम से कम साधन में अच्छा सिनेमा. एडिटिंग, संगीत अऊर टाइटिल के बाद सिनेमा बहुत अच्छा बन गया. बाद में बहुत सा गलती भी देखाई दिया, लेकिन पहलौठी का संतान पाने का सुख परसव का तकलीफ कहाँ महसूस होने देता है.

दूसरा फिलिम के लिये हमको अपने गुरु के. पी. सक्सेना साहब का ध्यान आया. लेकिन समस्या एही था कि उनका लेख में व्यंग त होता है, मगर कहानी नहीं. तइयो एगो लेख निकाले, उसको दोबारा पटकथा अऊर सम्बाद के साथ लिखे अऊर तब लगा कि कुछ बात बन गया है – “आत्महत्या की पहली किताब”. हमारे लिये गुरू जी को दिया जाने वाला गुरु-दच्छिना के समान था. लेकिन सिनेमा का पूरा काम होने के रोज  उनका निधन का समाचार मिला. गुरु-दच्छिना, सर्धांजलि में बदल गया.

ई बार जब जनवरी में पटना गये त फिर हम दुनो बाप-बेटा बइठकर सोचने लगे कि अबकी का किया जाए. ई बार अच्छा बात ई हुआ कि घर के सब सदस्य के अन्दर ऐक्टिंग का कीड़ा कुलबुलाने लगा था. सत्यजीत राय के कहानी “मानपत्र” का पटकथा अऊर सम्बाद लिखा गया. पूरा घर इस बार जुट गया. दू गो छोटा भाई, बहु सबलोग. मगर एगो सबसे बड़ा समस्या ई था कि उसमें एगो दिरिस था जिसमें बहुत बड़ा जलसा होता हुआ दिखाना था अऊर ऊ कहानी का जरूरी हिस्सा था. बहुत सोचने के बाद हम बोले कि हमारा सादी के रजत जयंती का वीडियो में से जलसा वाला सीन निकालकर एडिट कर के इसमें डाला जा सकता है.

ई सिनेमा में घर का कलाकार होने से जादा महत्वपूर्ण बात ई था कि बहुत सा लोग के लिये ऐक्टिंग का पहिला अबसर था. मगर सबसे बड़ा बात था फिलिम में हमारे स्वर्गीय पिता जी के फोटो का इस्तेमाल. सूटिंग के टाइम में हमारे दिमाग में आया बात अऊर बस पिता जी भी फिट हो गये सिनेमा में अऊर एगो बहुत महत्वपूर्ण किरदार के रूप में.

आज आपके सामने “वर्मा फ़िल्म्स” का तीसरा सिनेमा पेस कर रहे हैं. सिनेमा में बहुत सा कमी है, मगर सुबिधा के अभाव अऊर बहुत सा मोस्किल (हमारे पास टाइम कम होना और बेटा का पढाई) के साथ कलाकार का कमी. मगर 16-17 साल के बच्चा के एडिटिंग का कमाल अऊर बैकग्राउण्ड संगीत का इस्तेमाल अऊर 16-17 साल की हमरी बेटी का कैमरा संचालन आपको वाह कहने पर मजबूर कर देगा.


(आसमान के तरफ हाथ उठाकर) पापा जी! देख रहे हैं ना, मम्मी हमेसा गुसियाती थीं कि आप हमलोग से खाली सिनेमा का बात बतियाते हैं, पढाई का बात नहीं. आज सिनेमा का रोग आपसे चलते हुए तीसरा पीढी तक पहुँच गया है! आसीर्बाद दीजिये कि बुढापा में हम अऊर किसोर अवस्था में आपका पोता-पोती आपको एगो फिलिम डेडिकेट कर रहे हैं! वी रियली मिस यू डैड!!

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

झूठा ब्लॉगर


अगर सादी-बियाह का न्यौता से आने के बाद कोनो अदमी दुल्हा-दुल्हिन का जिकिर नहीं करके, पकवान का जिकिर करे त समझ जाइये कि आप कोलकाता में हैं. पकवान का जिकिर भी बहुत सीरियसली अऊर एतना सुन्दर-सुन्दर सब्द के माध्यम से कि अगर आप बातचीत में सुरू से सामिल नहीं हैं, तो आपको लगेगा कि कोनो सुन्दरी के सौन्दर्ज का बरनन हो रहा है. आप कोनो निमंत्रन में चले जाइये, आपका आवभगत त जेतना बढिया से होगा ऊ त होबे करेगा, लेकिन चलते टाइम घर का लोग आपसे जरूर पूछेगा – रान्ना केमौन होएछे! (भोजन कैसा बना था). पकवान का सुन्दरता (स्वाद के नाम पर लोग जादातर शुन्दोर सब्द का प्रयोग करते हैं) बंगाल के मसहूर बिसेसन के साथ होता है – भीशौन शुन्दोर रशोगोल्ला छिलो! ‘भीसन’ सब्द का ऐसा इस्तेमाल हम बंगाल में ही देखे.

कुल मिलाकर, कोनो मामूली से मामूली चीज, चाहे बात भी किसी के बरनन से एतना खूबसूरत हो जाता है कि एकीन करना मोस्किल हो जाता है कि ओही चीज के बारे में कहा जा रहा है. असल में एही खूबी कोनो साधारन अदमी को कबि बना देता है. रोज निकलने अऊर डूबने वाला चाँद त सबलोग देखता है, बाकी ऊ चाँद में रोटी, कटोरा, अठन्नी, महबूबा त कोनो कबि चाहे सायर को ही देखाई देता है.

चचा गालिब का एगो मसहूर शे’र है:
ज़िक्र उस परीवश का, और फिर बयान अपना,
बन गया रक़ीब आख़िर, जो था राज़दान अपना.

माने पहिले त ऊ सुन्दरी परी के जइसा अऊर उसपर उसका सुन्दरता का बखान एतना सुन्दर कि दोस्त भी दुस्मन बन गया. सायद एही से लोग कहता है कि अदमी प्यार में सायर बन जाता है. जिसका सुन्दरता से दूर-दूर तक कोनो वास्ता नहीं, उसका खूबसूरती भी अइसा बयान करता है कि ऊ दुनिया का सबसे सुन्दर लड़की देखाई देने लगती है.

मगर सुन्दरता का बात खाली काहे कहते हैं. कभी-कभी कोनो घटना के बारे में कोई लोग अइसा फोटो खींच देता है कि लगता है आप आँख से देख रहे हैं. कोनो मामूली सा घटना भी किसी के सब्द का जादू से निखरकर एतना सुन्दर हो जाता है कि आपको अपना नजर पर सक होने लगता है कि धत्त ई त हम भी देखे थे, सच्चो एतना सुन्दर था! अऊर जो नहीं देखे रहता है, ऊ समझता है कि झूठ बोलता है, भला अइसन कहीं हो सकता है.

अपना ब्लॉग पर का मालूम केतना छोटा-बड़ा घटना हम आपलोग के साथ बाँटे होंगे. बहुत सा लोग ऊ घटना के बारे में जानकर खुस हुआ, चकित हुआ, मुग्ध हुआ, भावुक हुआ, नाराज हुआ, प्रेरित हुआ, दुखी हुआ, गौरवांवित हुआ, खीझ गया, लेकिन साथे-साथ अइसा भी लोग हमको मिला जो मुस्कुरा दिया अऊर बोला कि झूठमूठ का कहानी बनाता है. ई सब घटना इन्हीं के साथ काहे घटता है, हमरे साथ त कभी नहीं घटा!

अब हम का बताएँ. हमरे बात करने का तरीका में कोनो खोट रहा होगा कि सच्चो बात लोग को झूठ मालूम होता है. हम ऊ लोग से बिबाद, चाहे तर्क नहीं करते हैं, न कोनो सफाई देते हैं कि ई घटना सच है. बस चुपचाप आसमान के तरफ नजर उठाकर परमात्मा का सुक्रिया अदा करते हैं जो हमको उस घटना का पात्र या साक्षी बनाया अऊर अपने पूर्बज लोग को प्रनाम करते हैं कि उनके आसीस के बदौलत हमरे कलम में सचाई को ईमानदारी से बयान करने का ताकत मिला.

चार साल पहिले 21 अप्रैल 2010 में एगो बिहारी बोली में बतियाने वाला मामूली सा अदमी ब्लॉगर बनने का सपना लेकर एगो यात्रा सुरू किया था. आज चार साल हो गया अऊर पीछे पलट कर देखने पर बुझाता है कि बात-बात में एतना लम्बा रास्ता तय हो गया! परमात्मा से एही प्रार्थना है कि हमरे कलम का जोर ऐसहिं बनाए रखे कि लोग ई सोचने पर मजबूर हो जाए कि – चार साल हो गया ई अदमी को, झूट्ठा खिस्सा गढते हुये!!

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

हाय गजब कहीं तारा टूटा


अब त इयादो नहीं है कि आखरी बार जादू का सो कब देखे थे. बाकी जादू त जादूए होता है. एकदम नजर बाँध लेता है. एतना त समझ में आता है कि ई सब कोनो चमत्कार नहीं है, सब हाथ का खेला है, तइयो ई खेला में गजब का आनन्द आता है. जेतने अबिस्बसनीय, ओतने सच.

आजकल हमरे इधर भी एगो जादू का धूम मचा हुआ है - जादूगर बैताल. हमरा ऑफिस का इस्टाफ अऊर मकान मालिक का लइका भी जिद करने लगा कि चलिये देखने. अब हमरे पास त ऑफिस के बाद ब्लॉग पढने अऊर फेसबुक पर बतकुच्चन करने के अलावा कोनो काम त होता नहीं है. हम मान गये. छोटा थे त हमरे दादा जी अऊर बाद में हमरे मँझले फूफा जी हमसब बच्चा लोग को ले जाते थे सर्कस देखाने. हमहूँ सोचे कि जादू देखने के बहाने ऊ पुराना टाइम को फिर से जीने का अबसर मिलेगा. रंगीन तम्बू, प्लास्टिक का कुर्सी, चमचमाता हुआ इस्टेज, जोर-जोर से बजता हुआ गाना.

जादू का सो सुरू हुआ. बगले के गाँव का जादूगर था. बहुत कम उमर का 25-26 साल से जादा नहीं था. मगर बुझाता था कि बहुत सा सो कर चुका था, इसलिये उसका आत्मबिस्वास देखने लायक था. गाँव का सो था, इसलिये उसके जादू में लड़की लोग नहीं थी अऊर उसका असिस्टेंट सब उसी का भाई सब था. जादूगर के पिताजी इस्कूल के रिटायर्ड मास्टर थे अऊर गेट पर खड़ा होकर आने जाने वाले का स्वागत कर रहे थे. जादूगर अपना सो देखाने के बाद सब दर्सक से अनुरोध किया कि आजकल जादू, सर्कस त लोग सिनेमा चाहे टीवी का पर्दा पर देखना पसन्द करता है. ई टेक्नोलॉजी के कारन हमारा सांस्कृतिक धरोहर को बहुत नुकसान हुआ है. ई बात ऊ एतना मन से बोला कि मन भर आया!

बहुत लो बजट का सो होने के बाबजूद भी लगा कि जइसे ऊ जादू हमरे दिमाग में समा गया है अऊर हम जादू में गोता खाते हुए समय में बहुत पीछे चले गए. पटना का हार्डिंग पार्क में हमलोग सर्कस देखने जाते थे. तरह-तरह का जंगली जानवर का तमासा, सुन्दर सुन्दर लड़कियों का खेला अऊर नाटा-नाटा जोकर का मजाक. जबतक अगिला खेला चालू होता, तबतक जोकर का मजाक, आपस में लड़ाई, फटकारने वाला लकड़ी का तख्ता से मार-पीट, पीठ से पीठ जोड़कर उछलते हुये गोल चक्कर लगाना, आँख से, पीछे से पानी निकालना, एक हाथ से दोसरा हाथ में एक बार में का मालूम केतना गेन्दा उछालना, बिना गिराये हुए. राज कपूर का सबसे प्यारा सिनेमा एही सरकस पर आधारित था. अऊर ऊ जो बोल गए आखिर में ऊ आझो लोग मोहावरा के तरह इस्तेमाल करता है – द शो मस्ट गो ऑन!!


मगर सर्कस का जो हालत आज है ओही हालत राज कपूर साहब के “मेरा नाम जोकर” का हुआ. अब्बास साहब, जो राज कपूर के सब सिनेमा का कहानी लिखे थे, उनको भी ई बर्दास्त नहीं हुआ अऊर बोले कि एगो हिट फिलिम जरूर लिखेंगे ऊ. फिलिम लिखे “बॉबी” जो सुपर हिट हुआ. हम भी कहाँ से कहाँ भटक गये. गुलज़ार साहब कहते हैं कि इंसानी दिमाग भी ऐसने एगो सरकस के तरह है

एक तम्बू लगा है सरकस का,
बाज़ीगर झूलते ही रहते हैं
ज़हन ख़ाली कभी नहीं रहता!

अइसने एगो तम्बू लगा हुआ था साल 1994 में. उस समय भी हम बिहार के एगो गाँव में पोस्टेड थे अऊर ऊ गाँव में आया था एगो थियेटर. सब स्टाफ लोग मिलकर पूछा कि सर चलियेगा देखने. थियेटर बहुत बदनाम माना जाता था, इसलिये ऊ लोग डरते-डरते पूछा. हम पूछे कि का होता है इसमें. तब पता चला कि इसमें गाना बजाना होता है, नाटक-नौटंकी होता है.


अचानक हमरे मन में जाने का आया, हम तुरत तैयार हो गए. टिकट लेकर रात को खा पीकर तम्बू में जम गये. गाना सुरू हुआ, लड़की सब मेक-अप में आकर गाना  रही थी अऊर लड़का—लड़की मिलकर जुगल गीत भी गाते थे. अऊर बहुत सुन्दर गाना से भरपूर जबर्दस्त नाटक भी था उसमें. गाना से खुस होकर लोग ईनाम में रुपया भेंट करता था अऊर उनका नाम घोसित किया जाता था. कुछ लोग मजाक में नोट अपना जेब से देता था अऊर नाम अपना दोस्त का बता देता था. जब उनका दोस्त के नाम के साथ ईनाम का घोसना होता था सबलोग हँसने लगता था अऊर ऊ भाई साहब गरियाते हुए भुनभुनाते रहते थे. असल में लाउडिस्पीकर पर उनका नाम उनके घर तक सुनाई देता था अऊर घरे जाने पर घरवाली से पिटाई का खतरा भी था.

हम चुपचाप गाना-बजाना अऊर नाटक देख रहे थे. बाकी हमरे दिमाग में अलगे एगो खेला चल रहा था. लोग सीटी बजा रहा था, ताली बजा रहा था, बाह-बाह कर रहा था, मगर हम ऊ लिपिस्टिक से सना मुँह लिये हुये गीत गाने वाली एगो लड़की को देख रहे थे. जेतना अदा से ऊ गा रही थी

रहेगा इश्क़ तेरा ख़ाक में मिलाके मुझे,
हुए हैं इब्तिदा में रंज, इंतिहाँ के मुझे!

उसका चेहरा देखकर ई बुझाइये नहीं रहा था कि ऊ किसके लिये एतना बिभोर होकर गाना गा रही है. जबकि देखने वाला हर अदमी एही समझ रहा था कि ऊ उसी के लिये ई गाना गा रही है. हमरे दिमाग में का मालूम कऊन सोच डूब-उतरा रहा था. हमको ऊ लड़की हीरा बाई लग रही थी जो पता नहीं अपने कऊन हीरामन के लिये गाना गा रही थी. कोनो हीरामन था भी कि नहीं ऊ दर्सक मण्डली में.

थियेटर में बइठे हुये हमारे सामने फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ जी का ‘तीसरी कसम’ घूम गया. जब हम देखकर निकले, त हमरे पीछे से लाउडिस्पीकर पर गाना आ रहा था:

मारे गये गुल्फ़ाम, अजी हाँ मारे गये गुल्फाम!
उल्फ़त भी रास ना आई, अजी हाँ मारे गये गुल्फ़ाम!

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

हार की जीत की हार


बचपन में एगो कहानी पढ़े थे. अब हम कोनो अनोखा बच्चा त थे नहीं, आपलोग भी बच्चा रहे होंगे अऊर ओही कहानी आप भी पढ़े होंगे. कहानी था श्री सुदर्शन का ‘हार की जीत’. एतना ब्यौहारिक कहानी कि आज समाज से सम्बेदना मर जाने के बाद भी ऊ कहानी ओतने प्रासंगिक मालूम देता है. एगो डाकू, एगो साधु से भिखारी अऊर लाचार का भेस बनाकर उनका घोड़ा चोरा लेता है. साधु बाबा जाते-जाते उससे एही कहते हैं कि ई घटना का जिकिर तुम किसी से मत करना, नहीं त लोग का भरोसा गरीब लाचार पर से उठ जाएगा. डाकू का हिरदय परिबर्तन होता है अऊर ऊ चोराया हुआ घोड़ा वापस कर देता है. साथ में दू बूँद जिन्दगी का भी छोड़ जाता है – आँख का आँसू!

तीन-चार साल पहिले जब ब्लॉग के दुनिया में बड़े अरमान से पहिला कदम रक्खे थे, तब जो लोग का लिखना अच्छा लगता था, उनका अस्थान हमरे लिये कोनो सेलेब्रिटी से कम नहीं होता था. जइसे एगो बच्चा को साइकिल चलाना आ जाए, त ऊ घर के सामने वाली चाची के एहाँ भी साइकिले से जाता है, ओइसहिं जिसके ब्लॉग पर फोन नम्बर मिल जाता था उनसे बतियाने का भी मन करता था अऊर बात होने पर लगता था कि अमिताभ बच्चन से बतियाकर आए हैं.

एही बीच तनी खेल का नियम भी समझ में आने लगा अऊर ऊ सेर है न
कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिजाज़ का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो!
का मतलब भी बुझाने लगा. बहुत सा लोग का असलियत भी समझ में आया. अऊर आखिर में हम भी ओही सतरंज का एगो मोहरा बन गये. फरक बस एतना था कि हमरा बिसात अपना था अऊर गेम का रूल भी. लोग बेनामी-फेनामी कहते-कहते नाम से जानने लगा अऊर धीरे-धीरे पहचान बनता चला गया. कोसिस एही किये कि हमको हमेसा ई याद रहे कि आदमी जब चढता है त सीढी से अऊर जब उतरता है त टप्प से लिफ्ट से नीचे आ जाता है.

कुछ लोग हमको बहुत सम्मान दिया अऊर कुछ लोग को हम बहुत सम्मान दिये. जिनको हम सम्मान दिये उनसे मिलने, बतियाने का लालसा तब भी रहता था अब भी रहता है. सतीश सक्सेना जी, पण्डित अरविन्द मिश्र, जनाब अली सैयद साहब, अनूप शुक्ल, निशांत मिश्र, संजय अनेजा, अनुराग जी... एहाँ तक कि समीर लाल जी, मनोज कुमार जी, अऊर बहुत सा लोग. स्वप्निल से पहले बतियाना अऊर बाद में मिलना हमरे लिये गोल्डेन मोमेण्ट से कम नहीं था.

ऊ टाइम में महिला ब्लॉगर को लेकर एतना हंगामा चलता था कि कुछ लोग का सम्मान करते हुये भी बतियाते हुये डर लगता था. कभी-कभी चैट पर कोई मिल गया त बतिया लिये. एही दरमियान अब याद नहीं का बात था लेकिन कोई बात को लेकर हमको एगो प्रतिष्ठित महिला ब्लॉगर से बतियाने का जरूरत महसूस हुआ. मगर उनका नम्बर नहीं था. उनके करीबी लोग में से दू लोग हमरे भी बहुत अच्छे दोस्त थे. ऊ दुनो से अलग-अलग चैट पर बतिया रहे थे एक रोज. याद आया त हम पूछ लिये कि अगर उनका नम्बर हो तो मुझे दो. एगो से उत्तर मिला कि हमरे पास नहीं है अऊर दोसरका ब्लॉगर चैट लाइन काट दिहिन. तब हमको लगा कि हम कुछ जादा इमोसनल हो रहे हैं. काहे कि एतना अक्किल त भगवान देबे किये हैं कि समझ जाते कि ऊ लोग बताना नहीं चाह रहा है. बात खतम हो गया अऊर हमारा सम्बन्ध ऊ लोग के साथ ओइसहिं बना रहा.

करीब एक साल के बाद ओही महिला ब्लॉगर का फोन हमको आया. हमारा नम्बर उनको उन्हीं से मिला था जो हमको उनका नम्बर देने से मना कर दिये थे. ऊ पहिला बात हमसे एही बोलीं, “एक रोज आपने हमारा नम्बर माँगा था, तो आपको नहीं मिला था, देखिए आज हम आपका नम्बर लेकर आपको फोन कर रहे हैं. आपको निमंत्रण देना है.” हम गये उनके घर, सबसे मिले अऊर हमारा रिस्ता आज भी बना हुआ है.

अइसहिं दीदी गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी के एगो कबिता का समीच्छा मनोज जी के ब्लॉग पर “आँच” में परकासित हुआ था. मगर ऊ सूचना देने के बाद भी नहीं आईं, त हम सोचे फोन से सूचित कर दें. ऊ दिन डेढ दर्जन कुलश्रेष्ठ का नम्बर नेट से खोजकर निकाले मगर दीदी का नम्बर नहिंए मिला. फिर याद आया उनका “एकलव्य” अऊर बड़े भाई राजेश उत्साही. उनको पूछे त ऊ बोले कि पता लगाकर एस एम एस करते हैं. खैर नम्बर मिला, दीदी से बात हुआ, पता चला कि ऊ सहर से बाहर हैं एही से नहीं देख पाईं. अब त घरेलू रिस्ता हो गया है उनसे.

अइसहिं एगो पुरुस ब्लॉगर, एगो महिला ब्लॉगर से उनका फोन नम्बर माँगा था. ऊ महिला भी अपना नम्बर दे दीं बाबा भारती के तरह उस पर भरोसा करके. उसके बाद एगो लम्बा सिलसिला चला टॉरचर का. ऊ महिला ब्लॉगर का परिबार बिखर गया. घर के अन्दर अदृस्य दीवार खड़ा हो गया. और पिछला दू साल से ई हाल है कि उनका जिन्नगी घर में बिछावन, हस्पताल में आई.सी.यू., नर्स, इंजेक्सन, दवाई, बेहोसी, लाचारी अऊर कमजोरी के बीच पिसकर रह गया है. हम जब फोन करते हैं त उनका एक्के रट रहता है – फ़ोन कर लिया करो बीच बीच में. अच्छा लगता है!

कहाँ आजकल मिलता है डाकू खड़गसिंह जो बाबा भारती के ई कहने पर कि ई बात किसी को मत बताना नहीं तो कोई भी महिला ब्लॉगर कोनो पुरुस ब्लॉगर को अपना फोन नम्बर देने में हजार बार सोचेगी- अपना आँख से दू बूँद आँसुए गिरा देता ताकि ऊ औरत जो हर पल अपना मौत का इंतजार कर रही है, उसको एगो आसान मौत मिल पाता!! 

(परमात्मा उनको लम्बी उम्र दे!)

शनिवार, 8 मार्च 2014

नारी


आज “सम्वेदना के स्वर” का कुछ पुरनका पोस्ट सब पढ रहे थे, तब अचानक नजर पड़ा हमारे अभिन्न चैतन्य आलोक जी के कबिता पर. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिबस पर जब 2011 में ई कबिता अपने ब्लॉग पर पर्कासित किए, त रचना जी इसको अपने ब्लॉग पर सेयर कीं. कोनो महिला बिसय पर लिखा जाना अऊर उसको रचना जी के द्वारा सेयर किया जाना, अपने आप में एगो बहुत बड़ा उपलब्धि है.

आज ई कबिता पढते हुए, फिर से आँख भीज गया. लगा आज इसको हम भी सेयर कर लेते हैं.  


वो मेरी तुमसे पहली पहचान थी
जब मैं जन्मा भी न था
मैं गर्भ में था तुम्हारे
और तुम सहेजे थीं मुझे.

फिर मृत्यु सी पीड़ा सहकर भी
जन्म दिया तुमने मुझे
सासें दीं, दूध दिया, रक्त दिया तुमने मुझे.

और जैसे तुम्हारे नेह की पतवार
लहर लहर ले आयी जीवन में

तुम्हारी उंगली को छूकर
तुमसे भी ऊँचा होकर
एक दिन अचानक
तुमसे अलग हो गया मैं.

और जिस तरह नदी पार हो जाने पर
नाव साथ नहीं चलती
मुझे भी तुम्हारा साथ अच्छा नहीं लगता था
तुम्हारे साथ मैं खुद को दुनिया को बच्चा दिखता था.

बचपन के साथ तुम्हें भी खत्म समझ लिया मैने
और तब तुम मेरे साथ बराबर की होकर आयीं थीं..

बादलों पर चलते
ख्याब हसीं बुनते
हम कितना बतियाते थे चोरी के उन लम्हों में
दुनिया भर की बातें कर जाते थे

मै तुम पर कविता लिखता था
खुद को पुरूरवा
तुम्हें उर्वशीकहता था.

और जैसा अक्सर होता है
फिर एक रोज़
तुम्हारे पुरूरवाको भी ज्ञान प्राप्त हो गया
वो उर्वशीका नहीं लक्ष्मी का दास हो गया

तुम फिर आयीं मेरे जीवन में
मैने फिर तुम्हारा साथ पाया

वह तुम्हारा समर्पण ही था
जिसने चारदीवारी को घर बना दिया
पर व्यवहार कुशल मैं
सब जान कर भी खामोश रह गया

और उन्मादी रातों में
तुम जब नज़दीक होती
यह पुरूरवा”, “वात्सायनबन जाता
खेलता तुम्हारे शरीर से और रह जाता था अछूत
तुम्हारी कोरी भावनाऑ से

सोचता हूं ?
इस पूरी यात्रा में
तुम्हें क्या मिला
क्या मिला

एक लाल
और फिर यही सब .....

और जब तुमने लाली को जना था
तो क्यों रोयीं थीं तुम
क्यों रोयीं थीं???

                     -    चैतन्य आलोक