बुधवार, 1 मई 2013

Ray of Ray


(यह आलेख मेरे भाई शशि प्रिय वर्मा के अंग्रेज़ी लेख का अनुवाद है. यह आलेख उसके पुत्र अनुभव प्रिय की स्कूल पत्रिका के लिए अभिभावकों की श्रेणी में प्रकाशित हुआ था. आज सत्यजीत राय की जयन्ती के अवसर पर उस लेख का हिन्दी अनुवाद श्री शिवम मिश्र के विशेष आग्रह पर!)

गांधी”, सिनेमा के इतिहास में एक महानतम फिल्म है. इसने ग्यारह ऑस्कर के लिए नामांकित होकर आठ ऑस्कर जीते, जिसमें भारतीय कौस्च्यूम डिजाइनर भानुमति अथय्या ने संयुक्त रूप से यह पुरस्कार प्राप्त किया और वो भारत की पहली ऑस्कर विजेता बनीं.
लेकिन मैं न तो ऑस्कर की बातें करने जा रहा हूँ, न भानु अथय्या की!

सर रिचर्ड एटेनबरो ने उस फिल्म का निदेशन किया था, जो स्वयं एक बेहतरीन अदाकार हैं और जिन्होंने अभिनय की शिक्षा RADA (Royal Academy of Dramatic Arts) से ग्रहण की. उन्हें भी इस फिल्म के लिए ऑस्कर मिला था. उनकी अदाकारी जुरासिक पार्क (१९९३) में देखने को मिली थी, वो भी वर्ष १९७७ में उनके द्वारा अभिनीत एक फिल्म के बाद.
लेकिन मैं एटेनबरो की बात भी नहीं करने जा रहा. मैं तो उस फिल्मकार की बात करने जा रहा हूँ जिसके लिए उन्होंने वर्ष १९७७ में काम किया था.

इसके पहले कि मैं उनका नाम लूँ, उनका एक छोटा सा परिचय ज़रूरी हो जाता है. वह अपनी पहली फिल्म से ही एक चुनौती बन गए थे, दुनिया भर के फिल्मकारों के लिए. उन्होंने दुनिया भर के लगभग तमाम फिल्म-पुरस्कार हासिल किये और साल दर साल सारे पुरस्कारों को एक से ज़्यादा बार हासिल किया, सिवा ऑस्कर के. आखिरकार, ऑस्कर भी उनके पास आया, फ़िल्म-जगत को उनके योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्डके रूप में. बीमारी के कारण वो पुरस्कार प्राप्त करने नहीं जा सके इसलिए ऑस्कर कमिटी ने खुद उन तक जाकर उन्हें वो पुरस्कार प्रदान किया. उन्हें फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान और भारतवर्ष का भारत रत्नसम्मान प्रदान किया गया. जी हाँ, वो एक भारतीय था, जिसने हिन्दी में सिर्फ दो फ़िल्में ही बनाईं, बाकी अपनी मातृभाषा बांग्ला में. वर्ष 1977 में सर रिचर्ड एटेनबरो ने उनकी ही फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में काम किया, जो उनकी पहली हिन्दी फिल्म थी. वे फिल्मकार और कोई नहीं सत्यजित राय थे!

उनके जीवन काल के विषय में बहुत कुछ उपलब्ध है. उन्हें मैं दोहराने नहीं जा रहा. सत्यजीत राय की चर्चा अधिकतर उनकी फिल्मों को लेकर ही हुई है. यह बात भी सही है कि वो भारतीय सिनेमा के महानतम फिल्मकार थे. लेकिन जैसे खोटा सिक्का दोनों तरफ से ही खोटा होता है, वैसे ही खरे सिक्के के दोनों ओर कोई नहीं देखता. मुझे उनके दूसरे पहलू का तब पता चला जब मेरा उनके साहित्य से सामना हुआ. तब मैंने जाना कि वे भले ही एक महान फिल्मकार थे, किंतु दिल से बच्चे ही थे. वर्ष 1961 में उन्होंने अपने दादा जी के प्रकाशन का काम सम्भाल लिया, जो दादा जी ने बीच में ही छोड़ दिया था. राय ने बाल-पत्रिका सन्देश का पुन: प्रकाशन प्रारम्भ किया. उनकी कहानियाँ रहस्य-रोमांच से भरपूर और सामान्य जानकारियों से बुनी हुई होती थीं. उन्होंने अपनी कहानियों में गणित, भूगोल, इतिहास, मनोविज्ञान, संगीत तथा पुरातत्व के तथ्यों का भरपूर इस्तेमाल किया. उनकी कहानी कहने की कला रोमांचक और कई बार रोंगटे खड़े कर देने वाली होती थी. यही नहीं उनकी कहानियों में हर उम्र के व्यक्ति के लिये कुछ न कुछ अवश्य होता है.

मैंने उनकी पहली पुस्तक जो खरीदी वो थी प्रकाशन विभाग, भारत सरकार की हंसने वाला कुत्ता. मैं शुरू में इस किताब को खरीदने के प्रति उदासीन था और इसे मैने तब जाकर खरीदा जब ये 50% की छूट पर बिकने को आई. एक कुत्ता जो इंसान की तरह हंसता है और एक आदमी उसे किसी भी कीमत पर खरीदना चाह्ता है. चेक बुक निकालकर जब वो उसकी कीमत देना चाहता है तो वह कुत्ता ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगता है. कुत्ते के मालिक ने बताया कि उसके हंसने का कारण सिर्फ इतना है कि उस कुत्ते को पता है कि दुनिया में हर चीज़ पैसे से नहीं खरीदी जा सकती!

इस पुस्तक की सारी कहानियाँ पढने के बाद अगले ही दिन मेरे हाथ में सत्यजीत राय की पाँच और किताबें थीं. सोने का किला (राजकमल प्रकाशन), बादशाही अंगूठी (राधाकृष्ण प्रकाशन), सत्यजीत राय की कहानियाँ (राजपाल), जहाँगीर की स्वर्णमुद्रा (राजकमल) और मुल्ला नसरुद्दीन की कहानियाँ (राजकमल).

उनकी सारी कहानियों में सबसे उल्लेखनीय बात है उनके गढे हुए चरित्र, उनका नैरेशन और उनकी कल्पना की उड़ान. फेलु दा जैसा ज़हीन, जटायु जैसा थ्रिलर लेखक, प्रो. शंकु जैसा वैज्ञानिक (जिसने कम लागत में बड़े आविष्कार किये), प्रो. हिजबिजबिज जैसा सर्जन (जो मोमबत्ती की रोशनी में भी ऑपरेशन कर सकता है) सिर्फ उनकी सोच से ही जन्म ले सकते है. कहानियों का वर्णन इतना स्पष्ट कि वास्तविकता का आभास होता है. उनकी कहानियों को पढने के बाद आप फ्रांस, बेंगलुरु, जर्मनी, राजस्थान घूमने जायें तो आपको लगेगा कि आप यहाँ पहले भी आ चुके हैं. और उनकी कल्पनाशीलता तो कल्पना से भी परे है.

उनकी कल्पनाशक्ति की तुलना महान शेक्सपियेर से की जा सकती है जिन्होंने कॉमेडी ऑफ एरर में दो जोड़े जुड़वाँ की कल्पना की थी या फिर ‘मैकबेथ’ में उसकी मृत्यु का क्लाइमेक्स लिखा था.

मेरा अनुरोध है सभी बच्चों से और उनके अभिभावकों से कि अगर वे सत्यजीत राय को केवल एक फिल्मकार मानते हैं, तो एक बार उनकी कहानियाँ अवश्य पढें. मेरा अनुरोध उन सभी सिने-प्रेमियों से भी है जो उन्हें केवल एक प्रादेशिक या आंचलिक फिल्मकार मानते हैं कि वे उनकी फिल्में एक बार अवश्य देखें. उनकी फिल्मों का इतिहास और उनके द्वारा प्राप्त सम्मान/पुरस्कार इस बात के प्रमाण हैं कि कम्युनिकेशन गैप को भरने के लिये कम्युनिकेशन से बेहतर कोई रास्ता नहीं.

उनकी कहानी की पुस्तक के हर दूसरे तीसरे पृष्ठ पर उस कहानी से जुड़ा कोई रेखाचित्र आपको मिलेगा जिसे स्वयम सत्यजीत राय ने बनाया है. वे थीम के अनुसार स्केच बनाते थे और स्केच के अनुसार दृश्य को विज़ुअलाइज़ करते थे. फिल्मों की पटकथा लिखते समय उन्हें इससे काफी मदद मिलती थी. यही नहीं, उनके विस्तार का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपनी शुरुआती तीन फिल्मों को छोड़कर उन्होंने सभी फिल्मों का संगीत निर्देशन किया और हर पात्र के ड्रेस डिज़ाइन करने से लेकर फिल्म के पोस्टर तक डिज़ाइन किये. 

आज कई फिल्मकार अपने नाम से पहले ड्रीम मर्चेण्ट या शो-मैन जैसी उपाधि लगाते फिरते हैं, सत्यजीत राय ने कभी इन शब्दों की ओर ध्यान भी नहीं दिया. वे स्वयम लफ्ज़ों के शाहंशाह थे.

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि 2 मई 1921 को जन्मा, यह एक बहुत ही दुर्लभ प्रजाति का प्राणि था, जो 23 अप्रैल 1992 को इस जगत से विलुप्त हो गया. 

रविवार, 21 अप्रैल 2013

प्रसव पीड़ा


“हेलो सर जी! क्या चल रहा है!”
“अरे कुछ नहीं, बताइये!”
“एक मजेदार कांड हो गया. पता है......!”
लगभग अइसहीं हम दुनो का बात चीत सुरू होता है. अब इसमें संबाद का अदला बदली भी आम बात है. डिपेंड करता है कि फोन किया कउन है. केतना बार उनका फोन आया त हम बोले कि पूछिए मत लेबर पेन से छटपटा रहे हैं.
“कोई बात नहीं, सलाइन चलने दीजिए, डिलीवरी नोर्मल होगी!”
एतने नहीं, आधा एक घंटा के बाद फिर पूछेंगे, “क्या हुआ?”
“बस हो गया!”
“तो चलिए मुँह दिखाइए! इरशाद”
अऊर इसके बाद सुरू होता है सिलसिला चैतन्य बाबू को फोन पर पोस्ट सुनाने का, माने बच्चा का मुँह देखाई. एगो अऊर बात बड़ा मजेदार ई रहा है कि आजतक बिना इरसाद बोले हममें से कोनो आदमी सुनाना सुरू नहीं करता है.
बहुत सा पोस्ट को सुनते ही ऊ खुस हो जाते हैं, कोनो कोनो पोस्ट पर उनके आवाज से हमको बुझा जाता है कि बहुत पसंद नहीं हुआ. लेकिन उनके बात का हम अऊर हमरे बात का सम्मान ऊ करते रहे हमेसा.
एगो पोस्ट हम बहुत मन लगा कर लिखे थे. बहुत प्यारा था हमको. पूरा सुनने के बाद ऊ बोले, “बहुत सुन्दर है सर जी! लिखा भी शानदार है! लेकिन इसको पब्लिश मत कीजिये. जिन बातों के कह देने से अपशकुन होने की बात आप कह रहे हैं, उसपर पोस्ट लिखना भी तो कह देने जैसी बात है.”

उनका बात हमको दिल पर लग गया. भले ही ऊ पोस्ट हमको बहुत पसंद था, लेकिन आझो हमरे फोल्डर में पड़ा हुआ है. कुछ बच्चा गंडमूल नछत्तर में भी पैदा हो जाता है बेचारा.

दू दिन पहिले अइसहीं मन नहीं लग रहा था त सोचे कि चलो अपना पुरनका पोस्ट पढकर देखते हैं. एकदम नॉस्टैल्जिक लगा. बिस्वास नहीं हुआ कि बेनामी से सलिल वर्मा अऊर सलिल वर्मा से सलिल जी, सलिल जी से सलिल भाई अऊर सलिल भाई से चाचा, दादा, बाउजी, दाऊ, दादू, पापा अऊर पा. कभी सोचबे नहीं किये थे कि बात बात में बात एतना बढ़ जाएगा.

आज हमरे ब्लॉग का भी तीन साल हो गया.
हमरे सुरुआती टाइम का दू चार ठो कमेन्ट आपके साथ बांटना चाहते हैं. लोग का सोचते थे हमरे बारे में अऊर अब का दर्जा है हमारा उनके दिल में.

कुमार राधारमण:
ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है। मेरा शुरू से मानना रहा है कि ब्लॉग पर जितना सार्थक काम हो रहा है,उसमे से कम से कम पचास प्रतिशत का श्रेय छद्मनामी या अनामी ब्लॉगरों को जाता है। ठेठ भाषा की शैली में नाममात्र ब्लॉग लिखे जा रहे हैं। मुझे विश्वास है कि अगर आप ब्लॉग जगत में बने रहे,तो एक दिन आपका योगदान सार्वजनिक चर्चा का विषय बनेगा। शुभकामनाएं लीजिए।

शिवम मिश्रा:
मेरे हिसाब से बात यह जरूरी है की आप अपने ब्लॉग के मार्फ़त क्या कहेते है ना कि यह कि आप कौन है और कहाँ के है ??

मैं आपके ब्लॉग से जुड़ा क्योंकि आपकी बातो में मुझे अपनेपन का अहेसास हुआ और आपकी बाते दमदार लगी !! जिस किसी भी दिन यह दोनों खूबियाँ आप में नहीं होगी आप आप नहीं होगे और हम आपके साथ नहीं होगे !! वैसे बिहार का होने में कोई गुनाह नहीं है आप अपनी भाषा को और अपने आप को जो सम्मान दिलाने की कोशिश कर रहे है वह तारीफ के काबिल है !!

हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है !!


संजय अनेजा- मो सम् कौन:
ई लेयो भाई, पहला कमेंट हमरा झेलो।
अपनी पोस्ट पर कमेंट और अपने प्रदेश पर होने वाली कमेंट की बात करके आपने अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया है। 
फ़िर से कहता हूं, जब तक आप किसी की मानहानि नहीं कर रहे हैं, बेनामी होने के कारण या किसी प्रांत विशेष से संबंध रखने के कारण होने वाले भेदभाव के विरोध में हम भी आपके साथ हैं।


सतीश सक्सेना:
मेरा विचार है कि किसी लेखक के व्यक्तित्व को जानने के लिए आप उसके ३ - ४ लेख पढ़ लीजिये ! मेरा विश्वास है कि उसका सच्चा व्यवहार समझने में देर नहीं लगेगी ! आपकी पहली पोस्ट से आप एक भले मगर मज़बूत आदमी लगे ! प्रांतीयतावाद और भेदभाव इस देश से हर हालत में मिटना चाहिए ! इसके लिए लेख के माध्यम से आवाज उठाना मानवता और देश की सेवा ही है !
 
एक बात और कृपया गुरु जी न कहें ...मैं अपने आपको इस सम्मान के योग्य नहीं मानता ...हो सके तो दोस्त और भैया कहो उसमे बड़ा प्यार है!


नीरज गोस्वामी:
आज आपका ब्लॉग पे पहली बार आना हुआ और पहली बार में ही यहाँ का हो कर रह गया..आपक लिखने का अंदाज़ इतना रोचक है के एक के बाद एक कई पोस्ट पढ़ गया...दू जून का बात में आप गज़ब ही कर दिए हैं...अब आपका समझो मैं पक्का फैन हो गया हूँ...कोई रोक सके तो रोक ले...:))

स्व. डॉक्टर अमर कुमार:
মা গো.. কি রকম ভাল কথা.. (ओ माँ, कितनी सुन्दर बात)
কিন্তু একটু অব্যেক্শন তো..  (किन्तु एक ओब्जेक्शन है)
এঈটা কোলকাতার ও বাঁগালের কর্জ নেঈ (यह कोलकाता और बंगाल का क़र्ज़ नहीं)
আবার দিন দুঈগুলোর প্রতিদান বলবেন (इसके बाद दोनों को प्रतिदान बोलिएगा)

मनोज कुमार:
धुत्त मरदे!
इतना अपनापन से कोई लिखता है। आप त बात-बात में रुलाइए देते हैं। ई सब बात मने में रखते त काम नहीं चलता का।
अब छोटका भाई बना लिए हैं त आना त पड़ेगा ही। इधर बहुत दीन से दील्ली जाना हुआ ही नहीं है। ससुरारो बाला सब इयाद नहीं करता है। देखें "ऊ" अगर राखी बांधने का जीद की त जाना तो होगा ही।
हं एगो बात है। परिबार बढाते रहिए। इसमें नियोजन का कोनो जरूरत नहीं है।

सरिता दी:
aaj mai London pahuch gayee bitiya ke paas mere blog se mere bacche jude hai kahee bhee ho padte hai aur personally phone par batate hai apanee pratikriya.........

aapkee tippanee padkar aapkee shailee bahut acchee lagee. ( S F O se phone par bolee badee betee ) mamma uncle apane lagte hai...........
ise blog jagat se parivar jan saa sukh milta hai.....comments kee gintee mai nahee kartee par haa apanapan jaroor toul letee hoo .
bitiya ne yanhaa aate hee sabse pahile mera laptop activate kar diya.......

अब का कहें.. बहुत कुछ बिखरा सा है. बहुत सा रिस्ता समेट लिए. हाँ, सरिता दी का एक्के बात दिमाग में हमेसा रहा कि कमेंट्स का गिनती कभी नहीं किये, हाँ अपनापन जरूर तौल लेते रहे.

कहानी, कबिता, नज़्म, संस्मरण, समीक्षा सब लिखे. सम्मान और अवार्ड के नाम पर रिस्ता बनाते रहे. कभी गायब रहे तो महीनों नजर नहीं आये, मगर हालचाल सबका पता लगाते रहे! अपनापन भी कोनो चीज है भाई. अऊर एही त पहचान है हमारा!!

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

Diamonds are forever!!


कभी-कभी हमको अपना ऊपर बहुत गोस्सा आता है कि जहाँ पढा-लिखा लोग-बाग, अपना बात कहने के लिये गीता-पुरान, उपनिसद अऊर ग्रंथ का उदाहरन देता है, हम सिनेमा का उदाहरन देकर अपना बात कहते हैं. मगर जाने दीजिये मतलब त बात कहने से अऊर समझ में आने से है. कुच्छो हो, सिनेमा त ऐसहूँ हमरे रग-रग में बसा हुआ है.

ऊ का है कि तब तक सिनेमा में आतंकबाद नहीं आया था. अपराध माने स्मगलिंग - ऊ भी हीरा का. रॉबर्ट एगो काला रंग का पोटली निकालकर लॉयन को थमाता है अऊर उसके अन्दर से ढेर सा हीरा निकलकर चमकने लगता है. हीरा से जादा चमक लॉयन के आँख में देखाई देता है. ऊ घूमकर गोली चलाता है अऊर रॉबर्ट ओहीं जमीन पर गिरकर ढेर हो जाता है. लॉयन अपना बाकी आदमी से बोलता है, कफन में जेब नहीं होती, मगर इस मुर्दे की जेब भी है और असली हीरे उसमें ही हैं. निकाल लो हीरे और इसकी लाश को माहिम की खाड़ी में फेंक दो!
बहुत बड़ा मकान था. तिनमहला था मगर बहुत लम्बा-चौड़ा. फाटक के जगह पर बड़ा-बड़ा लोहा का ग्रिल, बीच में छोटा सा दरवाजा, एक आदमी के जाने भर, पीछे एगो गार्ड हाथ में बन्दूक लिये हुये. सीढी चढकर, जैसहिं हम दरवाजा खोले कि घूमने वाला कुर्सी के पीछे से आवाज़ आया, आइये साहब!
सामने पूरा देवाल पर टीवी स्क्रीन लगा हुआ था अऊर फाटक से लेकर एहाँ तक हमरा एक-एक कदम निगरानी में था. एही नहीं, तिनमहला मकान के हर कमरा पर एहीं से निगरानी रखा जा रहा था. हमको सामने वाला कुर्सी पर बइठने का इसारा हुआ.
बोलिये साहब क्या लेंगे, ठण्डा या गरम, चाय या कॉफी?
बस ठण्डा पानी.
क्या साहेब! पहली बार आये हैं तो सिरिफ पानी कैसे चलेगा...  ठण्डा आपो (लाओ)!
ठण्डा नहीं, चाय चलेगी!
जबतक चाय आता, हम अगल-बगल सीसा का कमरा में नजर दौड़ाये. टेबुल के ऊपर लैम्प जलाकर सैकड़ों जवान लड़का सब टेबुल में मूड़ी गड़ाये हुये काम में मगन था.
देखिये साहब! यही हमारा छोटा सा काम है!
एतना बात बोलते हुये ऊ कागज का पुड़िया निकाला अऊर हमरे सामने एक मुट्ठी हीरा निकाल कर रख दिया. सामने चमचमाता हुआ हीरा देखकर हमको भी अजीब तरह का सिहरन होने लगा. याद आया कि बचपन में जब हमरा छोटा भाई दादा जी के ऑफिस जाता था (माँ-पापा के साथ), त दादा जी उसको पोस्ट ऑफिस का तिजोरी खोलकर देखा देते थे जिसमें नोट भरा रहता था. हमरे भाई का आँख देखने लायक होता था ऊ समय. ऊ मम्मी को कहता था कि दादा जी से पैसा माँगने पर मना कर देते हैं अऊर सब पैसा ऑफिस में रखते हैं.
फिर ऊ आदमी हमको पूरा फैक्टरी घुमाने ले गया. मामूली गन्दा पत्थर, एकदम सेन्धा नमक का ढेला जइसा, मगर लेजर से काटने अऊर पॉलिस करने के बाद जब ऊ चमक लेकर हमलोग के सामने आता है त इतिहास गवाह है कि केतना लोग का नीयत खराब हो जाता अऊर केतना खून-खराबा हो जाता है.

पिछला तीन-चार महीना से एतना परेसान रहे हैं कि का बतायें. घर-ऑफिस का रोज का परेसानी के साथ-साथ एगो जरूरी दस्तावेज हमसे पहिले वाला आदमी लेना भुला गया अऊर पकड़ा गया हमारे टाइम में. सबको मालूम था, लेकिन जिम्मेवारी हमरा था. नौकरी में दाग, अनुसासनिक कार्रवायी अऊर पता नहीं का का होता. टेंसन अइसा कि कोई मदद करने वाला नहीं.

एक रोज एगो आदमी मिलने आया अऊर उसको हम मदद के लिये अपना समस्या बताये कि अगर कोई जान-पहचान से दस्तावेज मिल जाये तो हम अपना पइसा खर्च करके कलंक से त बच सकेंगे. ऊ बोला, साहब! आपके लिये हम इतना भी नहीं कर पाये तो लानत हम पर और आप जैसे नेक आदमी को यहाँ परेसानी हो,  ये हमसे बर्दाश्त नहीं होगा. आप मेहमान हैं हमारे. आपका पैसा नहीं खर्च होगा. तीन रोज में ऊ आदमी कागज लेकर हमारे सामने आया अऊर बोला, साहब! आप हंसते हुये अच्छे लगते हैं!

हम परेसानी के लेजर किरन के आँच में कटते अऊर रगड़ाते हुये अपना चेहरा का चमक बचा सके अऊर ई सोचकर खुस थे कि परमात्मा तकलीफ नहीं दे त इंसान हीरा कैसे बनेगा. एही अनजान सहर में ऊ हीरा जइसा आदमी हमको भेंटा गया.

अमित जी त रोज कहबे करते हैं, बाकी आज त हम भी आप लोग को कहेंगे कि
खुसबू है एहाँ के हर बात में,
अरे, कुछ दिन त बिताइये गुजरात में!

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

इन्साफ का तराजू


अगर गिरिजेश राव जी का आह्वान नहीं होता त सायद हम ई पोस्ट नहीं लिख रहे होते. अभी साल २०१२ के जाते-जाते जउन घटना घटा है, उसके बाद नया साल का बधाई अऊर सुभकामना देने का मन नहीं किया. एही सुभकामना २०१२ के जनवरी में भी दिए होंगे अऊर ऊ बेचारी को भी दोस्त लोग बोला होगा – हैप्पी न्यू ईयर!! मगर उसके लिए नरक का तकलीफ से बढकर हो गया ई साल. का फायदा ई सुभकामना का. सब बिधाता का लिक्खा है त उसी के हाथ में छोड़ कर अपना काम करते हैं, जब ओही आकर सुभकामना देगा त मानेंगे कि सब सुभ होगा.

खैर, २०१२ जाते जाते सरकार के सम्बेदनहीनता का नमूना देखा गया, नेता लोग के मुँह पर कोनो कंट्रोल नहीं है ई बता गया, हमरा संबिधान का मौलिक अधिकार केतना खोखला है ई समझा गया अऊर देस का अदालत कइसे घोंघा के चाल से इन्साफ करता है, इहो समझ में आया. सवाल उठा कि हमारा न्याय ब्यबस्था कइसा होना चाहिए अऊर तत्काल एगो कमीसन बना दिया गया. सरकार अब तान कर सो सकता है अऊर कमीसन अपना काम करेगा. आमीन बोलिए, चाहे इंसा अल्लाह!! जब हो जाए तब एकीन करेंगे.

सबसे पहिला बात जो हमरे जइसा साधारण आदमी के मन में आता है, ऊ ई है कि क़ानून एतना कम्प्लिकेटेड काहे है भाई. हमरे ऊपर होने वाला अत्याचार को प्रोक्सी के माध्यम से कोनो आदमी कइसे समझा सकता है. हमको चोट लगा हो तो हमरा दर्द महसूस कराने के लिए हमको एगो ओकील चाहिए!! जब ऊ समझायेगा कि हमको दफा फलाना के अंतरगत चोट लगा है तब न्यायमूर्ति को समझ में आएगा कि चोट का इंटेंसिटी केतना है!! कमाल है. जब हम क़ानून के बिद्यार्थी हुआ करते थे, तब एक रोज किलास में एही बात अपना प्रोफ़ेसर साहब को बोल दिए. नतीजा आप सोचिये सकते हैं कि हमको किलास से बाहर निकाल दिया गया.

अमेरिका में कोनो आदमी को गिरफ्तार करने के समय उसको बताया जाता है कि कउन जुर्म में, कउन धारा के अंतर्गत गिरफ्तार किया जा रहा है. हमरे इहाँ त पहिले धरा जाता है तब धारा लगाया जाता है. कारन खाली एतना है कि साधारण आदमी के अधिकार का रक्छा के लिए बना हुआ क़ानून उसके भासा में हइये नहीं है. इहाँ तक कि पढ़ा लिखा आदमी के समझ से भी बाहर है. अब क़ानून बांचने के लिए गिद्ध लोगों के पास जाइए, जहाँ दुनो तरफ से गिद्ध लोग आपको नोचना सुरू करेगा. अऊर कहीं गलती से पीड़ित बलात्कार का सिकार हो तो बस समझिए हर सुनवाई में उसके साथ बलात्कार होना तय है. कभी कोनो न्याय ब्यबस्था को ई ध्यान नहीं आया कि महिला पुलिस इस्टेसन के तर्ज पर महिला अदालत बनाया जाय, जहाँ औरत न्यायाधीस, औरत वकील हो, जो कम से कम बयान को संतुलित रख सके अऊर बे-इज्जत होने वाला औरत के इज्जत का ख्याल कर सके.

क़ानून के बारे में बचपन से दू गो मोहावरा सुनते आ रहे हैं. सौ अपराधी भले छूट जाए, मगर एगो निरपराध को सजा नहीं मिलना चाहिए. निरपराध का त पता नहीं अपराधी को छोडने का काम का मालूम कब से चल रहा है. एगो आदमी को तो सारा जिन्नगी जेल में बिताने के बाद बताया गया कि ऊ केस जीत गया है अऊर ऊ निरपराधी है. बाह, कमाल का इन्साफ है. जेल से आजाद करने के बाद उसका जवानी, उसका परिबार से छूटा हुआ प्रेम कउन वापस करेगा, मी लॉर्ड!!

दोसरा मोहावरा है क़ानून में देर है मगर अंधेर नहीं है. इहाँ भी फस्ट हाफ पर अमल होता है. न्याय एतना न देर से होता है कि आदमी का सबर जवाब दे जाए. केतना बार त बेचारा फरियादी के मर जाने के बाद उसको न्याय मिलता है. कोनो आदमी उसके कब्र पर जाकर बोल आता है कि सत्यमेव जयते! अऊर बेचारा अपना कब्र में छाती ठोंक कर खुस हो जाता है कि हमारा आस्था बहुत मजबूत हुआ है देस के न्याय बेवस्था पर.

सरकारी आंकड़ा पर बिस्वास कीजियेगा त देस में पेंडिंग केस का संख्या कम से कम छौ अंकों में चला जाएगा. एही नहीं पाकिटमारी से लेकर हत्या तक का मामला एक्के इस्पीड से निपटाया जा रहा है. मी लॉर्ड, तनी सोचिये कि हस्पतालो में इमरजेंसी वार्ड होता है. सोचिए कि मरने वाला मरिज को रात में बोला जाए कि सबेरे दस बजे ओ.पी.डी. में आना. हद्द है.

मी लॉर्ड! इस्पीड बढ़ाइए. जउन बच्ची के साथ बर्बरतापूर्ण अत्याचार हुआ है, ऊ बेचारी त १०-१५ दिन भी नहीं ज़िंदा बची, अऊर उसका देह नोचने वाला सिकारी जानवर धराने के बाद भी क़ानून के कउन धारा के अंतर्गत सजा पायेगा ई सोचने में एतना टाइम लग रहा है, तब त बेचारी को अगिला जनम लेकर फिर से आना पडेगा इन्साफ के लिए.

फिलिम “इन्साफ का तराजू” में एही समस्या को बहुत बढ़िया से देखाया गया था. इहो बताया गया था कि मुजरिम को छोड़ देने के कारण ऊ दोबारा बलात्कार का कुकर्म किया. अब क़ानून ई बताए कि दोबारा वाला बलात्कार के लिए कउन दोसी है???

जब आदमी को भूख लगा होता है तब्बे खाना खाने संतोस होता है. न्याय जब देरी से होता है त भूख मर जाता है. मी लॉर्ड, माना के आपके आँख पर पत्ती बंधा हुआ है अऊर माथा पर नकली बाल लगाकर आप अपना चेहरा छिपाए हुए हैं.. मगर ऊ सब के नीचे देखिये कि आपके कान में रुई नहीं भरा हुआ है. आप बयान सुनते हैं, दलील सुनते हैं, मगर माई-बाप कभी उस लडकी का चीख आपको नहीं सुनाई देता है बैकग्राउंड में? देस में उठने वाला लाखों जनता का पुकार नहीं सुनायी देता है?

सायद खिस्सा रहा होगा कि एही देस में कोनो राजा खाली जंजीर हिलाने का आवाज सुनकर सुतला में उठकर चला आता था, ई सोचकर उसके परजा में से किसी को कोनो तकलीफ हुआ है अऊर उसको न्याय चाहिए!!

शनिवार, 29 दिसम्बर 2012

काला शनिवार


आज इस साल ने जाते जाते,
मुँह पे कालिख सी पोत डाली है.
सर झुकाए हैं, शर्मसार हैं हम!!
  

मंगलवार, 18 दिसम्बर 2012

(कु)सभ्यता

दिल्ली कभी हमरे सपना का सहर नहीं था. नौकरी के सिलसिला में दू-एक बार हमसे पूछा भी गया दिल्ली जाने के लिए, त हम मना कर दिए. मगर जब २००५ में हम दिल्ली आये, तब सोचे कि चलो मन मारकर रह लेते हैं. ओही टाइम में जब हम नोएडा में रहते थे, तब निठारी कांड सामने आया. तब हम एगो लंबा नज़्म लिखे थे. आज जब दिल्ली में एतना बड़ा कांड हुआ है त अचानके हमारा नज़्म सामयिक हो गया.
कभी इसको हम ब्लॉग पर प्रकाशित नहीं किये, लेकिन आज रोक नहीं पा रहे हैं!

तुम मुझे दो एक अच्छी माँ, तुम्हें मैं एक अच्छा राष्ट्र दूँगा.

बात तो जिसने कही थी सच कही थी
पर भला वो भूल कैसे ये गया कि
पूत कितने ही सुने हैं कपूत लेकिन
माँ कुमाता हो, नहीं इतिहास कहता.

माँ कहा करते थे नदियों को,
और उनको पूजते थे
तब कहीं जाकर जने थे सभ्यता के पूत ऐसे
आज भी है साक्षी इतिहास जिनका.

पुस्तकों में था पढा हमने कि
दुनिया की पुरानी सभ्यताएँ
थीं फली फूली बढीं नदियों के तट पर.
याद कर लें हम
वो चाहे नील की हो सभ्यता या सिंधु घाटी की
गवाह उनके अभी भी हैं चुनौती आज की तकनीक को
चाहे पिरमिड मिस्र के हों
या हड़प्पा की वो गलियाँ, नालियाँ, हम्माम सारे.

माँ तो हम सब आज भी कहते हैं नदियों को
बड़े ही गर्व से जय बोलते हैं गंगा मईया की,
औ’ श्रद्धा से झुकाते सिर हैं अपना
जब गुज़रते हैं कभी जमुना के पुल से.

वक़्त किसके पास होता है मगर
कुछ पल ठहरकर झाँक ले जमुना के पानी में
था जिसको देखकर बिटिया ने मेरी पूछा मुझसे,
“डैड! ये इतना बड़ा नाला यहाँ पर कैसे आया?
कितना गंदा है चलो
 जल्दी यहाँ से!”

कैसे मैं उसको ये बतलाऊँ कि इस नाले का पानी,
हम रखा करते थे पूजा में
छिडककर सिर पे, धोते पाप अपने,

काँप उट्ठा दिल उसी दिन
दुर्दशा को देखकर गंगा की, जमुना की.
आज की इस नस्ल को क्या ये नहीं मालूम,
नदियाँ हों जहाँ नाले से बदतर,
जन्म लेती है निठारी सभ्यता,
जिसमें हैं कत्ले-आम और आतंक के साये.
उजडती आबरू, नरभक्षियों का राज!

मित्रों,
आपको मालूम हो उस शख्स का कोई पता
तो इस नगर का भी पता उसको बताना,
और कहना
आके बस इक बार ये ऐलान कर दे,

तुम मुझे दो एक अच्छी माँ
तुम्हें मैं एक अच्छा राष्ट्र दूंगा!