शनिवार, 1 मार्च 2014

मेरी आवाज़ ही पहचान है


एगो बहुत पुराना कहावत है कि जब आप किसी को इज्जत देते हैं, त आपको भी इज्जत मिलता है. ई बात जेतना सजीव लोग पर लागू होता है ओतने निर्जीव पर भी लागू होता है. सजीव माने आदमी, जानवर अऊर पेड़-पौधा अऊर निर्जीव माने...? तनी सोचिये कि निर्जीब चीज को का इज्जत देंगे हम अऊर ऊ हमको का इज्जत देगा. बाकी अइसा बात नहीं है.

चलिए एगो बात बताइये. आप लोग के साथ केतना बार अइसा हुआ होगा कि कोनो समान, चाहे जरूरी कागज, कोनो किताब कहीं रखा गया अऊर जब आप उसको खोजना सुरू किए त ऊ मिलबे नहीं किया. हर सम्भब जगह पर खोजने के बाद भी ऊ आपको देखाई नहीं दिया. आखिर में हारकर आप मने-मन पछताते हैं कि ठीक से रखे होते त एतना परेसानी नहीं होता. ओही घड़ी आपका बच्चा चाहे घर का कोनो आदमी आकर आपसे पूछता है, यही ढूँढ रहे थे न आप? ये रहा... आलमारी के निचले ख़ाने में रखा था!आप हैरान होते हैं कि तनी देर पहिले त आप पूरा आलमारी देख गये थे, निचलका खाना भी देखे थे. ओ घड़ी त ओहाँ नहीं था, अभी कइसे आ गया!!

तनी सोचिए कि ऊ कागज, चाहे समान जब एतना जरूरी था त उसको सम्भालकर, हिफाजत से रखना चाहिए था ताकि जरूरत के बखत आसानी से मिल जाए. मगर आप उसको इज्जत नहीं दिए अऊर जहाँ-तहाँ रख दिए. अब बताइये, जब आप इज्जत नहीं दीजियेगा, त आपको कहाँ से इज्जत मिलेगा. ऊ समान आपसे अपना बेज्जती का बदला लिया. एही नहीं, जब आप बाद में पछतावा किए, त आसानी से मिल गया, ओही जगह जहाँ आप केतना बार खोज चुके थे. कोई बाहरी अदमी ओहाँ नहीं धर गया, आप ही रखे थे अऊर आपको मिल गया. ऊ का कहते हैं - ऐज़ सिम्पल ऐज़ दैट!!

चलिए एगो अऊर बात बताते हैं. बताते का हैं बस अपना मन का फीलिंग है ओही कहते हैं. कोनो ज्ञानी त हैं नहीं कि हम जो बोलेंगे ऊ पत्थर का लकीर हो जाएगा. गुलजार साहब का सायरी/नज्म का एक खासियत है जिसके कारन हर कोई उनका दीवाना हो जाता है. रोमाण्टिक से रोमाण्टिक बात कहने के लिये ऊ अइसा-अइसा प्रतीक खोजकर लाते हैं अऊर अइसा-अइसा सब्द का प्रयोग करते हैं कि पढने-सुनने वाला बस मोहित हो जाता है. उनका एही खासियत के कारन हम अपना जवानी का दिन से उनका दीवाना हैं अऊर ऊ समय से लेकर आज का नौजवान पीढी तक का फेवरिट हैं ऊ. जो सब्द हमारा रोजाना का बोलचाल से गायब हो चुका था उसको फिर से जिन्दा करने का काम ऊ किये अऊर जो लोग का वाकफियत था ऊ सब्द से उनको अपना भुलाया हुआ माटी का महँक याद दिलाते गए.

असल में ई शब्द भी इज्जत देने से आपको बदला में सम्मान दिलाता है. अऊर जब आप सब्द को सम्मान देते हैं त सब्द आपके साथ एतना परेम से खेलता है कि आपका पहचान बन जाता है. दिनकर जी का रस्मिरथी हो, निराला का सरोज-स्मृति, बच्चन जी का मधुसाला, गुलजार साहब का नज्म हो, के.पी.सक्सेना साहब का कोई आलेख, अपना पहचान अलग से बना लेता है. सलीम-जावेद अऊर फिलिम ‘सोले’ का सम्बाद आज 39 साल बाद भी अपना असर बनाए हुए है, खाली इसलिये कि का कहना है, कोन सब्द को कइसे प्रयोग करना है, यानि हर शब्द को इज्जत दिया ऊ लोग अऊर आज ओही सब्द उनको इज्जत दिला रहा है, मान-सम्मान दिला रहा है.

बास्तव में हर सब्द का बहुत सा मतलब होता है अऊर बहुत सा सब्द को बहुत तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन कब, कहाँ, कोन अर्थ में, किस तरह कोई बात को कहना है, ऊ कमाल का बात है. हमारे पंजाब में शब्द के साथ खेलना एकदम लोक परम्परा के जइसा है. लोग का बातचीत, मजाक करने का ढंग, उनके खुसमिजाजी को चार चाँद लगा देता है. अपने संजय अनेजा (मो सम कौन...) जी के ब्लॉग पर कभी कमेण्ट देखिए अऊर उनका जवाब देखिए. इनसे हाथ मिलाने के बाद उँगली भले गिनकर मत देखिए, लेकिन अपने कमेण्ट में कोनो सब्द का इस्तेमाल बहुत सोच समझकर कीजिये. आपके हर बात का जवाब देने का तरीका एतना खास है कि पोस्ट के बाद इनका कमेण्ट बोनस का काम करता है.

लोग अस्लील, फूहड़, घटिया चाहे जो मर्जी कह ले (उसपर अलग से बहस), लेकिन स्टैण्ड-अप कॉमेडी में जो पंजाबी लोग कमाल दिखाया है, ऊ कोई नहीं. चाहे सुदेस हो, भारती हो, सिद्धू जी हो या अपना कपिल सर्मा. यसराज फिल्म्स के एगो सिनेमा में काम करने के कारन कपिल का सो हफ्ता में दू दिन के जगह पर खाली एक्के दिन देखाया जाएगा. कपिल बताया कि सूटिंग में बेस्त रहने के कारन समय नहीं मिल पाएगा एही से एक दिन बन्द करना पड़ा. सत्तर मिनट के प्रोग्राम में हर दस सेकण्ड में मजाक गढना कोई आसान काम नहीं है अऊर हफ्ता में दू दिन एही काम करना त अऊर मोस्किल है.

सब्द साधना हो चाहे हर बात को इज्जत देना हो जब सध जाता है तब्बे हम कहते हैं कि अदमी हाजिरजवाब है. सिद्धू जी का तात्कालिक तुकबन्दी हो या कपिल का दस सेकण्ड में बनने वाला तात्कालिक मजाक या (आतममुग्ध होते हुये) फेसबुक पर हमरा कमेण्ट सब्द को इज्जत से दिमाग में रखने से आता है, जिसके भुलाने का त सवाले पैदा नहीं होता है अऊर भुलाइयो जाए त खोजने का जरूरत नहीं पड़ता है!

38 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही कहा आपने - किस शब्द का कहाँ प्रयोग किया जाय,यह भी बहुत मायने रखता है.नेताजी टाईप लोगों में तो और ज्यादा क्योंकि वही तो सबसे ज्यादा कहते फिरते हैं कि उन्हें गलत सन्दर्भ में पेश किया गया है.

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  2. वो कहा जाता है न कि कुछ लोग बोलना तो सीख जाते है पर कहाँ, क्या और कैसे बोलना है यह नहीं सीख पाते |

    पोस्ट के माध्यम से बढ़िया और काम का ज्ञान मिला दादा ... :)

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    1. ’कहाँ, क्या और कैसे बोलें’ इस विषय पर एक वर्कशॉप लगाईये न प्लीज़, पहला प्रतिभागी मैं बनूँगा। वैसे भी आजकल लर्निंग मोड और मूड दोनों में हूँ।

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  3. बात तो सौ आने सही है - इज्जत दोगे तो पाओगे … सामनेवाला भले भूल जाए, अगर आप अपने को इज्जत न दे पाए तो किसी को नहीं दे सकते और अपने साथ आप जो व्यवहार करते हैं, वह दूसरों के साथ करें तो सब अच्छा होता है। निर्जीव भी मन के अंदर सजीव हो तो वह सजीव बन साथ देता है .... और आपके कमेंट्स - उसमें से एक बौद्धिक खुशबू आती है, बिना किसी मिलावट के

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  4. बहुत बढ़िया बात और बहुत सुंदर प्रस्तुति...!!
    इज्जत देने से ही मिलता है चाहे वह हम खुद हो या कोई दूसरा हो या कोई निर्जीव चीज......

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  5. शब्भादों में बहुत शक्षाति है जीवंत तभी बनती है जब उसमें शब्दों का

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  6. शब्दों में बहुत शक्ति है ,उचित शब्दों का प्रयोग भाषा में जीवंतता का संचार करता है और कथन में प्रभाव लाता है .शब्द और अर्थ के गूढ़ संबंध समझे बिना वाणी की साधना संभव नहीं .

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  7. पता नहीं हम तो किसी सामान को इतनी ज्यादा इज्जत दे देते हैं कि बेचारा शर्मा कर छुप ही जाता है. मेरे परिवारजन, मित्र,रिश्तेदार सबको मेरी यह आदत ज्ञात है. मैं इतना संभाल कर कुछ रख देती हूँ कि वो मुझे ही जल्दी नहीं मिलता और पूछने पर सब कहते हैं तुमने सेफली कहीं रख दिया होगा:(

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  8. ढेर इज्जत देने से भी मामला गरबरा जाता है! बहुत संभालकर रखा कागज भी नहीं मिलता।

    सही कहा आपने संजय जी की पोस्ट उनकी पोस्ट पर आये कमेंट और उनके उत्तर से सुपर हिट हो जाती है। देखें इहाँ का लिखते हैं!

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  9. शब्द को दिये सम्मान से ही सम्मान मिलता है। सोच समझ कर लिखना और कहना चाहिये।

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  10. हम भी सोचते हैं कि कोई न कोई विज्ञान जरुर होगा निर्जीव सामानों की अठखेलियों में जैसे वे मुंह सी बिराती हों -हमको निरा निर्जीव ही समझ लिए हो का बाबू ? :-) इसी तरह जब मोबाईल चार्जर लीड और और तार वार आपस में उलझते हैं तो लगता है वे चिढ़ाते हैं हमें!

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  11. इंसान की पहचान उसके बात-व्यवहार से ही होती है ..
    बात-बात में बहुत अच्छी सीख मिलती हैं आपके लेख से ...

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  12. अत्यंत सार्थक पोस्ट। बड़ी प्यारी लगी. आपने शब्दों को बड़ी इज्जत दी है.

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  13. बहुत सही कहा आपने । हम बेध्यानी चीजों को यों ही डाल देते हैं और वक्त पर बेहद परेशान होते हैं । मेरे साथ ऐसे हादसे अक्सर होते हैं । मैं जब कहती हूँ कि मैंने चीज सम्हाल कर रखी थी तो बच्चे कहते हैं कि तब वह चीज बिल्कुल नही मिलेगी । फिर भी अब मैं चीजों को इज्जत देने लगी हूँ ।
    हाँ हाज़िरजबाबी एक वरदान है जो सभी को नही मिलता । शब्दों का सही प्रयोग करने वाले लोग हर जगह अपनी जगह बना लेते हैं । भाई आप भी तो कितनी सहजता के साथ अपनी बात कह जाते हैं ,जबकि हम जैसे लोगों को जाने कितनी बार सोचना पडता है ।

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  14. शब्द की महिमा शब्दों से ही समझा दी , जय हो ..... सादर !

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  15. सब्द मुंह से निकलता है और उसी को लेके अपना इहां एगो फकरा बरा फेमस है - इहे मुंह पान खिलाता है और इहे मुंह .. उंह छोरिए... सब्द को ... में समझ लीजिए।

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  16. निश्चित ही निरादर भाव से वस्तुओं को रखने पर सहजता से प्राप्त नहीं होती. यह महत्वपूर्ण वस्तुओं के साथ मानसिक लापरवाही का ही परिणाम होता है, व्यवहार में चाहे कितना भी सम्भाल कर रखा जाय.

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  17. आपने इस लेख के लेबल में "शब्द साधना" भी डाला है. यह मेरे ब्लॉग का पुराना नाम है. खैर अब तो मैंने नाम बदल लिया है इसलिए कोई दावा नहीं :) :)

    जाहिर है शब्दों की जो साधना आप करते हैं मेरे बस की नहीं है. इसी साधना के चलते आप अपने पाठकों में इतने मकबूल हैं. यही बात संजय बाऊ जी पर भी लागू होती है.

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    1. सोमेश जी! 'शब्द साधना' लेबल चुनते समय यह ध्यान में आया था कि इस नाम से कोई ब्लॉग था जिसे मैं फॉलो करता था... लेकिन ज़ोर डालने पर भी यह नहीं याद आया कि किसका ब्लॉग था. अभी जैसे ही आपने कहा दिमाग़ की बत्ती जल गई!!

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    2. मैंने पोस्ट शुरु में मोबाईल पर देखी थी, कमेंट की सुविधा नहीं थी वरना शुरू में ही टोक दिया होता कि पोस्ट में जिक्र फ़ूहड़ों का और लेबल सोमेश के ब्लॉग का? बहुत नाईंसाफ़ी है :)

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    3. बच्चे के मजे ले रहे हैं आप संजय जी... :)

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  18. आपकी इस प्रस्तुति को शनि अमावस्या और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. (पहली टिप्पणी में उन्नीस-बीस हो गया था, इसलिए उसको डिलीट कर रहे हैं )

    शब्दों की शक्ति से किसे इन्कार होगा भला, यह दुनिया ही शब्दों के प्रभाव पर टिकी है.।
    शब्दों ने जयघोषों का निर्माण किया, जिनकी शक्ति ने कितने ही राष्ट्रों की तकदीर बदल दी.। शब्द शक्ति के बल पर ही नेता लोकमत पाते हैं या लोग उन्हें जुतियाते हैं, साधु-संत अपने शाब्दिक साधना से ही भाव-विह्वल भक्तों के जीवन में आमूल परिवर्तन कर पाते हैं
    अगर हमारे शब्दों में स्नेह, प्रेम, मैत्री की भावना हो तो सामने वाला उन्हीं भावों में आकण्ठ डूब जाता है और अगर ईर्ष्या-द्वेष, घृणा कटुता हो तो सामने वाला तदानुसार प्रभावित होता है, शब्द एक ओर तो डूबते को उबार सकते हैं दूसरी ओर शब्दों का असर किसी को आत्महत्या तक करने को प्रेरित कर देता है और कभी हत्या भी हो जाती है। सारांश यह कि शब्दों में अपरिमित शक्ति है.. किसी भी व्यक्ति के अंतःकरण के भावों को शब्द ही व्यक्त करते हैं.।
    ब्लॉग्गिंग में शब्दों की बात हो और ब्लॉग जगत के 'शब्दों के खिलाड़ी' का ज़िक्र न हो, ऐसा हो नहीं सकता। श्री संजय अनेजा जी के लेखन की मैं भी एक अरसे से मुरीद हूँ, छोटी-छोटी बातें जो हम जैसे साधारण लोगों के जीवन में आई-गई होती हैं, उन्हीं बातों को बड़ी सहजता से लेखन के फ्रेम में खींच कर ले आना और अपने शब्दों की कूँची से वो रूप दे देना कि पढ़ने वाला उनके शब्दों के तिलस्म में बंध जाए, ऐसा जोख़िम भरा काम हमारे आशुलेखक सर्वश्री अनेजा जी ही करते हैं.। उनको पढ़ने के बाद तो कभी-कभी हम पछता कर रह जाते हैं कि ये घटना तो हमारे साथ भी घटित हुई थी, फिर हमारे मिज़ाजे शरीफ़ में ऐसी पोस्ट काहे नहीं कौंधी भला :) जो बातें हमको भंगार बराबर दिखतीं हैं वो वहाँ से सोना निकाल लाते हैं और कोई बहुत ही अच्छी सीख भी बता जाते हैं ।
    गाहे-ब-गाहे उनकी प्रति-टिप्पणियों का आनंद हम भी ख़ूब ली हूँ और उम्मीद है आगे भी अइसा ही होता रहेगा पूरा बिसबास है ।
    आपके लेखन की तारीफ़ के लिए तो लिए तो हमरे कीबोर्ड में वर्तनियाँ कम हैं, यही कहेंगे आप तार को चिट्ठी समझ लीजियेगा :)

    पोस्ट का सिरसकवा देख के बुझाया कि पॉडकास्ट-उडकास्ट, गीत गोविन्द का बात होगा साइद :)

    सदैव आभारी !

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    1. bare bhaiji..........di' ke tippani me se char aana hum udhar le rahe..........abhi haath tang hai.......khulne pe lauta denge........

      bakiya, abbi tak 'mo sum hain kahan'?????


      pranam.

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    2. नामराशि, हम सप्ताह भर के लिये जबलपुर भेजे गये थे। अब हाजिर हो गये हैं।

      स्वप्न मञ्जूषा जी,
      क्या कहूँ? जाईये, कुछ नहीं कहना।

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  21. आपका भी जवाब नहीं ..
    सच है की मुंह से बोला शब्द और एंटर दबाने के बाद लिखा शब्द वापस नहीं आता इसलिए बहुत ही सोच-समझ के निकालना चाहिए और जिसे ये कला आ जाती है वो शब्दों के साथ साथ (धन) का भी धनि बन सकता है ... वैसे आप इसमें डाक्टरी करे हुए हैं ....

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  22. ध्यानी आऊर बे ध्यानी में हमार चश्मा ही टूट गइल हा ........
    फिर भी बहुत ध्यान से आपका आलेख पढ़ी हूँ ..... बहुते निमन ज्ञान मिलल

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  23. शब्द की इज्जत करो तो वो तुम्हारी करेंगे . बहुत ज्ञान की बात कही . फलसफा नया सा लगा मगर बात गूढ़ पुराणों जैसी !

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  24. हम भी एक बात बताते है, बताते क्या है अपना मन का फिलिंग बता रहे है !
    आजकल घर में मेहमान आये हुए है उनकी ही खातिरदारी (इज्जत) करने में लगे है :)
    सार्थक पोस्ट है पर तथ्यपरक टिप्पणी करने फिर आउंगी !

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  25. बात तो पते की है और आपने सही शब्दों को सही जगह लगा कर समझा भी दी है:)

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  26. रचनाकारों की नगरी में
    मैंने कुछ रंग सजाये हैं
    आते जाते ही नज़र पड़े
    ऐसे अरमान जगाये हैं ,
    यदि मन के भाव समझ पाओ,तो झूम उठे,दुनिया सारी !
    मैंने तो मन की लिख डाली, अब शब्दों की जिम्मेदारी !

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  27. सुंदर अभिव्यक्ति। मेरे नए पोस्ट DREAMS ALSO HAVE LIFE.पर आपका इंतजार रहेगा। शुभ रात्रि।

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  28. बहुत अच्छी सीख मिली सलिल भैया। आपके आभारी तो हमेशा से ही हैं और हमेशा रहेंगे भी फ़िर भी यारों की महफ़िल में बड़े-बड़े नामों के साथ अपना जिक्र भी आया है तो अपने बारे में इतना और बताना चाहूँगा(being a proud PUNJABI) कि अश्लीलता, फ़ूहड़ता और घटियापन पर आपसे कोई असहमति नहीं और कोई इंकार भी नहीं, वो क्या बोलते हैं ’जो है सो है’ :)
    मेरे तो ब्लॉग का नाम भी बजाय कुछ छिपाने के पहले से ही आगाह करता है कि यह ब्लॉग सबका स्वागत करने योग्य नहीं है, गाहे-बेगाहे उल्टा-सीधा झेलने वाले ही रिस्क लें। फ़िर भी देवेन्द्र भाई के हिसाब से मेरी पोस्ट हिट होती हैं तो दोष रिस्क लेने वालों का ही है :)

    इन विशेषताओं(?) के साथ अपनी कौम की एक और कमी या विशेषता बताना चाहता हूँ जिसे ’एरोगेंस’ कह सकते हैं। इस मामले में भी हम लोग बहुत खड़ूस होते हैं, ’डिप्लोमेसी’ ज्यादा नहीं जानते। फ़िर चाहे पान मिले या बकौल मनोज जी के ....., परवाह नहीं करते।आजकल जरूर कुछ पोज़िटिव सोचने लगे हैं तो ऊपर शिवम से आग्रह किया है कि इस विषय पर कुछ पहल करे, देखते हैं कब, कहाँ और किस फ़ीस पर वर्कशाप लगाई जाती है। उचित अवसर पर विस्तृत जानकारी मिलने की अपेक्षा रहेगी।
    आपकी शैली की खासियत है कि हम जैसों को कमेंट में इतना कुछ लिखने की लिबर्टी मिल जाती है!!

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  29. achcha lagta hai ki aap kisi bhi baat par......ek sunder aur shikchatmak lekh likh lete hain......

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  30. बहुत सही बात कही आपने ..... सहमत हूँ आपकी बात से
    सादर

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