बुधवार, 16 अप्रैल 2014

हाय गजब कहीं तारा टूटा


अब त इयादो नहीं है कि आखरी बार जादू का सो कब देखे थे. बाकी जादू त जादूए होता है. एकदम नजर बाँध लेता है. एतना त समझ में आता है कि ई सब कोनो चमत्कार नहीं है, सब हाथ का खेला है, तइयो ई खेला में गजब का आनन्द आता है. जेतने अबिस्बसनीय, ओतने सच.

आजकल हमरे इधर भी एगो जादू का धूम मचा हुआ है - जादूगर बैताल. हमरा ऑफिस का इस्टाफ अऊर मकान मालिक का लइका भी जिद करने लगा कि चलिये देखने. अब हमरे पास त ऑफिस के बाद ब्लॉग पढने अऊर फेसबुक पर बतकुच्चन करने के अलावा कोनो काम त होता नहीं है. हम मान गये. छोटा थे त हमरे दादा जी अऊर बाद में हमरे मँझले फूफा जी हमसब बच्चा लोग को ले जाते थे सर्कस देखाने. हमहूँ सोचे कि जादू देखने के बहाने ऊ पुराना टाइम को फिर से जीने का अबसर मिलेगा. रंगीन तम्बू, प्लास्टिक का कुर्सी, चमचमाता हुआ इस्टेज, जोर-जोर से बजता हुआ गाना.

जादू का सो सुरू हुआ. बगले के गाँव का जादूगर था. बहुत कम उमर का 25-26 साल से जादा नहीं था. मगर बुझाता था कि बहुत सा सो कर चुका था, इसलिये उसका आत्मबिस्वास देखने लायक था. गाँव का सो था, इसलिये उसके जादू में लड़की लोग नहीं थी अऊर उसका असिस्टेंट सब उसी का भाई सब था. जादूगर के पिताजी इस्कूल के रिटायर्ड मास्टर थे अऊर गेट पर खड़ा होकर आने जाने वाले का स्वागत कर रहे थे. जादूगर अपना सो देखाने के बाद सब दर्सक से अनुरोध किया कि आजकल जादू, सर्कस त लोग सिनेमा चाहे टीवी का पर्दा पर देखना पसन्द करता है. ई टेक्नोलॉजी के कारन हमारा सांस्कृतिक धरोहर को बहुत नुकसान हुआ है. ई बात ऊ एतना मन से बोला कि मन भर आया!

बहुत लो बजट का सो होने के बाबजूद भी लगा कि जइसे ऊ जादू हमरे दिमाग में समा गया है अऊर हम जादू में गोता खाते हुए समय में बहुत पीछे चले गए. पटना का हार्डिंग पार्क में हमलोग सर्कस देखने जाते थे. तरह-तरह का जंगली जानवर का तमासा, सुन्दर सुन्दर लड़कियों का खेला अऊर नाटा-नाटा जोकर का मजाक. जबतक अगिला खेला चालू होता, तबतक जोकर का मजाक, आपस में लड़ाई, फटकारने वाला लकड़ी का तख्ता से मार-पीट, पीठ से पीठ जोड़कर उछलते हुये गोल चक्कर लगाना, आँख से, पीछे से पानी निकालना, एक हाथ से दोसरा हाथ में एक बार में का मालूम केतना गेन्दा उछालना, बिना गिराये हुए. राज कपूर का सबसे प्यारा सिनेमा एही सरकस पर आधारित था. अऊर ऊ जो बोल गए आखिर में ऊ आझो लोग मोहावरा के तरह इस्तेमाल करता है – द शो मस्ट गो ऑन!!


मगर सर्कस का जो हालत आज है ओही हालत राज कपूर साहब के “मेरा नाम जोकर” का हुआ. अब्बास साहब, जो राज कपूर के सब सिनेमा का कहानी लिखे थे, उनको भी ई बर्दास्त नहीं हुआ अऊर बोले कि एगो हिट फिलिम जरूर लिखेंगे ऊ. फिलिम लिखे “बॉबी” जो सुपर हिट हुआ. हम भी कहाँ से कहाँ भटक गये. गुलज़ार साहब कहते हैं कि इंसानी दिमाग भी ऐसने एगो सरकस के तरह है

एक तम्बू लगा है सरकस का,
बाज़ीगर झूलते ही रहते हैं
ज़हन ख़ाली कभी नहीं रहता!

अइसने एगो तम्बू लगा हुआ था साल 1994 में. उस समय भी हम बिहार के एगो गाँव में पोस्टेड थे अऊर ऊ गाँव में आया था एगो थियेटर. सब स्टाफ लोग मिलकर पूछा कि सर चलियेगा देखने. थियेटर बहुत बदनाम माना जाता था, इसलिये ऊ लोग डरते-डरते पूछा. हम पूछे कि का होता है इसमें. तब पता चला कि इसमें गाना बजाना होता है, नाटक-नौटंकी होता है.


अचानक हमरे मन में जाने का आया, हम तुरत तैयार हो गए. टिकट लेकर रात को खा पीकर तम्बू में जम गये. गाना सुरू हुआ, लड़की सब मेक-अप में आकर गाना  रही थी अऊर लड़का—लड़की मिलकर जुगल गीत भी गाते थे. अऊर बहुत सुन्दर गाना से भरपूर जबर्दस्त नाटक भी था उसमें. गाना से खुस होकर लोग ईनाम में रुपया भेंट करता था अऊर उनका नाम घोसित किया जाता था. कुछ लोग मजाक में नोट अपना जेब से देता था अऊर नाम अपना दोस्त का बता देता था. जब उनका दोस्त के नाम के साथ ईनाम का घोसना होता था सबलोग हँसने लगता था अऊर ऊ भाई साहब गरियाते हुए भुनभुनाते रहते थे. असल में लाउडिस्पीकर पर उनका नाम उनके घर तक सुनाई देता था अऊर घरे जाने पर घरवाली से पिटाई का खतरा भी था.

हम चुपचाप गाना-बजाना अऊर नाटक देख रहे थे. बाकी हमरे दिमाग में अलगे एगो खेला चल रहा था. लोग सीटी बजा रहा था, ताली बजा रहा था, बाह-बाह कर रहा था, मगर हम ऊ लिपिस्टिक से सना मुँह लिये हुये गीत गाने वाली एगो लड़की को देख रहे थे. जेतना अदा से ऊ गा रही थी

रहेगा इश्क़ तेरा ख़ाक में मिलाके मुझे,
हुए हैं इब्तिदा में रंज, इंतिहाँ के मुझे!

उसका चेहरा देखकर ई बुझाइये नहीं रहा था कि ऊ किसके लिये एतना बिभोर होकर गाना गा रही है. जबकि देखने वाला हर अदमी एही समझ रहा था कि ऊ उसी के लिये ई गाना गा रही है. हमरे दिमाग में का मालूम कऊन सोच डूब-उतरा रहा था. हमको ऊ लड़की हीरा बाई लग रही थी जो पता नहीं अपने कऊन हीरामन के लिये गाना गा रही थी. कोनो हीरामन था भी कि नहीं ऊ दर्सक मण्डली में.

थियेटर में बइठे हुये हमारे सामने फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ जी का ‘तीसरी कसम’ घूम गया. जब हम देखकर निकले, त हमरे पीछे से लाउडिस्पीकर पर गाना आ रहा था:

मारे गये गुल्फ़ाम, अजी हाँ मारे गये गुल्फाम!
उल्फ़त भी रास ना आई, अजी हाँ मारे गये गुल्फ़ाम!

25 टिप्‍पणियां:

  1. क्या गज़ब फिलिम याद दिलाये हैं.बढ़िया है।

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  2. Bahut umda....kahin door,door bachpanme chali gayi! Waheedji ki kitni sundar aur shaleen tasveer hai ye....Teesari qasam apne aapme ek yaadgar film thi.

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  3. असल में लाउडिस्पीकर पर उनका नाम उनके घर तक सुनाई देता था…
    क्या आयडिया है :)

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  4. जादू के शो से शुरू किया और सर्कस, गुलज़ार और नौटंकी से होते हुए रेणु पर जा पहुंचे. अच्छा सफ़र रहा...

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  5. सही में एक लम्बा सफर. हमेँ तो "पान खाये सैय्याँ हमार" ज्यादा भाई थी.

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  6. बहुत ही रोचक। आज जब भी कोई शो देखते है चाहे वो सर्कस हो ,जादू हो ,नाटक हो या सिनेमा ही क्यों नहो ?अतीत सुनहरी छबि लिए खड़ा हो जाता है सम य के साथ सब कुछ बदल गया किन्तु पुराने समय का कलात्मक मनोरंजन जि.सका एक शो देखने के बाद बरसो उसकी हरेक चीज मन में बसी रहती थी .

    हाँ प्रसंगवश अभी कुछ महीने पहले एक सर्कस जो विदेशी था यहाँ बंगलौर में देखा 500 रु का टिकिट था

    एक माल के बहार तम्बू लगाया था उससे अच्छा तो इण्डिया गॉट टेलेंट था

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  7. अतीत के दिनों की सुंदर झांकी सिनेमा,सर्कस और जादू के माध्यम से.सर्कस तो अब बीते दिनों की बात लगती है.तकनीक के बदलते स्वरूप में सब कुछ खो गया लगता है.

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  8. ईहो कलाकारी का कम है की किसी को अप ने लिखलका में ऐसा लपेटिये
    की उ सब काम भूल के बलाग़ै पढता रह जाय और कछु नहीं त आखिर में
    ईगो लमहर सांस खींची के बोले - केतना नीमन लिखता है अपना बिहारी

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  9. kitna umda tarika se likha h aapne pura ka pura bhawna ko.... e bihar ki mitti ka jaadu h...

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  10. लोक-मंच की पूरी यात्रा-कथा कह डाली सलिल जी आप ने तो .अभिनय का रूप क्या से क्या हो गया ,भावों में भी टेक्नीक समा गई. सिनेमा आम जनता के लिए लोक-मंच का पर्याय बन गया हो भले, लेकिन सफ़ेद पर्दे पर रोशनी का खेल, रंगमंच की सजीवता और रसात्मकता को कैसे पा सकता है !

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  11. ये दूसरी तरह का जादू है.... आपकी कलम का! पूरा किस्सा पढ़ते पढ़ते ‘मारे गए गुलफ़ाम’ सी हालत हो आती है। तीसरी कसम और मेरा नाम जोकर अपनी भी पसंदीदा हैं।

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  12. सलिल जी,
    आपकी यह पोस्ट पढ़ते पढ़ते अपने बचपन की बहुत सारी स्मृतियाँ आँखों के सामने साकार हो गयी !
    जादू का शो हो की ऐतिहासिक कहानियों पर आधारित नाटक हो या फिर सर्कस इनको लाईव देखने का मजा ही तब कुछ और था समय के साथ कितना सब कुछ बदल गया है न, लेकिन आपकी कलम ने भी देखिये कैसा जादू किया सारे दृश्य एक बार फिर से साकार कर दिए है जो आज भी मन के किसी कोने में बसे हुए है, शुरू से अंत तक पढ़ते हुए मन प्रसन्न हुआ ! बहुत सुन्दर पोस्ट !

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  13. सड़क पर ही मजमा लगा कर जादू दिखाते बाजीगर , बड़े पंडालों में हाथ की सफाई दिखाते , सर्कस में हैरतंगेज कारनामे , सब बचपन की यादें ही रही .
    आपकी पोस्ट को खालिस भोजपुरी हिंदी लहजे में पढना भी रोचकता बढ़ा देता है .

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  14. आलेख पढ़कर पुरानी यादें ताजा हो गई ...!
    क्या फिल्म थी तीसरी कसम सारे गाने एक से बढ़कर एक ....

    RECENT POST - आज चली कुछ ऐसी बातें.

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  15. आप किसी जादूगर से कम तो हो नहीं ... :)


    न जाने कैसे इस बार देर हो गई आने मे :(

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  16. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मुस्कुराते रहिए... फ़टफ़टिया बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  17. सचमुच तकनीकी युग ने आदमी की कला की कीमत घटाई है । आज भी जहाँ कहीं गलियों में दो दो चार चार रुपयों के लिये बच्चों या बडों को शरीर को गेंद की तरह उचालते तोडते मरोडते और हैरतअंगेज करतब दिखाते देखती हूँ तो कला की दुर्दशा पर रोना आता है । एक तरफ वे हैं जो जीवन को पूरी तरह झौंककर भी भूखे नंगे रहते हैं दूसरी तरफ जरा सी हेराफेरी ( चाहे उंगलियों या धन की या फिर शब्दों की ) लोग सुख-सुविधाओं में डूबे हैं । शायद यही है टैक्नीकल माइण्ड ।
    आपने मेरा नाम जोकर और तीसरी कसम का उदाहरण सही दिया है । इतनी मार्मिक फिल्में फ्लाप होगईं और बाबी जैसी फिल्म हिट । सरकस नाटक नौटंकी आदि का भी वही हाल है । मुझे याद है हमारे गाँव में नौशे-बसीर उच्चकोटि के अभिनय-कर्ता थे उनके मुकाबले छोटे पर्दे पर चमकने वाले कलाकार कुछ भी नही ।
    आप जितनी निकटता से छोटी-छोटी बातों का सरस चित्रण करते हैं, आचार्य शुक्ल जी की तर्ज पर कहा जासकता है कि आप अनुभूतियों का कोना कोना झाँक आए हैं ।

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  18. बहुत बढियां लिखा है जनाब आपने.. शुरू करो तो ख़तम करिये के आदमी रूकता है , .. इ बिहारी सब एतना अच्छा काहे लिखता है जी .. बिहार अपने आप में जबकि भारत देश से कम वैविध्यपूर्ण नहीं है , जितनी प्रकार की बोली यहाँ बोली जाती है, शायद दुनियां में कहीं नहीं बोली जाती होगी ...पटना से बख्तियार पहुचिये और बोली चेंज, उधर हाजीपुर का पूल टपिए और बोली चेंज ... कमाल का जगह है .... बख्तियारपुर से मोकामा जाइए और बोली चेंज .. यहाँ तो हर आदमिये अलग अलग बोली बोलता है महाराज ... यही शायद कारण है कि जब ऐसा व्यक्ति शिक्षा के संस्कार से परिष्कृत होता है तो अच्छा लिखता है ... बहुत बढियां.. कभियो हमरो ब्लोगवा पर आइये ना ,, आपके जैसा तो नहीं लिखते हैं लेकिन हाँ , अब कुछ तो लिखवे करते हैं न ... आइयेगा तो अच्छा लगेगा और का ..

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  19. बहुत राचक तरीके से वर्णन कि‍या आपने....मुझे पढ़ने में भी बहुत आनंद आया...धन्‍यवाद

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  20. जीवंत कलाएं निर्जीव तकनीक से पराजित होती दिख रही हैं।

    लेकिन आपकी कलम का जादू सचमुच ‘लाइव‘ है।

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  21. पढ़कर आनंद तो आया ही, बचपन में रामलीला, गंगा-स्नान के मेले, सर्कस और जादू के न जाने कितने शो याद आ गए। मैंने जादू के हर शो से एक नई ट्रिक सीखी और समय के साथ छोटी मोटी इतनी ट्रिक्स आ गईं कि खुद ही एक छोटा-मोटा शो करने की हैसियत बन गई। वह कला आज भी ज़रूरत पड़ने पर बच्चों का मन लगाए रखने के काम में आती है।

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  22. पूरी दुनिया एक सर्कस है, जादू का खेल है.. हम सब जोकर।

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  23. मैने गलत नहीं कहा था .....यहां तो सचमुच का जादू चल रहा है :)
    अच्‍छा लगा पढ़कर

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