शनिवार, 10 मई 2014

कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी


“कविता मेरे लिये रिक्त घट भर देने वाला जल है, ज़मीन फोड़कर निकला हुआ अंकुर है, अन्धेरे कमरे में जलता हुआ दिया है, बेरोज़गार के लिये रोज़गार है या कि बेघर भटकते मन का ऐसा एकमात्र आश्रय है जहाँ बैठकर कुछ राहत मिल जाती है. कविता मेरी अंतरंग मित्र है, भीड़ में भी मेरे अकेलेपन की संगिनी. कविता के कन्धों का सहारा लेकर मैंने अब तक का ऊबड़ खाबड़ रास्ता सरलता से तय कर लिया. मैं कविता की ऋणी हूँ क्योंकि मेरी कुछ अनुभूतियाँ कविता की ममतामय गोद में जाकर रचना की संज्ञा पा लेती हैं.”
और ऐसी ही कुछ रचनाओं का संग्रह है – “कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी.” जैसा कि  शीर्षक से विदित है यह पंक्ति किसी नज़्म की पंक्ति सी प्रतीत होती है या फिर किसी गीत सी. तो यह है श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ के कुछ चुने हुए गीतों का संग्रह. उनकी अब तक प्रकाशित चौथी पुस्तक, जिसमें समाहित हैं उनके लगभग सत्तर गीत. इन गीतों में कुछ ग़ज़लें हैं और कुछ दोहे भी हैं. चुँकि दोनों विधाओं की रचानाएँ गायी जाती रही हैं, इसलिये उन्हें गीतों के मध्य गीत मान लेने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.


(बड़ी बहु सुलक्षणा कुलश्रेष्ठ) 

कविता को लेकर कवयित्री के ऊपर दिये गये विचार उन्होंने आत्मकथ्य में स्पष्ट किए है और जिस रचनाकार के लिये कविता का अर्थ इतना विस्तार लिये हो, उसके लिये तो सम्पूर्ण प्रकृति ही एक कविता है. और स्वयम को इस प्रकृति का एक अंश स्वीकारते हुये अपनी रचनाधर्मिता निभाना उनके लिये उस परमपिता की स्तुति से कम नहीं. गिरिजा जी का परिचय हमारे लिये उनके ब्लॉग “ये मेरा जहाँ” से है. किंतु उनका यह परिचय एक अत्यंत संकोची और अपनी रचनाओं को सुदामा के चावल की तरह छिपाने वाले व्यक्तित्व सा ही रहा है. उनके इस संग्रह में जितने भी गीत हैं, उन्हें पढने के बाद कोई उनके इस वक्तव्य से सहमत नहीं हो सकता कि जीवन के पाँच दशक पार करने के बाद भी मैं ख़ुद को पहली कक्षा में पाती हूँ.

इन गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रत्येक गीत की संरचना भिन्न है अर्थात यदि उन गीतों की स्वरलिपि लिखी जाए तो वह अनिवार्य रूप से हर गीत के लिये अलग होगी. यह बात इसलिये भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि कुछ ऐसे गीतकार भी देखे गए हैं जिनके लगभग समस्त गीतों की रचना एक ही धुन को आधार बनाकर की गई होती है. गिरिजा जी ने हर गीतों में स्थायी और अंतरे का विभाजन इतने सहज ढंग से किया है कि यदि उन्हें गाया जाए तो दोनों भागों के मध्य विभेद करने में असुविधा की कोई सम्भावना नहीं रह जाती. आधुनिक गीतों में इस तरह की व्यवस्था गीत/ काव्य संरचना में नहीं होती है (कविता और गीत दोनों को समान विधा मान लिये जाने के कारण), अत: इस आधार पर सारे गीतों को हम क्लासिकल कह सकते हैं. गीतों में लयात्मकता है और सभी गेय हैं.

गीतों के विषय इतनी विविधता लिये हैं कि पाठक एकरसता का शिकार नहीं होता जैसे – प्रकृति, ऋतुएँ, नववर्ष, पर्व त्यौहार आदि. साथ ही कुछ रचनाएँ नितांत व्यक्तिगत हैं जैसे अपने पुत्र के लिये, दूसरे पुत्र के जन्म दिवस पर, भाई के लिये बहन के उद्गार आदि. किंतु अपने पुत्र को केन्द्र में रखकर लिखा हुआ गीत भी जब आप पढते हैं तो आपको उसमें अपने पुत्र की झलक दिखाई देती है. मन्नू के जन्मदिन पर वो क्या कहती हैं देखिये

हर पल से तू हाथ मिलाना/खुलकर गले लगाना
रूठे हुये समय को भी/ देकर आवाज़ बुलाना
लक्ष्य नए कुछ तय करना/ संकल्पों का सन्धान
और भीड़ में खो मत देना/ अपनी तू पहचान.

इनकी कविताओं में व्यर्थ की घोषणाएँ, नारे और भाषणों का स्थान नहीं होता. इनके सन्देश इतने मुखर हैं कि उसके लिये किसी शोर का वातावरण दरकार नहीं.

अंग्रेज़ी की आदत क्यूँ हो/ इण्डिया माने भारत क्यूँ हो,
हृदय न समझे मतलब जिनका/ ऐसी जटिल इबारत क्यूँ हो
सरल भाव हों, सरल छन्द हों/ अपनी लय अपना स्वर हो
ऐसा नव-सम्वत्सर हो!

किसी भी रचनाकार के शब्दकोष का अनुमान उसकी दस पन्द्रह रचनाओं को पढकर लग जाता है. लेकिन गिरिजा जी की सत्तर रचनाओं को पढने के बाद भी बहुत कम शब्द पुनरावृत्त होते हुये दिखाई दिये. यह इनकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है. शब्दों का भण्डार, उचित शब्दों का चयन, शब्दों द्वारा भावों की अभिव्यक्ति, इतनी सुगठित है कि किसी एक शब्द को उठाकर आप कोई दूसरा शब्द बिठाना चाहें तो पूरी कविता काँच के बर्तन की तरह चकनाचूर हो जाती है.

कलुष विषाद बहाते/ भारवहन में हैं ये कच्चे
कोई कितना भी झूठा हो/ आँसू होते सच्चे
सूने-सूने आँगन में/ ये भावों का अमंत्रण हैं
आँसू मन का दर्पण हैं!

दोहे जितने भी हैं सब अपने क्लासिकल रूप में दो पंक्तियों में अपनी बात सीधा कह जाते हैं. यहाँ एक सुन्दर प्रयोग का उल्लेख करना चाहूँगा:

हर वन-उपवन बन गया, ब्यूटी-पार्लर आज,
सबकी सज्जा कर रही, सृष्टि हुई शहनाज़!

जब से इन्हें पढना आरम्भ किया है तब से मेरे अंतर्मन में यह प्रश्न हमेशा सिर उठाता था कि श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ की कविताओं पर महादेवी वर्मा जी का प्रभाव दिखता है. इस संग्रह में एक गीत उन्होंने महादेवी वर्मा जी को समर्पित किया है, जो परोक्ष रूप से मेरे सन्देह की पुष्टि करता है.

इतनी ख़ूबियों के साथ ही कुछ कमियाँ भी रही हैं, जिनकी चर्चा के बिना यह प्रतिक्रिया संतुलित नहीं कही जा सकती.

गीतों के साथ प्रणय का अन्योनाश्रय सम्बन्ध है. जहाँ हम सब जानते हैं कि हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं, वहीं हम सब यह मानते हैं कि प्रेम में हर व्यक्ति कवि बन जाता है. गिरिजा जी के गीतों में दर्द का एक सुर , व्यवस्था से नाराज़गी, पर्यावरण नष्ट करने वालों के प्रति आक्रोश तो दिखता है, किंतु प्रणय-गीत की अनुपस्थिति एक प्रश्न करती है उनसे, भले ही उनकी क्षमताओं पर प्रश्न चिह्न न लगाये. कालिमा, गरल, रुद्ध, हुँकार, रक्तरंजित, पीड़ा, धूमिल, विगलित, करुणा – इन शब्दों का चयन उनके अन्दर के अवसाद को प्रकट करता है. दूसरी ओर जहाँ उनके दोहे चकित कर देते हैं, वहीं ग़ज़लों में मूलभूत भूल दिखाई दे रही है. उन्होंने स्वयम स्वीकार किया है कि गज़ल की विधा से वे पूर्णत: परिचित नहीं हैं.

गुलज़ार साहब की एक पुस्तक है – पन्द्रह पाँच पचहत्तर. प्रथम दृष्टि में यह कोई दिनाँक प्रतीत होता है. परंतु उस संग्रह में पन्द्रह विभागों के अंतर्गत उनकी चुनी हुई पाँच-पाँच नज़्में हैं. गिरिजा जी को भी चाहिये था कि वे रचनाएँ जो इस संग्रह में बिखरी हुई हैं, एक मुख्य विषय (प्रकृति, रिश्ते, ऋतुएँ, सरोकार आदि) के अंतर्गत विभक्त कर संकलित की जानी चाहिए थीं.

यह संग्रह श्री अरुण चन्द्र राय के ज्योतिपर्व प्रकाशन, इन्दिरापुरम द्वारा प्रकाशित हुआ है. पुस्तक सजिल्द आवरण के साथ है और कवर बहुत ही आकर्षक है. छपाई की गुणवत्ता किसी भी स्थापित प्रकाशक से कमतर नहीं है. पुस्तक को देखते ही हाथ में उठाने की तबियत होती है और हाथ में लेते ही पढने की जिज्ञासा जागृत होती है.

इस संग्रह के गीतों को पढते हुये मुझे जो अनुभव हुआ, उसे इस गीत के माध्यम से ही व्यक्त किया जा सकता है: जैसे सूरज की गर्मी से तपते हुये तन को मिल जाए तरुवर की छाया!

37 टिप्‍पणियां:

  1. गिरिजा जी की दिल को छू लेने वाली कुछ रचनायें मैंने उनके ब्लॉग पर पढ़ी हैं, आपकी समीक्षा ने उनमें नया रंग भर दिया है, आप दोनों को बधाई !

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  2. गिरिजा दी को बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएँ !!
    उनकी कवितायें पढ़ना याने एक क्लास अटेंड करना!! कुछ न कुछ सीखने को मिलता है |
    आपकी समीक्षा तो कमाल की है ही दादा......
    आभार !

    अनुलता

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  3. सलिल जी, आपका जवाब नहीं! अच्छा लिखते हो, अच्छा गुनते भी हो। एक धुरंधर आलोचक की तरह गहरी पड़ताल करते हो। सिर पर भी बैठाते हो और जहां खबर लेनी हो खबर भी ले लेते हो। आपके मार्फत कई अच्छे ब्लोगस के पते मिल जाते है। आपके माध्यम से गिरिजा जी को बधाई!!
    रचना की भाषा भोजपुरी, समालोचना की हिन्दी... कहीं वो बात तो नहीं कि जब गुस्से में हो तो हिंदुस्तानी अँग्रेजी बोलने लगता है?

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  4. सलिल जी, प्रशंसनीय पुस्तक समीक्षा के लिये बहुत बहुत बधाई, मैने बहुत कम पढ़ा है गिरिजा ज़ी को, “कुछ ठहर ले और मेरी ज़िन्दगी.” इस पुस्तक की समीक्षा द्वारा उनको जानना एक़ सुखद अनुभूति है मेरे लिये, जीवन मे अनुभूतियों का हर क्षण महत्वपूर्ण होता है सलिल जी जैसे प्रशंसक स्नेह से रचनाकार को तराशने वाले उत्साहवर्धक समीक्षक मिलना सच मे भाग्य की बात है ! अनगिनत रचनाकार इन दिनों सक्रिय है किन्तु आच्छे समीक्षाकारों का सर्वथा अभाव मैने महसूस किया है आशा करती हूँ की अनुभवी सक्षम समीक्षाकार इस दिशा मे भी काम करने का सोचे ! गिरिजा जी को पुस्तक प्रकाशन पर बहुत बहुत बधाई ! सुन्दर एवं सराहनीय समीक्षा की है !

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  5. पुस्तक प्रकाशन पर बधाई एवं सुन्दर समालोचना .......

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  6. जितना भी सुना गिरिजा दी के बारे में आपसे ही सुना ......तुरत-फुरत रचनाएं नहीं रही कभी ,बहुत मन से पढने में मजा आता है .जैसे आप पढ़ते है....

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  7. गिरिजा जी की अनमोल कृति क़ी अनमोल समीक्षा .... पढ़ना होगा

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  8. गिरिजा जी की पुस्तक प्रकाशन के लिये बहुत बहुत बधाई और शुभकामना !!
    आपके परख दृष्टिकोण ने पुस्तक को और भी खूबसूरत बना दिया धन्यवाद ....

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  9. आदरणीय सलिल भैया ,इस पोस्ट को पढने में कुछ विलम्ब हुआ है लेकिन पढकर एक बार फिर सोचने विवश हूँ कि कैसे समीक्षा एक रचना को विशिष्ट व आकर्षक ही नही बनाती बल्कि उसे एक विस्तार देती है । सम्माननीय सुधी पाठकों की प्रतिक्रियाएं यही कहतीं हैं । मैं आभारी हूँ उन सबकी और हाँ , आपकी भी । लेकिन जैसा कि आपने कहा था कि इस बार कडी आलोचना भी है, वह तो मुझे कहीं दिखी नही । है भी तो वह माँ की कोमल नसीहत जैसी ।
    जहाँ तक विषाद व निराशा की बात है, मैंने अपनी भूमिका में कहा है कि अपने अँधेरों में में घिरकर उजाले की कल्पनाएं करते हुए ही मैने अधिकांश गीत आदि लिखे हैं । जाहिर हैं कि उनमें अँधेरे से निकलने की व्यग्रता है । व्यग्रता भी प्रेम का ही एक हिस्सा है । प्रेम और पीडा की अनुभूति के बिना कविता नही होसकती । मेरे अधिकांश प्रेम-गीत मेरी दृष्टि में निजी प्रलाप ( भूमिका में है ) होने के कारण इस संग्रह में नही हैं । फिर भी सर्वव्यापक, अनुभूति तुम्हारी ,वह बात ,अहसास ,तेरे दो अक्षर ,आकांक्षा आदि गीतों में प्रेम के उल्लास की ही अभिव्यक्ति है ।
    गीतों के क्रम के विषय में आपने बहुत ही सुन्दर बात कही है । सच कहूँ तो अव्यवस्था मेरा एक बडा सच है । कविताओं में व्यवस्था कैसे हो सकती थी लेकिन अगले काव्य-संग्रह में जो संभवतः अक्टूबर तक आ सकेगा ,इसका ध्यान रखूँगी ।

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  10. गिरिजा जी के कविता संग्रह के प्रकाशन पर उनका अभिनन्दन। आपकी समीक्षा सुंदर है पढने को प्रेरित करती है। कविता के उध्दरण मन की उत्कंठा बढाते हैं.

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  11. व्यवस्थित समीक्षा कविताओं की अव्यवस्था को सुर में लाती है . कविताओं में प्रीत , प्रणय की आवश्यकता पर बल देना अवसाद के माहौल को सकारात्मक बदलाव की दिशा में देखने की आपकी उत्कट अभिलाषा को व्यक्त करता है.
    गिरिजा जी को बहुत बधाई!

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  12. गिरिजा जी को बहुत बहुत बधाई और ढेर सारी शुभकामनाएँ !!
    उनकी कविताओं से परिचित हूँ
    आपकी समीक्षा संग्रह पढने को प्रेरित करती है.

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  13. मेरी मानिए तो अब आप एक नियमित समीक्षक बन ही जाइए ... और एक नया ब्लॉग बना लीजिये ... जिस मे आप के द्वारा की गई समीक्षायेँ हो ... चाहे फिल्म की या ऐसे ही किसी काव्य संग्रह की |

    गिरिजा दीदी को बहुत बहुत बधाइयाँ |

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  14. गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की कविताएं जितनी तरल-सरल और अनुभूति-प्रवण हैं ,उनका समीक्षात्मक परिचय भी इतनी कुशलता से दिया गया है कि प्रकाशित संग्रह पढ़ने की चाह जाग उठती है.,रचना और
    रचनाकार के व्यक्तित्व के प्रति समीक्षाकार की उदासीनता अक्सर ही रचना के प्रति पूरा न्याय नहीं होने देती ,कृतिकार, कृति में उपस्थित रहता ही और उसका परिवेश भी. सलिल जी ने उस पक्ष का भी समुचित निर्वाह किया है .मैंने इस कवयित्री को जितना पढ़ पाया महादेवी जी की गूढ़ता और रहस्यात्मकता मुझे नहीं मिली. वह अपने समय और समाज के साथ रही है.युग की पीड़ा उनके स्वरों में मुखरित है भाव-जगत की इतनी विविधतापूर्ण और सरस अभिव्यक्तियाँ और उनका समुचित मूल्यांकन दोनों ही अपना प्रभाव छोड़ते हैं
    समीक्षाकार बहुज्ञ हैं ,रचनाओं में प्रयोगशीलता और संगीतात्मक पक्ष पर भी विचार किया है. ऐसी सहृदय, सहानुभूतिपूर्ण समीक्षाएँ साधारणतया दुर्लभ होती हैं .कवयित्री और समीक्षक दोनों ही बधाई के पात्र हैं.

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    1. माँ! समीक्षा करने की क्षमता मेरी नहीं है. असाहित्यिक व्यक्ति हूँ और समीक्षा एक साहित्यिक विधा है. मैंने हमेशा इस श्रेणी के अपने लेखन को "अपनी प्रतिक्रिया" ही कहा है.
      आपकी यह टिप्पणी हमारे लिये प्रसाद के समान है, माँ. आभार बहुत छोटा शब्द होगा. आपका आशीष, मेरी प्रेरणा है!

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  15. गिरिजा जी को ढेर सारी शुभकामनाएँ !!
    मै उनकी कविताओं नियमित पाठक हूँ
    बेहतरीन समीक्षा के लिए सलिल जी आपको बहुत २ बधाई ...!
    मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

    RECENT POST आम बस तुम आम हो

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  16. बधाई गिरिजा जी एवं सलिल को ,
    इन रचनाओं से ही भाषा का सम्मान है ! मंगलकामनाएं …….

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  17. पुस्तक की सही समीक्षा ऐसी ही होनी चाहिए...संतुलित !!!

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  18. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  19. ब्लॉग के माध्यम से गिरिजा जी को हमेशा पढता रहा हूँ ... आज आपके माध्यम से उनको, उकने लेखन और उनके भाव को विस्तार से जान रहा हूँ ... आपकी समीक्षा संवेदनशील रचनाकार को पढने को प्रेरित करती है ... गिरिजा जी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें इस प्रकाशन पर ..

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  20. बहुत ही सरल और बेबाक समीक्षा,किताब पढने को उकसाती हुई.…गिरिजा जी को तो पढ़ती आयी हूँ ,बहुत खूबसूरत होती है उनकी रचनाएँ और अब जैसे ही ये किताब हाथ लगेगी ,पढ़ डालूँगी.......

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  21. गिरिजाजी की कविताएं, यहां तक कि गद्य भी दिल को छूने वाला होता है, क्योंकि उनकी रचनाएं दिल से निकलती हैं। यह आलेख मैंने आपकी समीक्षा पढ़ने के लिए पढ़ा, शिवम जी का कहना सही है, आप एक अच्छे समीक्षक बन सकते हैं। सिर्फ ब्लॉग के लिए नहीं, ब्लॉग के बाहर भी लिखें, ताकि अधिक से अधिक लोग ऐसी रचनाओं से परिचित हो सकें और उन्हें पढ़ सकें।

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  22. समीक्षा ढकर इन्हें पढने की अभिलाषा जाग उठी है, बहुत बधाई और शुभकामनाएं.

    रामराम.,

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  23. गिरिजा जी को कविता संग्रह प्रकशित होने पर बहुत शुभकामनाएँ !
    बहुत सुंदर समीक्षा प्रस्तुति के लिये सलिल जी को धन्यवाद!

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  24. ये तो पता ही है चचा की गिरिजा जी की कवितायें कितनी अच्छी और प्रभावशाली होती हैं..आपकी समीक्षा भी बहुत ज्यादा अच्छी है...पढेंगे चचा इस किताब को भी, मंगवाते हैं..

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  25. ज्योतिपर्व प्रकाशन की नीव प्रायः सलिल जी के कनॉट प्लेस स्थित दफ्तर में प्रसिद्द ब्लॉगर मनोज जी और सलिल जी के सामने पड़ी थी। किसी नौकरीपेशा अदना से ब्लॉगर का दुःसाहस ही था कि प्रकाशन की जटिल दुनिया में आना। लेकिन 2012 के विश्व पुस्तक मेला में शुरू हुआ यह सफर आज लगभग डेढ़सौ पुस्तको के साथ चल रहा है। ज्योतिपर्व प्रकाशन के पहले कार्यक्रम का कुशल सञ्चालन सलिल सर ने ही किया था। लेकिन सलिल जी और मनोज जी ने मुझे पानी में छोड़ दिया तैरना सीखने के लिए। और चुपचाप देखते रहे। उन्हें जरूर अच्छा लग रहा होगा ज्योतिपर्व से प्रकाशित किताबो को देखकर।
    गिरिजा जी का पहले धन्यवाद कि एक नए प्रकाशक को उन्होंने चुना। किताब के प्रकाशन में खूब बिलम्ब हुआ। प्रकाशित होने के बाद भी उन तक पहुचने में भी लगभग चार पांच महीने लग गए। लेकिन एक अच्छी किताब को देखकर गिरिजा जी बिलमब को भूल गई।
    गत विश्वपुस्तक मेला नई दिल्ली में "कुछ और ठहर ले मेरी ज़िंदगी " का प्रकाशन कुछ प्रख्यात नवगीतकारों जैसे नवगीत के जनक कहे जाने वाले वयोवृद्ध गीतकार देवेन्द्र शर्मा इंद्र का संग्रह "परस्मैपद", आजकल पत्रिका के पूर्व संपादक और गीतकार योगेन्द्र दत्त शर्मा का संग्रह "पीली बस्तियों पर नीली ढूंढ" और वेद प्रकाश शर्मा वेद का संग्रह "नाप रहा हूँ समय के तापमान को" के साथ प्रकाशित हुआ है। इन सभी संग्रहों पर विस्तृत परिचर्चा विश्व पुस्तक मेला में लेखक मंच पर हुई थी और गीत पाठ भी हुआ था जिसमे लगभग तीन सौ पाठक श्रोता मौजूद दे। गिरिजा जी नहीं आ पायी थी किन्तु उनकी किताब पर भी चर्चा हुई और अच्छी चर्चा हुई। इन गीत संग्रहों पर एक और चर्चा देवेन्द्र शर्मा की अध्यक्षता में १४ अप्रैल को साहिबाबाद में भी हुई। एक प्रकाशक का यही दायित्व होता है कि वह किताब को नए पाठको तक ले जाए।

    सलिल सर की समीक्षा किताब को और अधिक पठनीय बना रही है। यह पुस्तक आप 9811721147 पर पता एस एम एस कर मंगवा सकते हैं। डाक खर्च का वहां हम करेंगे और किताब पर १०% छूट भी।

    एक प्रकाशक तभी सफल होता है जब लेखक अपनी दूसरी किताब भी उसी प्रकाशक को दे। और गिरिजा जी का कविता संग्रह भी ज्योतिपर्व प्रकाशन से आ रहा है। अक्टूबर नियत समय रखा है और इस बार समय पर किताब पाठको तक आएगी।
    धन्यवाद गिरिजा जी , सलिल सर !

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  26. प्रभावशाली समीक्षा....आदरणीय गिरिजा जी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें इस प्रकाशन पर ..

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  27. ‘कुछ ठहर ले और मेरी जिंदगी‘...
    यह ठहराव भी कितना गतिशील हो सकता है, आपकी लालित्यपूर्ण समीक्षा ने स्पष्ट कर दिया !
    गीतों की बंजर होती जमीन पर ‘आर्द्रा‘ की बारिश जैसी ‘कुछ ठहर ले और मेरी जिंदगी‘...

    आ. गिरिजा जी को बधाई !

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  28. अपन भी जल्द ही इस तरुवर की छाया का सुख प्राप्त करने का प्रयास करते हैं भाई साहब

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  29. सुंदर समीक्षा के लिए आपको बधाई...
    गिरिजा जी को कविता संग्रह प्रकशित होने पर बहुत शुभकामनाएँ !

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  30. आपका स्वास्थ्य तो ठीक है, जिन परेशानियों का जिक्र आपने किया था, आशा है अब नहीं होंगीं. बहुत दिनों से आपकी कोई टिप्पणी पढने को नहीं मिली न ही आपकी नई पोस्ट, शुभकामनायें !

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  31. पुस्तक की बहुत सुन्दर समीक्षा की है आपने, बधाई. गिरिजा जी को पुस्तक के लिए हार्दिक बधाई.

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  32. इस पोस्ट के माध्यम से गिरिजा जी को कुछ और जानने का अवसर मिला। ...आभार आपका।

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