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शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

वो तो है अलबेला, हज़ारों में अकेला !!

कभी कभी बहुत पुराना बात याद करने में डर लगने लगता है. लगता है हमरा उमर बहुत तेजी से भागता जा रहा है. केतना पुराना है ई बात, इसका अंदाजा त एही से लगा सकते हैं कि देवी स्थान में जो पुराना पीपल का पेड़ है, ऊ टाईम में जवान देखाई देता था. जवान माने एकदम कच्चा कच्चा डाली, मोलायम मोलायम पत्ता अऊर हरा हरा छाल. अब त बहुत सा डाली सूख गया है, अऊर नया पत्ता भी पहिले जईसा नहीं लगता है. सबसे बड़ा बात त ई है कि हमसे उमर में बहुते बड़ा है ऊ पीपल का पेड़.
ओही पीपल तर एगो कच्चा मकान था, बहुत बड़ा. दू गो छोटा छोटा बच्चा ऊ घर में रहता था. दुनो भाई के उमर में डेढ दू साल का अंतर था. एक रोज, छोटका भाई फिसल कर घर के ओसारा (बरामदा) में गिर गया. न ओहाँ पानी था, न गड्ढा. जब ऊ फिसल कर गिरा, त फुआ दौड़कर उठाई, दुलार की, अऊर पूछी, “कईसे गिर गइला बऊआ. एहाँ त न पानी है, न गड्ढा.” जवाब सुनकर आपको हँसी आएगा. ऊ बच्चा बोला, “थोड़ा देर पहिले भईया एहीं पर गिर गया था.इसलिए हम भी गिर गए” बात हँसी का जरूर था, लेकिन ई बात का पीछे अद्भुत प्यार था. हमलोग के समाज में त तुरते लोग राम लछमन जईसन भाई का तुलना कर देगा, लेकिन सायद रामायनो में कोनो अईसा उदाहरन नहीं देखाई देता है.
घर में लोग बड़का भाई को बहुत प्यार करता था. प्यार त दुनो को मिलता था, लेकिन बड़का पढने में अच्छा था, इसलिए उसका कदर तनी ज्यादा था. एही चक्कर में छोटका को लोग भुला भी जाता था. ऊ गुसियाता बहुत जल्दी था, अऊर जिद्दी भी था. नहीं पढ़ने का जिद पकड‌ लिया, त नहींए पढेगा, चाहे दुनिया एन्ने का ओन्ने हो जाए. लेकिन कभी भईया से चिढ नहीं किया.
लोग पूछता था कि नहीं पढोगे त का करोगे. जवाब मिलता , “कण्डे बेचेंगे”. बच्चा के मुँह से अईसा बात सुनकर लोग हँसने लगता. सब लोग उसको चिढाता कि बड़का भाई का चपरासी बनेगा. देखिए त बड़का भाई वाला कोनो गुन नहीं था छोटका में. कोनो नाता नहीं पढाई से, चाहे कोर्स का किताब हो चाहे कहानी का. लेकिन समय के साथ सब बदल गया. ऊ पढ भी गया, अच्छा नम्बर से पास भी हो गया, एम. ए. का डिग्री भी लिया.
आज त कहला से बिस्वासो नहीं होगा कि जऊन भाई का चपरासी बनना उसका सपना था, वैसा केतना साहेब आज उसका ऑफिस के बाहर इंतजार करते रहता है. बड़ा भाई का सब पढाई बेकार हो गया अऊर सब साहित्त भुला गया. लेकिन आज छोटका भाई का कहानी अऊर कबिता पढकर त बिस्वासे नहीं होता है कि ई ओही बच्चा है जो जमीन पर खाली इसीलिए गिर जाता था कि ओहाँ उसका बड़का भाई गिरा था थोड़ा देर पहिले.
आज उसका आलमारी में हिंदी अंगरेजी का सबसे अच्छा साहित्त मिलेगा, बिमल मित्र, सत्यजीत रे, मण्टो, राही मासूम, निदा फाज़ली, मुनव्वर राना, बशीर बदर, राजेश रेडडी अऊर वीडियो कलेक्सन में सत्यजीत रे से लेकर चार्ली चैप्लिन अऊर हिंदी क्लासिक सिनेमा का खजाना तक.
लीजिए अभी तक त हम नाम बतएबे नहीं किए ऊ बच्चा का… बच्चा कहाँ, अब त बाप हो गया है. लेकिन नाम से का फरक पड़ेगा. नाम चाहे रनछोड़दास छाँछड़ हो या रैंचो हो या फ़ुंशुक वाँगड़ू. बड़ा भाई का बिशाल ब्यक्तित्व के ग्रहन से बाहर निकल कर, आज जो अलग पहचान बनाया है, ऊ अपने आप में एक मिसाल है. उसका बचपन का छबि से एकदम बिपरीत.
उसका नाम है शशि प्रिय. हमरा छोटा भाई, सरकारी पदाधिकारी, जिम्मेदार बेटा, भाई, अंदर से कबि अऊर लेखक, अऊर कला को समझने वाला कलाकार. भाई साहब कादम्बिनी, वनिता अऊर दुसरा पत्रिका में छप चुके हैं, जो सौभाग्य हमको नहीं प्राप्त हुआ. ऊ साबित कर दिया कि पूत का पाँव हमेसा पालना में देखाई दे,जरूरी नहीं है.

आज अचानक उसका एगो गज़ल हाथ लग गया,जो ऊ हमको बहर ठीक करने के लिए दिया था (अभियो ऊ समझता है कि हम उससे अच्छा समझ रखते हैं, इस मामला में). आप लोग के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं.
इसमें हो सकता है कि उसका बचपन का एही बेदना छिपा हुआ हो,काहे कि हमलोग जिसको लकड़ी चाहे पत्थर समझ कर फेंक देते हैं ओही बाँसुरी अऊर भगवान का मूरत बनकर हमरे सामने जाता है.हमरा बात त चलते रहेगा, आप गजल का आनंद उठाइएः

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कल तक ऐसी बात नहीं थी, फिर जाने क्या आज हुआ
कल जो था रस्ते का पत्थर, आज वो सिर का ताज हुआ.
इंसाँ की तक़दीर है कैसी, कितने उलझे इसके तार
जितना सुलझाने की कोशिश, उतना गहरा राज़ हुआ.
बहती नदिया, बदले मौसम, किस्मत ने भी करवट ली
कल जो था टुकड़ा लकड़ी का, आज सुरीला साज़ हुआ.
कोई कहे हथियार है पत्थर, कोई कहे मूरत भगवन की
इस मसले को कौन करे हल, वो खुद बे-आवाज़ हुआ.