ई जाड़ा का मौसम भी बहुते सुंदर होता है. चारों तरफ हरियरी छाया रहता है अऊर आदमी भी तंदरुस्त नजर आता है. छोटा छोटा बच्चा सब रंग बिरंगा सुईटर पहिने, एकदम रुई का गोला जैसा लगता है. गुलाबी गुलाबी फूला हुआ गाल, उसपर छोटा छोटा आँख अऊर बहता हुआ नाक गुलाबी ओठ तक आने से पहिले ही बचवा उसको अपना सुईटर से पोंछकर खेल में मगन हो जाता है. बुझाता है, जईसे कोनो छोटा सा खरगोश घास का मैदान में एहाँ से ओहाँ दौड़ रहा है.
घर के बाहर मैदान में, चाहे छत पर, चाहे बालकोनी में औरत लोग एक जगह झुण्ड बनाकर बईठ जाती हैं अऊर सुईटर के फंदा में अपना सुख दुःख बुनते चली जाती हैं. कभी कोनो दुःख को उधेड़कर रख दिया अऊर कभी कोनो सुख को बुन दिया. हर फंदा के साथ प्यार बुनाता जाता है अऊर इसका पता तब लगता है जब सुईटर पहिनने वाला पहिन कर निकलता है. ई सुईटर के गर्मी का मुकाबला मोण्टे कार्लो भी नहीं कर सकता.
जब छोटा थे त गर्मी जाने अऊर जाड़ा आने का इंतजार हमलोग बहुत मन लगाकर किया करते थे. सबसे पहिले तो जाड़ा माने त्यौहार का मौसम. अऊर त्यौहार माने, नया कपड़ा, इस्कूल से छुट्टी अऊर घूमने जाना, मेला देखना अऊर खेलौना खरीदवाना. हम भाई बहन के लिए तो जाड़ा अऊर गर्मी के छुट्टी का माने इलाहाबाद जाना भी होता था, पिताजी के पास. पुराना दोस्त लोग से नया नया मुलाकात.
इसके अलावा भी सबसे अच्छा लगता था अच्छा तरकारी खाना. अण्टा घाट अऊर कदम कुँआ के सब्जी बाजार में त लगता था हरियाली छा गया है. नया आलू, कोबी (गोभी), छीमी (मटर), साग, परवल, टमाटर, कटहल,रामतरोई (भिण्डी)… माने जेतना हमरा मनपसंद तरकारी था, सब जाड़ा में मिलता था. अऊर माता जी के हाथ का बना तरकारी का स्वाद त आझो जीभ में बसा हुआ है. अभी भी कभी माता जी हमरे कहने पर कोनो तरकारी बना देती हैं त ऊ स्वाद नहीं मिलता है. कहीं न कहीं समय के साथ जईसे बच्चा लोग का बचपना खतम हो गया, ओइसहीं तरकारियो का स्वाद छिन गया लगता है.
साँझ को त टीवी ऊवी का कोनो साधन था ही नहीं. बस खा पीकर सब लोग ओसारा में बईठ जाते थे. गर्मी का टूटा हुआ सुराही चाहे घड़ा को हिफाजत से आधा तोड़कर, उसमें लकड़ी अऊर गोईठा (उपले) जलाकर घेरा बनाकर, आग तापते थे अऊर गप्प लड़ाते थे, चाहे कहानी सुनते थे दादा जी से. हमरी माता जी कहती थीं कि आग आदमी को निकम्मा बना देता है. आग के पास से कोई उठकर जाना नहीं चाहता. गलती से अगर कोई पानी माँग लिया तो सबलोग एक दोसरा का मुँहे देखते रह जाते थे अऊर अंत में सबसे कमजोर आदमी को उठकर जाना पड़ता था. आग के पास से उठे त सीधा रजाई में.
एक रोज अईसहीं पिताजी को बोल दिए हम कि हमको जाड़ा बहुत अच्छा लगता है. केतना अच्छा होता अगर सालों भर जाड़ा रहता. ई बात सुनकर पिता जी सीरियस हो गए, बोले, “जिनके पास साधन है उनके लिए तो बहुत अच्छा मौसम है. मगर जिनके पास अभाव है, उनके लिए भगवानी मार है.” बोले कि गर्मी में त गाँधी मैदान में भी सोकर, बिना कपड़ा, नंगे बदन भी लोग रह लेता है. लेकिन ई जाड़ा में जब आसमान से भी ओस बरस रहा हो, तब बिना कपड़ा, ऊ भी गर्म कपड़ा के रात बिताना बिना सर पर छत के, नरक से कम नहीं होता है… बच्चा मन, जो कभी अभाव देखा ही नहीं था, कहाँ से समझता ई सब बात.
सन 1986.. हमलोग तीन दोस्त कलकत्ता गए घूमने. रात को गाड़ी हावड़ा स्टेशन पर पहुँचा. दिस्म्बर का महीना था. वैसे तो कलकत्ता में ठण्डा ओतना नहीं होता है, लेकिन दिसम्बर जनवरी में कुछ समय के लिए बहुत ठण्डा होता है. उस रात भी जमा देने वाला ठण्डा था. हमलोग ऊन का गोदाम बने हुए,सामान पीठ पर लादे जल्दी से कोनो होटल में पहुँचना चाह रहे थे. पता चला बहुत अच्छा तो नहीं है, मगर पास में एगो होटल है, पैदल जा सकते हैं.
हमलोग निकल कर चल दिए. हुगली नदी के तरफ से ठण्डा हवा कँपा दे रहा था. दुनो मुट्ठी में जाड़ा को बंद करके चल दिए अंधेरा में होटल के तरफ. रास्ता में एगो होटल देखाई दिया जिसका रसोई का हिस्सा सड़क पर था जिधर से हम लोग जा रहे थे. तंदूर का राख निकालने वाला हिस्सा सड़क के साईड में था. होटल बंद हो चुका था, रसोई भी ठण्डा गया था, मगर तंदूरके अंदर आग का गर्मी कुछ लकड़ी का कुछ कोयला का राख में दबा हुआ था.
उधर जब नजर पड़ा त अचानक हम डर गए. उसका राख निकालने वाला छेद में हम देखे कि चार पाँच आदमी आधा बदन अंदर डालकर आधा सड़क पर सोया हुआ था. बिस्वासे नहीं हुआ कि आदमी है ऊ लोग. कुछ एक दूसरे के देह का गर्मी अऊर कुछ राख के अंदर का बुझा हुआ कोयला का गर्मी. हम आगे बढ़ गए होटल के तरफ जल्दी जल्दी.. मगर अंधेरा में भी हमरे पिता जी का बात हमरा पीछा कर रहा था.
