तब हमरी बेटी छोटी थी. कलकत्ता में पैंटालून के स्टोर में उसको लेकर हम लोग गए. ओहाँ जाकर खेलौना देखकर उसका खुसी का ठिकाना नहीं रहता था. लगता था कि पूरा दोकान खरीद लेगी. मगर बच्चा का मन. एगो खेलौना उठाकर आगे जाती, त दोसरका लेने का मन करता अऊर उसके आगे कोनो अऊर. फाइनली जो हमलोग ले देते उसी से खुस. ऊ रोज हमलोग कपड़ा देखते हुए आगे बढ़ गए अऊर बेटी खेलौना वाला सेक्सन में पीछे रह गयी. ओहाँ पर जो कर्मचारी था ऊ देखा कि बच्चा अकेला रह गया है त उसके पास जाकर बोला, “तुम्हारे पापा उधर चले गए हैं!” हमरी बेटी अपना धुन में मगन थी, जवाब दी, “वो मेरे डैडी हैं, पापा पटना में रहते हैं!” हमलोग ई बात सुनकर अपना हंसी नहीं रोक पाए अऊर बेटी को लेकर आगे बढ़ गए. ऊ कर्मचारी बेचारा हैरान माथा पर प्रश्न चिह्न लिए हमलोग को देखते रह गया.
हमारे परिबार में बच्चा सब अपने बाप को परगतिसील अंगरेजी में डैडी बोलता है अऊर चाचा लोग को पापा. हम लोग भी भतीजा-भतीजी नहीं, बेटा-बेटी कहते हैं, जब कभी अन्य पुरुस में संबोधित करना होता है तब. मगर मामला इतने सिम्पुल होता, त हम ई पोस्ट नहीं लिख रहे होते. हमारा बेटा (एकलौता है खानदान में) हमको अऊर हमरी पत्नी को भैया-भाभी कहता है. का है कि बचपने से सबको एही बोलते सुना त ओही बोलने लगा. बच्चा लोग का त सोभाव होता है. हमरी बेटी अपनी माँ को सुरू सुरू में हमरा देखा-देखी नाम से बोलाती थी. एक दिन सिरीमती जी सिकायत की हमसे कि आपको देखकर ऊ हमको नाम लेकर बोलाती है. हम बोले कि समझाओ उसको, सुधर जाएगी. अब उसको समझाने के लिए हम तुमको मम्मी कहकर त नहिंये बोला सकते हैं.
बचपन में अईसा बात बहुत साधारण होता था. करीब-करीब हर घर में. हमरी छोटी फुआ हमरी माता जी को भाभी कहती थी, त हमरा फुफेरा भाई भी उनको भाभी कहने लगा था मामी कहने के बदले. हमरा एगो दोस्त अपनी दादी को अम्मा कहता था, काहे कि उसके माँ-बाबूजी दादी को अम्मा कहते थे.
मगर हमलोग के घर पीछे के पीछे रहने वाला दोस्त सिव कुमार के घर का रिवाज त अऊर अनोखा था. ऊ लोग अपनी दादी को “दादा” कहकर पुकारता था. अब इसका कारन त साधारण तौर पर समझ से बाहर था. त एक दिन हमलोग उसको पूछ लिए. ऊ जो कारन बताया ऊ त अऊर अनोखा था. ऊ लोग दादी को पहले दादी कहता था, मगर उसके दादा के देहांत के बाद उसकी दादी अपना सब पोता-पोती को बोलीं कि तुमलोग के सामने त हम जीवित हैं, मगर तुम लोग हमको दादा कहकर पुकारोगे त तुम्हारे दादा भी हमारे साथ जीवित रहेंगे. कमाल का प्रेम था अऊर कमाल का तरीका याद को ज़िंदा रखने का.
ई त था आदमी लोग का खिस्सा. हमरे यहाँ एगो तोता था. उमर में हमसे बड़ा. ऊ हमरी फुआ को बुच्ची, हमरी माता जी को दुल्हिन अऊर हमको बेटू कहकर बोलाता था. कमाल का तोता, ठेठ मगही भासा में बतियाता था. १९७५ के बाढ़ में गलती से डूबकर उसका स्वर्गवास हो गया. अगर ऊ आज ज़िंदा होता त हमरा सब पोस्ट का पोडकास्ट बहुत सफाई से कर सकता था. खैर, हमरे दादा जी से सबलोग को पुकारना सीखकर जइसे दादाजी बोलाते थे, वइसहीं ऊ भी बोलाता था.
अब सेक्सपियेर साहब भले बोल गए हों कि नाम में का रखा है. मगर रिस्ता का भी त नाम होता है. इन फैक्ट, रिस्ता का नाम से ही रिस्ता समझ में आता है. भाभी माने भाई की पत्नी, साला मतलब पत्नी का भाई, देवर मतलब पति का भाई. मगर इस तरह अगर रिस्ता का नाम में गुलमफेंट हो गया हो, त कैसे समझाया जा सकता है रिस्ता. उधर गुलजार साहब कहते हैं कि
सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो कोइ नाम न दो!
बात सही है, देवर-भाभी के रिस्ता के नाम के साथ जो मिठास है, भैया-दीदी के नाम के साथ जो स्नेह का खुसबू है, सब रूह से महसूस त किया जा सकता है, मगर ई रिस्ता का नाम सुनते ही, रिस्ता के साथ रिस्ता कायम होता है!
