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शनिवार, 14 अप्रैल 2012

तीन दशक और वह, जो शेष है!


“वह, जो शेष है!” श्री राजेश उत्साही की कविताओं का प्रथम संकलन है. ज्योतिपर्ब प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का विमोचन अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेला – २०१२ में प्रगति मैदान, नई दिल्ली में हुआ. इस कविता-संग्रह में कुल ४८ कवितायें हैं, जो इन्होंने तीन दशक से भी अधिक के कालखंड में रची हैं. यदि इतने लंबे अंतराल में उत्साही जी द्वारा रचित कविताओं की संख्या (जो इस संग्रह में हैं) मात्र ४८ हैं, तो सहज ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उन्होंने कवितायें “लिखीं” नहीं है, “रची” हैं. एक-एक कविता, गर्भधारण से लेकर प्रसव तक की यात्रा है. अतः यह कहने की आवश्यकता नहीं कि राजेश जी ने इन कविताओं को जिया है, पात्रों के साथ एकाकार हुए हैं और उनकी अनुभूतियों को अपने अंदर उतारा है, उनकी वेदनाओं का हलाहल नीलकंठ की तरह पिया है, तब जाकर इन कविताओं का जन्म हुआ है.

इस कविता-संग्रह में कविताओं के क्रम न तो रचना-काल के अनुसार हैं, न ही रचनाकार की पसंद के क्रम में हैं. राजेश जी के अनुसार कविताओं की विषयवस्तु के आधार पर उन्हें क्रम प्रदान किया गया है, जो मूलतः तीन श्रेणी में हैं – प्रेम, सरोकार और व्यक्तिगत कवितायें. यहाँ मुझे एक और श्रेणी दिखी जिसके विषय में कवि ने कुछ नहीं कहा. वह श्रेणी है (और संग्रह में प्रथम श्रेणी वही है) कवि और कविता के संबंधों की. शायद स्वयं को कविता के दर्पण में देखने की चेष्टा. चुप्पी उनके स्वभाव का परिचायक है और “कवि भी एक कविता है” में यह कहना कि

इसलिए पढ़ो/कि कवि/ स्वयं भी एक कविता है/ बशर्ते कि तुम्हें पढ़ना आता है!

“कविता बिना कवि” बिना हथियार के डॉन की तरह है क्योंकि कवि आत्मा पर चोट करता है और डॉन शरीर पर. उनके अनुसार कविता यदि आत्मा पर चोट न करे तो कवि की रचना सार्थक नहीं.

प्रणय विषयक कविताओं की श्रेणी में जितनी भी कवितायें हैं उनका चरित्र वैसा ही है जैसा उन्होंने “प्रेम” शीर्षक कविता में कहा है कि प्रेम दरसल व्यक्त करने की नहीं महसूसने की चीज़ है. उनकी सभी प्रेम कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनमें प्रेम का पारंपरिक वर्णन कहीं नहीं मिलता है, किन्तु शब्द-शब्द प्रेम पगा है. “तुम अपने द्वार पर” की अंतिम पंक्ति में जब वे कहते हैं कि “मुझे भी अपने द्वार का एक पौधा मान लो” तब जाकर यह कविता एक प्रेम कविता बनती है. और ज़रा इन पंक्तियों को देखें:
क्या लिखती हो तुम,
मेज़ पर, शीशे पर,
कागज़ पर,
ज़मीं पर, रेत में,
हवाओं में, पानी में,
उँगलियों से, तिनकों से,
क्या लिखती हो
जानना चाहता हूँ!
“वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था” वाले अंदाज़ में आरम्भ से अंत तक सबको पता है कि वह क्या लिखती है, मगर कवि नहीं कहता अपने मुँह से, उलटा प्रश्न छोड़ देता है कि क्या लिखती हो, जानना चाहता हूँ! पराकाष्ठा है यह प्रेमाभिव्यक्ति की. हर कविता एक अलग ही अंदाज़ में और एक अलग ही अभिव्यक्ति के साथ. लेकिन कवि के रूप में राजेश जी कहीं भी कविता और पाठक के बीच नहीं आते!

अगली श्रृंखला में समाजी सरोकार से जुडी कुछ कवितायें हैं, जिसमें बिना शब्दजाल फैलाए जिस प्रकार उन्होंने छोकरा शीर्षक के अंतर्गत बूट पॉलिश करने वाले, ट्रेनों में झाडू लगाने वाले, गाकर पैसे माँगने वाले बच्चों की दुर्दशा का वर्णन किया है, वह संवेदना का हिमालय है. और यहाँ भी उनका काव्य-चातुर्य दिखाई देता है, जब हम पाते हैं कि उन बच्चों की व्यथा व्यक्त करने के लिए उन्होंने अनावश्यक मार्मिक शब्दों और अनर्गल वर्णन का सहारा बिलकुल नहीं लिया है. कवितायें मन को छूती हैं, क्योंकि सादा हैं, शब्दों की पेंटिंग नहीं, ज़िंदगी की तरह बदरंग! धोबी, चक्की पर, स्त्री, घोड़ेवाला, चिड़िया, गांधी आदि कवितायें झकझोरती हैं और सीधा जोड़ती हैं उस सरोकार से. एक आईने की तरह रख दी हैं वे कवितायें हमारे सामने जिसमें हमें हमारा बदसूरत चेहरा दिखता है.

अंत में उनके कवि ह्रदय का परिचय देती हुई कुछ व्यक्तिगत कवितायें संगृहीत हैं. कवि-ह्रदय से यहाँ तात्पर्य यह है कि उनकी सोच का माध्यम भी कविता है. यद्यपि उन्होंने गद्य भी लिखे हैं, तथापि उनकी मूल अभिव्यक्ति कविता में ही मुखर हुई है. इन सारी कविताओं के पात्र, वे स्वयं हैं और उनके परिजन. नितांत वैयक्तिक कवितायें हैं. “इतनी जल्दी नहीं मरूंगा मैं” के अंतर्गत मौत से सामना होने की कुछ घटनाएँ उन्होंने कविता के माध्यम से साझा की हैं. कविताओं का प्रवाह बांधकर रखता है. बाद की कविताओं में उन्होंने अपने परिवार की जिन घटनाओं का वर्णन किया है, वह एक बड़ा ही साहसिक कदम है. आम तौर पर जो घटनाएँ कोई भी व्यक्ति, किसी अनजान व्यक्ति के साथ शेयर नहीं करता, उसे उन्होंने पूरी ईमानदारी से सारी दुनिया के साथ बांटा है. इस क्रम में उनकी जीवनसंगिनी का शब्दचित्र सर्वोत्तम है. कविता “नीमा” में उन्होंने पत्नी के संघर्ष की कथा और स्वयं को उनका पति, संगी, साथी और साधक के रूप में प्रस्तुत किया है, जो समस्त स्त्री जाति के प्रति उनके सम्मान की भावना का द्योतक है. इसी विशेषता के कारण यह कविता उनका व्यक्तिगत अनुभव न होकर सम्पूर्ण नारी समाज के प्रति व्यक्त किया गया सम्मान है.

कविताओं की संरचना छोटे-छोटे मुक्त छंदों से की गई है, कोई भी कविता अनावश्यक लंबी नहीं है, जो कवितायें लंबी हैं, वह विषय-वस्तु की मांग पर आवश्यक है, भाषा इतनी सरल है कि मानो आम बोल-चाल की भाषा हो, भावनाओं को उभारने के लिए व्यर्थ का शब्दाडम्बर कहीं भी नहीं है और सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कविता में कोई दर्शन नहीं छिपा है - जहाँ कवि कहना कुछ चाहता है और पाठक समझता कुछ और है या फिर कवि के स्पष्टीकरण की आवश्यकता अनुभव होती हो पाठक को, भाव इतनी सरलता और सहज रूप में अभिव्यक्त हुए हैं कि पाठक तक कवि की बात सीधी पहुँचती है!

कुछ दोष जो यहाँ वहाँ दिखे वो बस वैसे ही जैसे किशमिश के दाने में लगा तिनका. कुछ तथ्यात्मक दोष जो मुझे दिखे, जैसे- झील में पड़ी अपनी लाश के विषय में यह कहना कि “तबतक धंस चुका होउंगा मैं/झील में नीचे” जबकि तथ्य यह है कि लाश तैरती है, धंसती नहीं; “यहीं १९५९ के साल की पहली तारीख को/नीमा ने पहली किलकारी भरी”- यह निश्चित रूप से जन्म की तिथि है अतः किलकारी नहीं- पहला रूदन, किलकारी तो शायद कुछ महीनों बाद ही सुनाई देती है. कविता में मध्यप्रदेश को “मप्र” लिखना खलता है, क्योंकि एमपी तो प्रचलित है, मप्र नहीं! लेकिन यह दोष वास्तव में बिम्ब के रूप देखे जाएँ तो दोष नहीं लगते.

एक कविता है “वह औरत”. इसमें उन्होंने एक जवान मजदूरनी पर कुदृष्टि डालते ठेकेदार और स्वयं को साक्षी बनाकर उस औरत की मनोदशा और उसे भारत माता की दुर्दशा से जोड़ते हुए अभिव्यक्त किया है. किन्तु पढते हुए एक स्थान पर यह कविता समाप्त होती प्रतीत होती है अपने पूरे प्रभाव के साथ
अचकचाकर
मैं उसे देखता हूँ.
मुझे वह औरत
अपनी माँ नज़र आने लगती है!
इसके बाद माँ को भारत माँ से जोड़ना वह प्रभाव नहीं उत्पन्न कर पाया. अगर इसे दूसरी कविता के रूप में अलग से प्रस्तुत किया गया होता तो पाठकों को एक दूसरे अनुभव से उद्वेलित कर सकती थी.

कुल मिलाकर तीन दशकों की रचनाओं का संकलन “वह, जो शेष है” राजेश उत्साही जी के शांत, सहृदय व्यक्तित्व, जूझारू चरित्र, ज़मीन से जुड़े स्वभाव और ईमानदार अभिव्यक्ति का खज़ाना है. ये शांत भाव से, साहित्य की सेवा करने वाले व्यक्ति हैं, तभी आज तक छिपे रहे. किन्तु कल तक छिपे थे आज छपे हैं. मुझ डाकू खडगसिंह के बाबा भारती!

पुनश्च:
संयोग से आज ही मनोजकुमार जी ने “राजभाषा हिन्दी” ब्लॉग पर इस कविता-संग्रह की चर्चा की है. पुस्तक-परिचय यहाँ देख सकते हैं.