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गुरुवार, 2 जून 2011

एलेमेन्टरी माई डियर वाटसन!

आइये आज आपको एगो अपने पुराना परिचित से मिलवाते हैं. आप में से बहुत सा लोग मिले भी होंगे इनसे, त उनके लिए दोबारा मिलने जइसा होगा. सबसे पाहिले उनका पर्सनाल्टी के बारे में:

साहित्त, दर्सनसास्त्र अउर खगोलसास्त्र का ज्ञान: शून्य
राजनीति का ज्ञान: बहुत कम
बनस्पतिसास्त्र का ज्ञान: बेलाडोना, अफीम अउर जहर के बारे में पूरा जानकारी
भौमिकी (जियोलॉजी) का ज्ञान: मट्टी के बारे में जबर्दस्त जानकारी
रसायनसास्त्र का ज्ञान: पारंगत
एनाटॉमी का ज्ञान: सटीक मगर बेतरतीब
सनसनीखेज साहित्त का ज्ञान: पूरा सताब्दी में घटा हर घटना का गहन अध्ययन
संगीत का ज्ञान: वायलिन बहुत अच्छा बजाना आता है
खेल खेलना: मुक्काबाजी और तलवारबाजी में माहिर
क़ानून का जानकारी: स्थानीय क़ानून का ब्यवहारिक ज्ञान

खगोलसास्त्र का इनका जानकारी एतना शानदार है कि इनको ई भी नहीं पता है कि सोलर सिस्टम का होता है अउर सूरज, पृथिबी अउर चन्द्रमा में से कउन किसके पीछे चक्कर लगाता है. जब इनको बता दिया गया त ई बोले कि बेकारे बता दिए, अब इसको भूलने में टाईम लग जाएगा.
इनका मानना है कि आदमी का दिमाग घर के अंदर छत के नीचे बना हुआ बोंक्स रूम के जईसा होता है. सुरू-सुरू में त जेतना सामान इसमें फेंकिए, सब समा जाता है. बाकी एगो समय अइसनो आता है, जब एगो सामान फेंकिये, त दोसरा सामान बाहर गिर जाता है, चाहे पहिलके सामान अंदर नहीं समाता है. अउर इसमें कोनों जबरदस्ती भी नहीं चलता. उनका कहने का मतलब ई है कि आप अपना दिमाग में ओही बात या जानकारी रखिये जिसका आपको जरूरत है अउर समय पर आपको याद आ जाए. बाकी फालतू सब बाहर कर दीजिए. अब सूरज पृथिबी का चक्कर लगाए कि पृथिबी सूरज का, दिन रात होने में फरक त नहिये होने वाला है.
इतना परिचय के बाद, ई बताने का जरूरत है कहाँ कि उनका नाम शर्लोक होम्स है. सर आर्थर कानन डायल का रचा हुआ महान जासूस. ऊ अपने दोस्त डॉ. वाटसन के साथ मिलकर बहुत सारा अपराध चुटकी में हल कर दिए. हल करने का तरीका एतना साधारण कि “चुटकी में” सब्द मोहावरा नहीं, सचाई लगता था. जूता में लगा हुआ मट्टी देखकर बता देना कि ई आदमी लन्दन के किस हिस्सा से चलकर आ रहा है, आपके आने का समय से ई बताना कि आप कहाँ से आ रहे हैं, काहे कि इस समय ओहीं से गाड़ी सुबह-सुबह आता है. आज भी बहुत सा जासूसी सीरियल इन्हीं का भोंडा नक़ल करके बनता है अउर मसहूर भी होता है. मगर ऊ क्राइम कम कोमेडी जादा लगता है.
सत्यजीत राय भी फेलु दा (प्रदोस चन्द्र मित्तर) के नाम से एगो जासूस का चरित्र गढे थे, जो आज भी मसहूर है. हमरा बेटा त दीवाना है फेलु दा का. बंगाल में सरदेन्दु बंद्योपाध्याय द्वारा रचित ब्योमकेस बक्सी भी घर-घर में जाना जाता है. टीवी पर भी इसका सीरियल देखाया जाता था. ओइसहीं करमचंद, डिटेक्टिव ओंकार नाथ, के.डी.पाठक जैसा केतना जासूस देखाया गया.
बंगाल से याद आया. जब हम कलकत्ता में थे तब एक दिन कोनों दोकान में कुछ खरीदारी करने गए. पांच सौ का नोट था हमरे पास, सो हम दिए. दोकानदार बाकी पैसा हमको लौटाया, त हम सहेजकर पर्स में रखने लगे.
दोकानदार पूछा, “दादा! आपनी की बैंके चाकरी कॉरेन?” (क्या आप बैंक में नौकरी करते हैं?)
उसका उत्तर देने से पहले हम अपने दिमाग को मथ डाले. हम विदेशी-मुद्रा विभाग में काम करते हैं और हमरे इहाँ तो खाता भी नहीं खुलता है. माने इस आदमी का खाता भी हमरे ऑफिस में नहीं हो सकता. न ई हमरे घर के पास का बासिंदा लगता है कि जानता होगा कि हम बैंक के अपार्टमेंट में रहते हैं. सस्पेंस हमसे बर्दास्त नहीं होता है.
हम जवाब में सवाल पूछ लिए, “आपनी की कोरे बूझलेन?” (आपको कैसे पता चला?)
ऊ हंसने लगा. बोला, “ आमी टाका फेरोत दिलूम, त आपनी नोटेर सादा पोर्शन टा एक साइड कोरे शाजिये राखलेन. एई टा बैंकर लोकदेर अभ्येश!”

कमाल का चरित्र था. कहने लगा कि हमरे पैसा वापस करने पर आप जो नोट का सफ़ेद वाला हिस्सा को एक तरफ करके सजा रहे थे, तो हमको लगा कि आप बैंक में काम करते होंगे. उन्हीं लोगों को आदत है ऐसा करने का.

हम मुस्कुरा कर निकल आये दोकान से. सोचते हुए कि ऊ आदमी का नाम का था शर्लोक घोष या फेलू बंदोपाध्याय या ब्योमकेस मित्रा!