एगो बहुत पुराना
कहावत है कि काठ का हाण्डी दोबारा नहीं चढता है. अऊर एगो बहुत बड़ा अदमी का कहा हुआ
बात है कि आप एक टाइम में ढेर सा लोग को अपना झूठ से फुसला सकते हैं, चाहे एगो
अदमी को ढेर देर तक बहला सकते हैं, लेकिन ढेर सारा लोग को ढेर देरी तक झूठ बोलकर
नहीं फँसा सकते हैं. अब आप कहियेगा कि इसमें कऊन अइसन बिसेस बात है, सब लोग
पढा-लिखा है अऊर सबको ई मालूम है. त हम माफी चाहते हैं, बतवा एतने सिम्पुल होता त
हम एहाँ नहीं कहते.
आज सौ साल से बहुत
सा लोग का गुट आप सब लोग को झूठ-मूठ का कहानी सुनाकर फुसला रहा है अऊर आप, ऊ लोग
का कहानी सुनकर कभी खुस होते हैं अऊर कभी आँसू बहाते हैं. अरे जब सबलोग समझदार हैं,
त काहे नहीं झूठ धर लेते हैं. एक्के झूठ सिचुएसन बदल-बदल कर सामने आता है अऊर आप लोग
तारीफ करते नहीं थकते.
तीन घण्टा रुपहला पर्दा
पर चलने वाला रोसनी अऊर परछाईं का खेला हम लोग सौ साल से देखते आ रहे हैं. सब नकली
है जानते बूझते हुए भी आझो ऊ खेला हँसाता है, रोलाता है, डराता है, बहलाता है,
फुसलाता है, प्यार जताता है, भक्ति जगाता है, जोस भर देता है, नफरत देखाता है.
एतना नकली होता है कि देखने के बाद रोने वाला अदमी चुपचाप रुमाल से अन्धेरा में
आँसू पोंछ लेता है अऊर देखता है कि कोई देख त नहीं न रहा है.
अब त हमको कहने का
जरूरत नहीं है कि हम सिनेमा के बारे में बतिया रहे हैं. सिनेमा का आकर्सन कहियो कम
नहीं हुआ, देविका रानी से लेकर दीपिका पदुकोन तक अऊर पृथ्वीराज कपूर से लेकर रनबीर
कपूर तक. हमको तो नसा है सिनेमा का. बाकी अपने आप को सिनेमा के पर्दा (टीवी के
पर्दा) पर देखने का खाहिस अपना सादी का वीडियो से आगे नहीं बढ पाया. ऐक्टिंग करने
के बाबजूद भी सिनेमा वाला बात मन में फाँस के तरह लगले रह गया. एही नहीं, बेटा के अन्दर भी सिनेमा बनाने बीमारी समा जाएगा
कभी सोचे नहीं थे. माने हमको ऐक्टिंग करने का अऊर बेटा को सिनेमा बनाने का. बस हो
गया घोड़ा को कुँआ के पास ले जाने का इंतजाम.
कहानी का कोई चिंता
नहीं था, लेकिन कलाकार का समस्या था. हम दुनो बाप-बेटा के अलावा घर में कोई ऐक्टर नहीं,
सब के सब समिक्छक हैं. बेटी कैमरा उठाने से आगे तैयार नहीं. एही से श्री सत्यजीत
राय का एगो कहानी “टेलिफ़ोन” चुना गया जिसमें खाली दू गो चरित्र था. बेटा का कहना
था कि ऊ सिनेमा खाली हमारे ऐक्टिंग के लिये है, काहे कि ऊ लोग हमारा ऐक्टिंग कभी
देखा नहीं था. कहानी में दू आदमी का टेलिफोन पर बातचीत था. कैमरा हमारे ऊपर था अऊर
हमारे साथ टेलिफोन के दोसरा ओर का सम्बाद बोल रहा था हमारा बेटा, हमको साथ देने के
लिये!
जब पूरा फिलिम सूट
हो गया त हमको लगा कि बेटा का आवाज़ है त उसको अन्धेरा में रखकर उससे भी ऐक्टिंग
करवाया जाए त मोनोटॉनी खतम हो जाएगा. बस उसका सारा सम्बाद दोबारा बोलाया गया अऊर
उसका सीन सूट हो गया. बाद में एडिटिंग के बाद एतना बढिया फिलिम बना कि का बताएँ. कम
से कम साधन में अच्छा सिनेमा. एडिटिंग, संगीत अऊर टाइटिल के बाद सिनेमा बहुत अच्छा
बन गया. बाद में बहुत सा गलती भी देखाई दिया, लेकिन पहलौठी का संतान पाने का सुख
परसव का तकलीफ कहाँ महसूस होने देता है.
दूसरा फिलिम के लिये
हमको अपने गुरु के. पी. सक्सेना साहब का ध्यान आया. लेकिन समस्या एही था कि उनका
लेख में व्यंग त होता है, मगर कहानी नहीं. तइयो एगो लेख निकाले, उसको दोबारा पटकथा
अऊर सम्बाद के साथ लिखे अऊर तब लगा कि कुछ बात बन गया है – “आत्महत्या की पहली किताब”. हमारे लिये गुरू जी को दिया जाने वाला गुरु-दच्छिना के समान था. लेकिन सिनेमा
का पूरा काम होने के रोज उनका निधन का समाचार
मिला. गुरु-दच्छिना, सर्धांजलि में बदल गया.
ई बार जब जनवरी में
पटना गये त फिर हम दुनो बाप-बेटा बइठकर सोचने लगे कि अबकी का किया जाए. ई बार
अच्छा बात ई हुआ कि घर के सब सदस्य के अन्दर ऐक्टिंग का कीड़ा कुलबुलाने लगा था.
सत्यजीत राय के कहानी “मानपत्र” का पटकथा अऊर सम्बाद लिखा गया. पूरा घर इस बार जुट
गया. दू गो छोटा भाई, बहु सबलोग. मगर एगो सबसे बड़ा समस्या ई था कि उसमें एगो दिरिस
था जिसमें बहुत बड़ा जलसा होता हुआ दिखाना था अऊर ऊ कहानी का जरूरी हिस्सा था. बहुत
सोचने के बाद हम बोले कि हमारा सादी के रजत जयंती का वीडियो में से जलसा वाला सीन
निकालकर एडिट कर के इसमें डाला जा सकता है.
ई सिनेमा में घर का कलाकार
होने से जादा महत्वपूर्ण बात ई था कि बहुत सा लोग के लिये ऐक्टिंग का पहिला अबसर
था. मगर सबसे बड़ा बात था फिलिम में हमारे स्वर्गीय पिता जी के फोटो का इस्तेमाल.
सूटिंग के टाइम में हमारे दिमाग में आया बात अऊर बस पिता जी भी फिट हो गये सिनेमा
में अऊर एगो बहुत महत्वपूर्ण किरदार के रूप में.
आज आपके सामने “वर्मा
फ़िल्म्स” का तीसरा सिनेमा पेस कर रहे हैं. सिनेमा में बहुत सा कमी है, मगर सुबिधा के
अभाव अऊर बहुत सा मोस्किल (हमारे पास टाइम कम होना और बेटा का पढाई) के साथ कलाकार
का कमी. मगर 16-17 साल के बच्चा के एडिटिंग का कमाल अऊर बैकग्राउण्ड संगीत का
इस्तेमाल अऊर 16-17 साल की हमरी बेटी का कैमरा संचालन आपको वाह कहने पर मजबूर कर
देगा.
(आसमान के तरफ हाथ उठाकर) पापा जी! देख रहे हैं ना, मम्मी हमेसा गुसियाती थीं
कि आप हमलोग से खाली सिनेमा का बात बतियाते हैं, पढाई का बात नहीं. आज सिनेमा का
रोग आपसे चलते हुए तीसरा पीढी तक पहुँच गया है! आसीर्बाद दीजिये कि बुढापा में हम
अऊर किसोर अवस्था में आपका पोता-पोती आपको एगो फिलिम डेडिकेट कर रहे हैं! वी रियली
मिस यू डैड!!

