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रविवार, 4 मई 2014

वर्मा फ़िल्म्स


एगो बहुत पुराना कहावत है कि काठ का हाण्डी दोबारा नहीं चढता है. अऊर एगो बहुत बड़ा अदमी का कहा हुआ बात है कि आप एक टाइम में ढेर सा लोग को अपना झूठ से फुसला सकते हैं, चाहे एगो अदमी को ढेर देर तक बहला सकते हैं, लेकिन ढेर सारा लोग को ढेर देरी तक झूठ बोलकर नहीं फँसा सकते हैं. अब आप कहियेगा कि इसमें कऊन अइसन बिसेस बात है, सब लोग पढा-लिखा है अऊर सबको ई मालूम है. त हम माफी चाहते हैं, बतवा एतने सिम्पुल होता त हम एहाँ नहीं कहते.

आज सौ साल से बहुत सा लोग का गुट आप सब लोग को झूठ-मूठ का कहानी सुनाकर फुसला रहा है अऊर आप, ऊ लोग का कहानी सुनकर कभी खुस होते हैं अऊर कभी आँसू बहाते हैं. अरे जब सबलोग समझदार हैं, त काहे नहीं झूठ धर लेते हैं. एक्के झूठ सिचुएसन बदल-बदल कर सामने आता है अऊर आप लोग तारीफ करते नहीं थकते.  

तीन घण्टा रुपहला पर्दा पर चलने वाला रोसनी अऊर परछाईं का खेला हम लोग सौ साल से देखते आ रहे हैं. सब नकली है जानते बूझते हुए भी आझो ऊ खेला हँसाता है, रोलाता है, डराता है, बहलाता है, फुसलाता है, प्यार जताता है, भक्ति जगाता है, जोस भर देता है, नफरत देखाता है. एतना नकली होता है कि देखने के बाद रोने वाला अदमी चुपचाप रुमाल से अन्धेरा में आँसू पोंछ लेता है अऊर देखता है कि कोई देख त नहीं न रहा है.

अब त हमको कहने का जरूरत नहीं है कि हम सिनेमा के बारे में बतिया रहे हैं. सिनेमा का आकर्सन कहियो कम नहीं हुआ, देविका रानी से लेकर दीपिका पदुकोन तक अऊर पृथ्वीराज कपूर से लेकर रनबीर कपूर तक. हमको तो नसा है सिनेमा का. बाकी अपने आप को सिनेमा के पर्दा (टीवी के पर्दा) पर देखने का खाहिस अपना सादी का वीडियो से आगे नहीं बढ पाया. ऐक्टिंग करने के बाबजूद भी सिनेमा वाला बात मन में फाँस के तरह लगले रह गया. एही नहीं,  बेटा के अन्दर भी सिनेमा बनाने बीमारी समा जाएगा कभी सोचे नहीं थे. माने हमको ऐक्टिंग करने का अऊर बेटा को सिनेमा बनाने का. बस हो गया घोड़ा को कुँआ के पास ले जाने का इंतजाम.

कहानी का कोई चिंता नहीं था, लेकिन कलाकार का समस्या था. हम दुनो बाप-बेटा के अलावा घर में कोई ऐक्टर नहीं, सब के सब समिक्छक हैं. बेटी कैमरा उठाने से आगे तैयार नहीं. एही से श्री सत्यजीत राय का एगो कहानी “टेलिफ़ोन” चुना गया जिसमें खाली दू गो चरित्र था. बेटा का कहना था कि ऊ सिनेमा खाली हमारे ऐक्टिंग के लिये है, काहे कि ऊ लोग हमारा ऐक्टिंग कभी देखा नहीं था. कहानी में दू आदमी का टेलिफोन पर बातचीत था. कैमरा हमारे ऊपर था अऊर हमारे साथ टेलिफोन के दोसरा ओर का सम्बाद बोल रहा था हमारा बेटा, हमको साथ देने के लिये!

जब पूरा फिलिम सूट हो गया त हमको लगा कि बेटा का आवाज़ है त उसको अन्धेरा में रखकर उससे भी ऐक्टिंग करवाया जाए त मोनोटॉनी खतम हो जाएगा. बस उसका सारा सम्बाद दोबारा बोलाया गया अऊर उसका सीन सूट हो गया. बाद में एडिटिंग के बाद एतना बढिया फिलिम बना कि का बताएँ. कम से कम साधन में अच्छा सिनेमा. एडिटिंग, संगीत अऊर टाइटिल के बाद सिनेमा बहुत अच्छा बन गया. बाद में बहुत सा गलती भी देखाई दिया, लेकिन पहलौठी का संतान पाने का सुख परसव का तकलीफ कहाँ महसूस होने देता है.

दूसरा फिलिम के लिये हमको अपने गुरु के. पी. सक्सेना साहब का ध्यान आया. लेकिन समस्या एही था कि उनका लेख में व्यंग त होता है, मगर कहानी नहीं. तइयो एगो लेख निकाले, उसको दोबारा पटकथा अऊर सम्बाद के साथ लिखे अऊर तब लगा कि कुछ बात बन गया है – “आत्महत्या की पहली किताब”. हमारे लिये गुरू जी को दिया जाने वाला गुरु-दच्छिना के समान था. लेकिन सिनेमा का पूरा काम होने के रोज  उनका निधन का समाचार मिला. गुरु-दच्छिना, सर्धांजलि में बदल गया.

ई बार जब जनवरी में पटना गये त फिर हम दुनो बाप-बेटा बइठकर सोचने लगे कि अबकी का किया जाए. ई बार अच्छा बात ई हुआ कि घर के सब सदस्य के अन्दर ऐक्टिंग का कीड़ा कुलबुलाने लगा था. सत्यजीत राय के कहानी “मानपत्र” का पटकथा अऊर सम्बाद लिखा गया. पूरा घर इस बार जुट गया. दू गो छोटा भाई, बहु सबलोग. मगर एगो सबसे बड़ा समस्या ई था कि उसमें एगो दिरिस था जिसमें बहुत बड़ा जलसा होता हुआ दिखाना था अऊर ऊ कहानी का जरूरी हिस्सा था. बहुत सोचने के बाद हम बोले कि हमारा सादी के रजत जयंती का वीडियो में से जलसा वाला सीन निकालकर एडिट कर के इसमें डाला जा सकता है.

ई सिनेमा में घर का कलाकार होने से जादा महत्वपूर्ण बात ई था कि बहुत सा लोग के लिये ऐक्टिंग का पहिला अबसर था. मगर सबसे बड़ा बात था फिलिम में हमारे स्वर्गीय पिता जी के फोटो का इस्तेमाल. सूटिंग के टाइम में हमारे दिमाग में आया बात अऊर बस पिता जी भी फिट हो गये सिनेमा में अऊर एगो बहुत महत्वपूर्ण किरदार के रूप में.

आज आपके सामने “वर्मा फ़िल्म्स” का तीसरा सिनेमा पेस कर रहे हैं. सिनेमा में बहुत सा कमी है, मगर सुबिधा के अभाव अऊर बहुत सा मोस्किल (हमारे पास टाइम कम होना और बेटा का पढाई) के साथ कलाकार का कमी. मगर 16-17 साल के बच्चा के एडिटिंग का कमाल अऊर बैकग्राउण्ड संगीत का इस्तेमाल अऊर 16-17 साल की हमरी बेटी का कैमरा संचालन आपको वाह कहने पर मजबूर कर देगा.


(आसमान के तरफ हाथ उठाकर) पापा जी! देख रहे हैं ना, मम्मी हमेसा गुसियाती थीं कि आप हमलोग से खाली सिनेमा का बात बतियाते हैं, पढाई का बात नहीं. आज सिनेमा का रोग आपसे चलते हुए तीसरा पीढी तक पहुँच गया है! आसीर्बाद दीजिये कि बुढापा में हम अऊर किसोर अवस्था में आपका पोता-पोती आपको एगो फिलिम डेडिकेट कर रहे हैं! वी रियली मिस यू डैड!!

बुधवार, 1 मई 2013

Ray of Ray


(यह आलेख मेरे भाई शशि प्रिय वर्मा के अंग्रेज़ी लेख का अनुवाद है. यह आलेख उसके पुत्र अनुभव प्रिय की स्कूल पत्रिका के लिए अभिभावकों की श्रेणी में प्रकाशित हुआ था. आज सत्यजीत राय की जयन्ती के अवसर पर उस लेख का हिन्दी अनुवाद श्री शिवम मिश्र के विशेष आग्रह पर!)

गांधी”, सिनेमा के इतिहास में एक महानतम फिल्म है. इसने ग्यारह ऑस्कर के लिए नामांकित होकर आठ ऑस्कर जीते, जिसमें भारतीय कौस्च्यूम डिजाइनर भानुमति अथय्या ने संयुक्त रूप से यह पुरस्कार प्राप्त किया और वो भारत की पहली ऑस्कर विजेता बनीं.
लेकिन मैं न तो ऑस्कर की बातें करने जा रहा हूँ, न भानु अथय्या की!

सर रिचर्ड एटेनबरो ने उस फिल्म का निदेशन किया था, जो स्वयं एक बेहतरीन अदाकार हैं और जिन्होंने अभिनय की शिक्षा RADA (Royal Academy of Dramatic Arts) से ग्रहण की. उन्हें भी इस फिल्म के लिए ऑस्कर मिला था. उनकी अदाकारी जुरासिक पार्क (१९९३) में देखने को मिली थी, वो भी वर्ष १९७७ में उनके द्वारा अभिनीत एक फिल्म के बाद.
लेकिन मैं एटेनबरो की बात भी नहीं करने जा रहा. मैं तो उस फिल्मकार की बात करने जा रहा हूँ जिसके लिए उन्होंने वर्ष १९७७ में काम किया था.

इसके पहले कि मैं उनका नाम लूँ, उनका एक छोटा सा परिचय ज़रूरी हो जाता है. वह अपनी पहली फिल्म से ही एक चुनौती बन गए थे, दुनिया भर के फिल्मकारों के लिए. उन्होंने दुनिया भर के लगभग तमाम फिल्म-पुरस्कार हासिल किये और साल दर साल सारे पुरस्कारों को एक से ज़्यादा बार हासिल किया, सिवा ऑस्कर के. आखिरकार, ऑस्कर भी उनके पास आया, फ़िल्म-जगत को उनके योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्डके रूप में. बीमारी के कारण वो पुरस्कार प्राप्त करने नहीं जा सके इसलिए ऑस्कर कमिटी ने खुद उन तक जाकर उन्हें वो पुरस्कार प्रदान किया. उन्हें फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान और भारतवर्ष का भारत रत्नसम्मान प्रदान किया गया. जी हाँ, वो एक भारतीय था, जिसने हिन्दी में सिर्फ दो फ़िल्में ही बनाईं, बाकी अपनी मातृभाषा बांग्ला में. वर्ष 1977 में सर रिचर्ड एटेनबरो ने उनकी ही फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में काम किया, जो उनकी पहली हिन्दी फिल्म थी. वे फिल्मकार और कोई नहीं सत्यजित राय थे!

उनके जीवन काल के विषय में बहुत कुछ उपलब्ध है. उन्हें मैं दोहराने नहीं जा रहा. सत्यजीत राय की चर्चा अधिकतर उनकी फिल्मों को लेकर ही हुई है. यह बात भी सही है कि वो भारतीय सिनेमा के महानतम फिल्मकार थे. लेकिन जैसे खोटा सिक्का दोनों तरफ से ही खोटा होता है, वैसे ही खरे सिक्के के दोनों ओर कोई नहीं देखता. मुझे उनके दूसरे पहलू का तब पता चला जब मेरा उनके साहित्य से सामना हुआ. तब मैंने जाना कि वे भले ही एक महान फिल्मकार थे, किंतु दिल से बच्चे ही थे. वर्ष 1961 में उन्होंने अपने दादा जी के प्रकाशन का काम सम्भाल लिया, जो दादा जी ने बीच में ही छोड़ दिया था. राय ने बाल-पत्रिका सन्देश का पुन: प्रकाशन प्रारम्भ किया. उनकी कहानियाँ रहस्य-रोमांच से भरपूर और सामान्य जानकारियों से बुनी हुई होती थीं. उन्होंने अपनी कहानियों में गणित, भूगोल, इतिहास, मनोविज्ञान, संगीत तथा पुरातत्व के तथ्यों का भरपूर इस्तेमाल किया. उनकी कहानी कहने की कला रोमांचक और कई बार रोंगटे खड़े कर देने वाली होती थी. यही नहीं उनकी कहानियों में हर उम्र के व्यक्ति के लिये कुछ न कुछ अवश्य होता है.

मैंने उनकी पहली पुस्तक जो खरीदी वो थी प्रकाशन विभाग, भारत सरकार की हंसने वाला कुत्ता. मैं शुरू में इस किताब को खरीदने के प्रति उदासीन था और इसे मैने तब जाकर खरीदा जब ये 50% की छूट पर बिकने को आई. एक कुत्ता जो इंसान की तरह हंसता है और एक आदमी उसे किसी भी कीमत पर खरीदना चाह्ता है. चेक बुक निकालकर जब वो उसकी कीमत देना चाहता है तो वह कुत्ता ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगता है. कुत्ते के मालिक ने बताया कि उसके हंसने का कारण सिर्फ इतना है कि उस कुत्ते को पता है कि दुनिया में हर चीज़ पैसे से नहीं खरीदी जा सकती!

इस पुस्तक की सारी कहानियाँ पढने के बाद अगले ही दिन मेरे हाथ में सत्यजीत राय की पाँच और किताबें थीं. सोने का किला (राजकमल प्रकाशन), बादशाही अंगूठी (राधाकृष्ण प्रकाशन), सत्यजीत राय की कहानियाँ (राजपाल), जहाँगीर की स्वर्णमुद्रा (राजकमल) और मुल्ला नसरुद्दीन की कहानियाँ (राजकमल).

उनकी सारी कहानियों में सबसे उल्लेखनीय बात है उनके गढे हुए चरित्र, उनका नैरेशन और उनकी कल्पना की उड़ान. फेलु दा जैसा ज़हीन, जटायु जैसा थ्रिलर लेखक, प्रो. शंकु जैसा वैज्ञानिक (जिसने कम लागत में बड़े आविष्कार किये), प्रो. हिजबिजबिज जैसा सर्जन (जो मोमबत्ती की रोशनी में भी ऑपरेशन कर सकता है) सिर्फ उनकी सोच से ही जन्म ले सकते है. कहानियों का वर्णन इतना स्पष्ट कि वास्तविकता का आभास होता है. उनकी कहानियों को पढने के बाद आप फ्रांस, बेंगलुरु, जर्मनी, राजस्थान घूमने जायें तो आपको लगेगा कि आप यहाँ पहले भी आ चुके हैं. और उनकी कल्पनाशीलता तो कल्पना से भी परे है.

उनकी कल्पनाशक्ति की तुलना महान शेक्सपियेर से की जा सकती है जिन्होंने कॉमेडी ऑफ एरर में दो जोड़े जुड़वाँ की कल्पना की थी या फिर ‘मैकबेथ’ में उसकी मृत्यु का क्लाइमेक्स लिखा था.

मेरा अनुरोध है सभी बच्चों से और उनके अभिभावकों से कि अगर वे सत्यजीत राय को केवल एक फिल्मकार मानते हैं, तो एक बार उनकी कहानियाँ अवश्य पढें. मेरा अनुरोध उन सभी सिने-प्रेमियों से भी है जो उन्हें केवल एक प्रादेशिक या आंचलिक फिल्मकार मानते हैं कि वे उनकी फिल्में एक बार अवश्य देखें. उनकी फिल्मों का इतिहास और उनके द्वारा प्राप्त सम्मान/पुरस्कार इस बात के प्रमाण हैं कि कम्युनिकेशन गैप को भरने के लिये कम्युनिकेशन से बेहतर कोई रास्ता नहीं.

उनकी कहानी की पुस्तक के हर दूसरे तीसरे पृष्ठ पर उस कहानी से जुड़ा कोई रेखाचित्र आपको मिलेगा जिसे स्वयम सत्यजीत राय ने बनाया है. वे थीम के अनुसार स्केच बनाते थे और स्केच के अनुसार दृश्य को विज़ुअलाइज़ करते थे. फिल्मों की पटकथा लिखते समय उन्हें इससे काफी मदद मिलती थी. यही नहीं, उनके विस्तार का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपनी शुरुआती तीन फिल्मों को छोड़कर उन्होंने सभी फिल्मों का संगीत निर्देशन किया और हर पात्र के ड्रेस डिज़ाइन करने से लेकर फिल्म के पोस्टर तक डिज़ाइन किये. 

आज कई फिल्मकार अपने नाम से पहले ड्रीम मर्चेण्ट या शो-मैन जैसी उपाधि लगाते फिरते हैं, सत्यजीत राय ने कभी इन शब्दों की ओर ध्यान भी नहीं दिया. वे स्वयम लफ्ज़ों के शाहंशाह थे.

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि 2 मई 1921 को जन्मा, यह एक बहुत ही दुर्लभ प्रजाति का प्राणि था, जो 23 अप्रैल 1992 को इस जगत से विलुप्त हो गया. 

बुधवार, 2 मई 2012

बंगाल का जादू


बंगाल का जादू एतना मसहूर रहा है कि उसका सम्मोहन से बचना मोसकिल है. अऊर ई जादू भी अईसा कि जो इसके सम्मोहन में पड़ा, उसके लिए त बस उससे निकलना लगभग असम्भब है. पाँच-छौ साल बंगाल में रहने के बाद हम आजतक ऊ जादू से बाहर नहीं निकल पाए हैं. एगो अजीब “मिडास टच” है ई सहर में, जिसको छू देता है उसको अंदर से सोना बना देता है. कला, साहित्य, संस्कृति अऊर परम्परा का गंगा भी है ई सहर अऊर सागर भी.

एही सहर में एगो नौजवान सांति-निकेतन के पाँच साल का पढाई बीच में छोडकर, ब्रिटिस बिज्ञापन कंपनी में काम करने लगा. काम के साथ-साथ ऊ “सिगनेट प्रेस” से छपने वाला दू ठो किताब जिम कॉर्बेट का “मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊँ” अऊर जवाहर लाल नेहरू का “डिस्कवरी ऑफ इंडिया” का कवर डिजाइन किया. बिज्ञापन कंपनी, जहां ऊ नौकरी करता था, के तरफ से उसको लन्दन भेजा गया. ओहाँ एक रोज ऊ देखने चला गया एगो सिनेमा – इतालवी सिनेमा Ladri di biciclette (बाइसिकल चोर).” सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के साथ ही ऊ नौजबान अपना जिन्नगी का सबसे बड़ा फैसला करता है कि उसको बस सिनेमा बनाना है. अऊर उसका ऊ फैसला उसको बिश्व सिनेमा का महत्वपूर्ण नाम बना देता है.
 (पेन्सिल स्केच - मेरे पुत्र अनुभव प्रिय द्वारा)

हम इयाद कर रहे हैं मसहूर फिल्मकार सत्यजीत राय को. एक आदमी के अंदर एतना पर्तिभा देखकर कभी-कभी भगबान के पक्षपाती होने का भरम पैदा हो जाता है. बास्तब में फिल्म बनाना अपने आप में एगो ऐसा आर्ट है, जो एक आदमी का सोच से सुरू होता है अऊर कई लोग मिलकर ऊ सोच को पर्दा पर उतारने में सफल होता है. लेकिन कभी ध्यान से सोचकर देखिये कि हमारा सोच को दोसरा आदमी कैसे महसूस कर सकता है. सायद एही कारण है कि बहुत सा साहित् को जब सिनेमा के पर्दा पर उतारा गया त कम से कम ऊ रचना के लेखक को पसंद नहीं आया.

सत्यजीत राय एही बात नहीं पसंद करते थे. कहानी के चुनाव के बाद, पूरा कहानी को अपने अंदर उतार लेते थे, सही माने में कंसीभ करना या गर्भ धारण करना जईसा. उसके बाद पटकथा, संबाद अऊर सेट डिजाइन का स्केच अपने आप तैयार करते थे. उनका हर स्क्रिप्ट में सेट का डिटेल देखकर दंग हो जाना पड़ता है. हर चरित्र का स्केच ताकि मेक-अप करने वाला बूझ सके कि फलाना कैरेक्टर कैसा लगता है, क्या पहनता ओढता है, कईसा देखाई देता है, कइसे खडा होता है, बैठता है... हर चरित्र का पूरा डिटेल स्केच में. वइसहीं सेट का स्केच, फर्नीचर का पोजीसन, लाईट केतना है, कहाँ से आ रहा है, कौन कहाँ खडा है या बैठा है.

एक एक डायलॉग पर मेहनत. “शतरंज के खिलाडी” सिनेमा के बाद ऊ बोले कि हमको भासा में परेशानी होता है, इसलिए हम हिन्दी/उर्दू/हिन्दुस्तानी में सिनेमा नहीं बना सकते हैं. इसमें अभिमान से जादा, उनका ईमानदारी झलकता है कि अपना कमी मान लिए. उनका सुरू का सिनेमा में पंडित रवि शंकर, विलायत खान साहब अऊर अली अकबर खान साहब संगीत दिए, लेकिन सत्यजीत राय का मानना था कि उनके मन मुताबिक़ काम नहीं होने पर चोटी के संगीतज्ञ लोग से बहस नहीं किया जा सकता, इसलिए बाद के सिनेमा में खुद संगीत देने लगे. एही नहीं, सुब्रत मित्र, जो उनके फोटोग्राफर थे, के साथ अनबन होने पर ऊ फोटोग्राफी भी खुद करने लगे. एडिटर त ऊ थे ही बढ़िया. लोग बताता है फोटोग्राफी खुद करने से उनको एगो फायदा ईहो हुआ कि ऊ एडिटिंग साथे-साथ कर लेते थे. एगो आदमी लेखक, पटकथा-संबाद लेखक, सेट डिजाइनर, संगीत निर्देसक, फोटोग्राफर, एडिटर सब हो अईसा बहुत मोसकिल है मिलना. सायद एही कारण था कि उनको देस-बिदेस में बराबर सम्मान मिला.

हम जानकर इहाँ पर उनका सिनेमा का नाम अऊर काम पर चर्चा नहीं कर रहे हैं, काहे कि ऊ सब त नेट पर उपलब्ध है. हम त बस एही बताना चाह रहे हैं कि सत्यजित राय के महानता में उनका समर्पण का सबसे बड़ा जोगदान है. एगो अऊर बात है, उनके साथ. एक तरफ ऊ समाज के बहुत सा सरोकारी, जटिल अऊर चिंता करने वाला बिसय पर सिनेमा बनाते हैं, दोसरा ओर बच्चा लोग के लिए भी सिनेमा ओतने ईमानदारी से बनाते हैं. एही नहीं, उनका लिखा हुआ उपन्यास अऊर कहानी आझो बच्चा लोग को रहस्य रोमांच का दुनिया में ले जाता है. फेलु दा उर्फ प्रदोस चंद्र मित्तर, तोपसे चाहे प्रोफ़ेसर संकू... ई सब काल्पनिक चरित्र बंगाल के संस्कृति का हिस्सा है, ओइसहीं जइसे ई सब चरित्र के रचनाकार सत्यजीत राय, जिनके हर जासूसी उपन्यास या कहानी के पीछे एगो सार्थक तथ्य छिपा होता था, चाहे कोनो न कोनो नया जानकारी.

गजब के सपना देखने वाले इंसान थे अऊर सपना को हू-ब-हू पर्दा पर उतार देना, अईसा कि देखने वाला को कहीं भी कोनो मिलावट नजर नहीं आये. सत्यजीत राय, हमरे भी पसंदीदा फिल्मकार/उपन्यासकार हैं अऊर हमरे बेटा के भी, जबकि हम दूनो में एक पीढ़ी का फासला है. मगर रचनात्मकता में सत्यजीत राय पुल हैं, दोनों पीढ़ी को जोड़ने वाले.

आज सत्यजीत राय का जन्मदिन है!!