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शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

воспоминания о Shikha (शिखा-स्मृति)



“स्मृतियों में रूस” भले ही शिखा वार्ष्णेय की स्मृतियों का दस्तावेज़ हो, लेकिन पिछली पीढ़ी के हर भारतीय की स्मृतियों में बसता है. पूर्व विदेश मंत्री श्री वी. के. कृष्णमेनन जब रूस गए थे तो वहाँ से इंदिरा के लिए रूसी गुड़िया लेकर आए थे. रूसी सर्कस के लचीले कलाकार आज भी अपने प्लास्टिक और रबर सरीखे शरीर के लिए याद किये जाते हैं. रूस में राज कपूर और नरगिस की यादें भी इतनी प्रगाढ़ थीं कि जब प्रसिद्द अंतरिक्ष यात्री यूरी गैगारीन पहली बार राज कपूर से मिला, तो हाथ मिलाते हुए बोला, “आवारा हूँ!”

जब संबंधों की ऐसी गहराई हो, तो एक १६-१७ वर्ष की युवती के लिए विद्यालायोपरांत स्नातकोत्तर स्तर तक की पढाई का समय विस्मृत करना संभव नहीं. पाँच वर्ष की एक लंबी अवधि, एक नवयुवा मन से, एक व्यस्क नागरिक बनने तक के रूपांतरण का काल है. एक ऐसा काल, जिसमें भविष्य आकार ग्रहण करता है, जीवन के प्रति धारणाएं स्पष्ट होती जाती हैं, स्वावलंबन सुदृढ़ होता है और एक व्यक्तित्व का निर्माण होता है. ऐसे संक्रमण काल में, जब सम्पूर्ण जीवन शारीरिक, मानसिक और सामाजिक तौर पर बदल रहा हो, वे घटनाएँ जो इस निर्माण में सहायक होती हैं, पत्थर पर लकीर की तरह होती हैं. ऐसी ही छवि को नाम दिया है शिखा वार्ष्णेय ने “स्मृतियों में रूस”.

शिखा वार्ष्णेय से हमारा परिचय एक संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त लेखिका के रूप में है. वे कवितायें भी लिखती हैं, लेकिन उसे मात्र उनकी अभिव्यक्ति का हिस्सा माना जा सकता है. पत्रकारिता की विद्यार्थी होने के कारण, उनके आलेखों पर इसकी छाप आसानी से देखी जा सकती है. हाँ, इस पुस्तक की भाषा और अभिव्यक्ति में यह प्रभाव बहुत कम दिखाई देता है. मेरे विचार में इसके दो कारण हो सकते हैं. पहला, इस पुस्तक के अंकुर उनके मस्तिष्क के पत्रकार की मिट्टी में अंकुरित नहीं हुए हैं और दूसरा, यह संस्मरण एक पत्रकार के हैं ही नहीं.

कुल पचहत्तर पृष्ठ की यह पुस्तक, छोटे-छोटे अध्यायों में विभाजित है, जिनमें आलेखों के बीच वहाँ के श्वेत-श्याम छाया-चित्र भी संकलित हैं. उनके ब्लॉग “स्पंदन” पर इसके अंश प्रकाशित होते रहे हैं, संभवतः इसी कारण कई अध्याय मात्र एक या दो पृष्ठ के भी हैं. शिखा जी ने जिस प्रकार घटनाओं का वर्णन किया है, वह इतना जीवंत है कि पाठक स्वयं को उन घटनाओं का पात्र या उस समाज का हिस्सा मान लेता है. विदेश का आकर्षण किस प्रकार वास्तविकता के कठोर आघात से टूटता है या एक नया आकार ग्रहण करता है, इसका वर्णन बहुत ही ईमानदारी से किया गया है. लेखिका ने यह समझाने का भरसक प्रयत्न किया है कि दूर के ढोल हमेशा सुहावने लगते हैं, जबकि सचाई उसके सर्वथा विपरीत होती है. किन्तु इसके पीछे उनका उद्देश्य किसी को हतोत्साहित करना नहीं, अपितु यह बताना है कि सफल वही होता है जो इन विपरीत परिस्थितियों में आनंद के पल खोज लेता है और हिम्मत नहीं हारता. भाषा, भोजन, सामाजिक मान्यताएं, बदलते आर्थिक वातावरण, जनता का चरित्र, सरकार का रवैया, शिक्षकों की मानसिकता, सहपाठियों का व्यवहार, न्यूनतम सुविधाएँ आदि ऐसे विन्दु हैं जिनपर उन्होंने खुलकर अपने अनुभव बांटे हैं और ये अनुभव कटु भी हैं और मधुर भी.

पुस्तक के नाम से यह ध्यान में आना स्वाभाविक है कि यह पुस्तक आपको रूस के दर्शनीय स्थलों की सैर कराएगी. लकिन यह पुस्तक कहीं से भी एक सैलानी के दृष्टिकोण से नहीं लिखी गयी है, अतः एक पर्यटक के लिए सहायक नहीं हो सकती. इस पुस्तक में रूस के कुछ मुख्य पर्यटन स्थलों का वर्णन भी है, लेकिन मात्र उतना ही जितना शिखा जी के तात्कालिक संपर्क में आया हो. उन्होंने स्वयं इस बात की स्वीकारोक्ति भी की है कि जिस जगह हम रहते हैं वहाँ के दर्शनीय स्थलों के प्रति उदासीन रहते हैं. इतने पर भी उन्होंने हमें वेरोनिष्, मॉस्को, कीव, गोर्की, पुश्किन आदि के गाँव की सैर कराई है. महान लेनिन के साथ वहाँ के लोगों के भावनात्मक जुड़ाव का वर्णन सुनकर, भारत में बैठे हमारा ह्रदय भी भाव-विह्वल हो उठता है.

भाषा पर शिखा जी के अधिकार के बावजूद कुछ मुहावरों अथवा शब्दों के प्रयोग त्रुटिपूर्ण लगते हैं. जैसे स्वयं सारे काम करने के परिश्रम के लिए “सांप छुछुन्दर की स्थिति” का प्रयोग, आपका दाना पानी जहां जब-तक बंधा है तब तक आप पार नहीं पा सकते और ‘हालात’ की जगह ‘हालातों’ शब्द का प्रयोग. लेकिन दूसरी ओर जहां एक केले में पूरे परिवार को खिलाती एक औरत का विवरण आता है, फ़ौज में भर्ती होते युवकों की व्यथा और उनकी प्रतीक्षारत प्रेयसियों का वर्णन आता है, प्यार भरे सम्बोधन से द्रवित होती वृद्धाओं का या किसी स्थल का चित्रमय वर्णन आता हो, वहाँ उनकी लेखनी आपके समक्ष चित्र खींच देती है और आप उसका हिस्सा बन जाते हैं.

कुल मिलाकर शिखा वार्ष्णेय ने यह प्रमाणित किया है कि वे एक सिद्धहस्त संस्मरण एवं यात्रा-वृत्तान्त लेखिका हैं. यह पुस्तक न केवल उनके इस पहलू को प्रमाणित करती है, अपितु उनके एक संवेदनशील और भावनात्मक चरित्र को भी उजागर करती है. क्योंकि बिना भावनात्मक जुड़ाव के संस्मरणात्मक लेखन संभव नहीं.

उनकी लेखन यात्रा में नए कीर्तिमान स्थापित हों, यही मेरी शुभकामना है!!