शनिवार, 22 जनवरी 2011

सज़ा


अपने देस में रेलवे का जाल अईसा फैला हुआ है, जईसे अदमी के देह में नस अऊर नाड़ी का. अगर नस में खून दौड़ना बंद कर दे अऊर देस में लोहा का पटरी पर रेल, त समझिये जीबन समाप्त. अऊर हमरा त रेलवे के साथ बहुत गहरा रिस्ता है. हमरा नस में भागने वाला खून में हेमोग्लोबिन कम अऊर रेलवे का सोडियम क्लोराईड (नमक) बेसी मिलेगा. पिता जी का पूरा जीबन इसी रेल के सेबा को समर्पित रहा. अऊर रिटायर होने के कुछ साल के अंदर अंदर दुनिया से रिटायर हो गए. रेलगाड़ी को भागते हुए देखना, बचपन से लेकर आज तक बहुत अच्छा लगता  है. एतना साल में छुकछुक गाड़ी का रंग बदलकर लाल से बुलू हो गया, लेकिन हमरा प्रेम का रंग नहीं बदला.
कोनो आम आदमी के लिए तो गाड़ी पर टिकट लेकर बैठना, लेट होने पर गाली देना, रेलवे को कोसना और अपना मंजिल आ जाने पर उतर कर चले जाना. बस  खेल  खतम  पईसा हजम. मगर एही लोहा के पटरी पर, बिना जाड़ा, गर्मी, बरसात का परवाह किये लगातार दौडता रहता है ई रेलगाड़ी. केतना आदमी, केतना सामान एक कोना से दोसरा कोना तक पहुंचाता है, बिना सिकायत. आराम भी नहीं करता है बेचारा रेलगाड़ी, एगो यात्रा खतम और दोसरा का तैयारी चालू. सायद एतना बर्दास्त करने का सक्ति और सेवा-भावना के कारन रेलगाड़ी को हमलोग स्त्रीलिंग में प्रयोग करते हैं. धरती माँ के तरह या हमारी अपनी माँ के तरह.
मगर आम आदमी को सायद कभी इ ध्यान भी नहीं आता होगा कि सारा दुनिया का गाड़ी तो भगवान चलाता है, मगर पटरी पर इ सब रेलगाड़ी को एक साथ कौन चलाता है! केतना मोसकिल का काम है, कौन गाड़ी आगे जाना है, कौन बाद में, किसको कहाँ रोकना है और किसको आगे बढ़ा देना है. बस गाड़ी पर बैठा हुआ आदमी एही समझता है कि उसका गाड़ी लेट हो गया और एक्के सांस में जेतना गाली होता है सब दे जाता है. लेकिन कंट्रोल रूम में बईठा लोग केतना टेंसन में गाड़ी को कंट्रोल करता है, ई बात सब लोग नहीं समझ पाता.
कंट्रोल रूम में बैठा हुआ आदमी, पूरा ध्यान लगाकर पूरा सेक्सन का एक एक गाड़ी को देख रहा होता है. जरा सा ध्यान इधर से उधर हुआ नहीं कि दुर्घटना घटा. उत्तर रेलवे उस समय मुगल सराय के बाद से सुरू होकर दिल्ली तक पसरा हुआ था. इसी पर कानपुर के कंट्रोल रूम में हमरे पिता जी के साथी श्री एस. बी. श्रीवास्तव सेक्सन कंट्रोलर थे. रेलवे में एगो बड़ा अजीब परम्परा है, किसी को पूरा नाम से कोई नहीं जानता. रेलवे में लोग का नाम होता है के. पी. मिश्रा, डी. एन. पाण्डे, एम. सी. सक्सेना, डी.पी. सिन्हा, आर. के. संतप्त, एस. एल. सोनकर आदि. त पिताजी के ई दोस्त या तो बच्चा लोग के श्रीवास्तव चाचा  थे या दोस्त लोग के एस. बी. थे.
उनका काम एतना अच्छा था कि दिल्ली तक लोग उनका तारीफ करता था.  बस एही समझिये कि दर्जन भर गाड़ी एक साथ पटरी पर उनके इसारा पर दौड़ता था, बल्कि नाचता था. कोई गार्ड, कोई ड्राइवर, या कोई भी चीफ कंट्रोलर को उनके काम से कभी कोई सिकायत नहीं हुआ. ऊ खुद भी खाली बईठने वाले आदमी नहीं थे. कम्प्यूटर का जमाना नहीं था अऊर मालगाड़ी अऊर सवारी गाड़ी के लिये अलग अलग ट्रैक नहीं था. तब भी उनका काम देखकर सबका कहना था कि ऊ कम्प्यूटर से भी अच्छा काम करते थे.
मगर हर अच्छाई के साथ कोनो न कोनो खराबी तो होता ही है. वईसहीं हर काम करने वाला  आदमी को भी काम से ऊबकर तनी रिलैक्स करने का मन तो करता ही है. जेतना टेंसन वाला काम, ओतने दिमाग सांति खोजता है. श्रीवास्तव चाचा को भी आदत था सिगरेट पीने का. अपने काम के बीच में समय निकालकर ऊ सिगरेट पीने चले जाते थे. मगर सिगरेट पीते टाइम भी उनको हर धुँआ के साथ साथ, धुँआ छोड़ता हुआ गाड़ी का ध्यान बराबर रहता था.
एक रोज अचानक कोनो सर्प्राइज इंस्पेक्सन हो गया. अऊर सरकारी इंस्पेक्सन के तरह ई सर्प्राइज इंस्पेक्सन बताकर भी नहीं हुआ. संजोग से जब उनके पास बड़ा साहब आए तो ऊ उस समय सिगरेट पीने निकले हुए थे. उनको बुलाकर लाया गया अऊर उनके तरफ से उनके चीफ साहब सफाई दिये. खुद बड़ा साहब भी श्रीवास्तव चाचा के महिमा से परिचित थे. मगर सब लोग एक समय में अपना अपना ड्यूटी से बँधा हुआ था. चाचा जी सिर झुकाकर गलती मानते हुए, चीफ साहब सफाई देते हुए और बड़ा साहब ई कहते हुए कि ऊ भी मजबूर हैं, कारवाई त करना ही होगा.
श्रीवास्तव चाचा को जो सजा मिला ऊ हमको लगता है कि सरकारी महकमा में अपने ढंग का अनोखा सजा रहा होगा. सजा के तौर पर उनका तबादला इलाहाबाद कर दिया गया, सिर्फ एक महीना के लिये. एक महीना के बाद फिर से कानपुर में बहाली. इलाहाबाद में उनको कोई काम नहीं दिया गया. सिर्फ बईठकर एक महीना का बेतन मिलना था उनको.
ई सजा का बात सुनकर तो सब लोग एही सोचेंगे कि भला ई कोनो सजा हुआ, ई त ईनाम हो गया उनके लिये. चाचा जी इलाहाबाद आ गए, हमारे क्वार्टर में. बहुत उदास रहते थे. काम के प्रति समर्पित आदमी के लिये बिना काम के बईठने का सजा से बड़ा कोई सजा नहीं हो सकता, ई उनका बेचैनी देखकर मालूम होता था. एक हफ्ता के बाद ऊ लिखकर माफी माँग लिये अऊर फिर से उनको कानपुर भेज दिया गया.
पता नहीं उनका सिगरेट पीने का आदत छूटा कि नहीं. मगर बहुत बड़ा बात सिखा गया ई घटना. सजा एतना प्यारा भी हो सकता है कि सजा का मियाद पूरा होने से पहले दोसी माफी माँग ले. अगर उनको सस्पेण्ड कर दिया गया होता, इंक्वाइरी होता या सचमुच इलाहाबाद ट्रांसफर  कर दिया गया होता, त का उनको अपना गलती का एहसास होता या उनपर एतना गहरा असर होता!!

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

ख़ून का रिश्ता


हम पहिले जऊन ऑफिस में थे, वहाँ ऑफिस त खुलता था दस बजे, मगर हमरा काम साढ़े नौ बजे से सुरू हो जाता था. बस एक के बाद एक लगातार टेलीफोन पर टेलीफोन. एगारह बजे से पहिले फुर्सत नहीं. अब जब काम था त था. ई डेढ़ घण्टा के बीच में हमको, हमरा टेबुल पर रखा हुआ इस्टेटमेण्ट अऊर फोन के अलावा, आस पास का कोनो खबर नहीं रहता था. ई डेढ़ घण्टा के बीच में कोई पीछे से आकर हमको चक्कू भी मार जाए, त जब तक काम खतम न हो जाए, हमको पता नहीं चलने वाला कि हमरे साथ का हो गया है. ई अलग बात है कि उसके बाद हम दरद से मरें चाहे नहीं मरें, खून देखकर जरूर मर जाएंगे.
19 जनवरी 2007. कलेंडर के हिसाब से मामूली दिन अऊर ऑफिस के हिसाब से बहुत बिज़ी दिन था. सबेरे साढ़े नौ बजे से फोन पर लगे हुए थे. करीब आधा घण्टा के बाद से हमको लगा कि हमरे आस पास काना फूसी अऊर गहमा गहमी चल रहा है. टाइम नहीं कि माथा उठा कर देखें अऊर पूछें कि का बात है. करीब साढ़े दस बजे जब फ्री हुए त हमरे पूछने से पहिले ही सब बताया कि शैलेंद्र नाथ दवे का एक्सीडेण्ट हो गया है, आज ऑफिस आते समय. हम पूछे कि अभी कहाँ है, तब पता चला कि वेलिंग्डन हॉस्पिटल ले गए हैं. शैलेन्द्र नाथ दवे, हमरे बिभाग में सीनियर कर्मचारी थे अऊर यूनियन के नेता भी. मगर हमसे कभी नेता वाला टकराव नहीं हुआ.
हम एगो स्टाफ को साथ लिए अऊर हॉस्पिटल के लिए निकल गए. वहाँ जाकर इमर्जेंसी वार्ड में देखे तो दवे जी बेड पर पड़े हुये थे. साथ में कोई नहीं. ऊ ग़ाज़ियाबाद से आते थे और घर पर बुजुर्ग पिताजी हार्ट के पेसेंट थे, इसलिये उनको बताना मोस्किल था. एक अऊर आदमी जो उनके साथ आते जाते थे, दुर्घटना के समय भी उन्हीं के साथ थे. हमको देखते दवे जी हमरा हाथ पकड़ लिए अऊर बोले, “मुझे बचा लो सर!” हमरे मुँह से त कोनो आवाज नहीं निकला.
सबसे पहिले हम दवे जी के साथ जो उनके दोस्त थे अऊर जो उनको हॉस्पिटल लेकर आए थे, उनको धन्यवाद कहे. फिर पूछे कि क्या हुआ था. तब जो ऊ बताए उसको सुनकर करेजा काँप गया. ई दूनो आदमी सड़क पार कर रहे थे. सिगनल लाल था अऊर सड़क खाली. अचानक एगो कार सिगनल तोड़ते हुए आया अऊर दवे जी को धक्का दिया. ऊ गिर गए रोड पर अऊर गाड़ी का पहिया उनके गोड़ पर चढ गया. गाड़ी वाला गाड़ी रोका अऊर फिर से गाड़ी को पीछे करके दोबारा गोड़ के ऊपर से बैक करके भाग गया.
फिर पुलिस, ऐम्बुलेंस, गाड़ी का नम्बर, वकील अऊर हॉस्पिटल का इमरजेंसी वार्ड. हम डॉक्टर को पूछे कि क्या करना है, तो ऊ बोला कि अभी प्लास्टर करना होगा कच्चा.  मगर ऑपरेसन करके अंदर रॉड लगाना होगा. खैर पहिले तो ई हॉस्पिटल से छुटकारा पाना था. डॉक्टर प्लास्टर रूम में लेकर गया, त साथे हम भी गए.
दवे जी का पैण्ट काटकर गोड़ का नीचे वाला हिस्सा में प्लास्टर करना था अऊर दर्द बर्दास्त से बाहर था उनके लिए. पूरा कपड़ा में लगा हुआ खून देखकर त हमरा मन खराब हो रहा था. हमारे जईसा साकाहारी आदमी को एतना खून, ऊ भी आदमी का, पहिला बार देखने को मिला था. अपना मन को काबू में किए.
डॉक्टर आकर जईसे गोड़ को हाथ लगाया, दवे जी हमरा हाथ एतना जोर से पकड़ लिए कि हमको दर्द होने लगा. पूरा कमरा में उनका चीख गूँजने लगा, “वर्मा सर! मार डालो मुझे. मैं लंगड़ाते हुए जिंदगी नहीं गुज़ार सकता. बहुत दर्द है, काट दो मेरा पैर!!” हम खाली एतने बोल पाए कि धीरज रखो. हम उनका खून से सना हुआ गोड़ पकड़े अऊर डॉक्टर प्लास्टर लगाने लगा. दवे जी लगातार दरद से चिल्लाते जा रहे थे, अऊर ओतने जोर से हमरा मन घबरा रहा था. एतना गाढ़ा लाल खून, दरद भरा चीख अऊर उनके आँख से बहता हुआ आँसू, उनका एकलौता बेटा का खयाल, उनके पिताजी का बीमारी, सब हमरे नजर के सामने घूम गया.प्लास्टर हो गया, नींद का सुई लग गया, उनका भाई आ गया अऊर सारा दिन हॉस्पिटल में बिताकर जब हम लौटे. तब समझ में आया कि मन केतना खराब था हमरा. खाना नहीं खाया गया हमसे. रह रह कर फैला हुआ खून आँख के सामने घूम रहा था.
हमरे परिवार में हम अऊर हमरा मँझला भाई साकाहारी हैं और हम तो पैदाइसी सकाहारी. हमरे खानदान के बारे में डॉ. हरिवंस राय बच्चन लिखे हैं कि अईसा माँसाहारी खानदान कि लोग पूछता था कि माँ के पेट में रहकर ई अपना माँ का माँस कईसे नहीं खाया अऊर खुदे जवाब भी देते हैं कि उस समय मुँह में दाँत नहीं था, सायद इसीलिए. अब बताइए अईसा कट्टर माँसाहारी परिवार में कट्टर साकाहारी हम, एतना खून देखना कईसे बर्दास्त किए होंगे. खैर, दवे जी को ले गया लोग गाजियाबाद. ऑपरेसन हुआ, रॉड डाला गया गोड़ के अंदर अऊर करीब चार पाँच महीना के बाद ऊ ऑफिस भी आ गए. आते ही हमको गले लगाए.
ऊ दिन अऊर आज का दिन, दूगो परिबर्तन हो गया हमरे जीबन में. पहिला कि हमसे कार चलाना छूट गया. जब स्टीयरिंग पकड़ते त लगता कि दवे जी हमरे गाड़ी के नीचे खून में पड़े हुए हैं. अऊर दोसरा परिबर्तन कि दवे जी को उस दिन के बाद दवे जी कहना छोड़ दिए हम. जिस दिन ऊ ऑफिस आए हम सबके सामने बोले कि दवे जी के चरन पकड़कर सारा दिन हम बईठे रहे हैं, इसलिए आज से ई हमरे बड़े भाई हुए. चुँकि ई गुजराती हैं, इसलिए हम आज से इनको मोटा भाई (बड़ा भाई) कहेंगे.  
आज  तक ऊ रिस्ता बना हुआ है, खून का रिस्ता.