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मंगलवार, 29 मई 2012

अब तो सचमुच चला बिहारी!!


एगो बहुत मसहूर कहावत है कि इतिहास अपने आप को दोहराता है. लेकिन तेरह साल का टाइम कोनो एतना बड़ा टाइम नहीं है कि उसको इतिहास जईसा कहा जाए. फिर भी जो हुआ ऊ एकदम हू-ब-हू दोहराने वाला खिस्सा हो गया. आस्चर्ज त नहिंये हुआ उसपर, अफ़सोस बहुत हुआ. मन को समझा लिए कि ओशो कहते हैं कि दुःख को पलट कर देखियेगा त उसमें खुसी देखाई देगा. जादातर आदमी पलट कर नहीं देखता है एही से दुःख, दुःख मालूम पड़ता है.

तेरह साल पहिले कलकत्ता में एगो अस्टाफ के बिआह में हमारा पूरा ऑफिस गया हुआ था. हमरे बॉस भी थे. ग्रुप में एन्ने-ओन्ने का बात चल रहा था. अच्छा बात एही था कि ऑफिस का बात कोई नहीं बतिया रहा था. बात होने लगा रेलगाड़ी में सफर करने का अऊर ओही में बात निकल आया गाड़ी के डिब्बा में सामान चोरी होने का. हमरे बॉस के पास भी एगो अनुभव था जब उनका गया जंक्सन इस्टेसन पर कोई सामान चोरा लिया. ई दुर्घटना सुनाने के बाद ऊ जो कन्क्लूजन बताए ऊ तनी डायलॉग में सुनिए.
“अरे, आपलोगों को क्या पता, बिहारी चोर होते हैं!”
“नहीं सर! रेलवे स्टेशन की चोरियों का नेचर पूरे देश में एक जैसा होता है!”
“आप तो बोलेंगे ही वर्मा जी! मगर जो कहिये, सारे बिहारी चोर होते हैं!”
पहिले “बिहारी चोर” अऊर बाद में “सारे बिहारी चोर” सुनकर त हमरे देह में आग लग गया. हम भी आव देखे न ताव अऊर बिना आगा-पीछा सोचे तड़ से बोल दिए, “मगर इंटरनेशनल क्रिमिनल्स की लिस्ट में अगर भारत के टॉप टेन क्रिमिनल्स का नाम देखा जाए तो उनमें पाँच आपके अंचल के हैं, कहिये तो नाम गिनाऊँ! और संजोग से उसमें बिहारी कोई नहीं!”
माहौल अचानक सीरियस हो गया.

आगे बताने का जरूरत नहीं होना चाहिए कि हमारा ट्रांसफर ऑर्डर दू-चार दिन में हमरे सामने आ गया. ऊ समय पिताजी का तबियत बहुत खराब था. ट्रांसफर रोकवाने का बहुत कोसिस किये. जेतना लोग हमको जानता था, हमारा काम सराहता था, सबको बोले. सबलोग बोला कि कोई मोसकिल काम नहीं है, मगर अफ़सोस लौटकर खुसखबरी सुनाने कोई नहीं आया. खुसखबरी का, ईहो कहने कोई नहीं आया कि सौरी हम आपका मदद नहीं कर सके! हमरे साथ हुए सोलह लोग के ट्रांसफर में से पन्द्रह लोग को मन मुताबिक़ पोस्टिंग मिल गया, बस हमको छोडकर!  बिहारी जो ठहरे!

आखिरी उम्मीद था हमरे पुराने बॉस श्री माधव राव पर. मुम्बई में उनको फोन लगाकर बताए अपना मजबूरी अऊर बोले कि ‘हाँ’ या ‘ना’ जो भी हमको बता दें ताकि हम झूठा उम्मीद पर नहीं रहें. दू दिन बाद उनका फोन आया. आझो उनका बात हमरे कान में गूंजता है.
“सौरी, वर्मा जी! आई कान्ट हेल्प यू आउट!! लेकिन बड़े होने के नाते एक बात कहूँगा कि परमात्मा की इच्छा के विरुद्ध मत जाइए. हो सकता है उसने आपके लिए कुछ और भी अच्छा सोच रखा हो.”

हमको लगा कि सांत्वना दे रहे हैं. हम जाकर ज्वाइन कर लिए. दू महीने के अंदर पिताजी का देहांत हो गया अऊर साल भर के अंदर हमरा सेलेक्सन बिदेस में पोस्टिंग के लिए हो गया. हम घर के लोग को खुसखबरी सुना रहे थे कि माधव राव साहब का बात याद आया. रात को उनका फोन आया बेंगलोर से. “वर्मा जी! कोंग्रचुलेशंस!! डू यू रेमेबर माई वर्ड्स!” अऊर हमरे मुंह से कोनो बात नहीं निकल सका. हम बस “थैंक्स सर” कह पाए!!

आज तेरह साल के बाद फिर से ओही परिस्थिति में एक महीना से घुट रहे हैं. बेटी का दसवां का बोर्ड है अगिला साल अऊर हमरा ट्रांसफर सताईस लोग में सबसे दूर कर दिया गया है. सब लोग के आगे मजबूरी बताकर देख लिए, गिडगिडाकर, समझाकर देख लिए. मगर मदद करने का भरोसा दिलाकर जो गया ऊ दोबारा लौटकर नहीं आया.

बस दू दिन बाद ई सहर से दाना-पानी उठ जाएगा. नया जगह, नया जिम्मेवारी के साथ पता नहीं आप लोग से एतना रेगुलर रूप से मिलना हो पायेगा कि नहीं. सायद नहीं, चाहे कभी-कभी! आँख बंद करके एही सब सोचते हुए माधव राव सर का बात दिमाग में आ रहा था. किताब का पन्ना फडफडाने का आवाज से आँख खुला, किताब बंद करने चले त देखे कि लिखा है:
मैं लोगों के बीच से गुज़रता हूँ और आँखें खुली रखता हूँ. मैं उनलोगों के सद्गुण नहीं अपनाता इसके लिए वे मुझसे नाराज़ हैं. वे मुझसे बेहद नाराज़ हैं, क्योंकि मैंने उन्हें बता दिया है कि छोटे आदमियों के लिए, छोटी मर्यादाएं ही ज़रूरी होती हैं. नाराज़ लोग आग के चारों ओर बैठकर कहते हैं, देखो यह भयानक आदमी और क्या विपत्ति लाता है. उन्हें बौनी मर्यादाओं से डर नहीं लगता. उनके साथ वे सहज ही हिलमिल जाते हैं. अपने मन में वैसे वे सिर्फ एक बात ही चाहते हैं कि उन्हें कोई चोट न पहुंचाए. हालांकि वे इसे सद्गुण मानते हैं मगर वह दरअसल कायरता है. मैं उनके बीच से गुज़रा और मैंने अपने कुछ शब्द वहाँ गिरा दिए. उनकी समझ में नहीं आया कि वे उन शब्दों को फेंक दें या वहीं पड़ा रहने दें. तब मैंने उन्हें ललकार कर कहा – तुम अभिशप्त हो कि कायर हो. जरथ्रुष्ट्र का कोई ईश्वर नहीं, इसलिए वह बुरा नहीं है. मैं ईश्वरहीन हूँ इसलिए सच कहता हूँ और सत्य को तुम्हें भी सुनाता हूँ. अगर मेरे शब्द बेकार गए तो तुम अपने छोटे-छोटे सद्गुणों और नन्हें-नन्हें गुनाहों के साथ नष्ट हो जाओगे!
(नीत्शे – जरथ्रुष्ट्र ने कहा)

बुधवार, 9 नवंबर 2011

बरगद

 कमाल के बुजुर्ग थे ऊ भी. घर के ओसारा में एगो चौकी पर अपना पूरा दुनिया बसाए हुए, उसी में खुस. घर का बाल-बच्चा दुतल्ला मकान बना लिया, मगर उनको तो ओही चौकी पर दुनिया भर का सुख हासिल था. जब पुराना मकान था तबो अउर पक्का बन जाने के बादो, ओसारा छोडकर कहीं नहीं गए. बस फरक एही हुआ कि पहले ऊ ओसारा कहलाता था, बाद में वरांडा कहलाने लगा. मगर उनके लिए ओही सलतनत था. घर के बहु लोग से पर्दा भी हो जाता था. कभी अंगना में जाने का जरूरत होता त गला खखार कर सबको बता देते थे कि बादसाह सलामत तसरीफ ला रहे हैं. बहु लोग घूँघट माथा पर रख लेतीं. जो काम होता करने के बाद, जो बात होता कहने के बाद फिर से ओसारा में जाकर तख्तेताऊस पर बैठ जाते.

तख्तेताऊस माने चौकी. उसी पर बैठना, पढाई करना, हिसाब-किताब लिखना अउर सो जाना. सब कुछ छितराया हुआ. कभी कुछ खोजना हो, त भूसा में सुई खोजने जइसा काम. मगर आप पूछकर देखिये कि फलाना चीज कहाँ है, त बिना हिले-डुले कहेंगे, ऊ, ललका चदरवा हटाइये ज़रा, उसी के तर में रखा होगा. (वो लाल चादर हटाइये ज़रा, उसी के नीचे रखा होगा) अउर कहने का जरूरत नहीं कि ओहीं मिल भी जाता. गलती से कहीं कोइ उनका सामान सजाकर रख दिया, त ऊ आदमी के लिए सजा हो जाता. कम से कम दू घंटा भासन कि हमरा चीज कोइ मत छुआ करो.

जेतना साल नौकरी नहीं किये, ओतना साल रिटायरमेंट का आनंद लिये. बस पढाई का ऐसा सुख कि पूछिए मत. ज्योतिष से लेकर बैदक इलाज तक, अउर धर्मं सास्त्र से लेकर साहित्त तक. होमियोपैथी अउर बायोकेमिक का दवाई किताब पढकर देते थे. आसपास का टोला मोहल्ला का गरीब लोग बीमारी बताकर दवाई ले जाता था. अउर ठीक भी हो जाता था. पत्रा उठाकर सबको बताते रहते थे कि फलाना दिन फलाना बरत है अउर फलाना दिन ग्रहण लगेगा. कोनो मासटरी नहीं था ई सब काम में, मगर अपना जैकगिरी में खुस थे.

साहित् के मामला में उनका फेवरेट किताब था सिवाजी सावंत का ‘मृत्युंजय’, आचार्य चतुरसेन का ‘वयं रक्षामः’ अउर ‘वैशाली की नगरवधू’. कमजोर अउर भावुक इतना थे कि उनके सामने जब रश्मिरथी का कर्ण-कुंती संबाद पढ़ा जाता था, त ढर- ढर आँख से लोर चूने लगता था. रात में खाना-पीना हो जाने के बाद, घर का सब लोग को एक जगह बईठा कर अपना पोता को कहते कि पढकर सुनाओ. उसके भी आवाज में गजब का उतार चढ़ाव था कि सीन एकदम सामने उतर जाता था. ऊ सुनते जाते थे अउर रोते जाते थे. कभी कोनो भाग दोहरा के पढने के लिए रोते-रोते गला से आवाज नहीं निकलता था, त हाथ का इशारा से कहते कि दोबारा पढ़ो.

पुराना आदमी, मगर मॉडर्न भी ओतने थे. सब पोता को बटोरकर ‘शोले’ देखाने ले गए. बसन्ती से गजब परभावित थे. एही नहीं, कोनो नया बात बताने पर उसको सुनते थे अउर बच्चा जैसा सीखने का कोसिस भी करते थे. सबको बैठाकर पढ़ाते थे अउर पढने वाला बच्चा को बहुत मानते थे. अंकगणित का सवाल उंगली पर जोडकर बना देते थे. कहते थे कि पहाड़ा गणित का जड़ है. सवैया अऊर अढैया का पहाडा तक याद था उनको.

कभी खाली होने पर गाना भी गुनगुनाते थे, गुनगुनाते का थे जोर-जोर से सुर लगाकर गाने लगते थे ‘मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया.’ लाख समझाने पर कि ई गाना बिरह का है, उनका मानना था कि ई गाना एकदम आध्यात्मिक गाना है.

ई जेतना भी उनका घर का एक्टिविटी था सब ओही चौकी पर चलता था जो ओसारा में बिछा हुआ था. १९७५ में जब पटना में भीसन बाढ़ आया अउर सबलोग घर छोडकर चला गया, ऊ ओही चौकी पर १२ दिन तक तैरते रहे. बगल वाला घर में से खाना बनाकर बहु उनको दे आती थीं अउर ऊ खा लेते थे. केतना सांप अउर अजीब-अजीब  जानवर ओही पानी में घूमता रहता था. मगर ऊ हिले नहीं चौकी से. अपने गाँव के मट्टी से एतना प्यार कि जब उनका छोटा बेटा सब खेत बेचकर पटना में पक्का मकान बनवा लिया, तबो ऊ अपना चौकी पर प्राण छोड़ दिए मगर मरते दम तक ऊ मकान में नहीं गए!

कातिक पूरनमासी के दिन भोरे-भोरे नहा धोकर बाजार चले जाते थे अऊर लौटकर सब लोग को एक साथ बैठाकर कचौड़ी अऊर जिलेबी खिलाते. खिलाने का कारण भी था, उनका जनमदिन!

हैप्पी बर्थ-डे दादा जी!  

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

माँ सुन्दर होती हैं


एगो बहुत पुराना कहावत है कि हर आदमी को अपना बच्चा अऊर दोसरा का जोरू हमेसा सुन्दर लगता है. एगो दोसरा कहावत भी बीच में चला था कि मोबाइल फोन अऊर मेहरारू के बारे में हर आदमी एही सोचता है कि तनी दिन रुक जाते त बढ़िया मॉडल मिल जाता. अब ई सब कहावत में केतना सचाई है अऊर केतना मजाक, बताना बहुत मोसकिल है. ई बहस में पड़ने का कोनो फायदा भी नहीं है, काहे कि दुनो कहावत का आधा हिस्सा त सहिये है. रहा बात दोसरा हिस्सा का, त ऊ बेक्तिगत अनुभव का बात है.
खैर, अपना बच्चा सब माँ-बाप को सुन्दर लगता है, ई बात को दोसरा तरीका से सोचकर देखिये तो तनी! बच्चा के नजर में भी का एही बात लागू होता है?? सायद नहीं. एगो बच्चा अपना माँ के साथ पुराना फोटो का एल्बम देख रहा था. अचानक उसका नजर पड़ा एगो फोटो पर, जिसमें उसकी माँ अऊर बाप का फोटो था. बच्चा माँ को पहिचान गया मगर बाप में एतना बदलाव आ गया था कि बेचारा को संदेह होने लगा.
ऊ अपना माँ से पूछा, माँ! इस फोटो में आपके साथ ये स्मार्ट से आदमी कौन है?
माँ बोली, पहचाना नहीं! ये तेरे पापा हैं!
बच्चा आश्चर्यचकित हो गया, बोला, कमाल है! इतने स्मार्ट!! तो फिर ये गंजा सा आदमी कौन है जो हमारे घर में रहता है और हम जिसे पापा कहकर बुलाते हैं?
अब देखिये, ऊ बचवा इस्मार्ट आदमी को अपना पापा मानने के लिए तैयार था, मगर पापा को गंजा होने पर भी इस्मार्ट मानने के लिए तैयार नहीं.
हमरी एकलौती बहिन विनी जब इस्कूल में पढ़ती थी, तब उसकी एगो सहेली थी बहुत पक्की, नाम था प्रिया. उसके घर विनी का आना-जाना भी था. मगर संजोग से प्रिया हमरे घर कभी नहीं आई थी. इसलिए हमरे परिबार में हमरी बहिन को छोडकर उसका किसी से परिचय नहीं था. बहिन को संकोच भी था कि हमरा घर कच्चा अऊर खपरैल है, जबकि प्रिया का घर बहुत बड़ा, पक्का अऊर फिलिम इस्टार सतरोहन सिन्हा के घर के बगल में.
एक रोज का मालूम कईसे उसकी सहेली का हमरे घर आने का प्रोग्राम बन गया. दिन, तारीख, समय सब तय हो गया. बहिन जी का घर भर को आदेस हो गया कि किसको का-का करना है. मगर एगो बात में पर्फेक्सन नहीं आ पा रहा था. बहिन जी को लगा कि हमरी माता जी खूबसूरत नहीं हैं या कहिये कि प्रेजेंटेबुल नहीं हैं. बस ओही मुद्दा पर संदेह का इस्थिति बना हुआ था. इहाँ बता दें कि हमरी माता जी के सुंदरता में भी कोनो कमी नहीं था, मगर घर के काम काज में ब्यस्त रहने के कारन साज-सिंगार पर ध्यान तनी कम्मे रहता था.
खैर, घर में माता जी को छोडकर सब चीज परफेक्ट हो गया. पूरा इत्मिनान कि सहेली के सामने नाक नहीं कटे. बहुत सा प्लान पर बिचार किया गया. मम्मी को गैरहाजिर भी नहीं किया जा सकता था. ऐसा करने से खेल बिगड़ जाता, काहे कि प्रिया अपनी मम्मी के साथ आने वाली थी. अंत में विनी ने ई समस्या का भी समाधान कर दिया अऊर हम सब लोग भी हंसकर मान लिए.
हमरी चाची विनी के नजर में प्रिया की मम्मी के टक्कर की ख़ूबसूरत थीं. फैसला हुआ कि चाची को बुला लेंगे अऊर कह देंगे कि यही मेरी मम्मी हैं. मम्मी से त ऊ लोग कभी मिला है नहीं, इसलिए पहिचानने का त सवाले पैदा नहीं होता है. अऊर दोबारा ऊ लोग आएगा भी नहीं. वैसे भी बाद का बाद में देखा जाएगा.
इस्टेज सेट हो गया. ठीक समय पर प्रिया अपनी माँ के साथ हमारे घर पर आई. विनी आगे बढकर स्वागत कीं. ऊ लोग को पुर्बारा (पूर्वी) घर में बैठाया गया. बातचीत सुरू करने के पहिले ही सहेली की मम्मी बोलीं, विनी! तुम्हारी मम्मी कहाँ हैं? बुलाओ उनको! अऊर स्क्रिप्ट के मोताबिक हमारी चाची कमरा में एंट्री मारीं. चाची को देखते ही ऊ खुसी से खड़ी हो गयी अऊर बोलीं, अरे! नीलिमा तुम!! कितने दिनों के बाद मिले हैं हम! मगर तुम यहाँ कैसे?
विनी मेरी जेठानी की बेटी है.
बगल वाले कमरा में हमरी माता जी अऊर हमलोग का हँसी रोके नहीं रुक रहा था. बास्तव में हमरी चाची अऊर सहेली की माँ दुनो कॉलेज की दोस्त थीं, बहुत पक्की. इसलिए चाची को झूठ बोलने का नौबत नहीं आया. बाद में माताजी भी आईं. पूरा नाटक के अऊर नाटक में हुआ परिबर्तन के बीच विनी चुप-चाप रही. पता नहीं बुजुर्ग लोग में नाटक के ओरिजिनल स्क्रिप्ट का चर्चा हुआ कि नहीं.
हमलोग जब कोनो नाटक का स्क्रिप्ट लिखते हैं, त समझते हैं कि हमसे सानदार त सलीम-जावेद भी नहीं लिख सकते. मगर हमलोग भुला जाते हैं कि हमलोग से बढ़िया नाटक लिखने वाला कोई और है, जो हम-सब लोग का रोल लिखता है. देखिये ज़रा, दुस्सासन जब चीर-हरण कर रहा था, तब उसको भी कहाँ मालूम था कि अचानक द्रौपदी के सखा का अदृस्य एंट्री हो जाएगा. अऊर दुर्योधन को भी कहाँ पता था कि महाभारत के स्क्रिप्ट में अचानक अर्जुन का सारथी महानायक बन जाएगा.

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

एक दफा वो याद है तुमको!!


भयमुक्त समाज सुनने में बहुते अच्छा लगता है, लेकिन होता है कि नहीं, का मालूम. कम से कम हमको त एही अनुभव हुआ है कि ई सब मन बहलाने का झुनझुना है, सब आदमी के हाथ में थमा दिया गया है. बस एही देखकर खुस रहो कि सुरच्छित हो तुमलोग, एगो भयमुक्त समाज में. हमलोग भी मने मन सब जानते हुए तनी खुस हो लेते हैं कि कोनो है ऊपर बईठल जो कह रहा है कि योगक्षेमं वहाम्यहम.

जीते जी कहाँ मिलता है भय से मुक्ति. घर में रहिये त पत्नी का भय (पत्नी नहीं रहें त घर काटने को दौडता है अऊर रहें त ऊ अपने काटने को दौडती हैं), रोड पर एक्सीडेंट का भय, अपना गाड़ी में घूमिये त पेट्रोल के दाम का भय अऊर ऑफिस में हेड ऑफिस का भय! अरे ई भय से आतंकित होकर हमरे बड़े भाई श्री रविन्द्र कुमार शर्मा रवि जी (हमपेसा हैं अऊर बहुत कोमल हिरदय वाले सायर हैं) कल एस.एम्.एस. में बैंक में काम करने वाला कर्मचारी के लिए कुछ हॉरर सिनेमा का नाम घोषित कर दिए. एतना कोमल सायर अऊर ऐसन हॉरर सिनेमा का नाम सुनकर लगा कि केतना भयग्रस्त होंगे बेचारे:

१. तडपता क्लर्क   २. ऑफिसर की मौत   ३. कातिल मैनेजर   ४. खौफनाक मीटिंग ५. टारगेट का सदमा   ६. क्लोजिंग की आहट   ७. खून का प्यासा कस्टमर

अब जउन समाज में ऐसा-ऐसा भयानक बिचार आता होगा ऊ भयमुक्त कइसे हो सकता है भगवान जाने!

एक रोज हमरे बैंक में भी एगो चिट्ठी आ गया ऊपरवाले के तरफ से... अरे ओतना ऊपर वाला के तरफ से नहीं, उससे तनी नीचे वाला के तरफ से. चिठ्ठी का था, फरमान था कि फलाना तारीख को तीन बजे दिल्ली का पूरा ब्रांच से हर लेवल का सब ऑफिसर को एगो मीटिंग में उपस्थित रहना है. अब ई कहे का त कोनो जरूरत नहिंये है कि मीटिंग में हमरे माई-बाप का भासन होना था. जगह दिल्ली सहर के बाहरी छोर पर.

अब सब के अंदर भय ब्याप्त गया. नहीं गए तो...! अब ई सवाल का जवाब खोजने से अच्छा था कि चले चलो. टैक्सी, कार, अपना चाहे किराया का, सबमें भर-भर कर गया लोग-बाग. कोनो राजनैतिक रैली टाइप का दिरिस देखाई दे रहा था. एक-एक गाड़ी में जेतना आदमी समा सकता था, समा गया अऊर अपना हाजिरी लगा आया.

लौटने के टाइम में हमरे साथी अभय के गाड़ी में हमरे अलावा तीन महिला थीं. हम अभय के साथ सामने बैठे अऊर तीनों महिलायें पिछलका सीट पर. उनमें से एगो थी ज्योति जो ६-७ महीने की गर्भवती थी. मगर मजबूरी जो न कराये इस भयमुक्त समाज में. अभय बाबू बहुत साबधानी से गाड़ी चला रहे थे. मगर सामने एगो गाड़ी वाला पास भी नहीं दे रहा था अऊर बीचोबीच गाड़ी चला रहा था अपना मस्त चाल में. होरन का आवाज का भी कोनो असर नहीं हो रहा था. अभय बाबू को वैसे भी ई सब हरकत अनबर्दास्तेबुल (नाकाबिले बर्दाश्त या असहनीय) लगता है. जगह देखकर ऊ धीरे से इस्पीड बढाए अऊर साइड से ओभरटेक करके निकल गए. ई चक्कर में बीच वाला पीला लाइन से उनका दाहिना चक्का बाहर हो गया. तनिके आगे बढे होंगे कि पीछे से पुलिस का सायरन सुनाई देने लगा. कनखिया कर देखे त एगो मोटर साइकिल पर सिपाही हनहनाये हुए आ रहा था अऊर रुकने का इशारा कर रहा था.

हम बोले कि गाड़ी साइड में खडा करिये. मामला समझने के साथ, ओही समय हमरे माथा में गुलज़ार साहब का एगो नज्म सुनाई देने लगा:

एक दफा वो याद है तुमको,
बिन बत्ती जब साइकिल का चालान हुआ था
हमने कैसे, भूखे-प्यासे बेचारों सी एक्टिंग की थी
हवलदार ने उलटा एक अठन्नी देकर भेज दिया था
एक चवन्नी मेरी थी वो भिजवा दो!

हम ज्योति को बोले कि तुम सीट पर माथा पीछे करके आँख बंद कर लो. तब-तक हवलदार भी आ गया था. गोस्सा में बोला, ओवरटेक करते हो और लेन क्रोस करते हो. कागज़ निकालो!
तब तक हम सामने आ गए और बोले, देखिये सर! इमरजेंसी है!! हमारे साथ ये प्रेग्नेंट लेडी हैं और हम इनको लेकर हस्पताल जा रहे हैं. सामने वाला पास नहीं दे रहा था और बीचोबीच चला रहा था. हारकर ओवरटेक करना पडा!

हवलदार गाड़ी में झांक कर देखिस. ज्योति आँख बंद करके पीछे के तरफ आधा लेटी थी और बाकी दूनो महिलायें उसको दूनो साइड से संभाले हुए थीं. बेचारा हवलदार आदमी निकला, पुलिस नहीं. बोला, अब रोका है तो चालान तो करना ही होगा. रैश ड्राइविंग के लिए कम-से-कम एक हज़ार रुपया फाइन होता. मगर गलत पार्किंग के लिए सिर्फ सौ रुपये का चालान करता हूँ. आप लोग जल्दी जाओ!

बेचारा जल्दी-जल्दी चालान काटा अऊर हमलोग चल दिए. ज्योति का हंसी नहीं रुक रहा था. हम सब लोग हंस रहे थे. देखते-देखते गाड़ी के अंदर एकदम भयमुक्त समाज अस्थापित हो गया था.

रविवार, 11 सितंबर 2011

इनसे मिलिए!!


इधर कुछ ब्यस्त रहे, कुछ परेसान रहे अउर कुछ... बस का मालूम काहे अस्थिर से बइठकर कुछ लिखने का मने नहीं किया. आज मनोज भारती जी से बात होने लगा त हर बार के तरह बात सुरू करते हुए ऊ पूछे कि अगला पोस्ट में हम का लिखने जा रहे हैं. कुछ तय नहीं था त हम भी कहे कि देखते हैं. तब ऊ जिद करने लगे कि अभी आप अपना इंटरव्यू के बारे में लिखे हैं, मगर एगो इंटरव्यू पहिलहीं से पेंडिंग है. ओही काहे नहीं पोस्ट कर देते हैं. तब खेयाल हुआ कि हमारा एगो पोस्ट पर आप लोग हमसे हमारा बेटी जो इंटरव्यू ली थी, ऊ छापने के लिए बोले थे. बेटी के इस्कूल में का हुआ मालूम नहीं, लेकिन इहाँ बहुत सहमकर, डरते-डरते हम ई पोस्ट कर रहे हैं.


प्रतीक्षा प्रिया: आपको ब्लॉग लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
सलिल वर्मा: इस प्रश्न का उत्तर मैं पहली बार आपको बता रहा हूँ. दरअसल मुझे ब्लॉग लिखने की प्रेरणा अमिताभ बच्चन और विवेक शर्मा के ब्लॉग से मिली. अमित जी के ब्लॉग पर कई बार मैं यह लिख के आया कि आपकी एक अंग्रेज़ी कविता, जिसका हिन्दी अनुवाद आपके पिताजी ने किया था, प्रकाशित करें. लेकिन उन्होंने उत्तर नहीं दिया और कविता भी नहीं छापी. मुझे ये एकतरफा संवाद पसंद नहीं आया. क्योंकि दूसरी ओर विवेक शर्मा के ब्लॉग पर की गई हर प्रतिक्रया वो ऐक्नोलेज करते. तब मैंने अपने मित्र चैतन्य आलोक जी के साथ मिलकर संवेदना के स्वर ब्लॉग शुरू किया. चला बिहारी तो बहुत बाद में आया.

प्र. प्रि.:  आपने ब्लॉग लेखन के लिए यह भाषा क्यों चुनी?
स.व.: मेरे ब्लॉग की भाषा हिन्दी ही है. बिहार के अधिकतर लोग हिन्दी इसी तरह बोलते हैं. कई लोगों ने मुझसे कहा भी कि आप भोजपुरी में क्यों नहीं लिखते. उसका कारण भी यही है कि भोजपुरी मेरी भाषा नहीं है. बिहार में मैथिली भाषा के साथ-साथ भोजपुरी, मागधी और वज्जिका बोलियां बोली जाती हैं. मैं मगध से हूँ इसलिए मेरी बोली मागधी है. आज भी घर पर कुछ सम्बन्धियों के साथ इसी बोली में बतियाता हूँ. मेरी माताजी भोजपुरी अंचल से आती हैं. लेकिन अब तो वो भी नहीं बोल पातीं. इस बोली में ब्लॉग लिखने का कारण मात्र इतना है कि मैं इसमें अपनी आत्मा महसूस करता हूँ. कई लोगों ने शिकायत की कि पढ़ने में तकलीफ होती है, हिन्दी में लिखें. लेकिन मेरा उत्तर यही रहा है कि फिर तो इस ब्लॉग की आत्मा समाप्त हो जाएगी.

प्र. प्रि.: आप अपनी लेखन शैली के विषय में क्या कहना चाहेंगे?
स.व.: बस इतना कि मैं कोइ साहित्यकार नहीं हूँ और न ही साहित्य का विद्यार्थी रहा हूँ. हाँ, अच्छे साहित्य की समझ भर है मुझमें. मुझसे अच्छा लिखने वाले कई लोग ब्लॉग जगत में हैं और उनके ज्ञान और भाषा-शैली की बराबरी मैं कभी नहीं कर सकता. इसलिए मैंने बात करने की शैली अपनाई. मेरी हर पोस्ट पाठक से बात करती हुई मालूम होती है. वैसे सही शब्द होता बतियाती हुई होती है. मेरी कोशिश यही रहती है कि हर पढ़ने वाले के साथ पोस्ट के माध्यम से एक जुड़ाव पैदा कर सकूं. कितना सफल हुआ यह तो मेरे पाठक ही बता सकते हैं.

प्र. प्रि.: आपके पसंदीदा ब्लॉग कौन-कौन से हैं?
स.व.: कोइ टिप्पणी नहीं. वो सारे ब्लॉग जिन्हें मैं पढता हूँ, जिनपर अपनी बात कहता हूँ, वो सब मेरे पसंदीदा ब्लॉग हैं.


प्र. प्रि.: आप अपने लेखन के लिए विषय कैसे चुनते हैं?
स.व.: यह बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है. आधी ज़िंदगी गुज़ारने के बाद (माँ ने सौ साल जीने की दुआ दी थी) सोचा मैंने कि जीवन में कई घटनाएं मेरे साथ घटीं या शायद परमात्मा ने उन घटनाओं के एक पात्र के रूप में मुझे चुना. उन घटनाओं को सम्मान देने, उससे जुडे लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मैंने उन घटनाओं को अपनी पोस्ट का विषय बनाया. मेरी चेष्टा यही रही कि इन घटनाओं के बहाने मेरे पाठकों को अपने जीवन की ऐसी ही किसी घटना को पुनः जीने का अवसर मिले.

प्र. प्रि.: इस पूरी ब्लॉग-यात्रा में आप किसी व्यक्ति विशेष का नाम लेना चाहेंगे?
स.व.: निस्संदेह ऐसा व्यक्ति तो बस एक ही हो सकता है. मेरे मित्र चैतन्य आलोक. जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व को एक नया आयाम दिया, मेरे ज्ञान को एक नया विस्तार दिया और मुझे दुबारा लिखने को प्रोत्साहित किया. मेरी हर पोस्ट के वे पहले श्रोता हैं और अगर किसी कारणवश वो पोस्ट उनको न सुनाई जा सकी तो पोस्ट टाल दी है मैंने, मगर सुनाना नहीं टला.

प्र. प्रि.: अंत में एक व्यक्तिगत प्रश्न... क्या आपके परिवार के लोग आपका ब्लॉग पढते हैं? उनकी क्या राय है आपके ब्लॉग के विषय में?
स.व.: मेरी पत्नी बिलकुल नहीं पढ़तीं. कभी-कभार अपनी कोइ पोस्ट पढकर ज़बरदस्ती सुना देता हूँ उनको, तो सुन लेती हैं. यह पूछने पर कि कैसी लगी, उनका एक ही उत्तर होता है कि आपने लिखी है तो बुरी हो ही नहीं सकती. पटना में मेरा पुत्र, मेरा भाई, उसकी पत्नी और मेरी माँ बहुत पसंद करते हैं. विशेष तौर पर वे पोस्ट जिनमे उनसे जुडी यादें सिमटी हों.

प्र. प्रि.: बहुत अच्छा लगा आपसे बातें करके. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!