गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

वह आता...


नई दिल्ली के कनॉट प्लेस का बाहरी चाहे भीतरी सर्किल हो या पुरानी दिल्ली के कोनो पुराना पुल के नीचे का कोना, भोर का टाइम हो कि दिन-दोपहरी-रात, जाड़ा का समय हो कि जेठ का तपता हुआ गरमी... आपको ओहाँ कोनो न कोनो गठरी नुमा आदमी, गलीज कपड़ा ओढ़े हुए, धरती माता के ओर झुका हुआ देखाई दे जाएगा. सारा दुनिया से बेखबर, अपना साधना में लीन. मगर जब ऊ अपना चेहरा उठाकर जब आपके तरफ ताकता है, त आपको देखाई देता है, उसका जलता हुआ लाल-लाल आँख, बिखरा हुआ बाल, गन्दगी से सना हुआ चेहरा... एकदम बच्चा लोग के कहानी के दानव जैसा. हाथ में हथियार के जगह, सिगरेट का पन्नी अऊर दियासलाई. आगे बताने का जरूरत नहीं है कि ऊ का कर रहा होता है. भीख में जेतना पईसा मिला, ऊ नसा के धुंआ में उड़ गया.

गरमी का मौसम अऊर दोपहर को चलता हुआ लू, अब त लू का नाम सुनकर बच्चा लोग अइसे मुंह ताकता है जइसे उल्लू का बात हो. कॉलेज से बाहर निकले अऊर पाकिट में हाथ डाले त हाथ में दू रुपिया का नोट था. रेक्सा वाला डेढ़ रुपिया लेता था. असोक राजपथ पर खडा होकर रेक्सा का इंतज़ार करिये रहे थे कि एगो सज्जन हमरे सामने आये अऊर बोले कि बेटा हमरा पर्स कहीं गिर गया है. पी.एम्.सी.एच. (पटना मेडिकल कॉलेज एण्ड हॉस्पिटल) में आये थे. सुबह से कुछ नहीं खाए हैं. दादाजी का सिखाया हुआ बात, माँ-बाप का दिया हुआ संस्कार, उस आदमी का उमर अऊर उसके गोहार में दर्द महसूस करके हम अपने पाकिट से दू रुपया का नोट निकाल कर उसको दे दिए. अब एही लू में पैदल जाना होगा घर.  हिम्मत करके बढे त देखते का हैं कि ऊ सज्जन ओही दू रुपिया का नोट देकर सिगरेट खरीद रहे हैं. हम धूल फांक रहे हैं अऊर हमरे पईसा को ऊ धुंआ में उड़ा रहे हैं. हम उसके सामने जाकर खडा हो गए, घूर कर देखे अऊर चल दिए. ऊ आदमी घबरा गया अऊर नजर बचाकर गली में गायब हो गया.

चन्द्रसेखर जी... हमरे वरिष्ठ सहकर्मी... अब रिटायर हो गए. अपना उसूल पर चलने वाले आदमी. किसी के दबाव में काम नहीं करते थे. अगर ऊ ऑफिस जा रहे हैं अऊर आपको भी ओही साइड जाना है तो आपको गाडी में बइठा लेंगे. आपको आपके ओफिस के गेट तक छोड़ेंगे. ई नहीं कि मोड तक पहुंचा कर कहेंगे कि चले जाइए, हमको आगे जाना है. एक बार हमको बोले थे कि मेरा उसूल है कि या तो हम लिफ्ट देते नहीं है और देते हैं तो पहुंचाकर ही छोड़ते हैं, आधे रास्ते में नहीं. उनके उसूल में से एक उसूल इहो था कि रास्ता में सिग्नल पर भीख माँगने वाला कोनो भिखारी को भीख नहीं देते थे. हमरे जईसा कोनो घटना के कारन हो सकता है कि उनको ई सिद्धांत लेना पड़ा होगा.
बिजयलक्ष्मी जी रोज उनके साथ ऑफिस जाती थीं. रोज के तरह ऊ दिन भी ऊ चन्द्रसेखर जी के साथ गाड़ी में जा रही थीं. एक जगह सिग्नल पर गाड़ी रुका. ऊ देख रही थीं कि थोड़ा दूर पर एगो आदमी पुराना कोट-पैंट पहने हुए भीख मांग रहा था. जाड़ा के दिन में कोट पहिनकर भीख मांगना कोनो आदमी को आस्चर्ज में डाल सकता था. मगर उसके बाद जो हुआ, ऊ त घोर आस्चर्ज वाला घटना था. रुका हुआ गाडी देखकर, ऊ भिखारी चन्द्रसेखर जी के गाडी के पास आया. चन्द्रसेखर जी गाडी का सीसा नीचे रोल किये अऊर पाकिट से दस रुपया का नोट निकाल कर उसके हाथ में दिए. सिग्नल हरा हो गया था अऊर गाड़ी आगे निकल गया.

बहुत समझदार आदमी थे अऊर बहुत संतुलित बात करते थे. ऊ भांप गए कि बिजयलक्ष्मी जी के माथा में बार-बार ई सवाल उठ रहा है कि जो आदमी कोनो भिखारी को एक पैसा नहीं देते है, ऊ कोट-पैंट पहनने वाला भिखारी को दस रुपया कइसे दे दिए.
मुस्कुराकर ऊ पूछे, “क्या सोच रही हो विजय लक्ष्मी? मैंने उस भिखारी को पैसे क्यों दिए!”
“सर! आपने देखा नहीं. वो तो कपडे से भी भिखारी नहीं लग रहा था.”
“वो कैसे!”
“उसने तो कोट-पैंट पहन रखा था.”
“हाँ! पिछली सर्दियों में मैंने ही उसे ये कोट-पैंट दिया था, यह कहकर कि इसे पहनना. वो चाहता तो इसे बेचकर नशा कर लेता. मगर उसने मेरी भीख को दान समझकर अपना लिया.”

का मालूम ई भेस में ऊ भिखारी का धंधा कैसा चलता होगा.
बहुत सा लोग जो ई घटना नहीं जानता होगा, ऊ लोग उसको ढोंगी समझता होगा.
या सचमुच ऊ दरिद्र-नारायण था.

57 टिप्‍पणियां:

  1. हर चेहरे पे नकाब है.जो दिखता है वो है नहीं ..फिर भिखारी ही क्यों न हो.
    काफी सबक मिल गए इस पोस्ट से.आभार सलिल जी.

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  2. सलिल जी,आज के युग में,
    जो दिखता है वो होता नही
    जो होता है वो दिखता नही....

    बहुत बेहतरीन अच्छी प्रस्तुति,.....

    MY NEW POST...आज के नेता...

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  3. भिखारी की हालत जो जानने वाले एक मात्र चन्द्रशेखर जी थे, अन्यथा यह हमेशा होता है कि जिसे आवश्यकता होती है उसे कुछ नहीं मिलता, और जो छद्म होता है पा जाता है। बहुत ही मननीय संस्मरण्॥

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  4. रोचक!
    ये सिगनल भी ज़िन्दगी के सभी रंग, लाल, पीला ... हरा ... सब समेटे रहता है ... दिखाता रहता है ...
    कौन जाने किस वेष में मिल जाए नारायण ... दरिद्र नारायण ..

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  5. मैं ऐसे लोगों को कुछ देने के बजाय रिक्शा खींचने वाले को दो के पाँच या दस के बारह देना पसंद करता हूँ.गुस्सा आती है जब 'इन' व्यावसायिक लोगों को लोग रुपये देकर अपने लिए 'पुण्य' कमाते हैं.कई लोग जो उल्टा-सीधा कमाते हैं,वो इन्हें कुछ देकर अपने पाप कम करने की कोशिश करते हैं.

    मानवीय संवेदना रखिये,परखिये,उसी में नारायण मिलेंगे !

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    1. एक आदमी एक दूसरे आदमी को खींचे यह कहीं से तर्क संगत और संवेदनशीलता की पहचान नहीं है. एक बार एक पैर को पैडल में बाँध कर (दूसरा था नहीं) रिक्शा चलाने वाले को पैसा देने की कोशिश की थी उसने कहा था,"सर ये मेरा पेशा है. एक दो आदमी आप जैसे मिलेंगे पर बाद में लोग बैठना छोड़ देंगे मेरे रिक्शे पर. मुझसे सेवा लीजिए और उतना ही पैसा दीजिए जो बनता है." उसकी बात निराधार नहीं थी. ज़रूरी नहीं की भीख देने वाले पुण्य करते हैं उल्टा सीधा कमाते हैं . भीख मांगने को एक पेशा के तौर पर ले सकते हैं...बस. सम्वेदना एक variable है सामने वाले के स्टेटस के हिसाब से बदल भी जाती है...जो दिखा वो सही जो ना दिखा वो निजी सोच यानि Perception.

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  6. :) :)
    बाई द वे,
    मैं भी सिग्नल पर भिखारी को भीख नहीं देता..
    बट एक्स्सेप्सन आर देर :)

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  7. चन्‍द्रशेखर जी का दर्शन अच्‍छा लगा। भीख मांगना मजबूरी नहीं है अपितु धंधा है इसलिए इसे बढावा नहीं देना चाहिए।

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  8. भाई ... लोग अपने लायक एक नक्शा गढ़ लिहिन हैं कि भिखारी निराला जी वाला ही हो ... लगता है भिखारी लोग भी थोड़ा बहुत सीख गया है और कलाकारी दिखाता है . अब त इ भिखारी सब हाथ पकड़ के खींचता है . इतना बिधि सीख लिया है कि मत पूछिए ... कोन सही जरूरतमंद है, पहचानना मुस्किल है भाई

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  9. रोचक शैली में लिखी गई ... एक बेहतरीन पोस्‍ट ... आभार ।

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  10. एक बार फिर विस्मित कर गए आप.... वाकई सही आदमी की पहचान मुश्किल है... भीख नहीं देने पर कई बार गाली भी खाएं हैं... भीख मांगनेवालो से बतिया जरुर लेते हैं खास तौर पर बच्चो से... और जो वाकई जरुरत मंद लगता है उसे ही कुछ देते हैं.... बढ़िया पोस्ट...

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  11. कल शनिवार , 25/02/2012 को आपकी पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .

    धन्यवाद!

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  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!

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  13. सच के लिबास में झूठ... कि झूठ के लिबास में सच! अच्छा फंसाया सलिल भाई, आपने...

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  14. एक बार मेरे बेटे को भी एक वृद्ध सज्जन स्टेशन पर मिले...बताया..'उनका पर्स..सामान सब चोरी हो गया है...बैंगलोर जाना है...टिकट के लिए भी पैसे नहीं हैं'...बेटे के पास जितने पैसे थे उसने सब दे दिए...खुद भूखे रहकर वह दिन गुजारा...बाद में पता चला..कई लोगो को वे सज्जन (?) अलग-अलग स्टेशन पर बेवकूफ बनाते रहते हैं..

    किस पर भरोसा करें..

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  15. न जाने किस भेष में नारायण मिल जाएँ!
    कबीरा आप ठगायिये और न ठगिये कोई
    ......

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  16. meerut ke raaste mein ek poora parivaar isi tarah ki thagi kartaa paya jaata hai ....ek mitra ne bataya tha ...par aise hee log jinko vaastav mein jaroorat hai unko milne wali jaayaj madad rok dete hai

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  17. रोचक शैली में लिखी गई बहुत खूबसूरत प्रस्तुति| धन्यवाद।

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  18. सच में कभी कभी सही आदमी की पहचान बड़ी मुश्किल हो जाती है और ऐसे में जरुरत मंद बेचारा रह जाता है.....

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  19. आसान तो नहीं ही है आदमी को पहचानना, वो भी सिर्फ़ बाहरी वेशभूषा देखकर। और इतनी गहन दृष्टि हम सबके पास होती नहीं कि भीतर तक उतर सकें। बाकी हम लोगों को जजमेंटल होने का शौक तो है ही सो होते रहते हैं और अनुभव पाते रहते हैं। चन्द्रशेखर जी यकीनन सूझवान, ज्ञानवान रहे होंगे।

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  20. आडम्बर और धन्धे वाली प्रवृत्ति के चलते सही ज़रूरतमन्द को पहचानना कुछ कठिन तो है फिर भी 'वह आता 'को चरितार्थ करता कोई असहाय बूढा बच्चा या अपंग हमसे रुपया-दो रुपया ले जाता है तो हमें कोई कमी नही आती । हमारे सुख व सुविधाओं में कहीं न कहीं उसका भी हिस्सा है ।

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  21. अब त लू का नाम सुनकर बच्चा लोग अइसे मुंह ताकता है जइसे उल्लू का बात हो.
    :)

    संस्मरण एक नयी दृष्टि देता है कई सन्दर्भों में...!
    आपकी लेखन शैली और तथ्य उजागर करने का कौशल अद्वितीय है!
    सादर!

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  22. रोचक प्रस्तुति । दिल्ली ही नही भारत के अन्य शहरों में भी दिल्ली जैसा दृश्य देखने को मिलता है । संस्मरण अच्छा लगा । धन्यवाद .

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  23. :)
    सबसे अच्छी बात इस संस्मरण की यह लगी कि यह मात्र संस्मरण है, निष्कर्ष नहीं दिया आपने।
    अलग अलग लोग, भिन्न-भिन्न स्थितियाँ, अलग-अलग समय, मनुष्य का स्वभाव ऐसे ही विचित्र नहीं होता।
    ऐसी बहुत सारी लू भरी दोपहरों के बाद भी आदत बदलने का मन नहीं होता, "कहीं सच में..." वाले सवाल से तो लू बेहतर ही है।

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  24. जो कहा माने तो उसका सहायता करना बनता है, जो धोखा दे उसे..कुछ भी न दें।

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  25. हमको बैपारी बुडबक बनाता है ....अफसर बनाता है .....नेता बनाता है .....भिखारी भी बनाता है ....मतलब ये कि हम एंग्री मोहन इसी लिए बन गए हैं. डाकू खडग सिंह-बाबा भारती बाला ज़माना किधर गया भाई ?

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  26. व्यस्त था देर से आया हूं। इसी महीने मधुर भंडारकर की फिल्म ट्रैफिक सिग्नल देखी। उसमें इस तरह का नंगा सच दिखाया है। हालांकि मैंने बहुत पहले से भीख देना बंद कर दिया है। कुछेक को ही मदद करता हूं, भीख नहीं देता। ग्वालियर में भोलेनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है अचलेश्वर महादेव के नाम से। यहां कई भिखारी बैठते हैं। रोज कई सेठ साहूकार आते हैं दान-पुण्य करते हैं। लगभग सभी भिखारी या तो शहर के ही हैं या फिर आसपास के गांव के रहने वाले हैं। एक -दो मेरे पिताजी के मामा के गांव के रहने वाले थे। एक दफा मैं वहां गया था तो वहां मुझे बताया गया कि फंला आदमी अचलेश्वर पर बैठता है। वहां उसे बहुत पैसा-सामान मिलता है जिसे वह यहां अपने बेटे-बहू को दे जाता है। इसी तरह वहां के एक-दो भिखारी के पास से खूब जमा धन मिला था। लोगों की नेक नियत का कुछ लोग गलत फायदा उठाते हैं। यह बेहद चिंतनीय विषय है।

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  27. आपके अनुभवों से सदा ही कुछ नया मिलता है। भिक्षावृत्ति के बारे में हम तो अब तक कोई उसूल बना नहीं सके। जब होते हैं तो दे देते हैं और जब ज़रूरत होती है तो कोई न कोई दे जाता है। इस विषय पर आपके नगर में अपने एक दिन के अनुभव के आधार पर एक कहानी लिखी थी, आप चाहें तो निम्न लिंक पर पढ सकते हैं [अगर यह टिप्पणी स्पैम में नहीं गई तो]

    क्या यह मांगने वाले और इन्हें बेरुखी से झिड़कने वाले सब लोग सामान्य हैं और मैं ही असामान्य हूँ। मुझे याद आया जब बचपन में एक बार मैंने पिताजी से पूछा था

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  28. हमारे देश में भिखारियों की दुनिया बड़ी अजीब है।
    वास्तव में कौन जरूरतमंद है और कौन धोखेबाज है, पता नहीं चलता।

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  29. “हाँ! पिछली सर्दियों में मैंने ही उसे ये कोट-पैंट दिया था...

    बहुत संतुष्टी मिली इस पंक्ति को पढकर....
    बड़े तो बड़े आज छोटे छोटे बच्चे भीख मांगकर छोटी छोटी शीशियों में मेकेनिक के नाम पर पेट्रोल खरीदते हैं... सूंघने के लिए... या पंक्चर बनाने का सिलोसन... या....
    सचमुच नशे की प्रवृत्ती नाश की ओर ले जा रही है...
    सादर.

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  30. अच्छे लोग हैं जो भीख देने में भी उसूल का पालन करते हैं।
    मेरे लिये तो भीख देना "इम्पल्स" पर निर्भर करता है। और यह जाना है कि इम्पल्स बहुत गई गुजरी चीज भी नहीं! :-(

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    1. वैसे इस पोस्ट में मैंने खुद को जजमेंटल होने से रोका है.. लेकिन आपकी यह इम्पल्स वाली बात का कायल हूँ.. इसी इम्पल्स से एक कविता निकली थी, जो दूसरे ब्लॉग पर है!!
      आभार आपका!!

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  31. और हां, आप लिखते बहुत शानदार हैं!

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  32. आज के समय में ऐसे लोगों की पहचान आसान नहीं है ... पर इमानदारी का फायदा भी होता है फिर चाहे बीख मांगते हुवे भी क्यों न हो ...

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  33. आपके इस पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया दे चुका हूं । चूंकि सेरा पोस्ट आपके साईड बार में दिखाई नही देता है ,इसीलिए आपको अपने नए पोस्ट "भगवतीचरण वर्मा" पर आने के लिए अनरोध करता हूं । धन्यवाद ।

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  34. भीख मांगना मजबूरी हो तोबात समझ आती है अगर धंधा है,तो इसे बढावा नहीं देना चाहिए।
    बहुत अच्छी प्रस्तुति,
    NEW POST ...काव्यान्जलि ...होली में...

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  35. कभी ख़ुशी कभी ग़म जैसी ही लगी पोस्ट !

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  36. सब अनुभवों का खेल है बहुत खूबसूरत प्रस्तुति|

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  37. pataa maangaa tha naa usaka aaj thoda samay milaa to istemal kiya hai.......
    aasheesh.

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  38. सचमुच दरिद्र-नारायण रहा होगा वह कोट-पैंट वाला भिक्षुक ...रामधारी सिंह दिनकर याद आ गए...

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  39. विचारणीय पोस्ट .... कितनी घटनाएँ यूं ज़िंदगी में होती हैं ...

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  40. बड़ा रोचक पोस्ट है। आपके चंद्रशेखर जी बड़े प्यारे आदमी हैं। उनको हमारी नमस्ते कहियेगा।

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  41. बाऊ जी , आपके पहले संस्मरण के लिए एगो चुटकुला याद आ रहा है , देखिएगा-
    "गर्मी की तपती दुपहरिया मा ८-१० लोग बस स्टॉप पर खड़े बस का इन्तजार कर रहे थे , एगो भिखारी उंहा आवा , सभे से ५-५ रूपया लिए और ऑटो में बैठ के निकल गवा |" :)

    और दूसरे संस्मरण में चन्द्रसेखर जी के लिए क्या कहूँ बस इतना ही कि उन्होंने भीख नहीं दी , मदद की है | भीख देने और मदद करने मा बहुत फर्क होवत है |

    सादर

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