बुधवार, 7 मार्च 2012

होली - एक कबित्त

ई हमारा पहिला कबित्त है, जो हम 'संवेदना के स्वर' पर आज से दू साल पहिले पर्कासित किये थे... आज इहाँ दोहरा रहे हैं... होली के सुबह कामना के साथ:

होली का त्यौहार, मची धूम चारों ओर है जी, देख-देख रंग की बौछार मन डरता है.
देश पर  भ्रष्ट  नेताओं  का   है  काला   रंग,  आतंक  की आग में ये देश देखो जरता है.
रंग  सतरंगी,  इन्द्रधनुष  सरीखे  थे  कल,  आज  भगवा  तो  हरा  शोर  कोई  करता  है.
महंगाई ने जो तोड़ रखी है कमर सब की, जनता का पेट आधा चौथाई ही भरता है.

गोरी की कलाई सूनी, चूड़ियाँ नहीं हैं सजी, श्याम भी सहम के कलाई आज धरता है.
फटी हुयी चूनर से झांकता यौवन और रीत गयी गागर से जल भूमि परता है.
माल तो समाप्त हुआ, पूआ बेसवाद हुआ, बालूशाही में से बालू-सा-ही कुछ झरता है
होलिका दहन प्रतिदिन हो रहा है आज, जीवन की चिता में मनुज नित जरता है.

50 टिप्‍पणियां:

  1. हम तो बुढाय गए,बाल पकियाय गए,देखि-देखि कामिनिन को
    फगवा-मन मचलता है !

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  2. आपको सपरिवार होली की शुभकामनायें ...

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  3. होली पर बिसरा रहा सब संसकिरती परंपरा, एक चुटकी गुलाल आपके चरणों में रख, आशीष लेने का मन करता है ... बढ़िया कवित्त... गाके पढने में और आननद आया.... होली की हार्दिक शुभकामना

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  4. बढ़िया ||


    होली है होलो हुलस, हुल्लड़ हुन हुल्लास।
    कामयाब काया किलक, होय पूर्ण सब आस ।।

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  5. लाल रंग गालों पे, काला रंग बालों पे
    गुलाबी रंग सपने हों, श्वेत रंग मन हो
    होली में आपका कवित्त पढ़ सलिल भैया
    अपना मन भी काहे ना मगन हो।

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  6. बहुत ही खुबसूरत रंगों से भरा हो आपका होली का त्यौहार.....

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  7. होली का त्‍यौहार जो आया, रंग अनोखे सामने लाया
    पता चला हमको कि चला बिहारी भी कविता करता है
    *
    होली की शुभकामनाएं

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  8. होली पर संवेदना के स्वर से पुनर्प्रकाशित यह कवित्त संवेदनाओं को पुनर्जीवित कर रहा है...होलिका दहन तो हर वर्ष होता है...पर जीवन की चिता(चिंता) में मनुष्य रोज ही जल रहा है...सामयिक प्रस्तुति!!!

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  9. सच्चाई को कहती सटीक और सार्थक रचना ....

    फिर भी ..... होली की शुभकामनायें

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  10. कमाल है बड़े भाई, कमाल है!
    ई कबितई में बहुत कुछ झर-झर-झरता है
    सचाई का सच सामने लाकर आपने एक ऐसी कविता पेश कर दी है जिसे पढ़कर मन हंसता और दिल क्रंदन करता है।

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  11. रंगों की बौछारों से न ,डरिये तनिक भी
    करते हैं रंग ही ,जीवन का श्रंगार हैं ।
    माना कि आतंक का है रंग काला जहाँ-तहाँ
    छाई मँहगाई और फैला भ्रष्टाचार है
    फिर भी जिजीविषा है आशा और विश्वास भी है
    क्योंकि शेष अब भी ईमान और प्यार है ।
    आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभ-कामनाएं

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  12. सार्थक प्रस्तुति,बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति....बेहतरीन रचना

    सलिल जी,....सपरिवार होली की बहुत२ बधाई शुभकामनाए...

    RECENT POST...काव्यान्जलि ...रंग रंगीली होली आई,

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  13. सच्चाई यही है ..फिर भी हैप्पी होली है.

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  14. ईश्वर आपके अंतस में उल्लास के रंग और जीवन में अनंत मुस्कराहटों के अवसर भर दे ! रंग पर्व पर मेरी शुभकामनायें स्वीकारने की कृपा करें !
    अली

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  15. नित अन्याय हो रहा है, होलिका नित प्रह्लाद को लेकर बैठ रही है

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  16. दिल्ली न सही, पटना में ही आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को होली के पावन पर्व पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।
    कवित्त में एक संवेदनशील देशहित चिन्तक की अभिव्यक्ति अच्छी लगी।

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  17. होली,धुरेड़ी की आपको हार्दिक-शुभकामनाएं...खुशियों रंगों भरी होली...

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  18. गोरी की कलाई सूनी, चूड़ियाँ नहीं हैं सजी, श्याम भी सहम के कलाई आज धरता है.
    फटी हुयी चूनर से झांकता यौवन और रीत गयी गागर से जल भूमि परता है.
    माल तो समाप्त हुआ, पूआ बेसवाद हुआ, बालूशाही में से बालू-सा-ही कुछ झरता है
    होलिका दहन प्रतिदिन हो रहा है आज, जीवन की चिता में मनुज नित जरता है... अभिलाषाओं की अथक यात्रा में , पल भर में सबकुछ पा लेने की ख्वाहिश में स्वार्थ प्रबल है, ' मैं ' प्रबल है - फिर स्वाद कहाँ ! मासूमियत के रंग नहीं , संस्कारों की खुशबू नहीं .... इतना बनावटी है सबकुछ कि लगता है ' सुबह होती ही नहीं , न शाम न रात !'
    पर कुछ भी हो जाए - स्नेहिल रंगों की शुभकामनायें

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  19. पर्व की सुन्दरता के बावजूद आज का विरोधाभास ही प्रभावी हो रहा है, मंगलकामनायें!

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  20. होली की कविता में आपके भीतर की दहक महसूसी जा सकती है। आपको और इष्ट-मित्रों को होली की बहुत बहुत शुभकामनायें।

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  21. पहले स्वर संवेदना के.....
    पहली ये कविता है.....
    जाने क्यूँ ऐसा नहीं लगता है.........

    बेहतरीन..........
    आपकी होली शुभ हो सलिल जी.

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  22. होली आप को सपरिवार मंगलमय एवं समृद्धिदायक हो।

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  23. यह होली आशा जगाने वाली है,
    नकली रंग उतर रहे हैं,
    नकली मुखौटे पहचाने जा रहे हैं
    होलिका माई के षणयंत्र बेनकाब होकर रहेंगे
    असली होलिका दहन भी होकर रहेगा

    सभी मित्रों को होली की शुभकामनायें !

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  24. गोरी की कलाई सूनी, चूड़ियाँ नहीं हैं सजी, श्याम भी सहम के कलाई आज धरता है.
    फटी हुयी चूनर से झांकता यौवन और रीत गयी गागर से जल भूमि परता है.
    माल तो समाप्त हुआ, पूआ बेसवाद हुआ, बालूशाही में से बालू-सा-ही कुछ झरता है
    होलिका दहन प्रतिदिन हो रहा है आज, जीवन की चिता में मनुज नित जरता है.
    वाह! मौजूदा हालात का सटीक चित्रण किया है आपने !
    आपको सपरिवार होली की ढेरों शुभकामनाएँ !

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  25. वर्तमान परिस्थितियों का सुंदर काव्यमय वर्णन।
    आपकी गद्य रचनाओं की तरह प्रस्तुत पद्य के अंत में भी जीवन-सूत्र छुपा हुआ है।

    होली की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  26. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..होली की शुभकामनायें..मेरे ब्लॉग filmihai.blogspot.com पर स्वागत है...

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  27. आज को उकेरती प्रभावी रचना सर...
    होली की सादर बधाईयां...

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  28. पर्व के उत्साह को महंगाई के छींटे फीके तो करते हैं ...मगर लड्डू मन के तो थोड़े क्यों ...ज्यादा है तो फीके क्यों !
    बहुत शुभकामनायें !

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  29. फ़िर से देर हो गई, लेकिन आपके कवित्त में जो बाते हैं वो हमेशा से सिस्टम में मौजूद हैं तो फ़िर देर भी कैसी? बुराई और अच्छाई की जंग हमेशा चलने वाली है और ’शुभ होली’ होकर रहेगी।

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  30. अवसाद की आग में रंग सब धूमिल हुए
    विपदा की मांग में सिन्दुर कहां सजता है
    रोटी की जुगत में काया रहे तरबतर
    बेरंग पसीने पर रंग कहां चढ़ता है

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  31. जीवन की चिता में मनुज नित जरता है.
    कितना सटीक और सच है यह!
    सुन्दर कबित्त!
    सादर!

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  32. वाह ... सटीक टिपण्णी है आज के समाजिक परिवेश पे .... होली ही नहीं लगभग हर त्यौहार ऐसा ही है आज के युग में ...
    पर फिर भी जीवन की रीत तो निभानी ही होती है ...
    आपको और परिवार में सभी को होली की मंगल कामनाएं ...

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  33. हम हालातों से समझौता कर खुश रहना सीख चुके हैं...जो न सीखा वो अनाड़ी!

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  34. सार्थकता लिए हुए मन को छूते भावों के साथ उत्‍कृष्‍ट लेखन ...आभार ।

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  35. बहुत ही सच्ची बात कहे आप..... आज के दौर में और भी धारदार लग रही है. सुंदर प्रस्तुति.

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  36. मेरे पास शब्द नहीं है भाई जी..एक भी शब्द नहीं...

    कहाँ किसकी नजर जाती है इधर...सब तो मस्त हैं, हुडदंग के बीच वो दीखते कहाँ हैं, जिनके बालूशाही से बालू झरता हो..जिनको बालूशाही क्या सूखी रोटी भी मयस्सर नहीं..आतंक के काले रंग में डूबा देश...व्यभिचारी सत्तासीन ....

    आजतक होली पर जिनी भी रचनाएं पढ़ीं, कोई इसके बराबर का नहीं...

    साधुवाद भाई जी साधुवाद...

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  37. होली पर घर (ग्वालियर) चला गया था... आभासी दुनिया से भी दूर हो गया था... इसलिए बिलम्ब से आपकी पहली कविता का आनंद ले रहा हूँ... होली की शुभकामनाएं.....

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  38. कुछ बातों के लिए कभी देर नहीं होती

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  39. बहुत सुन्दर कबित्त बा , का करी आजकल देश का हालात जौन है की तौन बहुत हे ख़राब हो गइल.

    होली माँ भी उ मजा नहीं मिलेला .

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