छठ पूजा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
छठ पूजा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

छठ पूजाः यादों का कोलॉज

अजीब समानता है आदमी अऊर चिड़िया में. एक तरफ साइबेरिया उड़कर हर साल केतना पंछी एहाँ आता है अऊर दोसरा तरफ पेट के खातिर केतना लोग अपना जड़ अपना जन्मभूमि से उखाड़कर परदेस में रोप देते हैं. पेड़ फलता है मगर, अपना जन्मभूमि का मिट्टी उसको हमेसा बुलाता  है. खास तौर से त्यौहार के समय. कुछ परब त्यौहार अपना प्रदेस के अलावा कहीं मनाया भी नहीं जाता. ऐसने एगो त्यौहार है छठ पूजा, बिहार और उत्तर प्रदेस के कुछ हिस्सा को छोड़कर कहीं नहीं मनाया जाता है. हाँ जहाँ जहाँ बिहारी लोग बस गया है वहाँ परब का प्रचलन बढ़ गया है.
मगर बशीर साहब बोल गए हैं कि
ये ज़ाफ़रानी पुलोवर, उसी का हिस्सा है,
कोई जो दूसरा ओढ़े, तो दूसरा ही लगे.
इसीलिए, परब का मजा परिबार, समाज अऊर अपना मट्टी में ही आता है. हम पिछला 17-18 साल से देस बिदेस भटक रहे हैं. लेकिन जननी  अऊर जन्मभूमि का अईसा लगाव है कि जैसे उड़ि जहाज को पंछी, पुनि जहाज पर आवे, हम भी हर साल छठ में पटना मे पाए जाते हैं.
हमरी सिरीमती जी खुदे छठ करती हैं. जब हमरी माता जी छठ करने में असमर्थ हो गईं तो परब बड़ी बहू यानि हमरी सिरीमती जी को सौंप दीं. तब से हमरी सिरीमती जी हमरे पूरा खानदान के बाल बच्चा का हिफ़ाज़त के लिए बरत करती हैं. अऊर बिस्वास कीजिए जब बाल बच्चा से भरा हुआ अँगना में उनको सबके लिए तीन दिन का उपवास रखते देखते हैं, तब एहसास होता है कि माता अऊर बच्चा का एगो अलगे जाति होता है अऊर अलगे धर्म, निःस्वार्थ प्रेम का धर्म.
(छठ पूजा का दो पीढ़ी) 
 

परब का एगो सबसे बड़ा बिसेसता है कि इसमें समाज का हर आदमी जुड़ा रहता है. हमरी फूआ के छत पर लौकी का लत्तर लगा हुआ था. बहुत लौकी फलता था. लेकिन फूआ उसको हाथ तक नहीं लगाती थीं, इसलिए कि उसमें से लौकी छठ के प्रसाद के लिए देना था. अऊर पूजा के समय पूरे मोहल्ले में जहाँ छठ पूजा हो रहा हो, बाँट दिया जाता. किसी के गाँव से गुड़ गया, तो पहिले पूजा के लिए इस्तेमाल होना जरूरी है. आटा का चक्की वाला लोग, पूरा चक्की खोलकर धुलाई करता है अऊर पूजा के बीच में सिर्फ पूजा के लिए गेहूँ पिसा जाता है.
मोहल्ला का एक से एक लोफर भी रस्ता, गली और नाली का सफाई में लगा रहता है. अऊर आस्चर्ज का बात है कि गंगा नदी तक जाने वाला सहर का सब रास्ता धुला हुआ, एकदम साफ मिलता है. रास्ते में कोनो कूड़ा नहीं, कोनो गंदगी नहीं, भर रास्ता रोशनी, सुंदर रंगीन लाइट अऊर चारों तरफ छठ का गीत. एक लाईन में कहें पूरा सहर एक धागा में माला का जईसा गूँथा जाता है जिसको छठ पूजा कहते हैं. स्रद्धा अऊर पबित्रता का आलम है कि जिस दिन खीर अऊर रोटी का प्रसाद बनता है उस दिन जिसघर में पूजा नहीं भी होता है वहाँ खीर या रोटी नहीं बनता है. इससे प्रसादका अपमान होता है.
समय के हिसाब से बहुत कुछ बदल गया. सहर पूरा साफ हो गया, मगर गंगा मैली हो गई अऊर पटना से दूर चली गईं. अब गंगा माई के नराज होने का कारन जग जाहिर है. लेकिन इससे जो नोकसान हुआ कि लोग गंगा जी में जाना कम कर दिया. आजकल देस के नेता लोग अपना बड़ा बड़ा बंगला के स्विमिंग पूल में छठ मनाते हैं, बहुत सा लोग अपने घर का छत पर पानी का टंकी बनाकर उसमें खड़ा होकर पूजा कर लेते हैं. अच्छा हमको भी नहीं लगता है लेकिन व्यबहारिक होकर सोचते हैं लगता है कि नदी का घाट का दुर्दसा के आगे घर में ही कर लेना उचित है. अऊर सच पूछिये मन चंगा तो कठौती में गंगा वाला कहावत भी एहीं चरितार्थ होता देखाई देता है.
परिबार में, समाज में सब लोग रुपया पैसा से, फल फूल से, ब्रत करने वाला का सेवा करके अपना सहजोग देने का कोसिस करता है. हमरे परिबार में सिरीमती जी की तीनों देवरानी अपना अपना तरफ से नया साड़ी खरीदकर देती हैं. एक एक करके सबका दिया हुआ साड़ी पहन कर पुजा करतई हैं सिरीमती जी. केतना बार जिद भी होता है कि इस बार हमरा साड़ी पहिनकर अरग (अर्घ्य) देना पड़ेगा. एक रोज फोन पर एही जिद चल रहा था जेठानी देवरानी में अऊर हमरी बेटी चुपचाप सुन रही थी. जब बात खतम हो गया उसके बाद का माँ बेटी का सम्बाद, तनी आप भी सुनियेः
ममा! पटना से मम्मी (चाची को मम्मी कहती है) साड़ी के बारे में क्या बोल रही थी.
कह रही थी कि इस बार आपको मेरा वाला साड़ी पहनकर पूजा करना है.
इससे क्या होता है.
होता कुछ नहीं है. पूजा का श्रद्धा है.
एक काम करो. मेरे मनी बॉक्स में भी बहुत सा पैसा जमा हो गया है. उससे तुम एक साड़ी ख़रीद लो अपने लिए. इस बार पूजा मेरे दिए हुए साड़ी को पहनकर करना.
“………………………….”
सिरीमती जी चुप हो गईं, हो सकता है उनका आँख भर आया हो. हम भी वहीं पर बईठे कुछ कर रहे थे. बात सुनकर हमरा हाथ रुक गया. अऊर हमको लगा कि बिहार के बाहर पैदा होने वाली, पढाई करने वाली अऊर बिहार के संस्कृति से दूर रहने वाली हमरी बेटी ठेठ बिहारी हो गई. तब लगा कि सचमुच चिड़िया के बच्चा उड़ना सिखाने का जरूरत नहीं होता है. मट्टी का प्यार अऊर क़तील शिफ़ाई का शेर हमरे दिमाग में घूम गया
क़तील अपने लिए वो कशिश ज़मीन में है
यहीं गिरेंगे, जहाँ से गिरा दिए जाएँ.
सिरीमती जी तब तक पटना फोन मिला चुकी थीं.

पुनश्च: छठ पूजा  की विस्तृत जानकारी "संवेदना के स्वर" पर "छठ की छटा" में पढ़ें!