हमरे फेसबुक के देवाल पर लिखा हुआ दूठो छोटा कबिता आपके सामने पेस कर रहे हैं. आजकल थोड़ा ब्यस्तता बढ़ गया है अऊर परेसानी भी. इसलिए आज एही झेलिये.
सूरज और सर्दी
दिन चढ आया
बाहर फिर भी अंधेरा था
सूरज बाबू कहीं दिखाई नहीं दे रहे.
छत पर चढ़कर मैंने जब आवाज़ लगाकर उनसे पूछा
वो बोले, मैं लेटा हूँ बादल की तोशक के अंदर
चुपचाप दुबककर.
मुझको मत डिस्टर्ब करो तुम.
जाकर तुम भी सो जाओ
बाहर तो देखो,
बाहर कितनी सर्दी है!!
सात फेरे
ना जाने कितनी सदियों से
एक उपग्रह
चक्कर लगा लगा कर ग्रह के
अपने मन की बात बोल ही बैठा उसको.
कहने लगा नहीं अब मुझसे होता ये सब
तुम बेकार में सूरज के इतने चक्कर काटे जाते हो
आओ मेरी उँगली थामो
गाँठ जोड़कर,
सूरज की अग्नि के फेरे सात लगा लें
इंसानों की जोड़ी हम तारों ने तो बनवाई कितनी
आओ मिलकर अपनी जोड़ी आज बना लें!!