हमरे बिहार में एगो अजीब तरह का मान्यता है, कहीं अऊर भी हो सकता है, मगर हमको पता नहीं है इसलिए बिहारे का बात करते हैं. हाँ त, मान्यता ई है कि अगर कोनो परब त्यौहार के दिन परिबार में मृत्यु जईसा कोनो असुभ घटना घट जाए, तो ऊ त्यौहार नहीं मनाया जाता है. केतना बार तो ई घटना कई पीढ़ी पहले का होता है , लेकिन उसका पालन पीढ़ी दर पीढ़ी करना पड़ता है. हर पीढ़ी अपने बाद वाला पीढ़ी को इसका सूचना देकर जाता है.
मगर इसके साथ भी एगो काट है. अगर किसी भी पीढ़ी में उसी त्यौहार के दिन अगर कोई लड़का पैदा हो जाए तो ऊ त्यौहार मनाना फिर से सुरू हो जाता है. यहाँ भी बेटी लोग के साथ अन्याय हुआ है कि अगर बेटी पैदा हो तो त्यौहार नहीं मनाया जा सकता. अब मान्यता है ही इसीलिए कि इसको हर कोई मानता है. बिरोध करने का आजादी है, नहीं मानने का भी आजादी है, लेकिन मानने के लिए बस दिल का सुनना पड़ता है.
हमरे परिबार में दीवाली नहीं मनाया जाता था. अब अगर मना लेते तो कौन देखने जा रहा था कि हमरे सात पुस्त पहिले किसका मृत्यु दीवाली के दिन हुआ था. अऊर कौन बुरा मानने जाता. लेकिन परम्परा का बंधन मामूली डोरी जईसा होता है, एतना कमजोर कि एक झटका से टूट जाए अऊर एतना मजबूत कि बिना किसी बंधन के बाँधे रहता है. इसीलिए हमलोग दीवाली नहीं मनाते थे. बस सब को देखते थे पूजा करते हुए.
दीवाली के दिन घर में बेटी लोग का दिन होता है. दू दिन पहिले से घरौंदा बनकर तैयार. हमरे जमाना में ईंटा जोड़कर घरौंदा बनाया जाता था. फिर उसपर मट्टी थोपकर, गोबर से लीपकर सूखने को छोड़ दिया जाता था. सूखने के बाद घर पर पुताई के बाद बचा हुआ चूना में रंग घोरकर, ऊ घरौंदा को रंग बिरंगा रूप में सजाया जाता.
ई घरौंदा बास्तव में घर का मॉडेल होता है. इसके अंदर पकाया हुआ मट्टी का बना बरतन में खील और फरही (धान और चावल, रेत में भूना हुआ) रखकर, लछमी गनेस को बईठाना और पूजा करना. ई सब काम घर का बेटी लोग करती है. हमको लगता है कि इसके पीछे एही भावना होगा कि लछमी जी से प्रार्थना करना कि ई घर को धन धान्य से परिपुर्न रखें. है न बिरोधाभास एहाँ पर भी. ऊ बेटी, जो आपके घर को धन धान्य से परिपुर्न रखने का बरदान माँग रही है, उसके पैदा होने पर दोस नहीं कटता है, काहे कि ऊ पराया घर का अमानत है. खैर, ई सब सजावट में घर का लड़का लोग भी बहुत मदद करता है. या कहिये कि सजावट का जिम्मा लड़का सब के ऊपर रहता है.
धीरे धीरे ईंटा अऊर मट्टी का जगह पर कागज अऊर कार्डबोर्ड का घरौंदा बनने लगा, सजावट के लिए रंगीन रंगीन चमकीला कागज उसके ऊपर साटा जाने लगा. कुल मिलाकर सब एकदम मॉडर्न हो गया. घर में कब ई परम्परा फूआ, मौसी से होते हुये, बहिन के मार्फत बेटी लोग तक आता गया अऊर ऐसहीं एक पीढ़ी से दूसरा पीढ़ी तक चलता चला गया, पता नहीं.
हमरा सबसे छोटा भाई राज, जब दीवाली के रोज पैदा हुआ तो उसके पैदा होने से जादा खुसी इस बात का था कि अब हम लोग दीवाली मना सकते हैं. फिर त हर साल दीवाली का आनंद दुगुना हो गया. सब लोग का जईसा हमलोग भी अंग्रेजी कलेंडर के हिसाब से जनमदिन मनाते हैं, लेकिन हमरा छोटा भाई के पैदा होने के बाद उसका जनमदिन हमलोग दीवाली के दिन मनाने लगे. हमलोग के लिये दीवाली सच में प्रकास परब के जईसा है, हमरे परिबार के ऊपर जो अभिसाप का अंधेरा छाया था, ऊ हमरे भाई राज के जन्म के प्रकास से मिट गया.
आप सब लोगों को दीवाली का हार्दिक सुभकामना! आपके जीबन में हमेसा सुख अऊर समृद्धि का प्रकास फैलता रहे एही मनाते हैं आज के दिन!!
(दोनों चित्रः मेरे घर के)
