सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

नाम सोचा ही न था!

जेठ का गर्मी कहें कि जून का. जिसमें आपको बेसी जलन महसूस हो ओही महीना समझ लीजिए, काहे कि दुपहर का डेढ़ बज रहा था अऊर हम पिघला हुआ अलकतरा का सड़क पर ख़ड़ा होकर टेम्पो (ऑटो रिक्शा) का इंतजार कर रहे थे. इंतजार का मतलब पटना में दोसरा होता है. समझाते हैं, तब आपको समझ में आएगा. ओहाँ सेयर वाला टेम्पो चलता है. एगो टेम्पो में तीन आदमी बीच में, तीन आदमी पीछे (दूनो तरफ बईठने का सीट रहता है) अऊर तीन आदमी ड्राइवर के सीट पर. बेचारा ड्राइवर बस टिकाने भर का जगह पाता है, अऊर हैंडिल पकड़े रहता है. दूर से देखिएगा त बुझएबे नहीं करेगा कि असल में ड्राइवर कौन है.

धंधा का उसूल एकदम फिट. जब तक नौ सवारी नहीं मिलेगा, तब तक दुनिया इधर का उधर हो जाए टेम्पो का सुमधुर ध्वनी सुनने को तरस जाएगा आपका कान. अऊर कमाल ई कि ड्राइवर एकदम बहरा हो जाता है. आप केतना भी चिल्लाते रहिए कि आगे मिल जाएगा सवारी, मगर का मजाल कि आपका बात उसका कान में जाए. हाँ कोई कोई समझदार टेम्पो वाला, कभी कभी छः आदमी के साथ भी टेम्पो चला देता है, रास्ता में देखते हुए कि कोई मिल जाए.

त इंतजार करने का मतलब आप खड़ा होकर देखते रहिए कि जब पाँच आदमी बईठ जाए, त आप जाकर बईठ जाइए. इससे आपके यात्रा का सिरी गनेस होने का सम्भावना बढ़ जाता है. सड़क पर इन्तजार करने से अच्छा था कि हम बईठ गए टेम्पो में अऊर देखने लगे कि कोई पसिंजर मिल जाए त हम जल्दी से पहुँचे. काम जरूरी था इसलिए जल्दी में थे. लेकिन हमरे चाहने से का होने वाला था. चलाना तो ड्राइवर साहब को था. ऊ प्रेम से अपना हाथ जमाए हुए हैंडिल पर अऊर नजर जमाए हुए सड़क पर देख रहे थे कि एगो अऊर पसिंजर मिल जाए तो चलें.

हमरा बर्दास्त का सीमा टूट रहा था. अचानके हम बोले, “ए बाबू रामपरवेस! आगे सवारी मिल जाएगा. बढाओ यार. “हमरे मुँह से अपना नाम सुनकर ऊ गद्गद हो गया अऊर आव देखा न ताव, पट से इस्टार्ट किया अऊर झट से बोला, “घबड़ाइए नहीं हुजूर. आपको टाइमली पहुँचा देंगे.” टेम्पो इस्टार्ट, अऊर हम एकदम समय पर पहुँच गए. उतर कर उसको धन्यवाद बोले त बेचारा एकदम भाव बिभोर हो गया, “हुजूर! आप धन्यवाद भी बोल रहे हैं अऊर हमको जानते भी हैं नाम से. हम आपसे पइसा नहीं लेंगे.” मगर हम जबर्दस्ती उसके हाथ में पईसा पकड़ा कर चल दिए.
++
ऊ दिन सनिबार को रात में बिनोद बाबू घर पर आए अऊर बोले, “वर्मा जी! कल पूजा की परीक्षा है. मेरा भी टेस्ट है कल.” हम समझ गए. उनको बोले, “अरे! काहे परेसान होते हैं. हम हैं न. पूजा बिटिया को हम लेकर जाएँगे परीक्षा दिलवाने.”

“लेकिन आपका सारा दिन बरबाद हो जाएगा.” हम बोले कि हमरे दिन के बरबादी का आप चिंता मत कीजिए, किताब पढ़ते रहेंगे तो टाइम बीत जाएगा.

ऊ रोज भी बहुत गर्मी था. इस्कूल का दरवाजा अभी खुला नहीं था.नतीजा सब बच्चा लोग खुला सड़क पर धूप में खड़ा था. हम पूजा बिटिया को लेकर धीरे से दीवार के छाया में चले गए. गर्मी था मगर धूप से बच गए. कुछ अऊर बच्चा बच्ची लोग भी उधर आ गया.

ओहीं धूप में एगो दुबली पतली लड़की, हाथ में पेपर लिए, उसका छतरी बनाकर अपना माथा धूप से बचा रही थी. हमको लगा कि बताओ ई बच्चा सब धूप में खड़ा है. अईसन हालत में तो जो पढा है सब भाप बनकर उड़ जाएगा. कुछ माता पिता लोग कुढ़ रहे थे मन ही मन, इस्कूल प्रसासन को खरा खोटा भी सुना रहे थे. मगर इस्कूल का दीवार एतना ऊँचा था कि उस पार कोई आवाज सुनने वाला नहीं था.

ऊ बचिया बहुत परेसान लग रही थी. सायद धूप से उसका तबियत खराब हो रहा था. अब हमसे देखा नहीं गया. हम पूजा को बोले, “ पूजा! रूची बेचारी धूप में परेशान है, उसको बुला लो इधर छाया में.”

पूजा हिचक रही थी बोलने में तो हम ही उसको बोले, “रूची बेटा! तुम इधर आ जाओ. हम उधर चले जाते हैं. ये लो पानी पी लो.” ऊ तुरत हमरे हाथ से बोतल लेकर पानी पी अऊर छाया में आ गई. बोली कुछ नहीं. धीरे से पूजा से पूछी, “अंकल को मेरा नाम कैसे पता चला.”

हम मुस्कुरा दिए. बोले, “ ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. तुम्हारे हाथ में जो पेपर है उसपर लिखा है तुम्हारा नाम. दूर से दिखाई दे रहा है. तुमने ही तो बताया मुझे अपना नाम!” रूची मुस्कुराने लगी अऊर थोड़ा देर पहिले धूप से जो ऊ परेसान हो रही थी, अब एकदम निस्चिंत लग रही थी.

ई दुनो घटना के बीच करीब बीस साल का अंतर होगा. ऊ टेम्पो वाला जब हैंडिल पर हाथ रखे हुए था तो हम देखे कि राम परवेस नाम गोदा हुआ था उसके हाथ पर. अऊर हम उसको ओही नाम से बोले. सिनेमा होता तो उसका कोई बिछड़ा हुआ भाई चाहे दोस्त का नाम हो सकता था. लेकिन ई नाम उसी का था.

ई दुनो घटना का जिकिर हम इसलिये नहीं किए कि हमको आपलोग कहिए कि वाह आप तो एकदम शर्लॉक होम्स वाला काम किए, कैसे सोच लेते हैं आप. अऊर हम भी चेहरा को तनी सीरियस बनाकर बोलें कि एलेमेंटरी माई डियर वाट्सन!

वास्तव में हम लोग अपना रोजमर्रा के जीबन में न जाने केतना लोग से मिलते हैं. लेकिन न तो कभी जरूरत हुआ कि उनका नाम पूछें, ना कभी जानने का इच्छा हुआ. एगो ऑफिस में तीन चार साल काम करने के बाद, जब ट्रांसफर हुआ एक आदमी का तो उनके बिदाई में लोग बोला कि आज श्री एस. के. सेनगुप्ता को हमलोग बिदाई दे रहे हैं. और जब ऊ बोले तब पता चला कि उनका नाम स्वपन कुमार सेनगुप्ता था. ऐसहीं केतना आदमी को हमलोग सर्मा जी, चड्ढा जी, सिन्हा जी के नाम से जानते हैं. मगर कभी फर्क देखे हैं उनके ब्यवहार में जब कोई उनको अनिल जी, तिरलोचन जी या दुर्गाशंकर जी के नाम से बुलाता है. एक बार सुरू करके देखिये. मजा आ जाएगा. अंधेरा में भी अगर इस नाम से उनको बुलाया जाए, तो उनके दिमाग में सिर्फ आपका तस्वीर बनेगा, काहे कि ई नाम से तो खाली आप ही बुलाते होंगे उनको.

कलकत्ता में प्रभात दा के घर गए तो उनकी पत्नी सिस्टाचार बस पूछ लीं, “रेणु केमौन (रेणु कैसी है)?” तो एकबारगी हमरा चेहरा खाली हो गया, मगर तुरत हम संभलकर बोले, “ भालो (अच्छी है).” जवाब देने में 15 सेकण्ड का पॉज आने का कारन ई था कि हम अपनी पत्नी को बेबी यानि उनके घर के नाम से बुलाते हैं, सब लोग उनको इसी नाम से बुलाता है. इसलिए रेणु नाम से उनको पहचानने में समय लग गया. हमको बताना पड़ा कि जब भी कोई हमको रेणु के बारे में पूछता है तो लगता है कि किसी अजनबी के बारे में पूछ रहा है.

हमरे शेख पीर साहब, नहीं पहचाने आप लोग, अरे लोग जिनको शेक्सपियेर कहता है, ऊ भले ही बोले हों कि नाम में का रखा है, गुलाब को कोनो नाम से बोलाइए, उसका खुसबू थोड़े न बदल जाएगा. लेकिन ई भी सच है कि कैक्टस नाम से भी गुलाब वाला खुसबू नहीं आ सकता. इस मामला में हम भी गुरू गुलज़ार साहब का बात मानते हैं. सुनिए उनके नाम का कहानी उनका ज़ुबानी अऊर हमरा बात पर अमल सुरू कर दीजिए.एक महीना में आस पास का दुनिया बदल जाएगा आपकेः

नाम सोचा ही न था, है कि नहीं
‘अमाँ’ कहके बुला लिया इक ने
‘ए जी’ कहके बुलाया दूजे ने
‘अबे ओ’ चार लोग कहते हैं
जो भी यूँ जिस किसी के जी आया
उसने वैसे ही बस पुकार लिया,
तुमने इक मोड़ पे अचानक जब
मुझको ‘गुलज़ार’ कहके दी आवाज
एक सीपी से खुल गया मोती
मुझको इक मानी मिल गया जैसे!

48 टिप्‍पणियां:

  1. आप बहुत ही गज़ब बात लिख दिए हैं हम भी इसी टाइप के इंसान हैं हर किसी को उसके नाम से बुलाते हैं और अपना नाम सुन कर हर कोई बहुत ही खुश हो जाता है...नाम से पुकारने पर जो अपना पण झलकता है उसे वो ही महसूस कर सकता है जिसने किसी और के मुंह से अपना नाम सुना हो...
    आपका आब्जर्वेशन कमाल का है...जय हो

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  2. बिलकुल सच कहा ..नाम के साथ संबोधन करने से बहुत प्रभाव पड़ता है.इसलिए अब फोर्मल लैटर्स में भी पहले नाम से संबोधित करने का रिवाज़ चल पड़ा है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. 16 aana sahi baat..aur bahute dhansu observation ek dum byomkes baksi jaisa... :P aur sahi me naam se kehu ke bulawe par alge asar hola..gulzar chacha jaisan log to nazm tak likh jaalen... :-)

    उत्तर देंहटाएं
  4. नाम की तो सही कही आपने....हर किसी को अपने नाम से बहुत प्यार होता है और एक पहचान मिलती है...महानगरों में ये अच्छा लगता है, यहाँ मिस्टर मिसेज़ नहीं..सीधा नाम लेकर ही बुलाते हैं.
    मुझसे ज्यादा और कौन जानेगा...पिछले कई बरसों से "रश्मि रविजा" नाम खो गया था...अब ब्लॉग में वापस आकर मिला है..वरना पत्रिकाओं से ब्लॉग तक के सफ़र के बीच, सरनेम से ही जानी जाती थी.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सलिल भाई!
    कैसन लगा ई संबोधन?
    अगर कहते
    @ सलिल
    तब ... कैसन लगता?
    मज़ा आ गया पढ के। और हमहूं उनको उहे कहते हैं जो आप कहते हैं। और सच मानिए कोई असली नाम लेता है तो बुझैएबे नहीं करता है कि केकरा बारे में पूछा जा रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. तुमने इक मोड़ पे अचानक जब
    मुझको ‘गुलज़ार’ कहके दी आवाज
    एक सीपी से खुल गया मोती
    मुझको इक मानी मिल गया जैसे!

    Wah! Ekhi saans me poora aalekh padh liya! Aapki shaili aisi hai,ki,shuru kar den ekbaar to ruk nahi pate! Sach! Apne jane pahchane naam se hame koyi bula le to bahut achha lagta hai...khaaskar wo log jinhen ham kayi baar tavjjo nahi dete!

    उत्तर देंहटाएं
  7. सलिल भाई सब नाम अच्‍छे होते हैं। और सब नामों के पीछे कुछ न कुछ बात जुड़ी ही होती है। बचपन में अपन मुन्‍ना हुए,फिर राजेश,फिर राजेश पटेल, फिर राजेश उत्‍साही, फिर उत्‍साही, फिर राजेश जी, और यहां तो आपने ही एक नाम दे दिया है बाबा भारती। और भी न जाने कितने लोगों के दिए कितने नाम हैं सबकी याद है।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सारी पुरानी यादें याद आ गयीं। मौका मिलते ही पढवाने की कोशिश करुंगा। :-)

    उत्तर देंहटाएं
  9. "नाम में क्या रखा है " जब भी कोई मेरा नाम गलत लेता है और फिर सोरी बोलता है तो अक्सर यही कह देती हूँ अभी मेरे प्रिविअस ब्लॉग कि ही बात है जहां लोगो ने मुझे सोनल,रौशनी,सोनिया, सीमा,वर्तिका इन सभी नाम से संबोधित किया ! हालाँकि सच कहूँ तो ये मेरे लिए आश्चर्यजनक था कि एक साथ इतने लोग मेरा नाम गलत कैसे ले रहे है लेकिन फिर सभी के सोरी बोलने पर मर दिया "शेख पीर" का डायलोग !
    वैसे ये "15 सेकेण्ड का पोज़" का सामना कई बार करना पढ़ जाता है !

    उत्तर देंहटाएं
  10. मैंने भी देखा है की नाम से कभी किसी को बुलाने पे असर पड़ता है, खासकर तब जब सामने वाला बिलकुल एक्सपेक्ट नहीं करता की कोई उसे नाम से बुलाए...लेकिन अच्छा लगता है,..

    वैसे पटना में ऑटो में बैठ के हम भी कितना बार इंतज़ार किये हैं....बहुत बार इरिटेट भी हो जाते थे :)

    उत्तर देंहटाएं
  11. आहा,
    ऋषिकेष दा की खुशबू आ रही है आपकी पोस्ट से।
    सौ फ़ीसदी सही बात, छोटी मगर सोलिड।
    हर मनुष्य के लिए इस दुनिया में सबसे मधुर शब्द एक ही है, खुद का नाम।
    हमारे बैंक के बगल में एक स्टेशनरी की दुकान थी। ट्रेन लेट होने पर वहीं दुकान में बैठ जाते थे। जो भी बच्चा बच्ची पेन खरीदने आते थे, जब चलाने के लिये कहा जाये तो या तो आड़ी टेढ़ी लाईन खींचते थे या फ़िर अपना नाम।
    ’नमक हराम’ फ़िल्म में राजेश खन्ना के मुंह से यही थ्योरी कहलवाई है।
    मस्त पोस्ट है जनाब।

    उत्तर देंहटाएं
  12. नाम सुन सब प्रसन्न हो जाता है, नाम का महिमा अपरम्पार।

    उत्तर देंहटाएं
  13. @
    मनोज बाबू! एकदम दिल जीत लेने वाला सम्बोधन है. और दुलहिन का नाम बताकर हमको धरमसंकट में डाल दिए आप... एड्भांस लोग नाम लेकर बोलाने लगा है, मगर हम त अभियो पुरनिये हैं.
    @ मो सम कौनः हृषि दा का बात कहकर आप हमको कान को हाथ लगाने पर मजबूर कर दिए हैं. याद है न कि हम आपको मुरारीलाल बोले थे, हृषि दा के आनंद वाला मुरारीलाल!!

    उत्तर देंहटाएं
  14. बिल्कुल सही कहा आपने अपना नाम सुनकर लोगों को वाकई बहुत खुशी होती है। इस बात को नेता लोग बहुत अच्छी तरह से समझते हैं। मैंने कई नेताओं को देखा कि वे बैठक या सभा में आए अधिकतर लोगों का नाम पुकारकर उनका हालचाल ही पूछ लेते हैं। एक बार मैंने एक परिचित हैं उनसे पूछा आप लोग ऐसा क्यों करते हैं तब उन्होंने बताया था नाम की महिमा के बारे में। खैर आप नेता नहीं है आप तो बहुत ही बढिय़ा साहित्यकार हो। अच्छा लगा यह पोस्ट पढ़कर।

    उत्तर देंहटाएं
  15. गजब बात कहे हैं...वैसे यहाँ तो सबको पहले नाम से बुलाना प्रचलन में है. उमर का, पद का कुछ लेना देना नहीं..एक बच्चा भी मुझे समीर कह कर ही संबोधित करेगा.

    मगर बात में दम है...

    गुलज़ार साहेब के रचना बहुत पसंद आई..आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  16. सच है कि अपना नाम सुनकर ख़ुशी होती है ..
    एक ठो सेर लिखे हैं , माफिक बयिठेगा कि नहीं ...राम जाने ...
    ले लिया है बेखुद में खुद अपना ही नाम
    तूने कहीं चुपके से मुझे पुकारा है ...

    लिखने का भोजपुरी इस्टाईल बढ़िया है ...!

    उत्तर देंहटाएं
  17. सच्चे कहते हैं। आब त जब ई कहते हैं कि सुनई छियई, अहीं के कहई छी, त बचबो सब पहले त हंसता था, आब त खिसिया के कहता है कि आप नहीं सुधरिएगा ... बुढवा तोता कहीं पोस मानता है ....

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत सार्थक बात कही है ....नाम के बिना कहाँ कोई पहचान होती है ...नाम ले कर बुलाने वाले में अपनेपन की झलक मिलती है ..और गुलजार साहब की यह पंक्तियाँ तो मन को छू गयीं
    तुमने इक मोड़ पे अचानक जब
    मुझको ‘गुलज़ार’ कहके दी आवाज
    एक सीपी से खुल गया मोती
    मुझको इक मानी मिल गया जैसे

    उत्तर देंहटाएं
  19. बहुत बढ़िया आलेख |नाम लेकर पुकारना या बुलाना अपनत्व का और अपने वजूद का अहसास दिलाता है |इसीलिए तो आजकल पत्निय अपने पति को नाम से ही बुलाती है |एजी,ओजी ,सुनिए जी ,पप्पू के पापा ,मुन्ना के बाउजीसब इतिहास की बात हो गई है |

    उत्तर देंहटाएं
  20. wah bahijee....katthya me jiwantata dene ka hoonar
    koi aap se sikhe......

    juwan pe barbas muskan aur dil me gudguddi paida ho jati hai.....

    pranm.

    उत्तर देंहटाएं
  21. बहुतै पता कै बात आप कहनी. आपन नाम में जवन खूशबू उ अउर कहवा......

    उत्तर देंहटाएं
  22. ...सलिल वर्मा जी को मेरा प्रणाम।
    कल से पूरा प्रयास करूंगा कि सभी को नाम से बुलाऊँ...मित्र कल्लू को भी,पान वाले को भी जिसे मैं ड्राइवर कहता हूं..चपनू को भी जिसके साथ मैं शतरंज खेलता हूँ...
    ..भाव विभोर कर दिया आपकी इस पोस्ट ने। एक बार शरद जोशी का बिहारी लेख पढ़ रहा था जिसमें बिहार में अंग्रेजी भाषा के हिंदी प्रयोग का खूबसूरत वर्णन है। मैं चाहता हूँ कि आप एक पोस्ट इस विषय में भी लिखें कि बिहार में अंग्रेजी का प्रयोग आम जनता किस तरह करती है।

    उत्तर देंहटाएं
  23. @ देवेंद्र जीः आप जब बेचैनआत्मा के नाम से जाने जाते थे तब भी हम आपको देवेंदर जी कहा करते थे..अब आप देवेंद्र पाण्डेय हो गए हैं तब भी हमारे लिए आदरणीय देवेंद्र जी ही हैं.
    आपका अनुरोध हमरे लिए आदेस हैं... समेटते हैं सब्द अऊर लिखते हैं.. दुबई के अंगरेजी अख़बार में लिखे थे इसके बारे में. अब आपके लिए!! वादा रहा!

    उत्तर देंहटाएं
  24. सलिल वर्मा जी...........
    आज शब्द खत्म हो गए......
    जो भी लिखा मौलिक लिखा और आपके लेखन से उस आंचलिक बोली को स्पर्श कर गए जहाँ तक सोचते थे.

    प्रणाम.

    उत्तर देंहटाएं
  25. गजब पोस्ट .... सलिल भाई ! सोच नहीं पा रहा हूँ और क्या लिखा जाए !

    उत्तर देंहटाएं
  26. aas pas hoti ghatnao se manaviya samvedana ki lahar koi kaise gin leta hai, ye aap jaise hi log kar sakte hai, sachmuch behad khubsurat! mast! man ko chu lenewali aapki rachna ! Is vakt koi sabd nahi hai vyakt karne ke liye. Ye to nischit hai ki aapki indriyan bahute hi patli (samvedansil) hai.

    vinod

    उत्तर देंहटाएं
  27. वाकई , नाम से पुकारने पर आत्मीयता महसूस होती है ।

    उत्तर देंहटाएं
  28. भाई सलिल, नाम के चक्कर का एक वाकया सुनाएँ...मेरा भतीजा एक दिन अचानक गुजरात से मिलने डिपार्टमेंट आ पहुंचा. गेट के बाहर किसी स्टुडेंट से डा.सुशील कुमार त्यागी के बारे में पूछने लगा. वह बोला हमारे यहाँ तो इस नाम के कोई टीचर नहीं हैं. फिर कुछ सोच कर जवाब दिया, 'अरे हाँ, एक डा. त्यागी तो जरूर हैं'. संयोग से यह वार्तालाप बाहर खड़े मेरी पीठ के पीछे ही हो रहा था, सो मैंने सुन लिया और इस तरह उसकी उलझन दूर हो गयी. सदा की तरह बढ़िया आलेख!!

    उत्तर देंहटाएं
  29. @त्यागी सरः चलिए एही बहाने आपका SKT का पहेली समाप्त हुआ.. आज से आप हमारे लिए सुशील सर हुए!

    उत्तर देंहटाएं
  30. आपकी बात बिलकुल सही है नाम के बिना किसी व्यक्तित्व की क्या पहचान ......जब कोई नाम से बुलाता है तो वो औपचारिकताओं से परे लगता है ....समीर साहब सही कहते है यहाँ तो बस हर कोई नाम से ही पुकारा जाता है बड़ा हो या छोटा ....गुलज़ार साहब की पंक्तियाँ दिल को छूने वाली है
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  31. और हाँ एक बात और बतानी थी समय निकल कर इस ब्लॉग पर भी ज़रूर पधारियेगा आपके लिए तो सरप्राइज़ ही है लेकिन इस बात का विश्वास दिलाती हूँ आपका मन प्रसन्न हो जाएगा .
    आपको सपरिवार नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  32. तुमने इक मोड़ पे अचानक जब
    मुझको ‘गुलज़ार’ कहके दी आवाज
    एक सीपी से खुल गया मोती
    मुझको इक मानी मिल गया जैसे...

    गजब कविता लिखते हैं आप तो ।

    .

    उत्तर देंहटाएं
  33. bahut khoob
    aapki ghatit in dono ghatnaon se hame bhi kuchh naya seekhne ko mila.
    aur ha! aapki kavita to badi hi jabardast hai .kisi ne sach kaha hai ki naam me kya rakkha hai?
    post padh kar bahut hi achha laga.aabhar----
    poonam

    उत्तर देंहटाएं
  34. @ दिव्या एवम् पूनम बहनद्वयः
    .
    क्षमा चाहूँगा... यह कविता मेरे गुरु गुलज़ार साहब की है!!
    .
    सलिल

    उत्तर देंहटाएं
  35. सलिल भाई साहब हमने आपकी बात गाँठ बाँध ली है. और गुलजार जी की २-४ लाइन लिख कर जो सपष्टता दी वो भी पल्ले पड़ गयी.

    लेकिन आप तो अपनी ही पत्नी का असली नाम भूल गए? ई का होई गवा ?
    :)

    उत्तर देंहटाएं
  36. इस यंत्रवत चल रही आपाधापी भरी जिंदगी में अगर कोई नाम से बुला लेता है तो ऐसा लगता है जैसे मेले में खोए हुए बच्चे के कंधे पर हाथ रखकर किसी ने कहा हो -- गुड्डू, चलो घर चलें.
    अपनत्व की ललक सबमें होती है. अपने नाम से अधिक सगी चीज और क्या हो सकती है.
    दिल garden-garden हो गया.

    उत्तर देंहटाएं
  37. सलिल जी हमारी कोलोनी में तीन सुरक्षा गार्ड हैं.. और कोई ढाई सौ मकान.. लेकिन उन गार्डों को कोई नाम से नहीं पुकारता. मैंने अपनी पहली मुलाकात में उनसे पहले नाम पूछे.. और वे इतने आत्मीय हो गए हैं की ड्यूटी बदल के मेरे घर आते हैं.. बाहर नलके पर हाथ पाँव धोते हैं.. मैं रहा तो उनकी चाय भी हो जाती है.. एक दिन मैं शहर से बाहर था.. बेटे की बस नहीं आयी.. पत्नी को दुसरे बेटे को स्कूल छोड़ना था.. वो गार्ड बेटे को अपनी साइकिल पर बिठा के स्कूल छोड़ आया.. मुझे लगता है नाम से आत्मीय कोई और चीज़ नहीं.. जब हम किसी से नाम लेके बुलाते हैं तो एक अलग सा सम्बन्ध बन जाता है.. मुझे तो पोस्ट मार्मिक लगी..

    उत्तर देंहटाएं
  38. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    साहित्यकार-6
    सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

    उत्तर देंहटाएं
  39. बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

    उत्तर देंहटाएं
  40. नाम में क्या रक्खा है ... आज समझ आया बहुत कुछ रक्खा है .... इस नाम की बदौलत बहुत बड़े से बड़े काम बन जाते हैं .... वैसे भी किसी से आत्मीयता से बात करने पर हम छोटे नही हो जाते ....

    उत्तर देंहटाएं
  41. नाम लेकर पुकारने पर निश्चित रूप से आत्मीयता बढ़ती है । कई बार एक ही जगह पर एक ही नाम के दो व्यक्ति हों...तब बड़ी कन्फ्यूजन हो जाता है । एक बार, मेरे कॉलेज़ के पुरस्कार वितरण समारोह में ऐसा हुआ कि मेरे नाम के ही दूसरे छात्र को मेरे साथ-साथ पुरस्कार दिया जाना था ...लेकिन हड़बड़ी में हम तब उठ खड़े हुए जब दूसरे साथ को पुकारा गया था ...तब कुछ क्षण के लिए हमारी क्या हालत हुई थी ... वह हम ही जानते हैं ।

    सुंदर रहा आपका यह दृष्टिकोण !!!

    उत्तर देंहटाएं
  42. भूल सुधार ...कृपया तीसरी पंक्ति में कनफ्यूजन हो जाती है पढ़ें। नीचे से तीसरी पंक्ति में दूसरे साथी को पुकारा गया था पढ़ें ।

    उत्तर देंहटाएं
  43. बहुत बढ़िया और बिल्कुल सही कहा है आपने! उम्दा प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  44. सलिल साहब,
    क्या पदवी दे दी हमें फ़िर से - मुरारी लाल?
    मजा आ गया। आज हम भी आपको आपके नाम से संबोधित करके कमेंटियावन सुख ले रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  45. हमारा यही कॉलेज में ही एगो दोस्त है , गोरखपुरिया , हम सभी उसे बाबा या दद्दू कह कर ही बुलाते हैं , एक दिन क्लास में मास-साब ने हमसे अचानक पूछ लिया कि प्रशांत (जी , ये शायद उसका असली नाम है) क्यूँ नहीं आया , हम बुत बने खड़े , अपने दिमाग पर जोर दाल रहे कि आखिर ये प्रशांत है कौन ?? :)

    सादर

    उत्तर देंहटाएं