सोमवार, 7 मार्च 2011

आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री - एक गुमनाम कवि


बंगाल में एगो अजीब रिवाज है. मगर रिवाज सवाल  उठाने के लिये होता नहीं है, बस पालन करने के लिये होता है. नहीं पालन करना है तो मत करे कोई, मगर सवाल उठाने से जवाब मिलने का उम्मीद बहुत मोस्किल है. काहे कि रिवाज एतना पुराना होता है कि जवाब के लिये का मालूम केतना पीढ़ी पीछे जाना पड़े. खैर, हम कह रहे थे कि बंगाल में एगो अजीब रिवाज है. दसहरा के समय दुर्गा जी का मूर्ति बनाने के लिये बेस्या के घर का मट्टी इस्तेमाल करना पड़ता है. अब इसके पीछे का मत  भगवान जाने. कुछ लोग का कहना है कि बेस्या के पास जाने के पहले हर आदमी अपना सराफत अऊर अच्छाई बाहर छोड़ देता है. इसलिये समाज का हर हिस्सा का अच्छाई मट्टी में पाया जाता है.
खैर जो भी हो मगर बिहार के मुजफ्फरपुर नामक सहर में बात साच्छात देखाई देता है. मुजफ्फरपुर का लाल बत्ती छेत्र, चतुर्भुज अस्थान कहलाता है. एही मोहल्ला में 95 बर्सीय एगो महान कबि रहते हैं, आचार्य जानकी बल्लभ सास्त्री. अब बिहार का नाम सुनकर सबके दिमाग में दिनकर, रेणु, नागार्जुन आदि का नाम आता है. मगर सायदे कोई होगा जिसको सास्त्री जी का नाम याद हो. कम से कम बिहार का नाम से इनका नाम जोड़ना बहुत दूर का बात बुझाता है.
हमरा इनसे पहिला परिचय अपना आठवाँ क्लास का हिंदी पद्य संग्रह से हुआ. सास्त्री जी का एगो कबिता हम लोग का कोर्स में था मेघगीत. जानकी बल्लभ सास्त्री जी का नाम सुनने से आज भी ओही याद आता है कि प्रस्तुत पंक्तियाँ जानकी बलभ सास्त्री द्वारा रचित मेघगीत कबिता से ली गई हैं. अऊर कुछ  साल बाद पहिला बार उनको अपना कोर्स का किताब से निकलकर आकासबानी पटना में कबिता पाठ करते हुये देखे. बहुत हल्का सा याद है अऊर उनका चेहरा तो तनिको याद नहीं.
अचानक एक रोज देखे कि मनोज कुमार जी अपने ब्लॉग पर सनिबार के दिन फुर्सत में सृन्खला के अंतर्गत सास्त्री जी के बारे में धारावाहिक लिखना सुरू किये. पूरा धाराबाहिक सास्त्री जी से उनके घर पर मुलाकात के आधार पर अऊर उनका साक्छात्कार पर आधारित था. सौ में पाँच कम यानि 95 साल का उमर में जेतना पुराना बात याद करके सास्त्री जी जेतना बात बताए, मनोज जी सब बात को सिलसिला से प्रस्तुत करने का कोसिस किये. उनका जीबन, कबिता, लोग-बाग अऊर सबसे अद्भुत उनका गऊ माता के प्रति प्रेम. सब कुछ आँखों देखा अपने ब्लॉग में प्रस्तुत किये.
देखकर लगा कि गुमनामी में जीबन बिताते हुए सास्त्री जी के जिन्न्गी का बहुत कुछ अनछुआ पहलू था जिससे किसी का कोनो परिचय नहीं हुआ कभी. हमको भी लगा कि जिनका लिखा पढकर हम कबिता को समझने का कोसिस करते थे, उनको देखने समझने का मौका हमको एतना साल बाद दोबारा मिला.
आज वागर्थ पत्रिका के मार्च 2011 के अंक में प्रकासित मनोज जी के ओही आलेख को देखकर लगा कि मनोज जी अपना सहित्त प्रेम अऊर राजभासा के प्रति समर्पन के माध्यम से जानकी बल्लभ सास्त्री जी को उनके अंतिम समय में जो सम्मान दिलाये हैं, सराहनीय है. हमारेप्पस कहने चाहेबतानेके लिये कुछ नहीं है, लेकिन हमको भी लगा कि आज हम उनके बारे में दू सब्द आप लोगों के साथ बाँटेंगे तो हमारे मन को भी संतोस होगा कि एही बहाने हम भी सास्त्री जी का चरन स्पर्स करने का सौभाग्य पा सके.
उनका एगो कबिता का आनंद आप भी लीजियेः

खिंचता जाता तेज, तिमिर तनता, क्या फेरा
अरे, सवेरा भी होगा या सदा अँधेरा ?

रहे अँधेरा, ये समाधियाँ दिख जायेंगी -
घास-पात पर शबनम से कुछ लिख जायेंगी !
कभी पढ़ेंगे लोग-न सब दिन अपढ़ रहेंगे,
सब दिन मूक व्यथा न सहेंगे, कभी कहेंगे -

'अंधकार का तना चंदोवा था जन-भू पर,
दीप उजलते, जलते थे, बस ऊपर-ऊपर ।
जीवित जले हुए कीड़ों की ये समाधियाँ,
दीप जलाना मना, यहाँ उठती न आँधियाँ ।

दीप जलाना अगर रस्म भर, इधर न आना !
दीप दिखाकर अंधकार को क्या चमकाना !!

आचार्य जी, हम आपको बिस्वास दिलाना चाहते हैं कि आज आपके बारे में हमारे मन का बात खाली रस्म अदा करने के लिये दीप जलाने जैसा नहीं है. मनोज जी के बहाने हम भी आपका चरन स्पर्स कर आसीस लेना चाहते हैं!
साक्षात्कार यहाँ देखें:

39 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री जी से हमारा भी परिचय स्कूल से ही हुआ था और हम लोग उन्हें दिनकर के समकक्ष मानते थे.. जो महत्व शाश्त्री जी को मिलना चाहिए था सो मिला नहीं... मनोज जी का साक्षत्कार पढने का अवसर हमें भी मिला था... अब वागर्थ में उसे स्थान मिला है सो वागर्थ भी धन्य हुआ ना कि शास्त्री जी या मनोज जी... सलिल जी एक बढ़िया कविता पढवाने के लिए आपका भी आभार...

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  2. शास्त्री जी के बारे मे पहली बार पढा है आभार आपका,
    शास्त्री जी को नमन

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  3. दीप जलाना अगर रस्म भर, इधर न आना !
    दीप दिखाकर अंधकार को क्या चमकाना !
    शास्त्री जी के बारे मे पहली बार पढा है |
    कमाल की लेखनी है उनकी आपकी लेखनी को नमन और आपका आभार !

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  4. इनके बारे में बिलकुल भी पता नहीं था.....सब लिंक को बुकमार्क कर लिए हैं...आराम से पढेंगे इनके बारे में

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  5. अच्छा वर्णन किया इस महान विभूति का , बहुत बढ़िया लेख ...शुभकामनायें सलिल !

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  6. सलिल जी, शास्त्री के विषय में आपने व मनोज जी ने जो लिखा है वह आपका अपने गुरु के प्रति श्रद्धाभाव तो है ही पर साथ ही पाठकों के लिये एक मूल्यवान उपहार है ।

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  7. जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री जी के बारे में विस्‍तार से मनोज जी के ब्‍लाग पर पढ़ चुके हैं। यह जानकर अच्‍छा लगा कि वागर्थ में भी यह आलेख प्रकाशित हुआ है।

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  8. बड़े भाई!
    शास्त्री जी के प्रति दिया गया यह सम्मान दिल को छू गया।
    एक अनाम सी ज़िन्दगी जी रहे शास्त्री जी पिछले एक महीने से अस्वस्थ हैं और अस्पताल में भर्ती हैं। उन्हें साहित्य जगत में जो स्थान मिलना चाहिए था नहीं मिला। इस संस्मरण, और बातचीत के द्वारा मुझे लगता है अपनी माटी के प्रति मैंने कुछ तो अदा किया। शास्त्री जी प्रति इस व्यवहार के लिए उनके ही शब्द यहां लिखना चाह रहा हूं
    ऊपर-ऊपर पी जाते हैं जो पीने वाले हैं
    कहते ऐसे ही जीते हैं जो जीने वाले हैं।

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  9. दाऊ !

    अपरिचित तो नहीं था शास्त्री जी से पर आप ने तो अभिभूत कर दिया आज…। मनोज जी और करण जी को अशेष धन्यवाद…

    स्कूल के दिनों में एक कविता पढी थी शास्त्री जी की…… कोशिश की है यथासंभव सही लिखने की…

    ===============================================
    सब अपनी-अपनी कहते हैं!

    कोई न किसी की सुनता है,
    नाहक कोई सिर धुनता है,
    दिल बहलाने को चल-फिर कर,

    फिर सब अपने में रहते हैं!

    सबके सिर पर है भार प्रचुर
    सब का हारा बेचारा उर,
    सब ऊपर ही ऊपर हँसते,

    भीतर दुर्भर दुख सहते हैं!

    ध्रुव लक्ष्य किसी को है न मिला,
    सबके पथ में है शिला, शिला,
    ले जाती जिधर बहा धारा,

    सब उसी ओर चुप बहते हैं।

    सब अपनी-अपनी कहते हैं!
    ================================================

    नमन !

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  10. चचा,

    ई आलेख पढ़ कर शास्त्रीजी से चार महीने पहले की आत्मीय भेंट बरबस याद आ गयी। उनका तेजोमय मुखमण्ड्ल, भाव-भंगिमायें, सरोष वाणी और कभी-कभी रह-रह कर निकलने वाला क्षोभ....! श्री शास्त्री दम्पति पिछले एक महीने से बीमार हैं। मुजफ़्फ़रपुर के श्री कृष्ण मेडिकल कालेज अस्पताल में दोनों का उपचार चल रहा है। और किसी समाचार माध्यम में तो इसकी चर्चा नहीं है किन्तु ’दैनिक जागरण’ में संक्षिप्त खबर छपती रहती है।
    मैं हर दिन एक उत्सुकता में दैनिक जागरण का वेब वर्सन खोलकर सीधा मुजफ़्फ़रपुर वाले पेज को देखता रहता हूँ कि आज आचर्यजी का स्वास्थ्य कैसा है.... ! एक दिन एक खबर का हिस्सा पढ़कर ऐसा ही लगा जैसे शास्त्रीजी से फिर हमारी बात ही हो रही हो। खबर थी कि शास्त्रीजी दिन में सो लेते हैं और रात-रात भर जागते रहते हैं। नर्स ने उन्हे सोने के लिये कहा तो कहते हैं, "मैंने रात-रात भर जाग कर कई किताबें लिखी है और तुम मुझे सोने केलिये कह रही हो।"
    यही तो है कवि-सुलभ अक्खड़पन... उनके स्वभाव की विशेषता। अस्पताल में उनके भर्ती होने की खबर से उनके साथ संस्मरण का वो हिस्सा याद आता है,जिसे हमने ’उद्दाम जीजिविसा’ के अन्तर्गत रखा है।

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  11. पहली बार मनोज जी के ब्लॉग पर आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री के बारे में पढ़कर उन्हें थोड़ा जानने का अवसर मिला तो अवाक रह गया था । सोचता रह गया था कि अभी भी धरती में ऐसी महान विभूतियाँ जीवित हैं ! सबसे ज्यादा आकर्षित किया पिता के लिए उनके सम्मान और मूक जानवरों के साथ प्रगाढ़ प्रेम की जीवन शैली ने। प्रेम करता हूँ कहना और जी कर दिखाना दोनो में जमीन आसमान का अंतर है।

    ऐसे लेख को जो सम्मान मिलना चाहिए वह वागर्थ ने दिया। इसके लिए उनके संपादक मंडल बधाई के पात्र हैं। लेकिन श्री शास्त्री जी को जो महत्व आज तक नहीं मिल पाया उसके लिए क्या कहा जाय..? कुछ तो है जो आईना दिखाता है।

    सलिल जी, आपने बेजोड़ कविता पढ़वाई। शास्त्री जी के बारे में थोड़ा पढ़कर उन्हें जानने की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई है। हे ईश्वर! उनका शेष जीवन सुखमय हो ..
    ..आभार।

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  12. मनोज जी की पोस्‍ट पढ़ता रहा हूं, आप और मनोज जी बधाई के पात्र हैं.

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  13. @ अरे, सवेरा भी होगा या सदा अँधेरा?

    आचार्य जी के बारे में पहली बार पढा और जाना। धन्यवाद!

    @ जाने के पहले हर आदमी अपना सराफत अऊर अच्छाई बाहर छोड़ देता है. इसलिये समाज का हर हिस्सा का अच्छाई ऊ मट्टी में पाया जाता है

    एक अमानवीय प्रथा को बढावा देने वाले के पास कौन सी सराफत और अच्छाई होगी जो वह बाहर छोडेगा भला? सच्चाई यही है कि परम्परागत मूर्तिकार ऐसी किसी परम्परा से नहीं बन्धे हैं। दुर्गापूजा उन क्षेत्रों में भी होती है जहाँ यह कुप्रथा नहीं पायी जाती।

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  14. आद . सलिल जी ,
    आपने सच लिखा है, जिस तरह मनोज जी ने अपने ब्लॉग पर आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रस्तुत कर हिंदी ब्लॉग जगत को समृद्ध किया वह उनके साहित्य के प्रति प्रेम और समर्पण की एक मिसाल है!
    यह प्रसन्नता की बात है कि अब वाग्धारा में उस संस्मरण को पढ़ कर न जाने कितने लोग शास्त्री जी की साहित्य साधना से परिचित होंगे !
    एक साहित्यकार का दूसरे साहित्यकार के प्रति इसी विनम्र अनुराग और कर्तव्य बोध ने टूटते समाज को हमेशा अनुप्राणित किया है !

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  15. मनोज जी के ब्लॉग पर जानकी बल्लभ शास्त्री जी के बारे में विस्तार से जानकारी मिली ...उनका यह लेख वागर्थ में आया इसके लिए बधाई के साथ शुभकामनायें ...ऐसी विभूतियों के बारे में जानकार मन तृप्त हो गया ..आभार

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  16. मैने भी मनोज जी के ब्लाग पर ही उनका परिचय प्राप्त किया था। ऐसी विभूतियाँ क्यों गुमनाम रह जाती हैं शायद आज कल साहित्य संसार मे भी कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं जो अच्छी प्रतिभा को आगे नही आने देती। अपना भी मन उनके चरणो की रज लेने का हो रहा है। उनकी रचना पढवाने के लिये आभार। शुभकामनायें।

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  17. Manoj sir ka post hamne bhi padha tha...unhone Shashtri jee ke saath ko chaar shrinkhla me post kiya tha...unka jeevan sach me nirala laga...:)

    aapke blog ke jariye...sahitya ke mahavibhushan ko vandana:)

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  18. सबसे पहले मनोज जी के ही ब्लाग पर जा.व.शास्त्री जी के बारे में जाना अब आपने उनकी एक और कविता से परिचय कराया.इन महँ लोगों का अनुसरण किया जाना चाहिए.

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  19. खिंचता जाता तेज, तिमिर तनता, क्या फेरा
    अरे, सवेरा भी होगा या सदा अँधेरा ?

    sawera bhi hoga aur andhera bhi chatega........

    bahut...bahut achha laga ye lekh

    pranam.

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  20. सच कहूं तो "शास्त्री जी" के बारे अब जाकर ही पता चला,और जानने की जिज्ञासा प्रबल हो गयी है।

    धन्यवाद सलिल भाई और मनोज जी!

    -चैतन्य

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  21. पहले मनोज जी के ब्लॉग पर विस्तार से शास्त्री जी के बारे में पढ़ा...और अब आपने उसी कड़ी को आगे बढ़ाया है.
    साहित्य के सच्चे आसक्त उन्हें कभी नहीं भूलेंगे.
    उनकी इतनी बढ़िया कविता पढवाने का शुक्रिया

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  22. आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री जी से परिचय करवाने के लिए आभार. उनकी कविता अच्छी है, साक्षात्कार अभी नहीं पढ़े.

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  23. शास्त्रीजी के बारे में सारे पोस्ट पढ़े, आनन्द आ गया।

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  24. शास्त्री जी के बारे में पहली बार जाना और उनके लेखन के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई। प्रस्तुत कविता से शास्त्री जी के लेखन की बानगी पता चलती है। सलिल भैया, आपके आभारी हैं ।

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  25. सद्कार्यों का सुफल मिलते देखना एक सुखद अनुभव है।

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  26. आचार्य जी के बारे में जानकार बहुत अच्छा लगा अब पढते हैं.

    रामराम.

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  27. आचार्य जी के बारे में पहले से जानता रहा हूँ, उनकी कविताओं के सम्मोहन में रहा हूँ।
    आपने फिर से इस व्यक्तिव्य से यहाँ मिलवाया, इसके लिए बहुत आभारी हूँ, और जानने मनोज जी के यहाँ जाता हूँ।

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  28. धर्मवीर भारती के समय के धर्मयुग, मनोहर श्याम जोशी के समय के साप्ताहिक हिंदुस्तान और नारायण दत्त के समय के नवनीत में आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी के बारे में काफी कुछ पढ़ने को मिलता रहता था।
    मनोज जी और आपने शास्त्री जी की चर्चा कर ब्लॉग जगत की गरिमा में वृद्धि की है।
    समाचार पत्रों में पढ़ था कि इस वर्ष प्रदान किए जाने वाले पद्श्री पुरस्कार को लेने से उन्होंने इंकार कर दिया है।

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  29. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए तथा पत्येक भारतीय लेखको को एक मंच पर लाने के लिए " भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" का गठन किया गया है. आपसे अनुरोध है कि इस मंच का followers बन हमारा उत्साहवर्धन करें , साथ ही इस मंच के लेखक बन कर हिंदी लेखन को नई दिशा दे. हम आपका इंतजार करेंगे.
    हरीश सिंह.... संस्थापक/संयोजक "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच"
    हमारा लिंक----- www.upkhabar.in/

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  30. हम भी दसमा में इनका कबिता पढ़े थे बिहार बोर्ड में.....आपसे पता चला आप उनको जानते भी हैं... अजीब सी कहानी भी पता चला उनके बारे में...
    ऐसा बात बताने के लिए बहुत धन्यबाद...

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  31. अंधकार का तना चंदोवा था जन-भू पर,
    दीप उजलते, जलते थे, बस ऊपर-ऊपर ।
    जीवित जले हुए कीड़ों की ये समाधियाँ,
    दीप जलाना मना, यहाँ उठती न आँधियाँ ।
    wakai kavita bahut badhiya hai saath hi jeevan parichya bhi achchha laga .

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  32. मनोज जी यह साक्ष्ताकार करके सारस्वत सम्मान के अधिकारी हो गए ..वागर्थ में भी छपे क्या कहने ! मेरी बधायी !

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  33. शास्त्री जी के बारे में जानकार प्रसन्ता हुई... उनके बारे में पहली बार पढ़ा है... आपका आलेख पढ़ कर उन्हें पढने कि इच्छा प्रबल हो उठी है... आपने लिंक भी उपलब्द्ध कराये उसके लिए धन्यवाद....

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  34. मैं ज़रूरी काम में व्यस्त थी इसलिए पिछले कुछ महीनों से ब्लॉग पर नियमित रूप से नहीं आ सकी!
    बहुत बढ़िया लगा! अच्छी जानकारी मिली! उम्दा पोस्ट!

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  35. आचार्य जी के श्री चरणों में सादर नमन के साथ उनके निवास स्थान के बारे में जो उत्सुकता आपने उत्पन्न कर दी है उसके बारे में निवेदन करना चाहूंगा कि वारांगना हाउस एक तरीके से चिकित्सा केंद्र है जो सामाजिक, पारिवारिक .....मानसिक आदि विकृतियों से ग्रस्त लोगों के विकारों को डस्ट-बिन की तरह अपने पास रख लेता है और शेष समाज को विकृत होने से बचाता है ......मैं इसे उनका बहुत बड़ा उपकार मानता हूँ सभ्य समाज के ऊपर....उनका यह त्याग या उपकार जो भी कहिये सभ्य समाज पर एक ऋण की तरह है .......शायद इसी ऋण को चुकाने के लिए उनके दुआर की मिट्टी का प्रयोग दुर्गा जी की मूर्ति के लिए किया जाता है.......यूं भी सभी भूतों में विभिन्न रूपों में वास करने वाली शक्तियों में दुर्गा का ही रूप है. इसीलिये वारांगनाएं मेरे लिए घृणा की जगह आदर की पात्र रही हैं......मेरे मन में उनके इस अप्रतिम त्याग के लिए श्रृद्धा का भाव है.

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  36. सच कहे भाई जी....इतने महान कलमकार प्रसिद्धि के उस शिखर पर विराजित नहीं हैं जो की इन्हें होना चाहिए...
    मनोज भैया के हम रिनी हैं कि इतना सब जान्ने को मिला उनके कारण...

    यह कविता पहली बार ही पढने का सौभाग्य मिला....
    आपके आभारी हैं....बाकी कविता पर क्या कहें...

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  37. shastrijee ko jo sammaan aap diye wah bahut achcha laga aur unki kavita padhwa diye yah hamare liye bhi bahut achcha hua.

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  38. बहुत सुन्दर रचना है .
    शास्त्री जी को सादर चरण स्पर्श |

    सादर

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