रविवार, 13 मार्च 2011

दूसरी माँ

आकासबानी पटना से बच्चा लोग का तीन ठो प्रोग्राम प्रसारित होता था. देहाती बच्चों के लिये घरौंदा (सुक्रवार साम), बहुत छोटा बच्चा लोग के लिये सिसु महल (बुधवार साम) अऊर बड़ा बच्चा लोग के लिये बालमण्डली (एतवार दोपहर). घरौंदा में दीदी भैया होते थे सीला डायसन (बाद में सीला शुक्ला) और भगवान साहू (कमलेश्वर के उपन्यास डाकबंगला पर बनी फिल्म में सिमी के साथ सहकलाकार थे), शिशु महल में खाली दीदी होती थीं, कुमुद सर्मा (साहित्यकार नलिन विलोचन शर्मा की पत्नी) और बालमण्डली में इला चतुर्वेदी और कुमार चंद्र गौड़. अब जईसे बॉलीवुड में आर्ट फिलिम, मेनस्ट्रीम फिलिम अऊर प्रादेसिक फिलिम का अलग अलग अस्थान है अऊर इनका हीरो हीरोईन भी अलग अलग हैं, वईसहीं इन तीनों प्रोग्राम का हीरो भी अलग अलग होता था. और कोई भी हीरो (बाल कलाकार) अपना प्रोग्राम छोड़कर दोसरा प्रोग्राम में भाग नहीं लेता था. घरौंदा में हम, सिसु महल में राजू (राजकुमार मेहरोत्रा) अऊर बालमण्डली में नंदन अऊर बमबम (दयाशंकर तिवारी).

एक रोज़ हम सब बच्चा लोग के साथ रिहर्सल के लिये स्टूडियो में इंतजार कर रहे थे. सीला दी रिहर्सल करवाती थीं, लेकिन ऊ कहीं दोसरा काम में बिजी थीं. इसलिये हमलोग आपस में रिहर्सल करने लगे. थोड़ा देर बाद सीला दी आईं अऊर सबको रिहर्सल करने के लिये बोलकर हमको अपने साथ ले गईं. ऊ कोई नाटक का रिकॉर्डिंग में ब्यस्त थीं.

हमको बोलीं, “तुमको बस एक काम करना है.”

हम डरकर बोले, “दीदी हमसे नाटक नहीं होगा. कभी किये भी नहीं हैं.”

ऊ बोलीं, “कोई डायलॉग नहीं बोलना है तुमको. बस इशारा करते ही रोना है जोर जोर से. और इशारा करते ही चुप हो जाना है.”

रिकॉर्डिंग सुरू हुआ अऊर हमको जईसे इसारा मिला हम खूब जोर जोर से रोना सुरू कर दिये. मगर तमासा तब हुआ जब इसारा करने के बाद भी रोलाई नहीं रुका हमारा. दूनो आँख से आँसू टप टप गिर रहा था अऊर रोलाई रुकने का नाम नहीं ले रहा था. रीकॉर्डिंग रोक दिया गया अऊर सीला दी हमको बाहर ले गईं. बाद में सब लोग हमको बधाई दिया. मगर हमको समझे में नहीं आ रहा था कि हम अईसा का कमाल कर दिये थे कि हमको लोग एतना साबासी दे रहा था. हमको साबासीदेने वाला में हमरी पुस्पा दी (पुष्पा अर्याणि) भी थीं.

इस दिन के बाद गजब परिबर्तन हुआ. पुस्पा दी हमको ड्रामा के लिये अप्रूभ कर दीं अऊर हम पर्मोसन पाकर बालमण्डली में सामिल हो गये. इसके बाद हम बच्चा से किसोर अऊर किसोर से जवान हुए. पुस्पा दी के साथ रहकर बहुत कुछ सीखने को मिला. ब्रॉडकास्टिंग का हर छोटा बड़ा डिटेल, आवाज का थ्रो, स्क्रिप्ट लिखना, डबिंग सबकुछ. कहती थीं कि तुम्हारे बिना तो हम एकदम अपाहिज हो जाते हैं. पैतालीस साल के उमर में, लम्बा अनुभव के बाद कोई 15 साल के बच्चा के लिये ऐसा कहे तो बिस्वास नहीं होता है.

हम आज भी मानते हैं कि हमारे अंदर जो भी कलाकार वाला गुन देखाई देता है ऊ सब उनका दिया हुआ है. हमरे अंदर के कलाकार को ऊ जनम दी हैं, हमरी दूसरी माँ! जब कोई नाटक का स्किप्ट उनको मिलता, तो घण्टा भर हमसे बहस करती थीं कि कौन सा चरित्र के लिये किसको लिया जाना चाहिये. कहाँ मनोरमा बावा को लेना है अऊर कहाँ सत्या सहगल को, किसके लिये सतीश आनंद ठीक रहेंगे और किसके लिये अखिलेश या प्यारे मोहन. अऊर खाली बहस नहीं, अगर हम जिद पर अड़ गए कि इस कैरेक्टर में यही ठीक रहेंगे तो हमारा बात कभी टालती भी नहीं थीं. 15 साल और 45 साल का अंतर बुझाएबे नहीं करता था. ऊ खुद भी बहुत अच्छा कलाकार थीं. देहातीप्रोग्राम चौपाल में गौरी बहिन के रूप में भाग लेती थीं.बहुत सा नाटक में भी ऊ काम की थीं, रेडियो अऊर मंच पर. लेकिन बाद में छोड़ दीं. केतना बार हम भी जिद किए, मगर नहीं मानीं.

बाद में हमारा नौकरी हुआ और हम बाहर चले गये पटना से, तइयो हमारा सम्बंध बना रहा, बल्कि घरेलू हो गया. कलकत्ता से आते तो जरूर मिलने जाते थे उनके घर. अपना नाती पोता नातिन के बारे में बतातीं. एकदिन अचानक टीवी पर समाचार आया कि पुस्पा दी का देहांत हो गया. हम उस समय पटना में थे. हमको बहुत सदमा हुआ. लेकिन हम उनका अंतिम दर्सन करने के लिये नहीं गए. हमको लोग बहुत सा बात सुनाया, मगर आज तक उनके देहांत के बाद हम उनके घर नहीं गए. हमरे लिए ऊ अभी तक जिंदा हैं, राजेंद्र नगर पटना के रोड नम्बर चार वाला मकान में.

46 टिप्‍पणियां:

  1. सलिल भैया,
    आपके प्रोफ़ाईल में दूसरी माँ के रूप में ’पुष्पा अर्याणि’ जी का नाम पढ़ रखा था लेकिन विस्तृत परिचय आज पाया। हालाँकि यकीन है ये पूरा परिचय नहीं, ऐसे इंसान का पूरा परिचय देने के लिये कितना भी लिखा जाये, परिचय अधूरा ही रहेगा। वय में इतना अंतर होने के बावजूद जो पहचान आपको पुष्पा माँ ने दी, ये उनका बड़प्पन दिखाता है। सही कहा आपने, ’ऊ अभी तक जिंदा हैं।’ वे जहाँ भी हैं, हमारा प्रणाम भी उन तक पहुँचे।

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  2. सलिल भाई... उम्र का अन्तर कभी रिश्ते में मायने नहीं रखता...कौन कब हमारे लिए माँ-पिता,भाई-बहन की जगह ले लेगा हमें नहीं मालूम बस........जब भाव आ गया सो आ गया--उमर भर के लिए.....अऊर ये जो हमरा और आपका रिस्ता बना कौनू बुझाया का??अऊर र्क बात तो रहई गया-- हाँ-- हमरा कहा तो आप भी टाल नहीं सकते.......

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  3. उपर वाली बात आपके लिए थी और ये माँ के लिए---सादर चरणस्पर्श...

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  4. ''अपना नाती पोता नातिन के बारे में बतातीं. एकदिन अचानक टीवी पर समाचार आया कि पुस्पा दी का देहांत हो गया... मगर आज तक उनके देहांत के बाद हम उनके घर नहीं गए''.
    मुझे ऐसा लगा कि आप अपनी भावुकता से पाठक को भावुक कर, उसका समर्थन ले लेना चाह रहे हैं.
    उपर की दोनों बातों को मिला कर देखिए, जो आपको अपने नाती, पोता, नातिन के बारे में बताया करती थीं और उनके देहांत के बाद आप उनके घर नहीं गए, अजीब नहीं लगता. जो आपके मन में जिन्‍दा हैं, जाकर देखिए वे अपने घर में और अधिक,अपने नाती, पोता, नातिन में उससे भी अधिक जिंदा है.
    आप आज ही उनके घर जाएं और उनके घर न जाने के अपराध-बोध से मुक्‍त हों.
    उनके घर जाने का निर्णय लें, हो कर आएं तो मेरे अनुरोध पर यह टिप्‍पणी कचरे में.

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  5. दाऊ !

    जो स्नेह मन से जुड़ जाता है त फिर ऊ भौतिकता से ऊपर हो जाता है…… लोग सशरीर रहे चाहे न रहे, स्नेह का बंधन नहीं टूटता है। परिचय में जब इ नाम पढे थे उत्सुकता तभी से था जानने का…… आज आप मन भिगा दिये उनके बारे में बता के…!

    निदा साहब का एक नज़्म पढे थे कभी……

    "तुम्हारी कब्र पर मैं
    फ़ातिहा पढने नहीं आया
    मुझे मालूम है तुम
    मर नहीं सकते…
    तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
    जिसने उड़ाई थी
    वो झूठा था… वो तुम कब थे!

    ……………………………………
    …………………………………
    तुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में
    साँस लेते है…"

    नमन पुष्पा माँ को और उनके इस बेटे को !

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  6. अचानक बिछड़ जाना कई बार इसी प्रकार स्तब्ध कर देता है ...
    उस विशिष्ट व्यक्तित्व को नमन !

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  7. आपकी जन्मजात प्रतिभा से परिचय हुआ, साथ ही उसे पल्लवित करने वाली माँ का भी पूर्ण परिचय मिला। उनके ममतामय गुणों को प्रणाम!!

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  8. लोग पहुँच से दूर चले जाते हैं, स्मृतियाँ रह जाती हैं। राहुल जी की बात भी विचारणीय है।

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  9. आदरणीय सलिल जी,
    कुछ लोग हमारे जीवन पर ऐसा असर डाल जाते हैं
    कि ताउम्र उनकी खुशबू हमारे साथ साथ चलती है.
    आपकी दूसरी माँ को नमन.
    मार्च में थोड़ा बैंक में व्यस्तता बढ़ गयी है.लेकिन आप की सभी पोस्ट पढता जरूर हूँ.
    मुझे पता है कि आप भी मुझे लगातार आशीष देते रहते हैं.
    तहे दिल से शुक्रिया.
    सलाम.

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  10. बहुत अच्छा भी लगा पढकर, दुःख भी हुआ अंतिम में,...लेकिन ओवरअल बहुत बहुत अच्छा लगा...

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  11. अच्छा किया नहीं गए ...अपने आपको बहुत बड़ी तकलीफ से बचा लिया ! इस दारुण दर्द को दूर नहीं भगाया जा सकता मगर जानबूझ कर बढाने से रोका तो जा सकता है !
    दिखावटी दुनिया के सामने दर्द दिखाने से बेहतर, अकेले कमरे में इसे महसूस करना है !
    लोगों की क्या बात करें ....
    शुभकामनायें !!

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  12. चले जाने वालों के लिये तो निशब्द हूँ। वो तो शायद मर कर और भी करीब हो जाते हैं हर पल यादों मे उनके ज़िन्दा होने का एहसास होता है मगर कुछ दर्द लिये हुये। भगवान उनकी आत्मा को शान्ति दे। शुभकामनायें।

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  13. मन के किसी कोने में कोई जिंदा रहे इससे बड़ी और क्या बात है ...लोग तो जीते जी मार देते हैं ..भावुक पोस्ट

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  14. यही तो है निस्वार्थ और पवित्र प्रेम जिसने आपको तो खुशबू से सरोबर रखा ही साथ ही हमे भी महका दिया इस प्रेम ने \
    ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे |

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  15. अत्यंत मर्मस्पर्षी आलेख, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  16. सलिल जी काश सभी बच्चे को दूसरी माँ मिले... दूसरी माँ को हमारा नमन... श्रधांजलि...

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  17. aapke bhavnatmak anubhav anmol hain....aapke liye bhi aur pathkon ke liye bhi....

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  18. दिल को छु जाने वाला लम्हा और पोस्ट...हर किसी बहुत साईं माएं होतीं हैं..जो जिन्दगी के शुरुवाती दौर में हमें समय समय पर आगे बढाती हैं...

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  19. ममत्व का रिश्ता सांसों पर नहीं टिका होता, वह तो शाश्वत हो जाता है।
    मार्मिक प्रसंग....

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  20. पहले तो आपकी दूसरी मां को नमन, और विनम्र श्रद्धांजलि।
    अब अप्पन बात ....
    एक दम भूले-बिसरे गीत की तरह सब याद आते गया। चौपाल, बालमण्डली, घरौंदा ... सब। लोहा सिंहो पर कुछ जोड़ देते त सम्पूर्ण हो जाता।
    अब त न ऊ देबी है न ऊ कराह।
    ई सब कार्यक्रम में किताना सीखने बाला बात होता था। वही सब त सीख सीख कर हम बरे हुए बरे भाई।
    आब आज पता चला कि सीखाने बाले में एगो आप भी हुआ करते थे।

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  21. @राहुल सिंह जीः
    मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी मॉडरेशन कभी नहीं रहा.. लिहाज़ा टिप्पणी कचरे में डालने की बात पर मैं आपत्ति दर्ज़ कर रहा हूँ.. आप बड़े हैं इसलिए और कुछ नहीं कहना इस विषय पर..
    दो बातें और स्पष्टीकरण के लिये कहना चाहूँगा.. पहला, न तो इस घटना के लिये मेरे मन में कोई अपराध बोध है, दूसरा ना इस बात के बहाने मैं नकली भावुकता के ज़रिये लोगों का समर्थन जुटाना चाहता हूँ...
    मेरी भावनाओं का उत्तर चुँकि रवि शंकर जी ने लिख दिया, वर्ना मैं भी वही कहता...

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  22. भीगी आँखों में ख़ुशी तैरती है ऐसा पढने पर।
    इस स्नेहिल रिश्ते को, माँ-बेटे को नमन

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  23. सलिल जी आप अक्सर पोस्ट के आखिर में बहुत भावुक कर जाते हो...... नमन हो उस देवी को। ऐसे महान लोगों के स्नेह से जीवन सदैव पल्लवित होता रहता है। मेरे सर पर भी कई ऐसे लोगों का साया है।

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  24. हमको बहुत सदमा हुआ. लेकिन हम उनका अंतिम दर्सन करने के लिये नहीं गए. हमको लोग बहुत सा बात सुनाया, मगर आज तक उनके देहांत के बाद हम उनके घर नहीं गए. हमरे लिए ऊ अभी तक जिंदा हैं, राजेंद्र नगर पटना के रोड नम्बर चार वाला मकान में.

    इस भावना को हम सोलह आना महसूस कर सकते हैं...क्योंकि हमारा भी एही सुभाव है...हमसे भी बर्दास्त नहीं होता मानसिक तौर पर यह स्वीकार लेना..
    मेरा मानना है कि कोई स्थान या व्यक्ति जो दिल से बहुत गहरे जुड़ा हुआ हो जिसके साथ बहुत ही सुखद समय बिताया गया हो,यदि ऐसा परिस्थिति बने कि समय के साथ वह एसेंस वहां न मिलने की सम्भावना हो तो उस मोड़/व्यक्तित्व को स्मृति में वहीँ , वैसे ही सजा सम्हालकर रख छोड़ना चाहिए..उसके ऊपर दुखद कोई पर्त नहीं डालना चाहिए....

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  25. जाने वाले चले जाते अहीं पर उनकी यादें ज़िदा रहती हैं हमेशा हमेशा के लिए .... और उसी जगह पर जहाँ यादें बनती हैं ... अफ़सोस हुवा जान कर उनके बारे में ...

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  26. आद. सलिल जी,
    आपके संस्मरण को अपनी दो पंक्तियाँ समर्पित कर रहा हूँ ,कृपया स्वीकार कर अनुग्रहीत करें !

    संस्मरण दिल छू गया ,द्रवित हुआ मन-प्राण !
    माँ मिल जाती है वहाँ, जहाँ हो माँ का मान !

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  27. bahut achhi post.
    hamare nirman men anek aise prabhav mojood hote hain jinse kabhi urin nahin hua ja sakta.

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  28. सलिल भैया ! हम सोलहों आना आपसे सहमत हैं ......हम होते आपकी जगह तो हम भी नहीं जाते.....लोगों की दृष्टि में यह अव्यावहारिकता हो सकती है .....पर हमारे व्यवहार में तो यही है इसलिए यह हमारी व्यावहारिकता है ......और ....
    यही हाल विदाई के समय का भी है ...लड़की किसी की भी हो विदाई के समय हम वहां नहीं रहते .....अब अपनी शादी में तो भाग नहीं सकते थे ....सो उस समय किसी आड़ में छिपने की कोशिश कर रहे थे ......बाद में डाक्टर ओझा पूछे ..का हो मिसिर जी का हो गइल बा ...अंखिया मं बुझाता कि
    कंजंकटेवाईटिस हो गइल बा.
    बाकी ....आपकी कई खूबियों से धीरे-धीरे परिचित होता जा रहा हूँ .....अब आपको किसी थियेटर में देखने का मन है.

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  29. बहुत मार्मिक हो गया आज तो...बहुत बढ़िया मार्गदर्सन मिला आपको...

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  30. badi bhaiya sachche me aapke har post se ek aisee atmiyata jud jati hai ki kya kahen...! mujhe lagta hai aap apni jindagi me jiske saath bhi kuchh pal rahe, unhe aapne apne dil me jagah di.......sirf Hi-Hello tak nahi simit rahe....ye manavta ki parkastha hai bhaiya........!
    shat shat naman aapko
    aur aapki pushpa maa ko..!

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  31. kya kahoon dadu....m speechless....aise log bohot kam hote hain jo genuinley kisi ka talent pehchaankar mauka dein....pushpa ji ko mera naman.....

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  32. आप खुशकिस्मत हैं कि आपको दो-दो माँओं का प्यार मिला...
    ये सारे कार्यक्रम मैं भी बड़े मन से सुना करती थी.

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  33. सलिल जी , बहुत ही अच्छा व मर्म स्पर्शी संस्मरण . आखिरी पंक्तियों में पुष्पा जी के प्रति आपका विश्वास मन को छू गया..........

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  34. इस बार बहुत देर से आ पाया. द्रवित करने वाली पोस्ट है आपकी.

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  35. आपकी दोनों माओं को नमन ..बहुत खुशकिस्मत हैं आप .

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  36. आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

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  37. सलिल भाई 'आपके पास मां है।' कामना है कि वह हमेशा रहे। और मेरे विचार में मां मां होती है। वह पहली,दूसरी,तीसरी नहीं होती।

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  38. बहुत सुन्दर आलेख! उम्दा प्रस्तुती! ! बधाई!
    आपको एवं आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

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  39. आपको और समस्त परिवार को होली की हार्दिक बधाई और मंगल कामनाएँ ....

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  40. आपके आलेखों के अनुरूप टिप्पणी करना आसान नही है । क्योंकि भावमय शब्दचित्रों में पाठक खोजाता है । हमेशा की तरह अभी दूसरी माँ और मुल्जिम..पढ कर भी ऐसा ही लगा ।

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  41. सलिल सर, जय राम जी की, देर से आने के लिए माफ़ी, बाकि आपकी पोस्ट के साथ साथ राजेश उत्साही जी की टीप से प्रभावित हूँ,

    @सलिल भाई 'आपके पास मां है।' कामना है कि वह हमेशा रहे। और मेरे विचार में मां मां होती है। वह पहली,दूसरी,तीसरी नहीं होती।

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  42. कई बार समझ नहीं आता , बोलें तो क्या बोलें , जाएँ तो कैसे जाएँ :(

    सादर

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