शुक्रवार, 24 जून 2011

जसोदा

रूपा जब बहुत खुस होकर ई खबर अपना घर के लोग को फोन पर सुनाई कि ऊ माँ बनने वाली है, त पूरा घर में खुसी का लहर दौड़ गया. मगर खुसी के साथ साथ घर का बुजुर्ग औरत लोग को चिंता भी घेरे हुए था कि परदेस में रूपा कइसे अपना देखभाल करेगी. परदेस में नौकरी करने के कारन आजकल संजुक्त परिबार मजबूरी में भी टूट कर बिखरता जा रहा है. अब अपना सहर से इतना दूर बिआह कर अपने पति के पास अकेले रहना, रूपा का मजबूरी था. अउर ई हालत में घर छोडकर एतना दिन के लिए कोइ बुजुर्ग औरत उसके साथ रहे, ई घर वाला का मजबूरी.

रूपा के बगल में ज्योति का फ़्लैट था. दूनो के आदमी एक्के जगह काम करते थे. आना जाना भी था. रूपा ज्योति को दीदी बोलती थी. मगर दूनो के उम्र में इतना फरक था कि अगर रूपा उसको आंटी भी बोलती तो कोनो अन्तर नहीं पड़ता. ज्योति को जब पता चला तो अचानक ऊ अचानक दीदी से माँ के अबतार में आ गयी. आधा घंटा लेक्चर ई बात पर कि कइसे रहना है अउर कइसे उठना बैठना, चलना फिरना, घूमना टहलना है. रूपा को जो खाना पसंद होता, ऊ फट से ज्योति के घर तैयार. रूपा के घर का लोग भी निश्चिंत हो गया कि चलो कोइ तो है देखभाल करने वाला.

ज्योति का सोभाव ही अइसा था कि रात-बिरात अगर कोनो जरूरत हो तो ज्योति का घंटी बजा दीजिए. आपको दरवाजा खोलने पर ज्योति हमेसा हंसते हुए मिलेगी. लेकिन रूपा के साथ तो अजीब बात देखाई दे रहा था. सब लो दांग था ज्योति का समर्पण देखकर. कारन एही कि ज्योति को अपने कोनो औलाद नहीं था.

देखते देखते टाइम अइसा पार होने लगा कि कहा नहीं जा सकता. रूपा को हस्पताल लेकर जाना, जांच करवाना, दवाई देना, खाना पीना सबका जिम्मा ज्योति के ऊपर था. अइसा बुझाता था कि रूपा का बच्चा उसी के पेट में पल रहा है. रूपा के लिए ऊ कभी दीदी, कभी माँ, कभी सहेली, कभी नर्स बन जाती. खुद रूपा के नैहर अउर ससुराल से उसकी माँ अउर सास तब पहुंचीं जब उसको लेबर रूम में ले जाया गया.

ज्योति हस्पताल के गलियारा में बेचैनी में टहल रही थी. तब अंदर से नर्स निकलकर बोली कि बधाई हो लक्ष्मी आई है! नोर्मल डेलिवरी था इसलिए रूपा होस में बाहर आई. उसी समय ज्योति हस्पताल का बिल जमा करने के लिए काउंटर पर चली गयी.

नर्स बच्चा को जब उसकी सास के गोद में देने लगी तो उसकी सास बोली, “नहीं! सबसे पहिले बच्चा को ज्योति के गोद में दीजिए. ओही ई बच्चा की असली माँ है!”

रूपा सास को पास बोलाकर धीरे से कान में बोली, “नहीं! सबसे पहिले बाँझ औरत के गोदी में बच्चा मत दीजिए!”

46 टिप्‍पणियां:

  1. इन कुरितिओं नें इन्सान को इन्सान ही नहीं रहने दिया!!
    स्वार्थी रूपा!!

    क्या गुजरी होगी ज्योति पर!! दर्दनाक!! जमीं फट पडे और उसमें समा जाय!! बाँझपन के दुख से नहीं, नेकी के बदले से।

    उत्तर देंहटाएं
  2. उम्मीद थी इसी ट्विस्ट की। यकीन मानियेगा आपकी तरह सस्पेंस वाले नावल का अंत पहले से पढ़े बिना ही अंदाजा था कि आखिर में गुलाटी खिलाकर मानेंगे आप। लेकिन फ़िर भी आप भारी रहे, मुझे यह वाक्य रूपा की माँ या सास से सुनने की और रूपा द्वारा इस बात का विरोध किये जाने की अपेक्षा थी।
    मानव मन की थाह पाना सच में मुश्किल है।
    अरे हाँ, वापिसी पर पुनर्स्वागत:)

    उत्तर देंहटाएं
  3. ऐसी मानसिकता अक्सर देखने मिलती है पर है बहुत ही ओछी व पीडादायक ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. अरे यही तो आज का जमाना है कि मतलब निकल गया तो हो गयी बांझ, बस उम्मीद नवजात की माँ से नहीं थी।

    उत्तर देंहटाएं
  5. यही संसार है ....दुखद और निर्दयी ! शुभकामनायें आपको !!

    उत्तर देंहटाएं
  6. सलिल भाई,
    क्यों दिल दुखाते रहते हो .
    अंत इस तरह भी हो सकता था.

    रूपा की सास बोली" नहीं! सबसे पहिले बाँझ औरत के गोदी में बच्चा मत दीजिए!”
    रूपा बोली " अम्मा जी ,नहीं, पहले बच्ची इन्ही की गोद में दीजिये,यही तो इसकी असली मां है,यही यशोदा है."

    माना कि ज़िन्दगी में यूं हैप्पी ending नहीं होती ,पर कहानी में हो जाए तो क्या हर्ज़ है.

    उत्तर देंहटाएं
  7. @विशाल जी:
    कहानी होती तो लिख देता.. जब विधाता लिख रहा था पट्कथा इस कहानी की तो मैं मूक साक्षी था..अब उसके साथ अपनी बनती नहीं, फिर भी उसकी कहानी में दखलन्दाज़ी मुझे मंज़ूर नहीं!!
    चाह्ता तो लिख सक्ता था कि यह घटना as is where is की स्थिति में लिखी गई है!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. ओह ... कैसी सोच होती है लोगों की ...जब तक अपना स्वार्थ था तब तक सब ठीक ..वैसे भी ऐसी सोच देने वाले भी हमारे बड़े ही होते हैं ..कहीं न कहीं यह बात रूपा ने भी किसी से सुनी होगी ...और फिर कोई भी माँ अपने बच्चे का अनिष्ट नहीं होने देना चाहती ...यह उसकी मानसिकता थी ...

    विचार करने योग्य कहानी .. अब इसे कहानी से ज्यादा घटना ही कहेंगे

    उत्तर देंहटाएं
  9. हमारे विश्वास हमें निष्पक्ष नहीं रहने देते। विश्वास के समक्ष सारी सेवा,निष्ठा,ईमानदारी,ज्ञान सब धरा रह जाता है।
    रूपा सास को पास बोलाकर धीरे से कान में बोली, “नहीं! सबसे पहिले बाँझ औरत के गोदी में बच्चा मत दीजिए!”

    अगर रूपा के ज्ञान ने उसके विश्वास को तोड़ा होता तो वह ऐसा कदापि न करती।

    एक सामाजिक यथार्थपरक जीवंत कहानी।

    शुभकामनाएँ!!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत दिनों बाद आपकी कोई रचना आई है.... एक साधारण कहानी होते होते अंत में यह असाधारण और निःशब्द कर देने वाली कहानी बन गई...अदभुद

    उत्तर देंहटाएं
  11. ये कहानी नहीं है ये तो मैं पोस्ट में संस्मरण के लेबल से ही समझ गया था लेकिन अंत में..क्या कहूँ :(

    उत्तर देंहटाएं
  12. ओह...
    ऐसे अंत की कल्पना मैंने नहीं की थी।
    वाह रे मानव...
    अंतिम वाक्य में कहानी का अंत नहीं हुआ, असली दुखद कहानी तो अब आरंभ हुई, ज्योति की,... कभी खत्म न होने वाली कहानी।

    उत्तर देंहटाएं
  13. kya twist diya hai kahani ko....sadharan se asadharan bana diya aur kitni sehjta se ek sawarth ko prilakshit karte hue superstition ka sateek chitran kiya hai...sach me hi tareef ke layak hai.

    उत्तर देंहटाएं
  14. दुखद लेकिन सत्य है
    ऐसी ही एक महान हस्ती से मेरा भी साक्षातकर हुआ है

    उत्तर देंहटाएं
  15. कोई बात नहीं । जब सास ने मान लिया है तो बहू भी एक दिन मान ही लेगी।

    उत्तर देंहटाएं
  16. सलिल भाई,
    आप का जवाब पढ़ कर दिल बहुत उदास हो गया है.
    अफ़सोस!

    उत्तर देंहटाएं
  17. काम निकल जाने के बाद ....कितने स्वार्थी हो जाते हैं लोग...

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत दिनों बाद आपकी रचना देखने मिली है । आप स्वस्थ रहें , रचनाएं देते रहें और पढ कर उत्साह बढाते भी रहें यही कामना है ।

    उत्तर देंहटाएं
  19. माया महाठगिनी हम जानी ...

    @नहीं! सबसे पहिले बाँझ औरत के गोदी में बच्चा मत दीजिए!
    निर्भय हुए बिना कोई बडा हुआ है कभी?

    @अब उसके साथ अपनी बनती नहीं,
    हाथ मिलाइये (उसके साथ जो बने बिना भी बनाता है)

    उत्तर देंहटाएं
  20. यह स्वार्थीपन इतना ज्यादा है अब ये घटनाएँ चौंकाती नहीं है ...आश्चर्य है की ये लोग शिक्षित भी होते हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  21. आपकी टिप्पणी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
    बहुत दिनों के बाद आपका पोस्ट पढ़ने को मिला ! आज का ज़माना ही कुछ और है ! जब लोगों का कम बन जाता है तो स्वार्थी बन जाते हैं! शुरू से लेकर अंत तक कहानी अद्भुत सुन्दर रहा! बेहतरीन प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  22. आश्चर्य है की ये लोग शिक्षित भी होते हैं|

    उत्तर देंहटाएं
  23. कहानी का अंत हतप्रभ कर देने वाला है...इंसान कितना कृतघ्न होता है...आप चाहें किसी के लिए अपनी जान भी दे दें लेकिन जरूरी नहीं के वो इस बात के लिए आपका एहसान मंद हो...एक ठो मजाकिया शेर सुनिए जो कामो बेश इसी तरह के हालात को बयां कर रहा है :-

    मैं मर गया जिसके लिए ये हाल है उसका
    ईंटें चुरा के ले गया मेरे मज़ार से

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  24. बहुत पीड़ा होती है ऐसी बातों से....यही है हमारा समाज.......

    उत्तर देंहटाएं
  25. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  26. @अंशुमाला जी:

    मैंने आज तक जितनी पोस्त लिखी हैं, उनमें कभी फ़ैसला नहीं सुनाया.. सिर्फ घटना बयान की है. जबकि मैं ख़ुद उस घटना पर कोई न कोई राय अवश्य रखता हूँ. लेकिन ब्लॉग पर लोग ज्ञानी हैं, समझदार हैं और पाठक हैं तो राय उनकी होनी चाहिये. इसलिये प्रश्न छोड़कर कभी टिप्पणियों का भी जवाब नहीं देता हूँ. आज आपकी ईमानदार टिप्पणी ने लिखने को मजबूर कर दिया. आपकी बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ. माएँ ऐसी ही होती हैं. लेकिन एक "नारी" के विषय में आप क्या कहेंगी? अब इसमें उस बेचारी का क्या दोष जो नारी तो है, माँ नहीं!!एक बार माँ को अलग कर नारी के बारे में सोचिएगा!!

    उत्तर देंहटाएं
  27. सलिल जी

    अपनी टिप्पणी हटा ली है क्योकि मैंने उसे सिर्फ आप के पढ़ने के लिए लिखा था और आप को माँ का उस समय की स्थिति के बारे में समझाने के लिए लिखा था और आप ने उसे पढ़ ली किन्तु ब्लॉग जगत में कई ऐसे लोग है जो इन बातो का कुछ का कुछ मतलब निकाल सकते है और गाहे बगाहे मुझे पर टंच भी कस सकते है इन चीजो को लेकर इसलिए हटा लिया |



    मै रूपा को क्या कह सकती हूँ जब मै खुद अपने इतनी करीबी महिला पर उस समय भरोसा करने के लिए तैयार नहीं थी फिर यहाँ तो पराई महिला है | मुझे नहीं लगता है की रूपा स्वार्थी है यदि होती तो कभी खुद के पास तक पुरे गर्भावस्था के दौरान ज्योति को आने नहीं देती क्योकि बाँझ महिलाओ को गर्भवती महिलाओ तक से दूर रखा जाता है चूँकि वो माँ नहीं बन सकती तो वो नजर लगा देंगी

    @ रूपा सास को पास बोलाकर धीरे से कान में बोली, “नहीं! सबसे पहिले बाँझ औरत के गोदी में बच्चा मत दीजिए!”

    जैसा की आप ने खुद लिखा है की पहिले मत दीजिये यानि बाद में इस बात को लेकर कोई बात नहीं होगी | बस फ़िक्र उस समय बच्चे को किसी और ममता की प्यासी की नजर लग जाने का डर भर है या समाज में प्रचलित मान्यता के मन में भरा होना भर है | आगे क्या हुआ ये तो आप ही बता सकते है पर मुझे नहीं लगता है की वो आगे कभी अपने बच्चे को उनसे दूर रख पाई होंगी |

    उत्तर देंहटाएं
  28. ज्योति के सर पर तो जैसे गाज ही गिर गयी होगी ... पता नहीं क्यों आज भी हमारा समाज इन कुरीतियों में फंसा हुवा है ... और हम जितना भी आधुनिक हो जाएँ ... इन बातों से बाहर नहीं आ पाते ..

    उत्तर देंहटाएं
  29. bahut marmik ant hai lekin samaj ki haqeekat yahi hai...badlav aa rahe hai par raftar dheemi hai...lekin ek boodhi mahila ke muh se yah sunana achchha laga ki bachche ki asli maa jyoti hai..

    उत्तर देंहटाएं
  30. Uf! Sochatee hun,ye kewal qissa bhar hee ho.....sach me aisa kaise koyi bol sakta hai.....wo bhee Roopa? Uskee saas boltee to bhee maan lete!Awishwasneey lagta hai,lekin yahee sach bhee hoga!

    उत्तर देंहटाएं
  31. कौन बाँझ? क्या इंसान कभी बदल पायेगा ?

    उत्तर देंहटाएं
  32. ज्योति जैसी दूसरी उर्वर कहाँ मिलेगी? अपने जने को तो पशु भी पाल लेते हैं, वो तो दूसरों को भी अपनों की तरह पालने का माद्दा रखती है!!

    उत्तर देंहटाएं
  33. दुखद लेकिन सत्य है, क्या इंसान कभी बदल पायेगा ?

    उत्तर देंहटाएं
  34. नारी के बाँझपन का दर्द कुछ शब्दों मे ब्याँ करना बहुत मुश्किल है--- कब सुधरेगा ये समाज? बहुत अच्छी लघुकथा। शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  35. ओह! नो!!
    कहानी का अंत विचलित कर देने वाला है।

    उत्तर देंहटाएं
  36. उफ़ ये स्वार्थ और ये कुरीतियाँ.

    उत्तर देंहटाएं
  37. ohh god dadu.....ye aakhiri line par bomb phodne ki buri aadat lag gayi hai aapko.....!!!

    उत्तर देंहटाएं
  38. आप एक और पोस्ट भी अन्धविश्वास के उपर लिख चुके हैं , ये वाली उस से भी बेहतर थी , मेरी नजर में जो कहानी के अंत में हुआ वो महज एक अन्धविश्वास था |
    बस एक निवेदन और है (पहले ही क्षमा मांगते हुए) आपने एक जगह दांग लिखा है दंग की जगह - "सब लोग दांग थे"

    सादर

    उत्तर देंहटाएं