नाम के बारे में त का मालूम केतना लोग केतना तरह का बात कह गया है. मगर हम त एक्के बात जानते हैं कि नाम का असर इतना जबरदस्त होता है कि उसको सुनने के साथ ही दिमाग में फोटो खींच जाता है. हमरे साथ एक बार अइसहीं हुआ कि निम्मो दी (श्रीमती निर्मला कपिला) से मुलाक़ात हुआ, हम उनका पैर छुए अऊर ऊ हमको आसिरबाद भी दीं. पहिला बार मिले थे इसलिए नाम भी बताए,” सलिल!” मगर उनके चेहरा पर कोनो अपनापन नहीं देखाई दिया. बाद में हम सिकायत किये तब ऊ बोलीं कि हम तो चला बिहारी के नाम से जानते थे इसलिए भूल हुआ! अब बताइये नाम धरा का धरा रह गया अऊर पहचान बना बिहारी से!
फ्लैस – बैक
आठ-नौ साल के उम्र में जब आकासबानी पटना से बतौर बाल-कलाकार जुड़े, तब बहुत से कलाकार से परिचय हुआ. हर नाम के साथ पूरा ब्यक्तित्व जुड़ा हुआ. रोमांटिक हीरो प्यारे मोहन, अखिलेस्वर प्रसाद अऊर सतीस आनंद, अभिनेत्री सत्या सहगल अऊर पुष्पा दी, कोमेडी माने सिराज दनापुरी अऊर निर्देसक तथा बहुमुखी प्रतिभा के कलाकार भगवान साहू. ई सब के साथ-साथ एगो नाम जो हमरे दिमाग में बचपन से लेकर आज तक बना हुआ है ऊ नाम है श्री चतुर्भुज. खाली एक सब्द का नाम.
आकासबानी के गलियारा में एगो कमरा के सामने लकड़ी के तख्ती पर सफ़ेद पेंट से लिखा हुआ नाम “चतुर्भुज”. बिहार परदेस, जहाँ नाम से जादा महत्व जाति-सूचक नाम का होता है, ओहाँ खाली एक सब्द का नाम. आकर्षित हो गए हम ई नाम से. एगो मामूली से आदमी, पाँच फीट से बस तनी सा अधिक ऊंचाई, एकदम गोल चेहरा, मोटा फ्रेम का चश्मा, माथा पर बाल कम, मुस्कुराते हुए जब बात करते मुँह के अंदर छोटा-छोटा दाँत का कतार साफ़ देखाई देता था अऊर पान खाए हुए मुँह से उनका मुस्कराहट का रिफ्लेक्सन, उनके आँख में नजर आता था. आप कह सकते हैं कि ऊ पूरा चेहरा से मुस्कुराते थे.
अब सस्पेंस के साथ बात करना हमरा इस्टाइल है. इसलिए आप पूछियेगा कि जब हम ऊपर सब कलाकार का नाम बताए त इनका नाम काहे नहीं बोले. असल में इनका पहचान सबसे अलग है. इनका नाम सुनते ही आज भी बुद्ध, अशोक, मीरजाफर, शकुंतला, रावण, झांसी की रानी, बहादुर साह जफ़र सब याद आ जाते हैं. दरअसल चतुर्भुज जी अकेले अइसे नाटककार थे जो ऐतिहासिक नाटक के लिए जाने जाते थे. आकासबानी पटना, रांची, भागलपुर, दरभंगा कहीं भी अगर कोनो ऐतिहासिक नाटक का बात हो, त समझ जाइए कि बात इन्हीं से सुरू होकर, इन्हीं पर खतम हो जाने वाला है. रेडियो अऊर मंच पर अगर कोई भी इतिहास के पन्ना से निकलकर आपके बीच में चलता अऊर बोलता नजर आ रहा हो, त समझ जाइए कि उसके हाथ में चतुर्भुज जी का स्क्रिप्ट होगा. बिहार में रंगमंच पर अगर कोई ब्यक्ति इतिहास को दोबारा ज़िंदा करने का साहस कर सका है त ऊ केवल अऊर केवल चतुर्भुज जी रहे हैं. सही माने में उनके नहीं रहने पर ही इतिहास, इतिहास हुआ; नहीं तो ऊ इतिहास को कभी बर्तमान से पीछे जाने ही नहीं दिए.
अपने बारे में उनका सोच अऊर नाटक के प्रति लगाव कइसा था इसका अंदाज़ आप उनका कहा हुआ बक्तब्य से लगा सकते हैं:
“मेरी रंगयात्रा वैसी जीवनयात्रा से कुछ अलग है। मैं बचपन से ही रंगमंच से जुड़ा रहा। आज तक जुड़ा हॅूं। मैंने यह अनुभव किया कि मुझे जीवन में जो कुछ भी मिला, वह रंगसेवा की बदौलत। मैं मघ्यम वर्गीय परिवार से आता हॅूं। जीवन में सुख कम देखा, दुख-दारिद्र्य-अभाव अधिक देखा और भोगा। कई तरह की नौकरी की। एक नौकरी से अलग होता, दूसरी का दामन थामता। परिवार को भूखे रहने की भी नौबत आई।इन सब के बीच एक बात जो बराबर बनी रही। एक सूत्र जो बराबर मेरे साथ रहा, वह है नाटक। नाटक की दुनिया अद्भुत है। नाटक ने मुझमें बराबर ऊर्जा दी, बराबर उत्साह दिया। ग़म को भूलने की शक्ति दी.”
स्वयं पाली भाषा में स्नातकोत्तर, नाट्य-शास्त्र में पी.एच-डी. तथा नाट्यशास्त्र के प्राध्यापक तक रहे. बहुत समय तक आकासबानी में रहे, ओहीं से रिटायर हुए. उनके बारे में एगो अऊर बात जो हमरे लिए आदर्स के जैसा रहा ऊ था उनका चरित्र. उनका लम्बाई-चौड़ाई लाल बहादुर शास्त्री जी के जैसा था अऊर चरित्र भी. आकासबानी में रहते हुए उनके साथ के केतना लोग अपने सपूत लोग को ओहीं के नौकरी में एडजस्ट करते चले गए. मगर चतुर्भुज जी कभी इसका सहारा नहीं लिए. उनका सब बच्चा लोग आज भी अपना बदौलत उच्चाधिकारी है.
फ्लैस-बैक समाप्त:
आज चतुर्भुज जी हमारे बीच नहीं हैं, मगर हमरे लिए आज भी लिजेंड से कम नहीं हैं. पारसी थियेटर से लेकर आधुनिक रंगमंच तक, नाटक लिखना, नाटक का निर्देसन करना अऊर अदाकारी करना. जो रोल बिधाता उनके लिए लिखता गया ऊ अदा करते गए. कभी भगवान से कुछ नहीं मांगे, मांगने के लिए कुछ था भी नहीं. जिन्नगी रंगमंच है अऊर हम लोग केवल कलाकार है जो अपना-अपना रोल निभाकर चले जाते हैं – ई बात सबके लिए त सेक्सपियेर का डायलोग होगा, मगर चतुर्भुज जी के लिए हकीकत था. उनका जीवन सचमुच रंगमंच था, जिसपर उनका जीवंत अभिनय देखने का मौक़ा मिलना हमरा सौभाग्य था.
आज पन्द्रह जनवरी को उनका जन्मदिन है!! हैप्पी बर्थ डे, बाबूजी!
पुनश्च:
चतुर्भुज जी के लिखे नाटक, उनका जीवन परिचय और उनके जीवन की झलकियां इस वेबसाईट पर उपलब्ध है – www.chaturbhujdrama.com
