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रविवार, 15 जनवरी 2012

मगध का रंगयात्री


नाम के बारे में त का मालूम केतना लोग केतना तरह का बात कह गया है. मगर हम त एक्के बात जानते हैं कि नाम का असर इतना जबरदस्त होता है कि उसको सुनने के साथ ही दिमाग में फोटो खींच जाता है. हमरे साथ एक बार अइसहीं हुआ कि निम्मो दी (श्रीमती निर्मला कपिला) से मुलाक़ात हुआ, हम उनका पैर छुए अऊर ऊ हमको आसिरबाद भी दीं. पहिला बार मिले थे इसलिए नाम भी बताए,” सलिल!” मगर उनके चेहरा पर कोनो अपनापन नहीं देखाई दिया. बाद में हम सिकायत किये तब ऊ बोलीं कि हम तो चला बिहारी के नाम से जानते थे इसलिए भूल हुआ! अब बताइये नाम धरा का धरा रह गया अऊर पहचान बना बिहारी से!

फ्लैस – बैक
आठ-नौ साल के उम्र में जब आकासबानी पटना से बतौर बाल-कलाकार जुड़े, तब बहुत से कलाकार से परिचय हुआ. हर नाम के साथ पूरा ब्यक्तित्व जुड़ा हुआ. रोमांटिक हीरो प्यारे मोहन, अखिलेस्वर प्रसाद अऊर सतीस आनंद, अभिनेत्री सत्या सहगल अऊर पुष्पा दी, कोमेडी माने सिराज दनापुरी अऊर निर्देसक तथा बहुमुखी प्रतिभा के कलाकार भगवान साहू. ई सब के साथ-साथ एगो नाम जो हमरे दिमाग में बचपन से लेकर आज तक बना हुआ है ऊ नाम है श्री चतुर्भुज. खाली एक सब्द का नाम.

आकासबानी के गलियारा में एगो कमरा के सामने लकड़ी के तख्ती पर सफ़ेद पेंट से लिखा हुआ नाम “चतुर्भुज”. बिहार परदेस, जहाँ नाम से जादा महत्व जाति-सूचक नाम का होता है, ओहाँ खाली एक सब्द का नाम. आकर्षित हो गए हम ई नाम से. एगो मामूली से आदमी, पाँच फीट से बस तनी सा अधिक ऊंचाई, एकदम गोल चेहरा, मोटा फ्रेम का चश्मा, माथा पर बाल कम, मुस्कुराते हुए जब बात करते मुँह के अंदर छोटा-छोटा दाँत का कतार साफ़ देखाई देता था अऊर पान खाए हुए मुँह से उनका मुस्कराहट का रिफ्लेक्सन, उनके आँख में नजर आता था. आप कह सकते हैं कि ऊ पूरा चेहरा से मुस्कुराते थे.

अब सस्पेंस के साथ बात करना हमरा इस्टाइल है. इसलिए आप पूछियेगा कि जब हम ऊपर सब कलाकार का नाम बताए त इनका नाम काहे नहीं बोले. असल में इनका पहचान सबसे अलग है. इनका नाम सुनते ही आज भी बुद्ध, अशोक, मीरजाफर, शकुंतला, रावण, झांसी की रानी, बहादुर साह जफ़र सब याद आ जाते हैं. दरअसल चतुर्भुज जी अकेले अइसे नाटककार थे जो ऐतिहासिक नाटक के लिए जाने जाते थे. आकासबानी पटना, रांची, भागलपुर, दरभंगा कहीं भी अगर कोनो ऐतिहासिक नाटक का बात हो, त समझ जाइए कि बात इन्हीं से सुरू होकर, इन्हीं पर खतम हो जाने वाला है. रेडियो अऊर मंच पर अगर कोई भी इतिहास के पन्ना से निकलकर आपके बीच में चलता अऊर बोलता नजर आ रहा हो, त समझ जाइए कि उसके हाथ में चतुर्भुज जी का स्क्रिप्ट होगा. बिहार में रंगमंच पर अगर कोई ब्यक्ति इतिहास को दोबारा ज़िंदा करने का साहस कर सका है त ऊ केवल अऊर केवल चतुर्भुज जी रहे हैं. सही माने में उनके नहीं रहने पर ही इतिहास, इतिहास हुआ; नहीं तो ऊ इतिहास को कभी बर्तमान से पीछे जाने ही नहीं दिए.

अपने बारे में उनका सोच अऊर नाटक के प्रति लगाव कइसा था इसका अंदाज़ आप उनका कहा हुआ बक्तब्य से लगा सकते हैं:
“मेरी रंगयात्रा वैसी जीवनयात्रा से कुछ अलग है। मैं बचपन से ही रंगमंच से जुड़ा रहा। आज तक जुड़ा हॅूं। मैंने यह अनुभव किया कि मुझे जीवन में जो कुछ भी मिला, वह रंगसेवा की बदौलत। मैं मघ्यम वर्गीय परिवार से आता हॅूं। जीवन में सुख कम देखा, दुख-दारिद्र्य-अभाव अधिक देखा और भोगा। कई तरह की नौकरी की। एक नौकरी से अलग होता, दूसरी का दामन थामता। परिवार को भूखे रहने की भी नौबत आई।
इन सब के बीच एक बात जो बराबर बनी रही। एक सूत्र जो बराबर मेरे साथ रहा, वह है नाटक। नाटक की दुनिया अद्भुत है। नाटक ने मुझमें बराबर ऊर्जा दी, बराबर उत्साह दिया। ग़म को भूलने की शक्ति दी.”
स्वयं पाली भाषा में स्नातकोत्तर, नाट्य-शास्त्र में पी.एच-डी. तथा नाट्यशास्त्र के प्राध्यापक तक रहे. बहुत समय तक आकासबानी में रहे, ओहीं से रिटायर हुए. उनके बारे में एगो अऊर बात जो हमरे लिए आदर्स के जैसा रहा ऊ था उनका चरित्र. उनका लम्बाई-चौड़ाई लाल बहादुर शास्त्री जी के जैसा था अऊर चरित्र भी. आकासबानी में रहते हुए उनके साथ के केतना लोग अपने सपूत लोग को ओहीं के नौकरी में एडजस्ट करते चले गए. मगर चतुर्भुज जी कभी इसका सहारा नहीं लिए. उनका सब बच्चा लोग आज भी अपना बदौलत उच्चाधिकारी है.

फ्लैस-बैक समाप्त:
आज चतुर्भुज जी हमारे बीच नहीं हैं, मगर हमरे लिए आज भी लिजेंड से कम नहीं हैं. पारसी थियेटर से लेकर आधुनिक रंगमंच तक, नाटक लिखना, नाटक का निर्देसन करना अऊर अदाकारी करना. जो रोल बिधाता उनके लिए लिखता गया ऊ अदा करते गए. कभी भगवान से कुछ नहीं मांगे, मांगने के लिए कुछ था भी नहीं. जिन्नगी रंगमंच है अऊर हम लोग केवल कलाकार है जो अपना-अपना रोल निभाकर चले जाते हैं – ई बात सबके लिए त सेक्सपियेर का डायलोग होगा, मगर चतुर्भुज जी के लिए हकीकत था. उनका जीवन सचमुच रंगमंच था, जिसपर उनका जीवंत अभिनय देखने का मौक़ा मिलना हमरा सौभाग्य था.
आज पन्द्रह जनवरी को उनका जन्मदिन है!! हैप्पी बर्थ डे, बाबूजी!

पुनश्च:
चतुर्भुज जी के लिखे नाटक, उनका जीवन परिचय और उनके जीवन की झलकियां इस वेबसाईट पर उपलब्ध हैwww.chaturbhujdrama.com

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

फरिश्ते आके उनके जिस्म पर खुशबू लगाते हैं!

आज भोरे भोरे छोटकी बेटी का फोन आया. भोरे भोरे माने साढे नौ बजे. छुट्टी के दिन   हमरा भोरे भोरे का मतलब एही होता है. जाड़ा का सुबह, रजाई तोसक के अंदर लेटे हुए हम, बाहर देखते हैं, हरा घास के मैदान में कुस्ती का सीन देखाई देता है. आजकल कुस्ती रोजे चलता है मैदान में. एक तरफ से लंगोट कसे हुए धूप, दोसरा तरफ कुहासा. दुनो एक दूसरा को पटकने में लगा हुआ. कभी धूप कुहासा को पटक देता है, तो लोग बाग, बच्चा सब जमकर ताली पीटता हुआ मैदान में जाता है. जब कुहासा धूप को पछाड़ देता है तो सब लोग डर के मारे रजाई में लुका जाता है. असल में पूरा कुस्ती का खेला, एकतरफा खेला है. इसमें सब लोग धूप के पार्टी में होता है. हमरे जईसा एकाध आदमी कुहासा को बाहर से समर्थन देता है. मगर अंत में कुहासा का सरकार गिर जाता है और सब लोग धूप के जीत पर ताली बजाने लगता है. सत्यमेव जयते!
देखिये! लगे हम सुमित्रानंदन पंत के जईसा प्रकृति का बर्नन करने लगे. असल बात रहिये गया. हाँ.. हमरी छोटकी बेटी का फोन आया भोरे भोरे. फोन पर उनका एक्साइट्मेण्ट थामे नहीं थम रहा था, लगता था कि बस फोन से बाहर निकलकर हमरे गोदी में बईठकर अपना बात बताएगी.
बड़के पापा! आज सैण्टा मेरे लिये बहुत सा गिफ़्ट लेकर आया.
वाऊ! क्या क्या लाया?” हम भी उसके सुर में सुर मिलाकर बोले.
वो ना, एक जैकेट, एक पिकनिक बैग, टोएज़ और चॉकलेट लाया मेरे लिये. मैं जब सोकर उठी, तो मेरे पास सॉक्स में रखकर गया था सैण्टा. झूमी दीदी को फ़ोन दे दो. मैं बताउँगी… (झूमी दीदी से) मुझे सैंटा ने बहुत सारा गिफ़्ट दिया है, तुम्हें क्या मिला.
मुझे आज डैडी बुक्स दिलवाने ले जाएंगे.
हे हे! बड़के पापा कोई सैंटा है!! सैंटा तो लाल कपड़े पहनता है, लाल कैप पहनता है, उसकी ना, वाइट दाढ़ी होती है.”
हम लोग मुस्कुराने लगे तीन साल का बचिया का सब बात सुनकर.
******

तनी देर में पटना से बेटा का फोन गया. उसका एक्साइट्मेण्ट पहिलहीं से नौवाँ आसमान पर था. हमको फोन पर बोलना पड़ा कि तनी साँस ले लो तब बताना. मगर काहे तो साँस लेने वाला है, जब तक बतवा बता नहीं लेगा तब तक साँस नहीं लेने वाला.
जानते हैं भैया! आज हमारे स्कूल में स्पिक मैके का प्रोग्राम है. बिरजू महाराज, एल. सुब्रमनियम और बेग़म परवीन सुलताना आएंगी.
परवीन सुल्ताना के नाम पर स्व. पिता जी का याद गया. दीवाना थे उनका गाना का. अऊर आज बेटा का एक्साइटमेण्ट देखकर लगा कि दादा का अत्मा पोता में समा गया है. इसके बाद बेटा का आवाज़ फिर से सुनाई दिया,
पता है भैया! बेग़म परवीन सुल्ताना जी का स्वागत भाषण हमको देना है!! और उनको बुके देकर उनको मंच पर भी हम लेकर आएंगे!!
बेटा का खुसी देखकर हमको लगा कि सचमुच आज सैंटा हमरे परिबार में भी खुसी बाँट रहा है. छोटकी बेटी को गिफ़्ट्स, बड़की को बुक्स अऊर बेटा को हमारे खानदानी सौख के अनुसार संगीत सभा में, देस के एतना गुनी  कलाकार को बईठकर सुनने का मौका.
***

पता नहीं कऊन सताब्दी में एगो संत, खुसी बाँटने का बीड़ा उठाए. जिसके हिस्सा में कोनो खुसी नहीं था, उसको उपहार देने का काम सुरू किये. बाद में अमेरिका का कोई कार्टूनिस्ट संत को नया रूप दिया, लाल लबादा, लाल टोपी, पीठ पर बड़का मोजा अऊर उसमें का मालूम केतना तोह्फ़ा, लोग के लिये, जिनके जिन्न्गी में अभाव का तोह्फा भगवान जनम से लिख दिये हैं.
हम एही सब सोचते हुये खिड़की से बाहर देखने लगे धूप अऊर कुहासा का कुस्ती. सिरीमती जी चाय दे गई थीं. कप से निकलने वाला भाप, कुहासा का पार्टी ज्वाईन कर लिया था. ओही समय सामने सड़क पर हमको एगो गठरी जईसा आदमी देखाई दिया छोटा सा, पीठ पर बड़ा सा एगो झोला लादे हुये माथा पर लाल रंग का लम्बा टोपी. हम चौंक गए कि सैंटा कहाँ से गया. जब सैंटा नजदीक आया तब ठीक से देखाई दिया कि एगो बच्चा था, कचरा बटोरने वाला. कचरा में उसको रात को पार्टी से लौटने वाला किसी का टोपी मिल गया था, जिसको पहन कर सैंटा कलॉज़ बनकर अपने रोज के काम में लगा हुआ था. 


मंगलवार, 31 अगस्त 2010

ऊँचाई का डर!

बिहार राज्य पथ परिवहन निगम का हालत पहिले एतना खराब नहीं था. पटना के आस पास के बाहरी इलाका के लिए कॉलेज, युनिवर्सिटी के छात्र अऊर राज्य सरकार के कर्मचारी के लिए इस्पेसल बस सेवा हुआ करता था. एकदम समय का पाबंदी के साथ. टाइम का खयाल बस का ड्राइवर अऊर कण्डक्टर साहब रखते थे, अऊर उनका ‘खयाल’ यात्री लोग.

ई बात तब का है जब हम दानापुर में पोस्टेड थे. पटना से दसेक किलोमीटर पच्छिम. एगो बस रोज सबेरे ऑफिस टाइम में लेकर जाता था अऊर साम को ले आता था हम लोग को. यात्री लोग थे ओहाँ के राज्य सरकार के ऑफिस के लोग अऊर केंद्र सरकार में रक्षा बिभाग का लोग. बहुत दोस्ताना माहौल था. 60 लोग का बस, सुबह साढे नौ बजे गाँधी मैदान डिपो से निकलता था अऊर साम को ठीक साढे पाँच बजे दानापुर से छूटता.

सब ठीके चल रहा था कि केंद्र सरकार के ऑफिस का टाइम बदल गया, सुबह 10 बजे से साम 6 बजे तक. ऊ लोग जाकर बस डिपो में टाइम कीपर को बता दिया कि बस अब से सुबह 9 बजे निकलेगा अऊर साम को साढे छौ बजे. टाइम बदलने से सबको असुबिधा हुआ, काहे कि उसमें बहुत सा गृहिनी लोग थी जिनको घरे जाकर भी काम करना होता था. लेकिन जो बात सबको खराब लगा ऊ ई था कि बस में इस बारे में कोनो चर्चा नहीं हुआ, जइसा कि होता था. बस के सेक्रेटरी का चुनाव या अऊर कोनो फैसला सब लोग चलते बस में चाहे एक जगह मैदान में रोक कर कर लेते थे. लेकिन ई परिबर्तन किसी के राय से नहीं हुआ था, बस मनमाना था.

अब केंद्र सरकार और राज्य सरकार के कर्मचारी लोग के बीच ठन गया. तत्काल चुनाव किया गया अऊर हमको नया सचिब चुन लिया गया. बस पुराना टाइम से चलने लगा. लेकिन दोसरा दिन से घेराओ चालू. दोसरा दल का लोग सुबह टाइम कीपर को धमका कर बस को अपना टाइम पर ले गया. हम भी उधर से लौटने के टाइम पर ऊ लोग को छोड़कर अपना आदमी के साथ चले आए.

अगिला दिन फिर ऊ लोग जबर्दस्ती ड्राइवर को घेर कर बईठ गया कि बस उनका टाइम से चलेगा. हम भी जोस में थे ही, रोड पर सो गए बस के आगे कि अब बस हमरे देह के ऊपर से जाएगा त जाएगा, नहीं त नहीं जाएगा. हम लेटे रहे रोड पर, अऊर बस को रात आठ बजे तक नहीं चलने दिए.

अगिला दिन राज्य परिवहन निगम के अध्यक्ष श्री जिया लाल आर्य, आई.ए.एस. के पास सिकायत गया अऊर दुनो दल का पेसी हुआ. बात होता रहा अऊर हम अपना पक्ष पर अडिग रहे. हम बोले, “सर! इन लोगों ने अपने मन से सारा टाइम बदल दिया है. और यही हमारा विरोध है.”

“अरे भाई! आप लोग सबको साथ लेकर चलिए. ऐसा क्यों करते हैं कि किसी को असुविधा हो.”

“सर! ये बस राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए है और उनके समय में कोई बदलाव नहीं हुआ है. इसलिए ये केंद्र सरकार के लोग अपने मन से कैसे बदल सकते हैं समय!”

“लेकिन इनके बिना तो आपकी संख्या भी पूरी नहीं होती. इन्हें हटाने से तो आपकी बस ही बंद हो जाएगी.”

“सर! लोग यहाँ टिकट के दुगुने पैसे देने को तैयार हैं. हम एक एक आदमी को दो दो टिकट दे देंगे. आपको तो बस पास की ही गिनती करनी है.”

“क्या मिलेगा आपको इससे?”

“सर! वही तो मैं कहता हूँ. क्या मिलेगा हमें यह करके! मैं अपना समय बर्बाद करके लोगों से पैसे इकट्ठा करता हूँ, उनके टिकट बनवाता हूँ, सुबह टाइम कीपर से मिलकर अच्छी बस का इंतज़ाम करताहूँ, अपने जानने वाले ड्राइवर की ड्यूटी लगवाता हूँ. इतनी परेशानियों के बीच मुझे क्या मिल रहा है, जो मैं ये सब करता फिरूँ. इतनी मुश्किलें अलग और पैसे कभी कम पड़ जाएँ तो अपनी जेब से भरना. क्या फ़ायदा है मुझे?”

वे मुस्कुराए. बोले, “आपकी उम्र कितनी है?”

“चौबीस साल.”

“और आपके बस में चलने वाले लोगों की औसत उम्र क्या होगी?”

“जी, चालीस से पैंतालीस के बीच.”

“वर्मा जी! चौबीस साल की उम्र में, ख़ुद से दुगुने उम्र के लोगों की जमात पर हुक़ूमत या लीडरी करने का नशा क्या कम नज़र आता है आपको! ये बहुत बड़ा नशा है. इंसान को ज़रा सा शिखर पर पहुँचा दो, बस उस पर बने रहने का जुनून उससे बहुत कुछ करवाता रहता है. आप जवान हैं, सोचिए जब ये जज़्बा है आपके अंदर, तो बाँटते क्यों हैं. जोड़कर चलने का नशा, बाँटने से भी ज़्यादा होता है.”

हमको लगा कि हमरे गाल पर एक जबर्दस्त तमाचा लगा है. एक बहुत सीनियर आई.ए.एस. के मुँह से ई बात सुनकर हम अबाक रह गए. बाद में पता चला कि ऊ बहुत अच्छा साहित्तकार भी थे. अगिला दिन से बस नया टाइम से चलने लगा. तनी ऊ लोग ऐड्जस्ट किया तनी हम लोग किए. किसी को कोई तकलीफ नहीं हुआ.

लेकिन उनका बात हमरे मन पर गोदना का जइसा गोदा गया. जब किसी को टॉप पर होने का नसा में देखते हैं, त एही सोचते हैं कि केतना अकेला है ई आदमी. कभी नीचे देखता होगा त डर नहीं लगता होगा उसको! बकौल मुनव्वर रानाः

बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है.
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है.

शुक्रवार, 7 मई 2010

गुरु गोबिंद दोउ खड़े !!

हई देखिए! हम सोचिए रहे थे कि का लिखें… एगो कमेंटो आया था कि ई सब बतिया छोड़कर कुछ काम का बात लिखिए। लेकिन बुझाइए नहीं रहा था कि का लिखा जाए. हमरा गड़ियो फस्ट गेअर में चल रहा था. अचानके हमरे गुरुदेव आए, बगल में बइठ गए, अऊर ड्राइभिंग इंस्ट्रक्टर जईसा अपना साइड से गड़िया को टाप गेअर में ले गए. अब त हमरे सम्भाले पड़ेगा गाड़ी.

चलिए देखते हैं! आज का दुनिया में सतीस सक्सेना जी का जइसा अदमी बहुत कम पाया जाता है। सच पूछिए त ई साहेब आर. के. लक्ष्मण जइसन काम कर रहे हैं. एगो मामूली अदमी को पूरा देस में बिना बोले एगो पहचान देना मामूली बात नहीं है. हमरा जइसा लोग, जिसका न नाम, न ठेकाना, जे अपने को बेनामी डिक्लियर कर दिया है, का ऊपर पूरा एगो पोस्ट लिख देना अचरज का बात है. पहिले ऊ आम का फोटो वाला दूनो दोस्त का बारे में लिखे, अब हमरा बारे में. ऊ लोग के साथ भी हमरा कोनो मुकाबला नहीं है. हम त बस मन का बात लिखते हैं अऊर खरा बात लिखते हैं. अब पहचान बन रहा है कि नहीं, का पता. आप लोग जईसा पारखी अदमीए बता सकता है.

हमरा परसिद्धी का बारे में सतीस जी का बात सहिए है। लेकिन हम त साधारन लोग हैं, हमको न तो कमेंट का गिनती आता है, न स्थापित होने का लालच सताता है. जे दिन हमरा दोस्त लोग बोल देता है कि बेजोड़ लिखे हो, ऊ दिन हम अपने आप को गुलसन नंदा समझने लगते हैं. अ जे दिन कह दिया कि जमा नहीं, रात भर खाना छोड़कर गलती खोजने में लगा देते हैं.
एगो करेक्सन करना चाहेंगे। ई हमरा बोली को लोकप्रिय बनाने में लालू जी का बहुते बड़ा हाथ था. बाकी ई कमवा ऊ लोग को हँसाने के लिए, अऊर अपना लोकप्रियता के लिए करते थे. खैर, ऊ उनका सोच था, लेकिन इसी कारन ई बिहारी बोली को लोग जोकरई और हँसी का बिसय बना दिया. हम कोसिस कर रहे हैं कि इ बोली को अपना सही इज्जत मिल जाए, बस. लोकप्रिय का बात त हमरे मगजो में नहीं आता है कहियो. अब आप ही देखिए, ई बोली में हमरा बात पढकर, ओकरा बारे में कमेंटवा कोई नहीं देता है, बस मजाकिया बात कर के चला जाता है लोग.

अपनापन, सिस्टाचार और मधुरता का बात करके आप दिल छू लिए, हमरे नहीं दुनिया का सभ्भे बिहारी लोग का। कहबे किए थे हम कि पारखी अदमी चाहिए. अब ई त हमरा प्रदेस का दुर्भाग है कि नालंदा, वैशाली, पावापुरी, पटना साहिब, गया, मधुबनी जइसा जगह का होते हुए भी अशिक्षा का पर्याय बना हुआ है.

अंत में आप सिस्टाचार का बात किए हैं, जिसको सुनकर हमरा आँख में लोर भर गया है। सायद बहुते कम लोग होगा जो ई बात को स्वीकार करेगा. नहीं त आप सब लोग जानते हैं कि जो जगह hospitality के लिए जाना जाता है, उसको hostility के नाम से डिक्लियर कर दिया गया है. हम, अऊर हमरा जइसा न जाने केतना बिहारी दुनिया भर में एही कोसिस में लगा है कि हमरा मातृभूमि के माथा पर जो करिया टीका लगा है ऊ धो सकें.

हमरा पोस्ट पर कमेंट नहीं मिले, हमको तनिको दरद नहीं होता है। बाकी समाज में बिहारी लोग का ऊपर जेतना कमेंट होता है ओही करेजा पर बोझ मालूम होता है.

सोमवार, 3 मई 2010

मन का टीस

अभी तक त मजाके चल रहा था. लोग भी सोचिए रहे होंगे कि का करेक्टर है. लेकिन ई सब मजाक के पीछे, एक बहुते बड़ा मजाक छिपा है, जो सायद कोई देख नहीं पाता है. बिहारी होना अपने आपे में बहुत बड़ा मजाक बन गया था हमरे लिए. किसी के सामने हम अंगरेजी में बतियाते हैं त ऊ अदमी बहुत इम्प्रेस होता है हमसे, हमरे बात करने का तरीका से, हमरा जानकारी से. जाते जाते पूछता है कि आप कहाँ के रहने वाले हैं (आजकल त भारतबासी हैं बोलने से अदमी को लोग बिदेसी समझ लेता है, लोग का पहचाने बिहारी, बंगाली, मराठी हो गया है). बस खेला खतम. जइसहीं हम कहते हैं ‘बिहार’, उनका एकदम से एक्स्प्रेसनवे बदल जाता है. एक बार त हम ढीठ बनकर पूछिए लिए, “का हुआ! आपको बिस्वास नहीं हुआ, झटका लगा कि निरासा हुआ?” साहेब लजा गए, उनको लगा कि उनका चोरी धरा गया है.
अब त आदत हो गया है. कोई पुछबो करता है त हम ई नहीं कहते हैं कि बिहार के रहने वाले हैं, एक दम साफे कहते हैं कि बिहारी हैं. हमको का फरक पड़ता है, बाकी लोग का नजरिया तुरते बदल जाता है. बिहारी माने अनपढ, देहाती, असभ्य. अगर पढा लिखा मिल गया त जरूर चोरी से पास किया होगा, नहीं त जाली डिग्री लेकर आया है. देस का राजधानी में त लगभग गालिए के तरह इस्तेमाल किया जाता है बिहारी शब्द.
अब ई त बताने का कोनो फायदा नहिए है कि इसी बुड़बक प्रदेस ने बाबू राजेंद्र प्रसाद, बाबू जगजीवन राम, सतरोहन सिन्हा,सेखर सुमन, चित्रगुप्त, मनोज बाजपेई, बाबा नागार्जुन, दिनकर, रेनू जईसा बिभूती पैदा किया है.
हमरा उद्देस अभी भी कोनो बिहारी असोसिएसन बनाने का नहीं है. हम ईहो नहीं चाहते हैं कि ई पढने के बाद बिहारी लोग हमरा सुर में सुर मिलाए. हमरा बात पसंद आता है त कोई भी वेल्कम है इहाँ पर, नहीं त खाली बिहार के नाम पर जय राम जी की.
चलते चलते, पिछलका पोस्ट में एगो अंजान भाई जी का टिप्पनी का खुलासा करना चाहते हैं। भाई जी! एगो बतिआ हम बता दें कि अजय कुमार झा जी को हम नहीं जानते हैं. एकाध बार पढे जरूर हैं. कहीं उनका धोखा में हमको मत गरिया दीजिएगा. अभी अभी दोकान लगएबे किए हैं, आपका किरपा से ठीक चल रहा है, कहीं बंद करा दिए त बाल बच्चा भुखे मर जाएगा. अपका गोड़ पड़ते हैं. आते रहिएगा त खुसिए होगा हमको. तब तक प्रनाम!!