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शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

हमरा ब्लॉग परिवारः भाग एक

छः महीना से ब्लॉग के गली में भटक रहे हैं, अऊर आज तीन महीना हो गया ई ब्लॉग लिखते हुए. एक बार पीछे घुर के देखते हैं, त लगता है कि का मिला ई तीन महीना में हमको. हम दिए 32 पोस्ट अऊर हमको मिला 558 कमेंट अऊर 53 फॉलोवर. एही उपलब्धि है का! गलत. ई सब तो छलावा है! अऊर फॉलोवर का होता है... हम न त कोनो साधु हैं, धर्म गुरू हैं अऊर न नेता हैं कि हमरा कोई फॉलोवर होगा. सच पूछिए, त फॉलो तो हम कर रहे थे एतना दिन से अपना पुराना याद, बचपन का घटना, बिछड़ा हुआ लोग अऊर दीमक लगता हुआ कबिता सब को.
एगो अऊर बहुत खास बात है. अपना परिबार के बाहर भी हमको एगो परिवार मिला, जिसको हम ई तीन महीना का सबसे बड़ा पूँजी अऊर खजाना मानते हैं. आइए आपको मिलवाएँ, अपना एगो अऊर परिबार से, जो हमको भगवान से नहीं मिला है, हम खुद से बनाए हैं.
सबसे पहिले, अपनत्व, सरिता अग्रवाल जी. समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर. डिग्री माने खाली पढाई करना नहीं. अपने ब्लॉग से जो अपनापन ई बिखेरी हैं, ऊ जीबन का पढाई करने से ही मिलता है. हम इनको सुरुए से पढते थे, लेकिन ऊ कभी हमरे ब्लॉग पर नहीं आईं, हमरे कहने के बावजूद भी. कारन कभी पूछे नहीं उनसे. लेकिन हमरा कमेंट ऊ हमेसा पढते रह्ती थीं, बस ओही से प्रभावित होकर आ गईं, अऊर बस तब से जुड़ी हैं. सायद ई अपना तरह का पहिला जुड़ाव है, एगो अनजान ब्यक्ति से. इनका हैसियत हमेसा एगो बुजुर्ग का रहा हमरे ब्लॉग परिवार में, कभी बड़की दीदी, कभी माँ. पति, प्रतिष्ठित संस्थान I.I.T. खड़गपुर में पढते हुए भी हॉस्टल के महौल से अनजान. अपसब्द के नाम पर 'फनी चैप' से जादा नहीं बोलते हैं. घर में ठेठ अंगरेजी माहौल बातचीत में, लेकिन हिंदी में सरिता जी का लेखन बच्चों को प्रेरित करने के लिए. तीन बच्चियाँ, सभी अपने अपने घर में, सुख अऊर समृद्धि के साथ. अभी फिलहाल, लंदन में नानी बनने का इंतजार कर रही हैं,एगो प्यारी सी बच्ची का.

अगिला नाम जो हमरे सामने आता है ऊ है श्री सतीस सक्सेना का. हम त गुरुदेव कहते हैं उनको, अऊर मानते हैं बड़ा भाई जईसा. पेट के लिए, सरकारी महकमा में इंजीनियर हैं, लेकिन पेट से जादा दिल से परेसान है. दिल है कि मानता नहीं, इसलिए किसी का दर्द देख नहीं पाते, चाहे आदमी हो या अनबोलता जानवर. मासूम एतना हैं कि गर्मी से बेहाल होकर कार का ए.सी. चलाकर अपना दुनो बच्चा के साथ सो गए. आँख तब खुला जब बचिया बेहोस हो गई अऊर सब का दम घुटने लगा. भगवान (जिसको ऊ नहीं मानते हैं हमरे तरह) का दया था कि बच गए. हमसे लड़ाई बहुत करते हैं, सॉरी उलटा हो गया, हम लड़ाइयो बहुत करते हैं इनसे, लेकिन बड़का भाई हैं त इनका सलाहो मान लेते हैं. बगले में रहते हैं हमरे. त बिना बोलाए धमक गए इनके घर, तब पता चला कि हम ऊ पहिला आदमी हैं (अगर ब्लॉगर को आदमी मान लीजिए तब) जो इस दुनिया से उनका घर में दाखिल हुआ है. एगो बेटा अऊर, एगो बेटी के साथ आप अपनी सिरीमति जी के सुर में सुर मिलाते हैं. एक सच्चा इंसान, सादा चरित्र आदमी हैं हमरे बड़का भईया.

हमरे छोटका भाई श्री मनोज कुमार, छोटा इसलिए कि हमसे उमर में एक साल छोटा हैं. कोलकाता में भारतीय आयुध निर्माण संस्थान में हैं, लेकिन असली आयुध त इनका कलम है, चाहे कहिए त कुंजी पटल. एकदम सहित्यिक आदमी, संस्थान के नाम से बिपरीत. शांत सोभाव वाले मनोज जी के मन में एगो मलाल है, जिसका जिकिर ऊ हमसे किए थे एक बार, सायद हमरे साथ कॉमन मलाल था इसीलिए. एकदम ठेठ देसी आदमी हैं मन से. सब लोगों का पोस्ट पढते हैं, टिप्पनी देते हैं, अऊर साप्ताहिक चर्चा भी करते हैं. बातचीत में एतना कोमल कि लगबे नहीं करता है कि एतना बड़ा सरकारी साहेब हैं. वादा किए हैं कि आतिथ्य का मौका देंगे. देखें कब पधारते हैं.

हमरा परिवार का अगिला सदस्य है सोनी गर्ग हैं. ब्लॉग का नाम तीखा बोल. लेकिन ई तीखापन ऊ लोग के खिलाफ है जो गलत आचरन करते हैं. व्यावसायिक परिवार से आने के बाबजूद भी लिखने का रुचि, जागरण जंक्शन का टॉप 20 ब्लॉगर्स में से एक. मगर थोड़ा सा पागल है. जब पता चला कि सम्वेदना के स्वर वाला सलिल हम ही हैं, त गुसिया गई कि हमको बताए काहे नहीं. बाबू जी कहती है हमको, अऊर हमरी त बिटिया है, बंगाल के हिसाब से माँ. कोई भी कमेंट कीजिए इसके पोस्ट पर, तुरत जवाब देगी, गलती करेगी त बेहिचक माफी माँग लेती है. कहती है बंधन पसंद नहीं, इसलिए नौकरी, ना-करी. अपने मन की मालकिन है, बात करने का अंदाज भी ओईसने है, जइसा लिखने का, डायरेक्ट दिल से!

सबसे सैतान है, स्तुति पाण्डे. अमेरिका में बसी है, लेकिन फिर भी दिल है हिंदुस्तानी को सच करने पर तुली है…फोन पर डेढ घंटा बतिया गई...ठेठ हमरे भासा में.बात सुनियेगा त बुझएबे नहीं करेगा कि एतना पढी लिखी, आई.बी.एम. में काम करने वाली लड़की है. ऊ त माने बदल दी है आई.बी.एम. का – इण्टर्नेशनल बिहारी मंच. अब बताईए है कोनो मुकाबला. इण्डिया में अपना दोस्त सब से लगातार जुड़ी है. ओहाँ अंगरेज लोग को भोजपुरी सिखाती है, लेकिन कुलदीप बाबू (हमरे मेहमान, उसके दुल्हा) को ठीक से हिंदीओ बोलना नहीं सिखा पाई. खैर, ई मजाक था. नाटक अऊर अभिनय उसके रग रग में बसा है. बहुत सम्बेदनसील है, हमरे जईसा. तुरते रोने लगती है. लेकिन कबिता से ओतने दूर है जेतना भारत से अमेरिका. भारत लौटकर आने का तमन्ना है. दोनों माँ बाप के लिए बहुत प्यार है मन में. हमको कभी पापा, कभी बाबूजी कहती है, हमारी (बि)देसी बेटी.

ई एपिसोड के लास्ट में अपने सम्वेदना के स्वर  चैतन्य जी को कईसे भुला सकते हैं. ई ब्लॉगवा का नाम उनका दिया हुआ है.आज तीन महीना से उनका दिया नाम का कर्जा चुका रहे हैं धीरे धीरे. लेकिन ऊ भी हमरे जईसा बिजनेसमैन नहीं हैं, इसलिए न उनको कर्जा बसूलने का जल्दी है, न हमको चुकाने का.



पुनश्चः ई पोस्ट अल्पबिराम है. एतना लोग के प्यार का कर्जा है कि चुकाने के लिए एगो अऊर जनम, मतलब अऊर पोस्ट लिखना पड़ेगा. त बस इंतजार कीजिए. तनी सुस्ता कर हम फिर चालू हो जाते हैं.