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सोमवार, 2 अगस्त 2010

हमरा ब्लॉग परिवार – अंतिम भाग

पिछला दू एपिसोड के बाद त हमहीं एतना सेंटीमेंटल हो गए कि पहिला बार लगा कि केतना बड़ा परिवार बना लिए हैं हम. अऊर सीरियसली, ई फैमिली में से कोनो एगो आदमी दू चारो दिन के लिए लापता होता है त हमको खबर लग जाता है. दिव्या बहिनअऊर सुलभ सतरंगी गायबे हैं. सुलभ बाबू त बता दिए कि ब्यस्त हैं, लेकिन दिव्या बहिन लगता है सास के सेवा में लगी है. केतना भुलायल लोग भेंटा गए, अजय झा जी, अबिनास बाचस्पति जी अऊर सानु सुक्ला जी. एही असली बात है, परिवार का लोग केतनो दूर चला जाए, प्यार से बोलाइएगा त खिंचाएल चला आता है. आइए मिलते है कुछ अऊर फैमिली मेम्बर सेः

अभिसेक पटना का बुतरू है. घरेलू, सुसील अऊर गृहकार्य में दक्ष लड़िका है. लिखता है त सब ग्रामर भुला जाता है, काहे कि ऊ प्यार का ग्रामर पढकर लिखता है... दिल से, बिना बनावट के. गाना का सौखीन है अऊर कबिता का भी. क़ैफी आज़मी, गुलज़ार साहब जनाब के फेवरेट हैं. रफ्तार के प्यार में अंगरेजी गाड़ी सब के पीछे लगा रहता है. दोस्ती किसको कहते हैं इसका साच्छात प्रमान. बेंगलुरू में रहने पर भी पटना जिंदा है, इसके मन में अऊर मित्र मण्डली में. तनी मनी पागल है हमरे जईसन.

शैलेंद्र झा हमसे अभी हाल से जुड़े हैं. चंडीगढ में रहा रहे हैं. फोन किए त अईसे बतिया रहे हों जईसे हमरे साईड से आवाज आ रहा हो कि जी मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ कौन बनेगा करोड़पति से. जब बात उनके मुँह से निकला त बताए कि ऊ हमरा सभे पोस्ट पढ गए हैं सुरू से अंत तक. झा जी, एतना पेसेंस कहाँ से ले आए भाई.

नीलेस माथुर रेगिस्तान में कबिता का फूल खिलाते हैं.मन में गहरा दर्द छिपाए हैं अऊर ई दर्द को रहस्य में लपेटकर रखे हैं. कुछ है जिसको सबके सात बाँटना नहीं चाहते हैं, बस कबिता के माध्यम से निकल जाने देते हैं. हमको बड़ा भाई मानते हैं अऊर एक बार हमरा किया हुआ टिप्पणी को अपने ब्लॉग का सर्वश्रेष्ठ टिप्पणी बता दिए. इनका प्रेम है, नहीं त अईसा कोई बात नहीं लिखेथे हम.

पंकज मिश्र पत्रकार हैं. खबर के अंदर से खबर निकाल कर सजाते हैं. घाट घाट का पानी पिए हैं,मगर अब सुस्ता रहे हैं, एक जगह रुककर आरम से लेखन को स्मय दे रहे हैं.

त्यागी जी वरिष्ठ है हमरे. सिक्षक हैं अऊर भारत का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेस से हैं. इनके ब्यंग लेखन का धार गजब का है. दिन भर का थकान इनका एगो पोस्ट पढकर दूर हो जाता है. आजकल देखाई नहीं दे रहे हैं.

मुकेस कुमार सिन्हा बैजनाथधाम के बासिंदा हैं… फिलहाल दिल्ली में अपना परिवार अऊर दूगो बच्चा के साथ रहते हैं. दिल्ली को हादसा का सहर बोलते हैं. कबिता बहुत समझदारी का करते हैं... बीच बीच में गायब हो जाते हैं.

अनामिका जी का सदा त पूरा ब्लॉग दुनिया में गूँज रहा है. दिल्ली के पास फरीदाबाद से हैं. इनको हमसे सिकायतहै अऊर हमको इनसे. लेकिन मजबूरी है कि हम दूनो भाई बहन एक दूसरा का सिकायत दूर नहीं कर सकते हैं. इनका उदास कबिता हमको कस्ट पहुँचाता है अऊर हमरा बोली से ई तबाह रहती हैं. न ई खुसी वाला कबिता लिखती हैं, न हम अपना बोली बदल सकते हैं. का करें,एही बोलिए त आत्मा है ई ब्लॉग का, इसके बिना त सरीर चोला माटी का रे!

जय कुमार झा जी का नाम त ऑनेस्टी प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी हो गया है. बहुत ऊँचा ऊँचा पद पर काम किए हैं. फिर भी लोकतंत्र का असली मूल्य के लिए समर्पित हैं. जब ई गायब हो जाएँ त समझ लीजिए कि कोनो मिसन पर हैं. सभे ब्लॉग पढते हैं अऊर टिप्पणी देते हैं. बहुत सुलझा हुआ इंसान हैं.

बबली का नाम सुनते के साथ मिष्टि दोई याद आ जाता है. ऊर्मि चक्रबॉर्ती, ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में रहती है. इसका कबिता चाहे सायरी पढने के बाद हमको बचपन का याद आ जाता है. जेतना निश्छल लिखती है, ओतने गहरा भाव छिपा रहता है.

भोले बाबा के नगरी कासी के सदस्य हैं हमरे देवेंद्र जी. बेचैन आत्मा के नाम से जादा मसहूर हैं. इनका कबिता में अनुभव झलकता है. बहुत सांत सोभाव के आदमी हैं.

दिगम्बर नासवा जी के साथ त अजीब लुका छिपी वाला रिस्ता बन गया. जब तक हम दुबई में थे, तब तक उनसे भेंटे नहीं था अऊर जब परिचय हुआ त हमरा दुबई छूट गया. लेकिन बिदेस में बसे हुए ई कबि के मन में भी बहुत कोमल सम्बेदना छिपा है.

राज कुमार सोनी पत्रकार हैं. जबर्दस्त लिखते हैं, चाहे पद हो चाहे गद्य. बहुत पारखी नजर है इनका. आस पास फैला हुआ कोई भी घटना इनका नज़र से नहीं बच सकता है. जो भी बोलते हैं बिगुल बजाकर. आजकल अपना पुस्तक का बिमोचन के सिलसिला में राजधानी में ब्यस्त हैं, इसिलिए एहाँ पर लिखना बंद है.

करण समस्तीपुरी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. कबि हैं, समीक्षक हैं, साहित्यकार हैं अऊर इनका कलम का अऊर सब्द जाल का लोहा भले दुनिया मानता हो, हम त सोना मानते हैं. इनका देसिल बयना पढने के बाद त हम इनका जबर्दस्त ए.सी. हो गए (दुनिया फैन हो जाता है). सबसे बड़ा खासियत त एही है कि इनका एक बिधा का असर दोसरा बिधा पर देखाई नहीं पड़ता है.

अविनास चंद्र बहुत सच्चा कबि हैं. इनका एक एक सब्द माणिक के तरह कबिता में जड़ा रहता है. कबिता का अर्थ का गहराई समाधि का अनुभव कराता है. बाबा भोले के तिर्सूल पर बसे हैं कासी नगरिया में. अपने बारे में कहते हैं कि पूरी तरह से बासी हैं लेकिन फिर भी ताजा हैं. भीड़ में से एक चेहरा है, लेकिन अभिमान है कि इनका चेहरा अपना है.

डॉ. दिव्या... बिदेस में डॉक्टरी कर रही हैं. हमरी बहन हैं. एतना गहरा गहरा बात लिखती है कि कह नहीं सकते कुछ. हमरा ज्ञान चुक जाता है. एही से हम कमेंट नहीं करते थे. पट से सिकायत कर दीं कि खाली राखी बाँधने से भाई बहन का रिस्ता होता है. बहन के ब्लॉग पर कमेंटकाहे नहीं करते हो. अब दोसर कोई हो तो बर्दास्त कर लीजिए, बहिन का गोस्सा बर्दास्त करना असम्भव.

अब लगता है कि बसुधैव कुटुम्बकम का मंत्र पूरा हुआ. एसिया से युरोप तक अऊर ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका तक फैल गया है परिवार. ई परिवार में अऊर भी केतना लोग हैं. लोकेन्द्र सिंह राजपूत, सुज्ञ यानि एच. राज जी, राधा रमण, मनीश छाबड़ा, देवेश प्रताप, वाणीगीत, डॉ. अमर, मृदुला जी, अहमद खान अकेला जी  अऊर भी बहुत सा लोग. हमरा कोसिस रहा है कि ई पूरा परिवार को समेटकर एक साथ एक जगह लोग से मिलवाएँ. लेकिन जहाँ दू गो बरतन होता है ओहाँ सोर त होबे करता है. हमरा गलती से अगर किसी को भुला गए हों, त जोर से चिल्ला कर याद करा दीजिएगा. हम माफी माँग लेंगे. परिवार को बनाए रहिए, तबे एगो संजुक्त परिवार बन पाएगा.

अब जाकर लग रहा है कि मन हल्का हुआ है. बड़ा लोग से एक बार फिर से आसिर्बाद माँगते हैं चरन स्पर्स करके. हमहूँ अजीबे एमोसनल फूल हैं… आप का समझे अंगरेजी वाला फूल माने बुड़बक..दुर! एमोसनल फूल माने ऊ फूल जिसका इमोसन का महँक सारा दुनिया में फैलता है.
(क्रमशः)
 

शनिवार, 31 जुलाई 2010

हमरा ब्लॉग परिवारः भाग दो

परिवार परिचय का पिछलका एपिसोड में जो प्रतिक्रिया मिला,उसमें कुछ सुधार भी था,कुछ अपनापन भी था, कुछ मन को छूने वाला बात भी था, कुछ नया जानकारी भी था. ई हमरे मन का बात है जिसको हम जईसा महसूस किए,लिख दिए.जिसके बारे में लिखे ऊ भी ओतना ही आत्मीयता से महसूस करेगा, अईसा हमरा सोचना है.

श्री मनोज भारती. हमपेसा हैं, फरक एतना है कि हम पैसा का हिसाब करते हैं, मनोज बाबू राजभासा का. हमसे पहले से ई दुनिया में रह रहे हैं अऊर समय समय पर अच्छा अच्छा ब्लॉग से परिचय भी करवाते रहे हैं.हमरे साथ राजनीति सिनेमा का समीक्षा भी किए थे. हमरा पोस्ट जरूर पढते हैं. उनका टिप्पनी बहुत महत्वपूर्ण होता है. मन से कबि, ओशो गंगा में आकण्ठ डूबे हुए, ब्लॉग साहित्य के यायावर हैं. हमरे इस ब्लॉग को सँवारने में उनका भी बहुत बड़ा हाथ है. एगो रहस्य का बत त रहिए गया. ई जो फोटो देख रहे हैं इनका, ई एक्सक्लूसिभ है हमरे ब्लॉग पर, इनकाअपना ब्लॉग पर भी नहीं मिलेगा.

इनसे मिलिए. ई हैं मैनपुरी के श्री शिवम् मिश्र. जनता के ऊपर बीमा का छतरी लगाए हैं. बहुत आत्मीय आदमी हैं, बहुत पढाकू, बहुत सम्बेदनसील, सच्चा देसभक्त. कहते हैं सम्बेदनसीलता को छिपाने के लिए भेस बदल लेते हैं (मतलब दाढी, करिया चस्मा). तनी मनी ऊँचनीच कह दीजिए त तुरते बाँह चढाकर तैयार (अब ई बात पर मत गुसिआइएगा, पहिलहीं बोल देते हैं). एक बार हम कुछ कहे, त तुरते अपना नम्बर देकर बोलिन की बतिया लीजिए हमसे. हम त एतना डरा गए कि पटना जाते जाते नई दिल्ली टेसन से गाड़ी का हल्ला में बतियाकर बात किलियर किए. जानकारी का भंडार है इनके ब्लॉग पर. इनसे सुरू से जुड़े हैं. आजकल ई चर्चा भी करते हैं अऊर हमको भी कभी कभी स्थान मिल जाता है इनका चर्चा पर. जेतना अच्छा लिखते हैं, ओतना अच्छा इंसान हैं.

हमरे बाबा भारती, राजेश उत्साही जी. अपना जाति लेखक अऊर गोत्र सम्पादक बताते हैं. टिप्पणी के साहंसाह हैं. जितने गुनी इंसान हैं, ओतने गुनग्राही भी हैं. नारी का सम्मान एतना कि अपनी अर्द्धांगिनी (हमको तो पूर्णांगिनी लगती हैं) के छिपा हुआ ब्यक्तित्व को दुनिया के सामने परकट किए अऊर मन का मलाल भी दुनिया से बाँटे. हमरे जईसा साधारन छमता वाले आदमी को एतना सम्मान दिए कि हम सचमुच उसके जोग्य नहीं हैं. लोग पेटी में खजाना रखता है, ई गुल्लक में खजाना रखते हैं. देखिए! बिना देखे बिस्वास करना मोस्किल है.

नीरज गोस्वामी जी. मुम्बई नगरिया के गजलकार. इनके दूगो पोस्ट के बीच का अंतराल का कारन, इनका ग़ज़ल पढने के बाद चलता है. पढेंगे तब बुझाएगा कि ई अंतराल, गजल को दिल में उतारने का साधना के कारन है. लोग सब्द बैठाकर गजल लिख देते हैं, लेकिन गोस्वामी जी, गजल को जीते हैं. सेर पढने के बाद आप ‘बाह’ कहने पर मजबूर नहीं होंगे, अबाक् रह जाएंगे. अऊर जेतना प्यारा इनका गजल होता है,ओतना अच्छा गजल का किताब का समीक्षा लिखते हैं.

संगीता स्वरूप जीः दीदी कहते हैं इनको हम.ई जो परिवार वाला बात हम लिखे हैं,ऊ तो हमसे भी पहिले से बनाए बैठी हैं.स्वप्निल इनको 'ममा' कहता है अऊर ई उसको 'बेटू'. बाकी सारी महिलागन इनको दीदी बोलती हैं. कोलकाता से इनका भी सम्बंध रहा है, इसलिए हमहूँ संगीता दी बोलने लगे, सहज भाव से. इनका कबिता, सब्द के किफायत अऊर अर्थ के बहुतायत का संगम है. एक बार इनका कबिता का गलत भूल बताने पर इनसे डाँट (मज़ाक) सुन चुके थे, लेकिन दोबारा जब दोसरा कबिता में गलती बोले त मानते हुए तुरत पूरा लाइन बदल दीं. हर पोस्ट को पढना, बिचार पर्गट करना, चर्चा करना, इनका समर्पित ब्यक्तित्व बताता है. एक बात इनसे सीखे हैं हम कि यह जगत अच्छा है, लेकिन हमरा बास्तविक जगत का भी हक है हमरे ऊपर. उसको नहीं भूलना चाहिए.

बिना समीर लाल जी के उड़न तश्तरी का बात किए त हमरा चर्चा अधूरा रहेगा. हमरा नासमझी के दिन में, बिचार का उड़ान के दौरान, हम समीर बाबू के उड़न तश्तरी से टकरा गए. लेकिन ऊ टक्कर बहुत कुछ सिखा गया हमको अऊर उनका मुरीद बना गया. ई कवि हैं, लेखक हैं, संसमरनकार हैं. लेकिन हमको लगता है कि ई बास्तव में ऐक्टर भी हैं (छमा याचना सहित). बम्बई (अब मुम्बई) में सी.ए. का पढाई करने के बाद यह भी लगता है कि ऐक्टिंग बस गया है इनके अंदर. इनके ब्लॉग पर लगा हुआ इनका फोटो देखने अऊर इनके गीत का तरन्नुम में भिडियो सुनने के बाद आपको लगेगा कि ई सनदी लेखाकार कहाँ ओशो की नगरी से सात समुंदर पार चला गया.'मुझको पहचान लो' कहने पर भी मुम्बई नगरिया पहचान नहीं पाया इनको. ई उड़न तश्तरी कम, छतरी जादा हैं, जिसके अंदर न जाने केतना ब्लॉगर को समेट रखे हैं अऊर इनसे हिंदी ब्लॉगर को असीम प्रेरना मिलता है.

प्रान जईसा महान कलाकार का आत्मकथा का सीर्सक है “And Pran”. सिनेमा का पर्दा पर सब हीरो लोग का नाम देखाने के बाद इनका नाम देखाया जाता था “ऐण्ड प्राण” लिखकर, इसलिए ऊ अपना आत्म-कथा का नाम भी ओही रखे. इसलिए हमरा आज का एपिसोड खतम करने से पहिले कहत हैं “ऐण्ड अनूप शुक्ल”. सब पढते हैं अऊर गुनते हैं, तौल के टिपियाते हैं. हमरा पहलौठी का कबिता पर ऊ जो कमेंट दिये थे ऊ हम भुलाईये नहीं सकते हैं. सत्यनारायण के कथा के जईसा साधु वनिक के नाव में का है बिना बताए भाँप जाने वाले अकेला आदमी.ओही समझ पाए थे ऊ कबिता का ब्याख्या. जमीन से जुड़े हुए मानुस. पिछला पोस्ट पर भोरे भोरे फोन करके बधाई दिए. भीष्मपितामह हैं ब्लॉग जगत के. हमको जेतना महीना लिखते हुआ है, ओतना महीना त पंडित जी ब्लॉगिंग में मौन रहे होंगे. अपने आप में संस्थान हैं. कहते हैं किसी के लेखन को जानना हो तो उसका अंतिम वाला पोस्ट नहीं, पहिला से अंतिम तक का पोस्ट पढो. इनका लेखन के बारे में एही बोल सकते हैं कि जिन डूबा तिन पाइयाँ.

अब का बताएँ,एतना बड़ा परिवार है अऊर जगह कम. चलिए, जईसे एतना बर्दास्त किए हैं, एक एपिसोड अऊर बर्दास्त कीजिए. अंतिम भाग सोमवार को.

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

हमरा ब्लॉग परिवारः भाग एक

छः महीना से ब्लॉग के गली में भटक रहे हैं, अऊर आज तीन महीना हो गया ई ब्लॉग लिखते हुए. एक बार पीछे घुर के देखते हैं, त लगता है कि का मिला ई तीन महीना में हमको. हम दिए 32 पोस्ट अऊर हमको मिला 558 कमेंट अऊर 53 फॉलोवर. एही उपलब्धि है का! गलत. ई सब तो छलावा है! अऊर फॉलोवर का होता है... हम न त कोनो साधु हैं, धर्म गुरू हैं अऊर न नेता हैं कि हमरा कोई फॉलोवर होगा. सच पूछिए, त फॉलो तो हम कर रहे थे एतना दिन से अपना पुराना याद, बचपन का घटना, बिछड़ा हुआ लोग अऊर दीमक लगता हुआ कबिता सब को.
एगो अऊर बहुत खास बात है. अपना परिबार के बाहर भी हमको एगो परिवार मिला, जिसको हम ई तीन महीना का सबसे बड़ा पूँजी अऊर खजाना मानते हैं. आइए आपको मिलवाएँ, अपना एगो अऊर परिबार से, जो हमको भगवान से नहीं मिला है, हम खुद से बनाए हैं.
सबसे पहिले, अपनत्व, सरिता अग्रवाल जी. समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर. डिग्री माने खाली पढाई करना नहीं. अपने ब्लॉग से जो अपनापन ई बिखेरी हैं, ऊ जीबन का पढाई करने से ही मिलता है. हम इनको सुरुए से पढते थे, लेकिन ऊ कभी हमरे ब्लॉग पर नहीं आईं, हमरे कहने के बावजूद भी. कारन कभी पूछे नहीं उनसे. लेकिन हमरा कमेंट ऊ हमेसा पढते रह्ती थीं, बस ओही से प्रभावित होकर आ गईं, अऊर बस तब से जुड़ी हैं. सायद ई अपना तरह का पहिला जुड़ाव है, एगो अनजान ब्यक्ति से. इनका हैसियत हमेसा एगो बुजुर्ग का रहा हमरे ब्लॉग परिवार में, कभी बड़की दीदी, कभी माँ. पति, प्रतिष्ठित संस्थान I.I.T. खड़गपुर में पढते हुए भी हॉस्टल के महौल से अनजान. अपसब्द के नाम पर 'फनी चैप' से जादा नहीं बोलते हैं. घर में ठेठ अंगरेजी माहौल बातचीत में, लेकिन हिंदी में सरिता जी का लेखन बच्चों को प्रेरित करने के लिए. तीन बच्चियाँ, सभी अपने अपने घर में, सुख अऊर समृद्धि के साथ. अभी फिलहाल, लंदन में नानी बनने का इंतजार कर रही हैं,एगो प्यारी सी बच्ची का.

अगिला नाम जो हमरे सामने आता है ऊ है श्री सतीस सक्सेना का. हम त गुरुदेव कहते हैं उनको, अऊर मानते हैं बड़ा भाई जईसा. पेट के लिए, सरकारी महकमा में इंजीनियर हैं, लेकिन पेट से जादा दिल से परेसान है. दिल है कि मानता नहीं, इसलिए किसी का दर्द देख नहीं पाते, चाहे आदमी हो या अनबोलता जानवर. मासूम एतना हैं कि गर्मी से बेहाल होकर कार का ए.सी. चलाकर अपना दुनो बच्चा के साथ सो गए. आँख तब खुला जब बचिया बेहोस हो गई अऊर सब का दम घुटने लगा. भगवान (जिसको ऊ नहीं मानते हैं हमरे तरह) का दया था कि बच गए. हमसे लड़ाई बहुत करते हैं, सॉरी उलटा हो गया, हम लड़ाइयो बहुत करते हैं इनसे, लेकिन बड़का भाई हैं त इनका सलाहो मान लेते हैं. बगले में रहते हैं हमरे. त बिना बोलाए धमक गए इनके घर, तब पता चला कि हम ऊ पहिला आदमी हैं (अगर ब्लॉगर को आदमी मान लीजिए तब) जो इस दुनिया से उनका घर में दाखिल हुआ है. एगो बेटा अऊर, एगो बेटी के साथ आप अपनी सिरीमति जी के सुर में सुर मिलाते हैं. एक सच्चा इंसान, सादा चरित्र आदमी हैं हमरे बड़का भईया.

हमरे छोटका भाई श्री मनोज कुमार, छोटा इसलिए कि हमसे उमर में एक साल छोटा हैं. कोलकाता में भारतीय आयुध निर्माण संस्थान में हैं, लेकिन असली आयुध त इनका कलम है, चाहे कहिए त कुंजी पटल. एकदम सहित्यिक आदमी, संस्थान के नाम से बिपरीत. शांत सोभाव वाले मनोज जी के मन में एगो मलाल है, जिसका जिकिर ऊ हमसे किए थे एक बार, सायद हमरे साथ कॉमन मलाल था इसीलिए. एकदम ठेठ देसी आदमी हैं मन से. सब लोगों का पोस्ट पढते हैं, टिप्पनी देते हैं, अऊर साप्ताहिक चर्चा भी करते हैं. बातचीत में एतना कोमल कि लगबे नहीं करता है कि एतना बड़ा सरकारी साहेब हैं. वादा किए हैं कि आतिथ्य का मौका देंगे. देखें कब पधारते हैं.

हमरा परिवार का अगिला सदस्य है सोनी गर्ग हैं. ब्लॉग का नाम तीखा बोल. लेकिन ई तीखापन ऊ लोग के खिलाफ है जो गलत आचरन करते हैं. व्यावसायिक परिवार से आने के बाबजूद भी लिखने का रुचि, जागरण जंक्शन का टॉप 20 ब्लॉगर्स में से एक. मगर थोड़ा सा पागल है. जब पता चला कि सम्वेदना के स्वर वाला सलिल हम ही हैं, त गुसिया गई कि हमको बताए काहे नहीं. बाबू जी कहती है हमको, अऊर हमरी त बिटिया है, बंगाल के हिसाब से माँ. कोई भी कमेंट कीजिए इसके पोस्ट पर, तुरत जवाब देगी, गलती करेगी त बेहिचक माफी माँग लेती है. कहती है बंधन पसंद नहीं, इसलिए नौकरी, ना-करी. अपने मन की मालकिन है, बात करने का अंदाज भी ओईसने है, जइसा लिखने का, डायरेक्ट दिल से!

सबसे सैतान है, स्तुति पाण्डे. अमेरिका में बसी है, लेकिन फिर भी दिल है हिंदुस्तानी को सच करने पर तुली है…फोन पर डेढ घंटा बतिया गई...ठेठ हमरे भासा में.बात सुनियेगा त बुझएबे नहीं करेगा कि एतना पढी लिखी, आई.बी.एम. में काम करने वाली लड़की है. ऊ त माने बदल दी है आई.बी.एम. का – इण्टर्नेशनल बिहारी मंच. अब बताईए है कोनो मुकाबला. इण्डिया में अपना दोस्त सब से लगातार जुड़ी है. ओहाँ अंगरेज लोग को भोजपुरी सिखाती है, लेकिन कुलदीप बाबू (हमरे मेहमान, उसके दुल्हा) को ठीक से हिंदीओ बोलना नहीं सिखा पाई. खैर, ई मजाक था. नाटक अऊर अभिनय उसके रग रग में बसा है. बहुत सम्बेदनसील है, हमरे जईसा. तुरते रोने लगती है. लेकिन कबिता से ओतने दूर है जेतना भारत से अमेरिका. भारत लौटकर आने का तमन्ना है. दोनों माँ बाप के लिए बहुत प्यार है मन में. हमको कभी पापा, कभी बाबूजी कहती है, हमारी (बि)देसी बेटी.

ई एपिसोड के लास्ट में अपने सम्वेदना के स्वर  चैतन्य जी को कईसे भुला सकते हैं. ई ब्लॉगवा का नाम उनका दिया हुआ है.आज तीन महीना से उनका दिया नाम का कर्जा चुका रहे हैं धीरे धीरे. लेकिन ऊ भी हमरे जईसा बिजनेसमैन नहीं हैं, इसलिए न उनको कर्जा बसूलने का जल्दी है, न हमको चुकाने का.



पुनश्चः ई पोस्ट अल्पबिराम है. एतना लोग के प्यार का कर्जा है कि चुकाने के लिए एगो अऊर जनम, मतलब अऊर पोस्ट लिखना पड़ेगा. त बस इंतजार कीजिए. तनी सुस्ता कर हम फिर चालू हो जाते हैं.