रो रहे थे सब तो मैं भी फूट कर रोने लगा,
वर्ना मुझको बेटियों की रुख़सती अच्छी लगी!
मुनव्वर राना साहब के इस सेर में किसी भी बाप के मन का ब्यथा छिपा हुआ है. बेटी के बिदाई का समय जेतना खुसी होता है, ओतने रोलाई भी आता है. खुसी इस बात का कि जिस लड़की को पाल पोसकर एतना बड़ा किये ऊ अपने घर चली जाती है, अऊर रोलाई इस बात का कि जो बेटी माँ के साथ उसका दुःख दर्द, घर गिरहस्थी सम्भालती थी, अऊर बाप का ख्याल रखती थी, आज सब रिस्ता नाता तोड़कर, एगो नया नाता से बँधकर जा रही होती है.
गाँव घर में तो आज भी किसी का डोली बिदा होता है तो रिस्तेदार त रिस्तेदार, अनजान लोग का आँख भी लोर से भीज जाता है. हमरे मोहल्ला में एगो लड़की थी सबिता, मगर सबलोग उसके काला रंग के कारन उसको कारी बोलाता था. उसका बिआह जब हुआ, त हमलोग सायद मामा के घर रेणुकूट गए हुए थे. अऊर कारी के बिदाई वाले दिन लौटे थे, सबेरे वाला गाड़ी से. हम दुनो भाई रेक्सा से उतरे त देखे सामने से डोली जा रहा था. बिदा होते हुये लड़की, मोहल्ला का सीमा से पलट कर अपना घर दुआर, पास पड़ोसी, नाता रिस्तेदार, गली अंगना पर एक बार नज़र दौड़ाती है. ऊ जईसे डोली का पर्दा हटाई कि उसका नजर हम दूनो भाई पर पड़ गया. डोली के अंदर से ऊ जोर से चिल्लाई, “ भैया हो! हम तू लोग के छोड़ के जा रहली हे!” (भैया! मैं आपलोगों को छोड़कर जा रही हूँ). अऊर उसका ई बिजोग भरा रोलाई, हमलोग का करेजा भी छेद गया. कोई रिस्ता नहीं, कोई नाता नहीं. सिवा इसके कि उसको भी हमलोग अपने बहिन के साथ खेलते अऊर बड़ा होते देखे थे. मगर आँख से आँसू बह रहा था उसके बिदाई पर. उस समय ऊ सबिता भी नहीं थी, कारी भी नहीं थी, बस बेटी थी पूरा मोहल्ला की!
अईसहीं एक रोज अपना मेलबॉक्स खोले तो सामने मेल दिखाई दिया.
बाबूजी नमस्ते! कैसे है आप ??
बाबूजी, अब मुझे आप से ढेर सारा आशीर्वाद चाहिए क्योकि अब आपकी ये पागल बेटी कुछ ही महीनो के अन्दर विदा होने जा रही है !
चलिए दीजिये ढेर सारा आशीर्वाद ! मैंने सर नीचे कर लिया!
मेल सचमुच एगो पागल लड़की भेजी थी... सोनी गर्ग. एही आभासी दुनिया की लड़की. ब्लॉग लिखती है तीखा बोल. मगर इस मेल में दिल से निकला एतना मीठा बोल कि आँख में आँसू भर आया. इस्कूल में फिजिक्स में पढ़ाया जाता था कि आभासी प्रतिबिम्ब हमेसा सीधा होता है, जबकि बास्तबिक प्रतिबिम्ब हमेसा उल्टा होता है, इसका उदाहरन हमको एही आभासी दुनिया में मिलेगा सोचे भी नहीं थे.
बस चार महीना का जान पहचान था. जान पहचान भी बस ब्लॉग के जरिये. हम बिना सम्बोधन के कमेंट लिख ही नहीं सकते. अऊर सम्बोधन भी मन से निकलता है. उसको सोनी बिटिया कहकर सम्बोधित करते थे. अऊर एक दिन “फादर्स डे” पर अचानक उसका सम्बाद मिला कि आज से हम आपको बाबूजी कहेंगे. मन एगो अजीब तरह का भाबना से भर गया. लोग हमको कहता है कि आप सबसे रिस्ता बना लेते हैं, मगर जब कोई आपको बाबूजी कहकर बोलाए तो कईसे समझाइएगा अपने दिमाग को. वईसे भी दिल अऊर दिमाग में ओही झगड़ा है, जो हमरे अऊर ऊपरवाले के बीच है.
हमको और हमरे चैतन्य बाबू (जिनको ऊ अपना भाई मानती है) को खास निमंत्रण मिला. कार्ड के साथ फोन पर भी जिद कि आना ही पड़ेगा, सपरिबार. हमरे लिये तो इमोसनल मोमेण्ट था कल यानि 24 जनवरी का. पूरा परिबार के साथ पहुँचे हम. चैतन्य बाबू को ऑफिस के काम से सिमला जाना पड़ा, इसलिये उनका हाजिरी भी हमको लगाना था. सोनी के घर के लोग को खाली एतना बताना पड़ा कि हम नोएडा से आ रहे हैं. जो लोग से कभी नहीं मिले थे, ऊ लोग भी हमको आसानी से पहचान गया. सोनी के पिताजी अऊर माता जी, अपने मेहमान के साथ ब्यस्त रहने पर भी हम लोग से खैर खबर पूछ रहे थे. सिमला से लौटते हुए चैतन्य भाई का फोन आया कि क्या चल रहा है. उनको रिपोर्ट दिये अऊर जुगल जोड़ी को आसीर्बाद देकर हम चले आए.
बेटी, घर अँगना, बिदाई… ई तीन सब्द के अंदर एगो लड़की का पूरा जीबन यात्रा छिपा रहता है माँ बाप के गोद से डोली तक का. हमरी छोटकी बेटी, जिसका उमर साढ़े तीन साल है अभी से गाते रहती है “काहे को ब्याही बिदेस!” आप भी देखिये.
उसको तो ई भी नहीं मालूम है कि फोन पर उसका ई गाना सुनकर पटना में बईठी हुई उसकी दादी के आँख से आँसू बहने लगता है!