मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

परफेक्शन और तरक्की


जिन्नगी में ऊपर जाने के लिए कुछ लोग लिफ्ट का इस्तेमाल करते हैं अउर बहुत सा लोग सीढी से ऊपर चढते हैं. लिफ्ट से चढाई करने वाला लोग बहुत खास होता है, इसलिए सीढ़ी पर भीड़ तनी बेसी रहता है. लोग एक दूसरे को धकियाते हुए ऊपर चढना चाहता है. अइसा हालत में पुराना टाइम में इस्तेमाल होने वाला लकड़ी का सीढ़ी याद आ जाता है. दुगो समानांतर बांस के बीच छोटा-छोटा बांस का खपच्ची लगाकर पायदान बनाया जाता है. देखने में रेलवे लाइन अउर उसके बीच का स्लीपर जैसा लगता है.
मगर ई सीढ़ी को कभी गौर से देखियेगा तो आपको जिन्नगी का बहुत बड़ा सच देखाई देगा. इसपर चढ़कर ऊंचाई पर पहुँचने के लिए दूगो बात बहुत जरूरी है. पहिला, अपना जूता से नीचे वाला पायदान को दबाइए अउर दोसरा, अपना दुनो हाथ से उपर वाला पायदान को पकड़े रहिये. बस एहि सिद्धांत आदमी को कहाँ से कहाँ पहुंचा देता है. ऊपर  वाले का गोड़ धरिये अऊर नीचे वाले को गोड़ से दबाते जाइए, भगवान आपको बहुत ऊंचाई तक ले जाएगा.  
हर ऑफिस में इस तरह का सीढ़ी होता है, अऊर लोग जम कर ई सीढ़ी का प्रयोग करते हैं. तरक्की का एकसूत्री कार्यक्रम एही है. बस, राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुसाला. जो लोग तरक्की पसंद होते हैं, ऊ लोग इस प्रक्रिया को कट थ्रोट कम्पीटिसन या सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट कहते हैं. बस अर्जुन का जैसा मछली के आँख का पुतलिये देखाई देता है, परमोसन माने तरक्की. इसका रास्ता में कोई भी आया तो जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा.
मगर ओही ऑफिस में कुछ लोग फ्रास्टिआया भी रहता है. ऊ लोग तरक्की का ई रास्ता को चमचागिरी अऊर चाटुकारिता कहकर बदनाम करता रहता है. अरे भाई एकदम सिम्पुल रास्ता है ई, अऊर सबके लिए खुला है. लगे रहो मुन्ना भाई, कभी तो तुमरा भी दांव लगेगा. मगर दोसरा आदमी को दोस देना अच्छा बात नहीं है. केतना लोग को तो ई सब काम उसूल अउर आदर्स के खिलाफ मालूम होता है. ऊ लोग जिन्नगी भर एही कहते हुए पाए जाते हैं कि फलाना हमारा बैचमेट है, आज साला देखो कहाँ से कहाँ पहुँच गया. मगर जाने दो हम चमचई नहीं किए. अब ई समझना बहुत कठिन है कि चमचई नहीं करने का उनको फख्र है कि अफसोस.
एगो हमरे सीनियर थे. काम का ज्ञान केतना था ई कहना बेकार है. मगर हर काम के लिए उनका आदेस के साथ ई निर्देस सुनने में हमेसा आता था कि हमको काम में पर्फेक्सन चाहिए. हम यहाँ तक अपना पर्फेक्सन के बदौलत पहुंचे हैं. उनका मातहत उनसे बहुत परेसान रहता था. कारन कि केतनो बढ़िया काम करके ऊ लोग ले जाए तो काम में कोनों नुक्स निकालिए देते थे ऊ साहेब. एक रोज उनको हम फुर्सत के टाइम में पूछे कि यार तुम जो इतना पर्फेक्सन का रे‍कार्ड सब स्टाफ के सामने बजाते रहते हो, तुमरा का हाल था जब तुम ऊ लोग के जगह पर थे. साहेब एकदम इमोसनल हो गए, अउर जो खिस्सा ऊ सुनाए, उन्हीं का ज़ुबानी सुनिए अउर देखिये उनका पर्फेक्सन का नमूना.
उस समय हम शांत कुमार के अंडर में थे. तुमको तो पता ही है कि ऊ केतना सफाई पसंद आदमी थे. ज़रा सा काम में झोल बर्दास्त नहीं करते थे, अउर सब के सामने सुना देते थे. एक रोज ऊ हमको अपना केबिन में बोलाए अउर दरवाजा बंद करने के लिए बोले. दरवाजा बंद करके ऊ अपना पैंट से बेल्ट खोले अउर हमारे हाथ में बेल्ट देकर बोले कि ई बेल्ट को हम इस छेद में लगाते हैं तो हमको ढीला होता है अउर इसके पहले वाला में लगाते हैं तो कस जाता है. तुम किसी तरह दुनो के बीच में छेद करवा कर ले आओ. हम बेल्ट लेकर गए अउर आधा घंटा में ठीक बीच में अइसा छेद करवाकर लाये कि बेल्ट लगाने के बाद उनका चेहरा पर एकदम इत्मीनान का भाव था. शांत कुमार सर हमको बोले कि तुमरे जैसा परफेक्ट काम करने वाला आदमी हम आज तक नहीं देखे. बस तब से हम इस ऊंचाई तक पहुँच गए तरक्की लेकर, सिर्फ अपना पर्फेक्सन के बदौलत.
हमको तो राज पता चल गया, उनका पर्फेक्सन का भी, अउर उनका तरक्की का भी. हम मने-मन सोचे कि अच्छा हुआ कि शांत कुमार जी पान नहीं खाते थे. नहीं तो हमरे दोस्त उनको कभी पान थूकने नहीं देते. कर्तव्यपरायण इतना थे ऊ कि कह देते, सर! आप कहाँ पान थूकने जाइयेगा, हमारे मुंह में थूक दीजिए, हम जाकर आपके बदला बाहर थूक आयेंगे.

53 टिप्‍पणियां:

  1. क्या ही परफेक्ट व्यंग्य है।
    अइसा छेद करवाकर लाये कि बेल्ट लगाने के बाद उनका चेहरा पर एकदम इत्मीनान का भाव था. शांत कुमार सर हमको बोले कि तुमरे जैसा परफेक्ट काम करने वाला आदमी हम आज तक नहीं देखे.

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  2. आप जैसा परफेक्ट आदमी ही ऐसा पर्फेक्सन से ऐसा परफेक्ट व्यंग्य एकदम पर्फेक्सनाली लिख सकता है !

    अरे मजाक नहीं कर रहे है भाई ... कसम से ... परफेक्ट है एकदम ही !

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  3. सलिल भैया, शुरुआती पैरा पहले पढ़ रखा है मैंने, और कई औरों ने भी पढ़ा होगा। कहाँ, मेरी किसी पोस्ट पर आपने अपने कमेंट में लिखा था, हा हा हा।
    तब भी मजा आया था और आज भी आया। लगे हाथों मिलती जुलती एक सच घटना हम बताते हैं। हमारी एक डिफ़िकल्ट पोस्टिंग के दौरान वहां नियुक्त ड्राईवर ने, जो कभी क्षेत्रीय प्रबंधक का ड्राईवर रहा था, ने एक वरिष्ठ अधिकारी के बारे में उनके मुंह पर ही बतया कि इन्हें डिफ़िकल्ट पोस्टिंग इसलिये दी थी साहब ने क्योंकि इन्होंने उनके घर की सब्जी के लिये आलू काटते समय बड़े बड़े टुकड़े किये थे, और वो साहब कुछ प्रतिरोध नहीं कर पाये। पर्फ़ेक्ट न होने की सजा।

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  4. सशक्त व्यंग। हम अपनी सीढ़ी लेकर चलते हैं और उसी कमरे के सामने लगाते हैं, जहाँ जाना होता है। किसी से कोई प्रतियोगिता नहीं।

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  5. राम जी, सलिल जी आज तो आप तमाचा मारने के मूड में आ गए...... आपकी ये अदा भी बदिया लगी.

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  6. kya khoob likhe ho daddu, sach mein bohot sahi hai, tarakki ki seedhiyaan aise hi chadhi jaati hain, aur sahi bhi hai...raasta sabke liye khula hai, to chadho.....hihihi, badhiya seekh diye hain dadu ;)

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  7. सलिल जी दुनिया ऐसे ही परफेक्ट लोगो को चाहती है और भरी पड़ी भी है... सुन्दर व्यग्य...

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  8. प्रणाम सलिल जी
    २ महीने से आपको और आपकी लेखनी पढ़ रहे हैं और सच कहें तो आनंद ले रहे हैं , धन्यवाद इतनी सुन्दर तरीके से सामाजिक प्रक्रिया का चित्रण करने के लिए
    जीवन प्रक्रिया मैं सीढ़ी बनी क्यों ये हम आज तक समझ नहीं पाएं , हमे लगता हैं सब कुछ बराबर हैं ....पर एक बात हैं जिसने भी सीढ़ी बने काफी समझदार व्यक्ति होगा शायद ,पर आज का इंसान समझदारी से चालाकी के तरफ अग्रसर हैं और सीढ़ी उतरने चढ़ने मैं लगा गया ..ज़मीन छोड़ गया
    परफेक्ट परफेक्ट के चक्कर मैं पूरा समाज इम्परफेक्ट हो गया , ऊपर निचे होने लगा गया , ज़मीन छुट गयी ..आस्मां हो गया .
    गुस्ताखी माफ़ सर बेल्ट मैं कितना भी छेद करा ले , कण्ट्रोल तो कमर और पेट पर रखना हैं , चर्बी कण्ट्रोल मैं रहे तो सब कण्ट्रोल , नहीं तो कितनो छेद करा लीजिये फिट नहीं होगा

    सार्थक बातें लिखने के लिए धन्यवाद

    सदर सप्रेम आभार
    संजय शर्मा

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  9. Wah! Aisi tez tarrar bhasha padhke maza aa gaya! Is bhashane vyang ko na jane kitne chaand laga diye!

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  10. 'ऊपर वाले का गोड़ धरिये अऊर नीचे वाले को गोड़ से दबाते जाइए, भगवान आपको बहुत ऊंचाई तक ले जाएगा.'सच्चाई तो यही है सलिल जी , बहुत बढ़िया .......

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  11. भले लोग व्यंग्य कहें पर सच्चाई भी ऐसी ही है.कम से कम आज कल तो.

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  12. हर आफिस - आफिस की कहानी. ....तीखा व्यंग है.....

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  13. सलिल जी

    मुझे समझ नहीं आ रहा है की एक सीधे साधे ज्ञानवर्धक उन्नति सफलता का सही मार्ग दिखने वाले लेख को लोग व्यंग्य क्यों कह रहे है | जरुर ये लोग सीढ़ी नहीं चढ़ पाने की कसक निकाल रहे है | ज्ञान ग्रहण कर लिया गया है उम्मीद है जल्द ही मै उन्नति की नई उचाईया छू रही होंगी | ज्ञान देने के लिए बिहारी बाबु को फिर से धनबाद मिले |

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  14. बहुत ही बढ़िया व्यंग्य और ऐसे परफेक्ट लोग आज इस बॉस के सामने हाथ जोड़े खड़े होते हैं...कल बॉस बदल गया तो ये भी मुड जाते हैं पर मुद्रा वही रहती है...हाथ जोड़े,सर झुकाए की.

    कर्मठ लोगो के लिए तो ये भी सुना है नीचे वाले पैर पकड़ कर खींचते हैं और ऊपर वाले सर दबा ऊपर नहीं आने देते...इन दोनों का प्रतिरोध झेलते हुए आगे बढ़ना पड़ता है.

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  15. सलिल जी आज तो एक एक बात हमारे दिल का कह दिए हैं आप ..
    "ऊ लोग जिन्नगी भर एही कहते हुए पाए जाते हैं कि “फलाना हमारा बैचमेट है, आज साला देखो कहाँ से कहाँ पहुँच गया. मगर जाने दो हम चमचई नहीं किए.” अब ई समझना बहुत कठिन है कि चमचई नहीं करने का उनको फख्र है कि अफसोस"
    एकदम जोर का झटका बड़े प्यार से मारा है .
    जबर्दस्त्त व्यंग ..
    आप इस विधा में माहिर हैं .

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  16. का कहें...हाथ जोड़े परनाम की मुद्रा धारण किये खड़े हैं आपके श्री चरणों में...लाजवाब लेख लिख दिए हैं आप...वाह...

    नीरज

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  17. सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट

    bade bhaiya bade jaandaar ho aap:)
    kash hamko bhi aisan sidhi mil jata...lekin bhaiya ee sarkari office me kuchh nahi hone wala...haan thora bahut favour mil sakta hai...:)

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  18. अ‍इसन नमूना से रोज़े दू-चार होना परता है, का कहें। इसको सब बेंग (व्यंग्य) कह रहा है जबकि इससे जादा सच का होगा।

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  19. @मो सम कौन:
    पान वाला उदाहरण श्रेष्ठ व्यंग्यकार स्व.शरद जोशी से लिया है मैंने..और बाकी का सबकुछ मेरे जीवन से.. हाँ आपका उदाहरण/घटना/संस्मरण नोट कर लिया है..कभी इस्तेमाल करूँ तो अनुमति अपेक्षित रहेगी!! अग्रिम भेज देंगे तो आभारी रहेंगे!

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  20. भाई साहब आजकल इन्हीं का जमाना है। चाटूकारिता शॉर्टकट है आज के समय में आगे बढऩे के लिए। आपकी ही तरह अपन भी नहीं कर पाते ऐसा।

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  21. शुरु में परफेक्शन व तरक्की तथा लिफ्ट व सीढियाँ पढ कर अलग ही विषय का अनुमान हुआ पर संस्मरण पूरा पढ कर लगा कि वह अनुमान तो बचकाना सा था ।

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  22. बात आपकी बिलकुल सही और कहने का अंदाज़ हमेशा की तरह रोचक है लेकिन सर, आज के ज़माने की सच्चाई यही है की बहुत ही कम ऐसे अपवाद है जहाँ कर्मठ व्यक्ति अपना सम्मान व सफलता पा सका हो वर्ना तो लिफ्ट की सवारी करने वाले तथाकथित पर्फेक्षनिश्ट्स चापलूसों का ही बोलबाला है !!

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  23. सलिल भाईजी,
    अनुमति जैसे शब्दों का इस्तेमाल अपने साथ न करें, इतने भी कुटिल, कह्ल नहीं हम कि...:) हमारी बात हमारे से ज्यादा बेहतर तरीके से आप पहुंचायेंगे औरों तक, वो भी अपने अंदाज में, बहुत है।
    हम तो आभारी होते हैं कि हमारी कही, बताई कोई बात इस लायक हुई कि आप याद तो रखेंगे।

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  24. आपके व्‍यंग्‍य में लाखों कटारों की धार है। लाजवाब लेख !

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  25. वैसे ये बात हम कहते हुए बहुत को सुने हैं और कभी सोचते भी हैं जो आपने कहा
    ""ऊ लोग जिन्नगी भर एही कहते हुए पाए जाते हैं कि “फलाना हमारा बैचमेट है, आज साला देखो कहाँ से कहाँ पहुँच गया. मगर जाने दो हम चमचई नहीं किए.” अब ई समझना बहुत कठिन है कि चमचई नहीं करने का उनको फख्र है कि अफसोस"

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  26. बहुत सुन्दर रही आपकी पोस्ट!
    आज के चर्चा मंच पर इस पोस्ट को चर्चा मं सम्मिलित किया गया है!
    http://charchamanch.uchcharan.com/2010/12/376.html

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  27. सलिल जी ... आप सब कुछ परफ़ेक्ट ही करते हैं ... अब देखिए ये व्यंग और इसका हास्य और इसकी चोट ... सभी कुछ परफ़ेक्ट ही है ... जहाँ तक सीडी वाला प्रसंग है .. वो भी परफ़ेक्ट है ... बहुत कुछ है सीखने को इस बात में ...

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  28. "अब ई समझना बहुत कठिन है कि चमचई नहीं करने का उनको फख्र है कि अफसोस."

    क्या बात कहें हैं आप...एकदम दुरुस्त..अब ई भावना किसके भी मुंह से सुनेंगे तो आपका लिखा याद आएगा...

    और आपका ई लाइन तो कभी नहीं भूलेंगे...चाटुकारिता का बेंचमार्क है ई...

    “सर! आप कहाँ पान थूकने जाइयेगा, हमारे मुंह में थूक दीजिए, हम जाकर आपके बदला बाहर थूक आयेंगे.”

    एगो हमारा स्टाफ था..मर गए हम उसको काम सिखा सिखा के ,लेकिन नहीं का नहीं सीखा..लेकिन उसका भारी डिमांड था कस्टमर प्लेस में सब जगह..

    राज पता किये तो पता चला कि टेक्नीकल काम छोड़ के चाहे स्कूल में एडमिशन करना हो,गैस लेना हो या आड़ा तिरछा दुनिया का कोई भी काम करना हो,सब उसके बाएं हाथ का था..

    बन्दा आज के दिन होंडा सिटी में घूमता है शहर में और उसका अपना ही एक कम्पनी है..और सच पूछिए तो हम उसका एग्जाम्पल बाकी स्टाफ को देते हैं कि सर्विस का मतलब यही होता है..

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  29. सलिल भैया ,
    बिलकुल ठीक कह रहे हो ! अपने बास की चमचागिरी की बदौलत लोग प्रमोशन और पैसा खूब बनाते हैं ! और यह आज भी हर जगह देखना आम है ! आखिरी लाइन खूब जमी ....
    इनके परिवार में क्या संस्कार होंगे अंदाजा लगाया जा सकता है !

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  30. सटीक व्यंग, मुझे तो पढ़ने में मजा आता है..पर मैं इस भाषा में बात नहीं कर सकती पर सुनने में और पढ़ने में मुझे बहुत अच्छा लगता है इसीलिए ब्लॉग फॉलो भी किया है...

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  31. "ऊ लोग जिन्नगी भर एही कहते हुए पाए जाते हैं कि “फलाना हमारा बैचमेट है, आज साला देखो कहाँ से कहाँ पहुँच गया. मगर जाने दो हम चमचई नहीं किए.” अब ई समझना बहुत कठिन है कि चमचई नहीं करने का उनको फख्र है कि अफसोस"

    जिसको मौका नहीं मिलता उसे अफ़सोस होता है ..बहुत सही लिखा है ...

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  32. ऊपर वाले का गोड़ धरिये अऊर नीचे वाले को गोड़ से दबाते जाइए, भगवान आपको बहुत ऊंचाई तक ले जाएगा.
    भैया ये तो हमसे होता नहीं, तब हमारा का होगा! भैया आपकी लिखी कोई कविता पढने का मन है!

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  33. salil bhai ji
    bahut hi badhiyan,katar se bhi teekhi bhasha ka prayog aur bahut se anubhavo se gujarne ka bhaut hi khoobsurat andaz me ehsaas karane me purntah perfect aapka aalekh, bahut bahut hi kabile tarrif hai.
    aapki addhbhut lekhan ko dil se naman karti hun.
    baht bahut badhai
    poonam

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  34. “सर! आप कहाँ पान थूकने जाइयेगा, हमारे मुंह में थूक दीजिए, हम जाकर आपके बदला बाहर थूक आयेंगे.”
    ....sach mein koi kami nahi aaj aise insaanon kee... aaj bhi office-dar-office aise nazare khoob dekhne ko milte hai.....dhanya hai aise logon ka jameer....
    bahut hi saarthak sateek vyang... dhanyavaad

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  35. YO BHAIJEE....AHAN KI LIKH DAIT CHIYE.....KICHUO
    NAHI PHURAIT ACHI.....

    BAR DIV BAR NIMAN.....

    GOR LAGAIT CHI.

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  36. आखिरी सीढ़ी अकेले ही चढ़नी होती है। वहां परफेक्शन और तरक्की की परिभाषा दूसरी है। वहां सिर के पास बैठे हुओं को पांव दबाने का अवसर नहीं मिलता!

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  37. वाह, वाह... क्या टांग खिंचाई की है आपने।
    सीढ़ी का इस तरह से उपययोग करने वाले तो ज़रूर चिढ़ रहे होंगे।
    जबरर्दस्त व्यंग्य।

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  38. hehehehe...aap bhi gazab hain ..akhir wali bat padh ke badi zor kee hansi aayi ..han wo bat bahut sahi kahi aapne ke ye nahi samjh aata ki unki chatukari na karne ka garv hota hai ya afsos..ek dum sahi baat thi ..aur han kaheen ye sahab amir khan ke bichde bhai wai to nahi... Mr. perfectionist... hehehe

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  39. aap itne dhyan se 'marubhumi....'padhe aur apne vichar diye iske liye bahut-bahut dhanybad.main sirf apke shanka ka samadhan karna chahti hoon ki aabu-dhabi se jo jahaz uda tha usmen main 'sudan'ja rahi thi isiliye 'sahara desert'
    neeche dikha tha.asha hai anyatha nahin lenge aur aage bhi apne vicharon se awgat karate rahenge.

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  40. "ई समझना बहुत कठिन है कि चमचई नहीं करने का उनको फख्र है कि अफसोस."
    बात कही कैसे भी गई हो, है सोलह आने सच.

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  41. चमचई न करने का उन्हें फक्र है या अफ़सोस :)
    :)

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  42. यह व्यंग्य पहले भी पढा था . फिर पढ़ने में और भी आनन्द आया . हास्य और व्यंग्य के ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं पढ़ते पढ़ते हँसी भी आई और यह विचार भी कि चोट कितनी गहरी होगी ,तब ऐसी रचनाएं लिखी जातीं हैं .

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  43. एक बार फिर पढ़ने चले आये ब्लॉग बुलेटिन से ..

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