सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

एक फ़िल्म- स्क्रिप्ट


दू भाई बचपन में कुम्भ मेला में अलग हुआ अऊर बीस साल बाद मिल गया.
एक ठो आदमी अपना भाई को खोजते हुये, सरकारी दफ्तर में जाकर हाकिम से गोहार लगाता है अऊर जईसहिं बाहर निकलता है, उसका भाई दोसरा दरवाजा से अंदर आता है उसको खोजते हुए.
एगो आदमी एक लड़की को छोटी बहिन कहकर गले से लगाता है अऊर उसकी प्रेमिका उसी समय उसको देख लेती है अऊर गलत मतलब लगाकर उसको छोड़कर चली जाती है.
ऐक्सीडेण्ट में जब बूढ़ी औरत को खून का जरूरत था, तब ओही टाइम पर एगो नौजवान आकर उसको खून देता है अऊर जान बचाता है. बेचारी नौजवान को देख भी नहीं पाती है काहे कि अंधी थी अऊर नौजवान उसका बिछड़ा हुआ बेटा था.
आप सब लोग सोच रहे होंगे कि हम अलग अलग हिंदी सिनेमा का कहानी आपको सुना रहे हैं. असल जिन्नगी में एतना कोइंसिडेंस कहाँ होता है. बात भी सहिये है. सब सिनेमा का खिस्सा है. अगर सच्चो इस तरह का घटना घट भी जाये, तो लोग कहेगा कि एकदम सिनेमा हो गया.

हमरा ऑफिस में पब्लिक बैंकिंग नहीं है. लेकिन यहीं पर हमरा बैंक का एगो एन.आर.आई. साखा भी है. एक्के साथ बईठने के कारन हमको सब देखते रहते हैं कि ओहाँ कौन आया, कौन गया, किसका का सिकायत है. साखा में बिदेस से एन. आर. आई. ग्राहक लोग आता है. अऊर बहुत दिन के बाद आने के कारन, बहुत सा लोग को हर बार नया आदमी देखाई देता है. तब लोग पूछते हैं कि फलाने साहब कहाँ चले गए, अमुक जी बहुत अच्छे आदमी थे. चुँकि हम सामने बईठे होते हैं, इसलिये देखते सुनते सब हैं, बोलते नहीं हैं, जब तक हमसे कुछ पूछा नहीं जाए.

एक रोज हम अपना काम में बिजी थे. देखे सामने ब्रांच में कोई आदमी आया. गोरा रंग, माथा पर बाल कम, साधारण कद काठी अऊर बहुत मद्धिम आवाज. ब्रांच मैनेजर के सामने जाकर बईठ गया. दूनो में बातचीत सुरू हो गया. जेतना बात हम सुन पाए, उससे हमको लगा कि दूनो आदमी पुराना परिचित हैं अऊर इनका खाता डॉरमेण्ट हो गया है, काहे कि बहुत दिन से खाता चला नहीं था.

हम उधर से ध्यान हटाकर अपना काम में लग गये. हमलोग के बीच दूरी बहुत अधिक नहीं है, इसलिये हमको उनलोग का बात थोड़ा थोड़ा सुनाई दे जाता था. अपने खाता के साथ साथ बहुत से पुराना लोग के बारे में पूछ रहे थे. और मैनेजर अरोड़ा जी उनको बताते जा रहे थे. हम कंफुजियाए हुए थे कि आदमी हमरे बैंक के ग्राहक हैं कि बैंक के इस्टाफ. काहे कि जेतना लोग के बारे में जानकारी ले रहे थे, लोग तो एन. आर. आई. साखा में काम किया ही नहीं. तब सज्जन एतना गहराई से कईसे जानते हैं सबको. अचानक आगंतुक किसी के बारे में बोले कि उनका पोस्टिंग आजकल चाईना में है. अरोड़ा जी को भी नहीं पता था बात.
अरोड़ा जी अपने सीट से हमको पुकारकर पूछे, “वर्मा जी! आपको मालूम है कि आजकल शांघाई में किसकी पोस्टिंग है?”
गुप्ता जी के बाद कौन गया है मुझे नहीं मालूम.हम जवाब दिए.
इसके बाद तो बात खतम हो जाना चाहिये था.  लेकिन बात इसके बादे सुरू हुआ.
आगंतुक धीरे से अरोड़ा जी से पूछने लगे, “ये वर्मा जी कुछ लिखते विखते भी हैं क्या, नेट पर, ब्लॉग वगैरह?”
हाँ हाँ, लिखते रहते हैं.अरोड़ा जी बोले.
इतना सुनकर सज्जन उठे अऊर सीधा हमारे सामने आकर खड़े हो गये.

आज से पहले हम उनसे कभी नहीं मिले थे. उनका चेहरा देखकर भी कहीं देखे हुए नहीं लगे हमको. मगर उनके मुस्कुराहट में एक अजीब आकर्सन था अऊर आवाज में एतना मुलायमियत कि बस हम बँध गये. मुस्कुराकर अपना हाथ हमारे सामने बढ़ा दिये अऊर बोले, “अनुराग शर्मा!  आप सलिल वर्मा हैं न!
अरे! अजीब इत्तफाक़ है!  अऊर हम एकदम अबाक रह गये.
अबाक होने का कारन अनुराग जी नहीं थे, बल्कि संजोग था जिसके कारन उनसे मुलाकात हुआ. अनुराग जी भी परिचय के मोहताज नहिंये हैं. भारत आए हुए हैं, भी हमको पता था. उनके बारे में लोग बाग अपने अपने ब्लॉग पर लिख रहे थे, भी हम देखे थे. अमेरिका जाने के पहले हमारे बैंक में काम करते थे, भी हमको मालूम था. मगर अईसे मुलाक़ात होगा सोचे नहीं थे. कॉफी पीते पीते उनके साथ इधर उधर का बहुत बात हुआ. हमसे चैतन्य जी के बारे में भी पूछे.

दिन लगा कि संजोग खाली सिनेमा में ही नहीं होता है असली जिन्नगी में भी हो जाता है. अनुराग जी अगर अरोड़ा जी से उस आदमी  का  जिकिर नहीं किये होते, अरोड़ा जी को उसके बारे में पता होता, हमसे पूछे नहीं होते या अगर वर्मा जी कहकर पुकारते नहीं, तो एगो बहुत सुलझे हुए आला दर्जा के इंसान से हमारा भेंट नहीं हो पाता.
….
एगो हिरोईन रोते हुए कहती है, “आज अगर राय साहब रनबीर सिंह जिंदा होते तो क्या मैं इस तरह दर दर भटकती फिरती!
बात वहीं खड़ा एगो ज़मींदार सुन लेता है. पूछता है, “बेटी!  कहीं तुम रायपुर के रनबीर सिंह की बात तो नहीं कर रही.
हाँ बाबा! मैं बदनसीब उन्हीं की बेटी हूँ.
मगर उनकी तो कोई बेटी नहीं थी, तुम कैसे उनकी बेटी हो सकती हो.
उन्होंने मुझे अपनी बेटी की तरह पाला था.
बेटी राधा! कब से ये बूढ़ी आँखें तेरा इंतज़ार कर रही थीं. तेरा बाप ज़िंदा है. अपने दुश्मन से तेरी जान बचाने के लिये आज से बीस साल पहले मैं तुझे रनबीर सिंह के पास छोड़ आया था.

57 टिप्‍पणियां:

  1. Bade itminaan se padha aur bahut maza aa gaya! Life IS stranger than fiction!

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  2. अब क्या कहे ... मालिक ... बैंक में आप है ही ... तो रूपया का कोनो कमी नहीं ... एक्टिंग भी कर ही लेते है ... निर्देशित भी आप कर लेंगे यह भी हम को मालुम है कुल जमा में ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा है जो इस स्टोरी को एक बम्पर हिट फिल्म बनने से रोक सके ... तो हम कह रहे थे एक छोटा सा रोल हम को भी मिल जाता ... तो मज़ा आ जाता बाई गोंड की कसम !

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  3. क्या क्या संयोग जुटते हैं...सच सबकुछ फिल्म जैसा ही लगता है...

    आस-पास कितनी ही बातें ऐसी घटती हैं...मैं अक्सर कहती हूँ..अगर उन्हें, कहानी में डाल दूँ तो लोग कहेंगे....क्या कल्पना के घोड़े दौडाए हैं...पर सच है..कि Truth is stranger than fiction

    अब आपकी अनुराग जी से मुलाकात भी कितने संयोग से
    हो गयी..

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  4. आद. सलिल जी,
    ज़िन्दगी के सिनेमा में भी कभी कभी ऐसे संयोग आ जाते हैं जिस पर सहसा विश्वास नहीं होता !
    लेखन का प्रभाव हमेशा की तरह अंत तक बांधे रखा !
    वसंत पंचमी की शुभकामनाएं !

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  5. सुखद संयोग के लिए बसंत-पंचमी के साथ-साथ मुबारकवाद.

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  6. सो बिहारी बाबु की मुलाकात पिट्सवर्गी अनुराग शर्मा से हो गयी !

    यकीनन दो बढ़िया सुदर्शन व्यक्तित्व यूँ अचानक मिल जाएँ तो यह मिलन सुखद और यादगार तो होगा ही !

    आपकी तरह अनुराग शर्मा उन लोगों में से एक हैं जिसके कारण ब्लॉग जगत में पढने का मन लगता है !

    हार्दिक शुभकामनायें !

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  7. ऐसा संजोग हमारे साथ क्यों नहीं होता?
    बचपन में बहुत कल्पना की है इस दृश्य की कि रेल यात्रा में कोई ऐसा व्यक्ति सामने की सीट पर बैठा मिल जाए जो मेरा फैवरेट हो। पर कभी कोई नहीं मिला।
    अब तो सोच रहा हूँ कि आपसे ही टकरा जाऊँ संयोग से तो मजा आ जाए।

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  8. जीवन है ही विविधता का नाम ...शुक्रिया

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  9. ज़िन्दगी की फिल्म में भी बहुत संयोग घटित होते रहते हैं,सलिल भाई .पर उसे सारे दर्शक देख नहीं पाते.

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  10. सलिल भाई इसीलिए एक फिल्‍म में गीत हैं कि
    छोटी सी ये दुनिया,पहचाने रास्‍ते हैं,मिलोगे तो पूछेंगे हाल।

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  11. नदी-नाव संयोग।
    मजेदार संस्मरण। स्मार्ट उस्ताद जी तो पहले से ही कहते हैं, ’संयोग होते हैं, होते रहते हैं।’ कहीं पढ़ा था उनका ऐसा लिखा हुआ:)

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  12. वाकई अनुराग जी से मिलना एकदम फ़िल्मी टाइप संजोग था..एक फिल्म बना ही डालिए ..पर सच है ऐसे संयोग होते हैं और फिल्मे भी हकीकत का ही प्रतिबिम्ब होती हैं.

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  13. शिवम जी की बात पर गौर किया जाये | वाकई जीवन में कई बार ऐसे संजोग होते है की लगता है जैसे कोई फिल्म की कहानी, मेरा तो विवाह ही मेरे और मेरे पति के अचानक संयोग से से मिलने के कारण हुआ था | अब मै इतने साल बाद उनसे पूछती हूं की तुमको क्या लगता है वो संजोग तुम्हारे लिए अच्छा था या बुरा :)

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  14. भाई ने भाई को पहचाना.
    संयोग
    http://unluckyblackstar.blogspot.com/

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  15. पिछले दिनों संयोग से हमें भी एक अच्छा मित्र मिला है ...

    संयोग से अनुराग शर्मा जी का आपसे मिलना भी एक अद्-भुत घटना थी...

    बहुत बार कोई किसी को कोई कितना भी ढ़ूंढ़ता रहे...पर वह नहीं मिलता ...लेकिन कई बार संयोगवश ऐसे मिलना होता है कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते...जीवन भी एक ऐसा ही संयोग है ।

    इस संस्मरण का पहला और अंतिम भाग हमेशा की तरह एक खूबसुरत मोड़ है...जो मुख्य कथा को आरोह व अवरोह दे रहें हैं । बहुत सुंदर लेखन !!!

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  16. आपको सुखद लगा होगा ऐसा आश्चर्य. अनुराग शर्मा से मिलवाने के लिए धन्यवाद....

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  17. संयोग जीवन है और जीवन संयोग.... इन्ही से फिल्मे भी बनती हैं... ऐसे सुखद संयोग होते रहें यही कामना है... एक हमारे गुरूजी थे सुरेन्द्र प्रसाद साहू, हिंदी अधिकारी, बी सी सी एल... उनसे पत्राचार था.. एक ही शहर में रहने के बाद भी कभी मिले नहीं थे.... एक बार पटना से गंगा दामोदर एक्सप्रेस ट्रेन में साथ बैठ गए.. बहुत देर तक बातचीत होती रही.. बाद में उन्होंने पुछा कि भूली नगर में एक लड़का रहता है, कविता लिखता है.. जानते हो उसे... वो मैं ही था...

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  18. संयोग भी होते ही हैं ...एक सुखद संयोग की बहुत बधाई!

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  19. वर्मा जी,

    आप से मिलकर मुझे भी बहुत अच्छा लगा| मुलाकात छोटी भले ही रही हो परन्तु एक सुखद संयोग ज़रूर थी| खासकर नज़दीकी साझा मित्रों की पुरानी पहचान निकल आना। आपका आतिथ्य याद रहेगा।

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  20. dadu....pata hai....main jab bhi kahin bheed bhaad mein jaati hoon na, kahin ghoomne, ya koi exam likhne....ya kahin aur....to ek dream sequence chalta rehta hai raaste mein....ke aise hi koi puraana dost, koi primary ka classmate mil jayega.....hihi.....par kabhi nahin hua ;)

    accha lagta hoga na jab aise koi milta hoga :)

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  21. रश्मि जी की बात को दोहराऊँगा,Truth is stranger than fiction.
    बहुत रोचक लिखते हैं आप।
    ऐसे मीठे संयोग होते रहें।

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  22. हमेशा की तरह दिलचस्प पोस्ट...अनुराग जी जैसे नेक इंसान से अचानक हुई इस भेंट की बधाई...
    नीरज

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  23. ई घटना का जिकिर सुने थे आपसे ... सायद अरुण सर के साथ जहिया आये थे तहिये सुने .... लेकिन एतना रोचक ढंग से इसको आप लिखेंगे हम नहीं सोचे थे...आखिर में तो हँसते हँसते बुरा हाल हो गया ...

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  24. बसंत पंचमी के अवसर में मेरी शुभकामना है की आपकी कलम में माँ शारदे ऐसे ही ताकत दे...:)

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  25. ओ..... तभिये हम कहे कि ई अनुराग भाई बिहारी इस्टाइल में कैसे कमेन्ट कर दिए हमरे पोस्ट पर...आपका ही असर है...

    लेकिन जो कहिये...आपका भावना पोस्ट में छलक छलक के ऐसे बाहर आया है कि हमरे मन को भी एकदम हरिया गया...

    सज्जनों का संग बड़े पुन्य प्रताप के फलस्वरूप मिलता है...

    अनुराग भाई को हमरे तरफ से भी पाय लागी...

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  26. बहुत दिन बाद ब्लॉग पर आया हूं। दरअसल मैं अभी-अभी जिन्दगी के नए सफर पर निकला हूं। संयोग से हाल ही में जीवन संगनी मिली है। बुजुर्ग भी कहते आए हैं न शादी/विवाह सब संजोग का खेल है।

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  27. सलिल जी प्रणाम।
    अब जिन्नगी के बारे में का कहिएगा। इहो एक संजोग से कम है का। हम भी आपही के बगल में रहते है कभी हमरो ब्लाग पर नजर डालिएगा।

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  28. हर आदमी की किस्मत में लिखी है,
    जीत केवल संयोग की बात है।
    किरणें कभी-कभी कौंध कर चली जाती है,
    पर, बाकि जिंदगी अंधेरी रात है।
    सलील भाई, कम लिखना ज्यादा सनझना-बस------।

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  29. ब्लॉगजगत ने संबंधों के विस्तार का जो मंच दिया है,ऐसी मुलाकातें उसकी उपलब्धि हैं। आप हमेशा दूसरों की बात करते रहे,मगर देखिए,दूसरे आप पर नज़रें जमाए हैं। इसलिए,संयोगवश मिलना भी समान धरातल वाले व्यक्ति के साथ ही हुआ। यह संयोग कहीं न कहीं से तो जुड़ता होगा!

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  30. Chalo sanjog hi sahi do blooger`s ka milan to hua
    is sanjog ka parstutikaran akdam mast hai

    //maaf karna Salil ji tippani mobile se kar raha hoon isliye angreji me hai\\

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  31. भाई साहब, ज़िन्दगी में फ़िल्म घटित हो या नहीं, फ़िल्म में ज़िन्दगी हो या नहीं, आपकी पोस्ट एक चल चित्र से कम रोचक नहीं होते।

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  32. ये जीवन है संयोग विजोग घटित होना तो इसका नियम है। अच्छी लगी कहानी। धन्यवाद।

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  33. अनुराग-मिलन के क्षणों में आपके मनोभावों की मैं कल्पना कर रहा हूं। इन्हीं अनुभूतियों के लिए संभवतः कहा जाता है कि शब्द नहीं है। लेकिन जिस अनोखे प्रवाह के साथ आपने इस संयोग-कथा को शब्दों में पिरोया है, वह अद्भुत है। पढ़ते-पढ़ते उन क्षणों के दृश्य मन में आकृति ग्रहण करते गए और अनुभूतियां के रंग मन को चित्रित करने लगे।

    इस जीवंत वर्णन को पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे अनुराग-सलिल मिलन का मैं साक्षी हूं।

    इस दुर्लभ संयोग के लिए बधाई, वर्मा जी।

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  34. सलिल भाई, हमारा आपका मिलना भी तो एक सुखद सयोंग ही था!

    वैज्ञानिक भी कहते हैं कि "अस्तित्व के इस महा आयोजन में अपनी इस धरती का होना भी तो एक सयोंग है!"

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  35. सलिल साहब परनाम, अब जिंदगी कै ढंग बहुतै निराला बाय कौने मोड़ पर के मिल जाय. बहुतै बढ़िया लागेला अईसन संजोग . बढ़िया प्रस्तुति.

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  36. अद्भुत!आप पहचाने या अनुराग जी -माने पहल किधर से रही -यी मिस्त्री अनुराग जी 'साल्भ' करेगें !

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  37. हाय!! ये सुखद संयोग....इसी यात्रा के दौरान हमारी भी मुलाकात हुई अनुराग से..मगर इतना फिल्मी स्टाईल नहीं..हुई तो मुलाकात आपसे भी. आनन्द आ गया. :)

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  38. @उड़न तश्तरीः
    समीर भाई, ग़लत बात!हमारी आपकी मुलाक़ात भी कम फ़िल्मी नहीं थी! एक बार ग़ौर से फ़्लैश बैक में जाकर देखिये..या रीवाईण्ड करके.. वर्ना मुझेभी एक फ़िल्मी स्क्रिप्ट पार्ट टू लिखना पड़ेगी!!

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  39. अनुराग जी से बातचीत (फ़ोन पर) काफ़ी पुरानी है पर मुलाकात इस साल दिल्ली में हुई. समीर जी का बिटवा की शादी में तो उनसे मुलाकात हुआ ही था पर अगला पूरा दिन उनके दिल्ली निवास पर उनके परिवार के साथ बिताया. पर ये सब काफ़ी समय पहले से प्लान किया हुआ था आपकी तरह फ़िल्मी नही था.:)

    आपकी लच्छेदार पोस्ट पढकर आनंद आगया.

    रामराम

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  40. चलिये कोई तो मिला ब्लॉगजगत में भी.और मिला नहीं मिले.बहुत इन्तजार करा दिये है अाप दोनों.पाबला जी के यहाँ ही आपको विश करने वाले थे पर फिर यहाँ आ गये.आपको और संवेदना के स्वर को मेरी ओर से जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाऐं.याद नहीं आज के दिन हम किसी को विश किये है.ये पहली बार है.
    वैसे एक बात बताऊँ ?
    मुझे बचपन से ही लगता रहा है कि 12 फरवरी को पैदा होने वाले लोग बहुत ही अच्छे और सच्चे होते हैं.जाने क्यो.

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  41. ये किस्सा भी आपसे सुन लिया था पहले...पर पढ़ने में फिर भी मजा आया :)

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  42. अच्छा तो ई बात है.अब समझे.मेल मे पोस्ट का टाईटल देख के लगा कि कोनो गडबड है.वो हुआ यूँ कि हम जो है पहला पोस्ट पढने के बाद डिरेक्ट दूसरा पढना शूरू कर दिये.कुछ ज्यादा ही खो गये पोस्ट में .और ऊ का खतम कर बिना कोनू कमेंट पढें हियाँ ही टिपिया दिये.एगो बार ऊ जो ब्लॉगर है .....का नाम है उनका हाँ मुक्ति जी उनके ब्लॉग पर भी हम सेम टू सेम गलती किये रहे बहुत पहले.कहीं के मारे कहीं कमेंट कर दिये.चलिये कोनो बात नाही आप तक बधाई पहुँच गई ओ ही हमारे लिये बहुत है.आभार.

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  43. @आप पहचाने या अनुराग जी -माने पहल किधर से रही -यी मिस्त्री अनुराग जी 'साल्भ' करेगें !

    मिश्र जी, पहले पहचाना तो मैने ही, वर्माजी सुनते ही दिमाग की घंटी बज गयी और क्षण भर में शक्ल मैच हो गयी - का है कि पैटर्न मैचिंग में अपना पुराना अनुभव है।

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  44. औरैया में मेरा बचपन से एक दोस्त है आशीष , स्कूल में साथ पढ़े , परीक्षाएं साथ दीं , शैतानियाँ साथ करीं और मार भी साथ ही खायी , सबसे खास कि हम दुनो के नंबर भी लगभग एक से ही आते थे , कभी उसके ८-१० नम्बर ज्यादा कभी मेरे , कई बार तो एकदम बराबर आये , स्कूल में एक सर थे वो १२वी पास करने तक ये नहीं जान पाए कि दोनों में कौन आशीष है कौन आकाश , कहीं भी एक अगर कोई शैतानी करता था तो मार दोनों को पड़ती थी मास्टर साब कहते थे कि तम लोग अकेले कुछ कर ही नहीं सकते |
    लेकिन असली फ़िल्मी स्टोरी तो कॉलेज आने के बाद शुरू हुई | हम दोनों अलग अलग कॉलेज में आये , वो लखनऊ हम दुर्गापुर |
    जब हम नए नए कॉलेज आये थे तो नए नए दोस्त मिले सभी एक दूसरे का नाम याद करने का कोशिश कर रहे थे , वो लोग जब भी मेरा नाम भूल जाते थे , मुझे पता नहीं क्यों आशीष कहकर बुलाते थे जबकि न तो यहाँ मेरा कोई आशीष नाम का दोस्त है न ही ऊ आशीष के बारे में यहाँ कोई कुछ जानता है |
    आज भी यही सिलसिला है , मुझे जाने कितने लोग आज भी आशीष के नाम से जानते है |
    :)

    सादर

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