शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

गुल्लक


अपने सोसाईटी में कोनो बच्चा का जनमदिन था, तो उसके लिये गिफ्ट खरीदने बाजार गए अपनी बेटी के साथ. दोकान में एतना खिलौना देखकर माथा घूम जाता है. एगो पसंद आया तो बेटी बोली, “डैडी! ये तो पाँच साल से ज़्यादा उम्र के बच्चों के लिये है. सक्षम तो अभी तीन साल का है.हमको समझे में  नहीं आया    बात कि खिलौना खिलौना होता है अऊर बच्चा बच्चा होता है, अब तीन साल का अऊर पाँच साल का बच्चा में हमको तो कोनो फरक नहीं बुझाता है. भी जाने दीजिये, खिलौना के डिब्बा के ऊपर लिखा हुआ हैख़तराचोकिंग हाज़ार्ड्स!भाई जब एतने खतरा है तो बेच काहे रहे हो. खिलौना हो गया, दवाई हो गया कि नोटिस लगा दिये हैंबच्चों के पहुँच से दूर रखिये.” अब घर में अगर अलग अलग उमर का बच्चा हो, तो तीन साल वाला बच्चा को पाँच साल वाला के खिलौना से दूर रखना होगा! कमाल है!!
हम लोग का टाईम अच्छा था. खिलौना, खिलौना होता था. खिलौना में उमर का कोनो भेद नहीं होता था. बस एक्के भेद था कि लड़का अऊर लड़की का खिलौना अलग अलग होता था. लड़की लोग मट्टी का बर्तन चौका के खिलौना से खेलती थी. चाहे गुड़िया गुड्डा से, जो माँ, फुआ, मौसी, चाची पुराना कपड़ा से बना देती थीं. उधर लड़का लोग के पास गंगा किनारे लगने वाला सावनी मेला से लाया हुआ लकड़ी का गाड़ी, ट्रक, मट्टी का बना हुआ सीटी, लट्टू , चरखी. सबसे अच्छा बात था कि खेलता सब लोग मिलकर था. अऊर कभी चोकिंग हैज़ार्ड्स का चेतावनी लिखा हुआ नहीं देखे.
सब खिलौना के बीच में एगो अऊर चीज था. जिसको खिलौना नहीं कह सकते हैं, लेकिन बचपन से अलग भी नहीं कर सकते हैं. लड़का लड़की का भेद के बिना दूनो में पाया जाता था. बस समझिये कि होस सम्भालने के साथ खिलौना बच्चा लोग से जुट जाता था. पकाया हुआ मट्टी से बना , एगो अण्डाकार खोखला बर्तन जिसमें बस एगो छोटा सा पतला  छेद बना होता था. हई देखिये, एक्साईटमेण्ट में हम बताना भी भुला गये कि उसको गुल्लक बोलते हैं.
करीब करीब हर बच्चा के पास गुल्लक होता था. कमाल का चीज होता था गुल्लक भी. इसमें बना हुआ छेद से खुदरा पईसा इसमें डाल दिया जाता था, जो आसानी से निकलता नहीं था. जब भर जाता, तो इसको फोड़कर जमा पईसा निकाल लिया जाता था. बचपन से फिजूलखर्ची रोकने, छोटा छोटा बचत करने, जरूरत के समय उस पईसा से माँ बाप  का मदद करना अऊर जमा पूँजी से कोई बहुत जरूरी काम करने, छोटे बचत से बड़ा सपना पूरा करने, एही गुल्लक के माध्यम से सीख जाता था. अऊर ओही बचत का कमाल है कि आज भी हम अपना याद के गुल्लक से सब  संसमरन निकालकर आपको सुना पा रहे हैं.
इस्कूल में पॉकेट खर्च के नाम पर तो हमलोग को पाँच पईसा से सुरू होकर आठ आना तक मिलता था. बीच में दस, बीस,चार आना भी आता था. अब इस्कूल में बेकार का चूरन, फुचका, चाट खाने से अच्छा एही था कि पईसा गुल्लक में जमा कर दें. पिता जी के पॉकेट में जब रेजगारी बजने लगता, तो निकालकर हम लोग को दे देते थे, गुल्लक में डालने के लिये. एही सब रास्ता से पईसा चलकर गुल्लक के अंदर पहुँचता था. जमा पूँजी में केतना इजाफा हो गया, इसका पता उसका आवाज़ से लगता था. अधजल गगरी के तरह, कम पूँजी वाला गुल्लक जादा आवाज करता था अऊर भरा हुआ रहता था चुपचाप, सांत. मगर प्रकीर्ती का नियम देखिये, फल से लदा हुआ पेड़ पर जईसे सबसे जादा पत्थर फेंका जाता है, ओईसहिं भरा हुआ सांत गुल्लक सबसे पहिले कुरबान होता था.
अब गुल्लक के जगह पिग्गी बैंक गया है. उसमें सिक्का के जगह नोट डाला जाता है. सिक्का सब भी तो खतम हो गया धीरे धीरे. पाँच, दस, बीस पईसा तो इतिहास का बात हो गया. बैंको में चेक काटते समय पईसा नदारद, फोन का बिल, अखबार का बिल, रासन का बिल, तरकारी वाला का बिल सब में से पईसा गायब. लोग आजकल नोट कमाने के फेर में लगा हुआ है, पईसा जमा करना बहुत टाईम टेकिंग जॉब है. इसीलिये उनका याद का गुल्लक में भी कोई कीमती सिक्का नहीं मिलता है.
दू चार महीना में चवन्नी भी गायब हो जाएगा. अब चवन्न्नी के साथ जुड़ा हुआ चवन्नी छाप आसिक, या महबूबा का चवनिया मुस्कान कहाँ जाएगा. बचपन से सुन रहे हैं किसोर दा का गानापाँच रुपईया बारा आना”.. इसका मतलब किसको समझा पाईयेगा. अऊर गुरु देव गुलज़ार साहब का नज़्म तो साहित्त से इतिहास हो  जाएगाः
एक दफ़ा वो याद है तुमको
बिन बत्ती जब साइकिल का चालान हुआ था
हमने कैसे भूखे प्यासे बेचारों सी ऐक्टिंग की थी
हवलदार ने उल्टा एक अठन्नी देकर भेज दिया था.
एक चवन्नी मेरी थी, वो भिजवा दो!
बेटी अऊर बेटा का परीच्छा हो, चाहे किसी का तबियत खराब हो, हमरी माता जी भगवान से बतिया रही हैं कि अच्छा नम्बर से पास हो गया या तबियत ठीक हो गया तो सवा रुपया का परसाद चढ़ाएँगे. सोचते हैं माता जी को बता दें कि अब भगवान का फीस बढ़ा दीजिये अऊर अपना प्रार्थना में सुधार कर लीजिये!


53 टिप्‍पणियां:

  1. मेले जाने पर चवन्नी मिलती थी खर्चे के लिए और उसी में खुद को कितना अमीर मान बैठते थे , मिटटी की गुल्लक तो अभी भी खरीद लाती हूँ , जब मन करता है ...
    बचपन के खिलौने , मेला ,चवन्नी ...क्या- क्या याद हो आया ...चवन्नी, अठन्नी का हाल भी एक , दो , पांच, दस पैसे जैसा ही हो गया है !
    पोस्ट के साथ जैसे मेला घूम आये हम तो !

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  2. भरा रहे आपका गुल्‍लक और ब्‍याज में इसी तरह आती रहें पोस्‍ट.

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  3. हम भी अपने बचपन में इन गुल्लकोँ में पैसे जमा किया करते थे। बढ़िया पोस्ट।
    एक शेर याद आ गया-

    घर आ के रोए थे माँ बाप अकेले में
    मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में

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  4. बाटा के दाम में हमेशा 95 पैसा होता था - अब बदल गया क्या?

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  5. हम भी गुल्लक खरीदवायें हैं दोनों को, बचत में दोनों का मन लगा है।

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  6. हॉस्टल जाने से पहले तक की इतनी गुल्लकें हैं, उनकी इतनी यादें है और मेरे घर में है आज भी एक गुल्लक है। ३ साल से फोड़ा नहीं है, सोचता हूँ अब नहीं खरीद पाऊँगा। और ऐसा मैं करना नहीं चाहता। बचपन बचा रहना चाहिए।
    आपकी पोस्ट पढ़ के मैं कई कई बार घर-ननिहाल हो आता हूँ।
    आभार व्यक्त करना तो बनता ही है।

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  7. @अनुराग जी,

    मेरी जानकारी के हिसाब से २००५ में बता ने ९५ पैसा हटा दिए थे दामों से।
    आते-आते २००६ से पूरी तरह से पैसों वाली कीमतें बदल गयीं थीं। :)

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  8. बचपन में गुल्‍लक रखने का मौका नहीं मिला। इसीलिए पहले बच्‍चों की एक पत्रिका शुरू करने का मौका मिला तो उसका नाम गुल्‍लक रख लिया। पत्रिका बंद हो गई तो हमने अपने ब्‍लाग का नाम ही गुल्‍लक रख लिया है। वैसे है बड़े काम की चीज।

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  9. बरसों पुरानी यादें दिलाता आपका लेख पढ़कर, खो जाना अच्छा लगता है !
    शीर्षक से राजेश उत्साही की याद दिला दी , मगर यहाँ ये मधुर यादें मिली ! राजेश उत्साही पर आपकी लेखनी और भावनाएं पढना चाहूंगा ...वे सर्वथा योग्य है कि किसी का भी ध्यान खींच सकें ! शुभकामनायें !

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  10. चाहें गुल्लक हो या चवन्नी ..सब बचपन में ले जाते है ..गुल्लक से हमारी कभी निभी नहीं ..कभी इतना धैर्य रहा नहीं की उसके भरने का इंतज़ार करे ..चिमटी से पिन से नोट खींच ही लेते थे

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  11. अब भगवान का फीस बढ़ा दीजिये अऊर अपना प्रार्थना में सुधार कर लीजिये!.......ye baat apne sahi kahi............

    'gullak' ..... ye to karun-ka-khazana tha hamre
    time me........

    pranam.

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  12. सलिल जी इस पोस्ट पर कमेन्ट स्वरुप मेरी यह छोटी सी कविता जो जनवरी २०१० में प्रकाशित हुई थी मेरे अपने ब्लॉग पर, स्वीकार कीजिये... ख़ुशी है कि संवेदना के स्तर पर मैं खुद को आपके करीब पा रहा हूँ आज ..
    **********************
    गुल्लक
    *********************
    बच्चों को
    अच्छा लगता है
    गुल्लक

    क्योंकि
    अच्छा लगता है
    दादा की चवन्नी
    दादी की अठन्नी
    काका का सिक्का


    बच्चों को
    अच्छा लगता है
    गुल्लक

    क्योंकि
    अच्छा लगता है
    छोटी छोटी बचत से
    'सपनो को सच करने' का सपना
    माँ के लिए इक अदद साड़ी लाने का सपना
    पिता के लिए चश्मे का सपना
    गुल्लक के भर जाने के बाद...

    अब गुल्लक
    नहीं रहे
    और नहीं रहे
    छोटी छोटी बचत से
    पूरे होने वाले सपने !
    *************

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  13. पैसो में चव्वनी और अठन्नी की अपनी ही जगह थी उसका प्रयोग पैसो से इतर भी किया जाता था | यहाँ मुंबई में वो मिटटी वाले गुल्लक तो मिलते ही नहीं मुझे तो बनारस जा कर लाना पड़ा अब एक बार ही ला सकती थी तो बड़ा वाला ले आई बस बेटी को दिखने के लिए जिसे मेरी बिटिया कृष्ण की मटकी कहती है और जन्माष्टमी पर उसे फोड़ने की जिद्द करती है छुपा कर रखना पड़ता है | उनका आज का आधुनिक बिग्गी बैंक है जब लाया तो बताया की इसमें पैसे डाल कर इसे भरना होता है बस घर के सारे सिक्के मांग मांग कर उसे एक ही दिन में भरने का प्रयास शुरू कर दिया का करे बेचारी मैंने बच्चा समझ बच्चो वाली बात कर दी और कह दिया जब ये भर जायेगा तो इसमे से मॉसमैलो निकलेगा, तब से वो मुझसे शिकायत करी है की ये ख़राब है इसमे से मॉस मैलो नहीं निकालता है | और रही बात खिलौनों और बच्चो की उम्र का रिश्ता तो याद होगा की रामायण महाभारत देख कितने बच्चो ने तीर से अपनी आँखे फोड़वा ली थी |

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  14. एकदम मन का बात कह दिए भाई जी...एक एक शब्द....

    अब अलग से क्या कहें...

    लेकिन और जो हो सो हो,समय के साथ याद का गुल्लक औरे समरिध होता जा रहा है...और सच पूछिए तो यही तो अपना पूंजी है...

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  15. मन जुरा गया।
    गुल्लक त अब देखै‍बे नहीं करता है।
    बचबा सब को आज कल चाहिए पॉकेट मनी और उसको भी जेबिए में रखेगा अ‍उर ऊ भी चमरौटा बेग में।
    धुत्त!!
    गुल्लक में से झारू के काठी से पंच पैसाही निकाल कर घुपचुप खाने का मज़ा ई छौरा सब का जाने।

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  16. आज तो इस पोस्ट से बचपन में पहुंचा दिया ...जब भाई बहन की लड़ाई होती थी तो अपना गुस्सा दिखाने के लिए दूसरे की गुल्लक ही फोड़ देते थे ....इससे ज्यादा कष्ट और कुछ नहीं होता था कि गुल्लक टूट गयी .... दसवीं का इम्तिहान पास कर जब पहली कलाई घडी मिली तो गुल्लक के पैसों से ही ...

    चवन्नी और अठन्नी दिल्ली में गायब हो चुकी हैं ...बहुत सी चवन्नी और अठन्नियां जमा हैं ...कोई नहीं लेता ...हँस कर कह देते हैं .जी किसी मंदिर में दे आईये ...यानि की सुझाते हैं भगवान जी को धोखा दे आइये :):)

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  17. गुल्लक पर आपका आलेख और अरुण चन्द्र राय जी की कविता अच्छी लगी.

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  18. प्रसिद्ध बांग्ला उपन्यासकार बिमल मित्र ने लिखा है -‘‘जिसको खेलना आता है वह कानी कौड़ी से भी खेल सकता है‘‘
    यह बात आपके इस रोचक संस्मरण को पढ़कर याद आ गई।
    मन ही मन मैंने अपने आप से कहा- ‘‘जिसको लिखना आता है वह माटी के गुल्लक पर भी लिख सकता है।

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  19. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (26.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  20. चवन्नी-अठन्नी तो खैर कभी की बन्द ही हो चुकी है । अब तो 1-2 व 5 रु. के लेन-देन में भी दुकानदार की कोशिश 10 के राउन्ड फीगर तक पहुँचा देने की ही रहती है । इसी लिये गुल्लक की आवाज भी अब गायब होती जा रही है ।

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  21. गुल्लक से पिग्गी बेंक तक बहुत कुछ बदल गया है ...बचपन में पहुंचा दिया आपने.
    (आपका ब्लॉग न जाने मेरे डैश बोर्ड पर क्यों नहीं दिखा रहा.मुश्किल से ढूंढ कर आ पाए हैं.)

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  22. गुल्लक में जामा एक एक पैसा जैसे जान से लगा कर रखते थे वैसे ही उससे निकला संस्मरण भी बहुत कीमती होते हैं फिर से जी लेते हैं उस बचपन को. बल्कि सच तो ये है उस समय सबका बचपन कमोबेश एक जैसा ही होता था और आज सबका अलग अलग .

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  23. सलिल जी,
    गुल्लक में पैसे डालते थे और सपने पालते थे. सपने भी ऐसे जिन पर आज हंसी आती है.
    क्या आपको नहीं लगता कि विश्व-व्यापी मंदी के दौर में भारत को बचाने वाली यह गुल्लक-परम्परा ही थी !

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  24. तेरा सच है तेरे अज़ाबों में,
    झूठ लिखा है सब किताबों में...

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  25. @अरूण जीः
    कमाल का सप्लिमेंट प्रस्तुत किया है आपने..
    @अंशुमाला जीः
    सही उदाहरण दिये हैं आपने... और किशन की मटकी वाली बात दिल में बस गई!
    @सोनल जी/मनोज जीः
    झाड़ू का सींक और चिमटी तथा पिन से पैसा निकालना भी एक आर्ट होता था. एक्स्पर्ट लोग इसके भी पाँच पैसे फीस लेते थे.
    @वर्मा साः
    आशीष आपका शिरोधार्य करता हूँ और इन्हीं से प्रेरणा पाता हूँ.
    @रजनी कांत जीः
    हमारे देश ने तो गुल्लक को भिक्षा पात्र से रिप्लेस कर दिया.. कभी वर्ल्ड बैंक तो कभी आई.एम.एफ.

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  26. आद.सलिल जी,
    आज आपकी पोस्ट ने एक तो बचपन की मीठी यादों का ताज़ा कर दिया दूसरे इस बात पर सोचने पर मज़बूर कर दिया कि लगातार पैसे और इंसान की घटती हुई क़ीमत हमें कहाँ ले जायेगी !
    सार्थक लेख के लिए साधुवाद!

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  27. चवन्नी को गुल्लक के साथ खूब जोड़ा है आपने.
    भगवान् जी का चढावा भी ग्याराह रूपये तक जा पहुंचा है.
    आपकी रचनाएँ चौपाल से निकलती हैं और ओबामा तक मार करती हैं.
    मैं तो फैन हो गया आपका.
    सलाम.

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  28. मै तो अपनी गुल्लक का सुराख पहले दि नही चाकू से छील के बडा कर देता था, सुबह को पिता जी से लेकर डालता था स्कूल से आने के बाद निकाल लेता था

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  29. कितनी सारी यादें जुड़ी हैं..गुल्लक से...सब एक एक कर याद आने लगीं...और उसपर ये इजाज़त के गाने की पंक्तियों ने तो बस गज़ब ही ढा दिया...

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  30. @ हम लोग का टाईम अच्छा था -
    सलिल भैया, ये एक ऐसा शाश्वत डायलाग है जो हर पीढ़ी बोलती है। अब मैं भी बोलता हूं:)
    मिट्टी की गुल्लक से बचपन की बहुत यादें जुड़ी हैं और बच्चों को भी लेकर दे रखी है बल्कि हमेशा से रहती है। ये हम लोगों की जिन्दगी का अहम हिस्सा था जो अवचेतन में ऐसा गहरा बैठा है कि भविष्य के लिये कुछ प्रोविज़निंग की शुरूआत यहीं से होती है।
    लाजवाब प्रस्तुति, मिट्टी की तरह सोंधी। आभार स्वीकार करें।

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  31. आपकी यह सरस मनभावन बतकही पढने के बाद में भी दिल में छायी रहती है.
    आपका नाम याद नहीं आया वरना आपके नाम का भी उल्लेख करना चाहता था अभी जब आपके ब्लॉग पर आया तो एहसास हुआ :)

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  32. गुल्लक से अपना प्रेम तो आज भी जारी है। रखने का कारण बदल गया है। पहले पांच पैसे का एक सिक्का डालते ही असंख्य ख्वाब घुमड़ते थे दिल में। उंगलिया थरथराती थीं। हथेलियां तौलती थीं वजन। अब डालता हूँ भारी सिक्के तो उतारता हूँ बोझ जेब का। बेकार लगते हैं रेजगारी जेब में। हाँ, एकांत में जब होता हूँ खुद के साथ तो कभी-कभी अनायास महसूस करा देते हैं सिक्के मेरे बदले अंदाज को। भारी पड़ता है मुझ पर अपना ही बदला हुआ अंदाज।
    ....आपकी इस पोस्ट ने यादों का समंदर पार कर लिया एक झटके में।

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  33. कभी कभी लगता है कि किस्सों और सिखावनों की आपकी इस गुल्लक के अन्दर हम बैठें हैं और बारी बारे से जब एक एक चवन्नी, अनमोल अनुभव लेकर अन्दर आती है तो हम सब खुशी से उछल पड़तें हैं।

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  34. लेख बहुत ही प्रेरणा दायक है....लाजवाब प्रस्तुति.

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  35. बहुत बढ़िया ..... बच्चों को ऐसी सीख मिल जाये तो कहने ही क्या......

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  36. बचपन में पहुंचा दिया आपने.
    लेख बहुत ही प्रेरणा दायक है
    लाजवाब प्रस्तुति********

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  37. यह गुल्लक सदा बना रहे...
    चवन्नी,अठन्नी,बारह-आने अब कहॉ रहे

    आपकी पोस्ट बचपन की बहुत सी यादों को ताजा कर गई ।

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  38. गुल्लक से याद आई...ईमली...बेर...बम्बई की मिठाई...और स्कूल की संचयिका...और...बहुत कुछ...
    @ हम लोग का टाईम अच्छा था -
    सलिल भैया, ये एक ऐसा शाश्वत डायलाग है जो हर पीढ़ी बोलती है। अब मैं भी बोलता हूं:)....------------और मैं भी...संजय जी के ही साथ...

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  39. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  40. गुल्लक गया बचत गई, गया चवन्नी का साया।
    कर्ज़ में खुदगर्ज़ बनते, जब गया शुभ सवाया ॥

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  41. अब चवन्‍नी भी आउट ऑफ चलन हो गई है, जैसे "कौड़ी की कोई औकात नहीं" का मतलब आज की जनरेशन नहीं समझती, वैसे ही ''चवन्‍नी छाप'' नामक मुहावरा भी अर्थहीन हो जायेगा

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  42. अपने जमाने की चवन्नियाँ अठनियां जितना सुख देती थी वो आज कहाँ। अब तो शब्दों की चवन्नियाँ अठन्नियां ही अपनी गुल्लक मे रखती हूँ। बचपन की याद दिला दी। वैसे बचपन भूलता ही कब है? शुभकामनायें

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  43. वोह-- कहां पहुंचा दिये , पिताजी कुछ सिक्के बिखेरते थे और हम सब भाई बहन अपनी गुल्लक के लिये गुथ्थम गुथ्था हो जाते । मैं छोटा था ,खाली हाथ --रोने लगता । फिर पिताजी सबसे एक एक सिक्का मेरे गुल्लक में डलवाते ।

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  44. गुल्लकों के साथ एक और प्रकार के चीनी के बने खिलौने भी याद आये -खेल लो खिलायिलो टूट जाय तो खाय लो ....

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  45. हा...हम 'चुकिया' कहते थे आप भी यही कहते होंगे....हमको भी बचत का आदत था जो अभी तक बन्नले है....कभी कभी डाबर दन्त मंजन के डिब्बा में छेद करके उसी को चुकिया बना देते थे..
    कनाडा आने की बाद यही काम शुरू किये लेकिन अबकी चुकिया जैसा कोनो चीज़ नहीं था...एक थो डिब्बा में रखते हैं...
    आपका पोस्ट पढके गिनने बैठे की कितना जमा हुआ है....मानियेगा नहीं...अभिये गिने हैं ....
    १७ मैहना में पूरा १७४ डौलर जमा हो गया है.....बाप रे....मज़ा आगया हमको तो.....

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  46. यही तो आपके पोस्ट का खासियत है कि इस से हर कोई अपने को जोर लेता है. समय के रफ़्तार में मेटेरियलस्टिक हो रही पीढी के एमोशानल कराइसिस का का जीवंत चित्रण प्रस्तुत किये हैं. मगर मार बढ़नी ई महानगरीय जीवन को ससुर करेडिट काट बैग भर के मिल जाएगा.... मगर गुल्लक खोजिये तो..... और ऊ में भी आपके गुरुदेव आजो लिखते हैं, "आजा आजा दिल निचोरें.... कोई 'गुल्लक' तो फोड़ें." !

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  47. ye to hona hi hai dadu....waqt aage hi badhta hai peeche nahin aata....par jo trip down the memory lane aap le gaye...wah, maza aagaya, actually, yaad aa gayi ;)

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  48. पापा हर दिन शाम में हम दोनों भाई बहन को चेंच पईसा ला कर दे देते थे गुल्लक खरीदने के लिए...चचा जी, जब हम आठवां क्लास में थे न...तब एक घड़ी ख़रीदे थे, इसी गुल्लक में जमा किया हुआ पईसा से...:)
    एक गुल्लक मेरा रहता था, और दूसरा मेरी बहन का...जब वो भर जाता था, तब उसको फोड़ के कितना पैसा हुआ ये गिनने में उस वक्त सबसे ज्यादा मजा आता था :)

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  49. हालाँकि बचपन में पिता जी ने कभी भी हमको कोई पाकिटमनी वगैरह नहीं दी , लेकिन उनसे जो भी मांगो तुरंत मिल जाता था | वो कहते थे कि तुमको जो चाहिए हमसे बोलो हम ला के देंगे तुमको पइसा जोड़ने का क्या जरुरत. उन्ही का सिखाया हुआ है जो मैं आज भी फिजूलखर्ची से बचा हूँ |

    सादर

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