एगो बहुत पुराना कहावत है कि बिना किताब के कमरा, बिना आत्मा के सरीर जइसा
होता है. मगर हमरे साथ तनी बात दोसरा है. हमरे लिये त बिना डीवीडी के कमरा भी, बिना आत्मा के सरीर
जइसा है. आजकल अकेले रहने अऊर हर हफ्ते बस का सफर करने के कारन अपना दुन्नो आत्मा
को अपने सरीर में बसाए रखने का मौका मिला. बस में किताब पढ़ना अऊर घर पर सिनेमा
देखना. एक अस्टार से लेकर फाइभ अस्टार तक का सिनेमा देख गये. कुछ नामवर – कुछ
अनजान. लेकिन एही चक्कर में बहुत सा बढ़िया सिनेमा भी देखने को मिला.
खैर, गुजरात में हंगामा अऊर तोड़फोड़ के बाद चुपके से हम भी कल देखिये लिये – राम
लीला (गोलियों की रासलीला). 15 नवम्बर को रिलीज होने के बाद से बहुत लोग बहुत
तरह का बात बोला, अच्छा है, बेकार है. मगर हमरा त पुराना सिद्धांत है, अनुभव हमेसा
अपने होता है, दोसरा का अनुभव त हमरे लिये जानकारिये हुआ ना. इसलिये देखने बइठ
गये कि कुछ न कुछ त अच्छा होबे करेगा, आखिर एतना काबिल डायरेक्टर हैं संजय लीला
भंसाली.
सिनमा चालू होते के साथ बुझा गया कि चचा सेक्सपियेर का मसहूर “रोमियो ऍण्ड जुलियेट” का कहानी है. का मालूम
केतना सिनेमा बना है इसके ऊपर. एगो अऊर सही. सेक्सपियेर के कॅप्युलेट अऊर मोण्टेग
खान्दान के तरह एहाँ भी सनेड़ा अऊर रजाड़ी खानदान का दुस्मनी अऊर दुनो खानदान के
लड़का-लड़की का प्यार. सुरुआत अऊर अंत के बीच में बस “गोलियों की रासलीला” है. अंत, जब रोमियो-जुलियेट वाला कहानी है, त बताने
का जरूरत नहीं.
सिनमा, नाम से कोनो लभ-स्टोरी मालूम पड़ता है अऊर होना भी चाहिये था. लेकिन
पूरा सिनमा में गोलाबारी के अलावा कुच्छो नहीं है. एहाँ तक कि दुन्नो
प्रेमी-प्रेमिका भी हर समय बन्दूक ताने रहता है. परकास झा का फिलिम “राजनीति” में जइसे पोलिटिकल पार्टी का नेता लोग एक के बाद अपना बिरोधी को तड़ से गोली
मार देता था, ओइसहिं ई सिनमा में भी बस गोली मारने का कम्पटीसन लगाये हुये था सब.
सायद एही सब देखते हुये लोग ई सिनमा को नापसन्द किया होगा. “गुज़ारिश” जइसा सिनमा के बाद ई राम-लीला भी बहुत अच्छा लभ इस्टोरी हो सकता था, लेकिन का
मालूम का कहना चाह रहे थे संजय बाबू.
कुच्छो हो, जब साठ-सत्तर करोड़
रुपया लगाकर संजय लीला भंसाली कोनो फिलिम बनाए हैं, त कुछ न कुछ त निमन बात होबे
करेगा. हमरे लिये त फिलिम का पइसा बसूल बात है सुप्रिया पाठक. “बाज़ार” की छरहरी छोकरी आज फैलकर “राम लीला” का धनकौर बा बन गयी है, मगर जब करेक्टर में उतरती है
त उसका भिलेनई के आगे अमरीस पुरी भी काँप जाएँ. उनका गेट-अप, मैनरिज्म, डायलॉग
बोलना अऊर अपना हर अंग से ऐक्टिंग करना... बस कमाल छोड़कर कोनो दोसरा सब्द नहीं है
हमारे पास. अब ई मत कहिएगा कि हम एतना तारीफ इसलिये कर रहे हैं कि इनकी अम्मा ओहीं
की हैं जहाँ हम आजकल बिराजमान हैं जिला अमरेली, गुजरात. ई त संजोग है! धनकौर बा का
करेक्टर बास्तव में भंसाली साहब पोरबन्दर की संतोकबेन जाडेजा (जिनके ऊपर
फिलिम बना था “गॉडमदर”) को ध्यान में रखकर गढ़े हैं, मगर एहाँ सुप्रिया, सबाना आजमी से एक्कईस साबित
हुई है. दोसरा ऐक्टर जो अपना छोटा सा रोल में परभावित किया ऊ है सरद केलकर, लीला
का बड़ा भाई कांजी भाई. कमाल का आवाज है. आवाज का क्वालिटी के साथ सम्बाद का
उतार-चढाव और आँख से एक्स्प्रेस करना बहुत परभावसाली है, हाँ इसमें फिलिम के
लाइटिंग का भी जबर्दस्त जोगदान रहा है. हर पात्र का करेक्टर उभर के सामने आया है.
फिलिम के सम्बाद को अलग-अलग हिस्सा
में बाँटकर देखने से सायद हम अपना बात खुलकर कह पायेंगे. पहिला बात- गुजरात का
बैकग्राउण्ड होने के कारन सम्बाद को गुजराती देखाने के लिये कहीं-कहीं पर
जबर्दस्ती “छूँ” या “छे” डाल दिया गया है. दूसरा बात – सम्बाद का स्तर बहुत अच्छा है. खासतौर पर धनकौर
बा का सम्बाद सब. सुप्रिया पाठक के अदायगी को सम्बाद के कारन अऊर निखार मिला है.
तीसरा अऊर सबसे अच्छा बात – राम अऊर लीला का सम्बाद. फिलिम के सुरुआत में जब ऊ
दुनो पहिला बार मिलते हैं, त बात सचमुच सुनने लायक है. एक के बाद एक सम्बाद - लगता
है बन्दूक से गोली छूट रहा है. पूरा सिक्वेंस सायद आधा घण्टा का होगा, मगर पाँच
मिनट में फिसल कर पार हो जाता है. सबसे मजेदार बात त ई है कि पूरा सम्बाद एस.एम.एस.
सायरी को मिलाकर बनाया गया है. ठीक एही सिचुएसन तब आता है जब लीला अऊर उसकी भौजाई
रसीला बेन (रिचा चड्ढा) में बातचीत होता है, जिसमें ऊ लीला को सादी कर लेने के
लिये कहती है.
पटकथा में जबर्दस्त इस्पीड है,
कहीं भी कहानी भटकता नहीं है. गाना सब त पहिलहिं से चल रहा है मार्केट में, मगर
सिचुएसन के हिसाब से ठीक ठाक है. गाना के पिक्चराइजेसन में त इनको महारत हासिल है.
भेसभूसा (कॉस्च्यूम) एकदम ऑथेंटिक है अऊर असली लोकेसन के अलावा सेट भी बहुत भब्य
बनाया गया है. “देवदास” के अंत में जब पारो भागते हुये सीढी से उतरती है त उसका दस मीटर का साड़ी
पर्दा का ई कोना से ऊ कोना तक लहराता है, एकदम ओही बिसालता “राम लीला” में
भी है.
अंत में दूगो बात कहने को बाकी रह
गया. संजय बाबू का फिलिम “ब्लैक” में काला रंग था, “गुज़ारिश” में नीला अऊर इसमें लाल है – खून से लेकर समूचे सेट अऊर बैकग्राउण्ड का. ई
सिनेमा देखने के बाद हम भी एही कहेंगे कि “रोमियो ऍण्ड जुलियेट” का प्रेम आज भी मिसाल है रोमांटिसिज्म का, जबकि यहाँ ऊ बात नहीं है. “गुज़ारिश” का मौन प्रेम देखने वाले के दिल को झकझोर देता था, मगर राम लीला का परेम दिल
को नहीं छू पाता है. दीपिका अऊर रणवीर सिंह कहीं भी नाटक करते हुआ नहीं बुझाते
हैं. जइसा लोग कह रहा था, ऊ दुनो का केमिस्ट्री सचमुच कमाल का है. उनका परेम भी
असली लगता है अऊर चाँदमारी भी.
भंसाली साहब का “देवदास” देखने के बाद कोई बोला था कि –
बिमल रॉय का देवदास में आदमी हॉल से निकलते समय “आह” कहते हुये निकलता था जबकि भंसाली
साहब का ‘देवदास’ देखने के बाद आदमी “वाह” कहते हुये निकलता है. त इतिहास दोहराता है - “रोमियो ऍण्ड जुलियेट” का जो क्लाइमेक्स सेक्सपियेर साहब लिख गये, उसके
हिसाब से अंत देखकर मुँह से बहुत गहरा “आह” निकलता है, लेकिन “रामलीला” खतम होने के बाद आपके मुँह से “वाह” निकले न निकले, “आह” त नहिंये निकलेगा!
पुनश्च:
मेरी यह पोस्ट फिल्म "राम लीला" की समीक्षा नहीं है. फिल्म देखते हुए जो भी मेरे मन आया, बस वही यहाँ पोस्ट करने की कोशिश की है मैंने.


