रविवार, 1 दिसंबर 2013

A violent love story


एगो बहुत पुराना कहावत है कि बिना किताब के कमरा, बिना आत्मा के सरीर जइसा होता है. मगर हमरे साथ तनी बात दोसरा है. हमरे लिये त बिना डीवीडी के कमरा भी, बिना आत्मा के सरीर जइसा है. आजकल अकेले रहने अऊर हर हफ्ते बस का सफर करने के कारन अपना दुन्नो आत्मा को अपने सरीर में बसाए रखने का मौका मिला. बस में किताब पढ़ना अऊर घर पर सिनेमा देखना. एक अस्टार से लेकर फाइभ अस्टार तक का सिनेमा देख गये. कुछ नामवर – कुछ अनजान. लेकिन एही चक्कर में बहुत सा बढ़िया सिनेमा भी देखने को मिला.


खैर, गुजरात में हंगामा अऊर तोड़फोड़ के बाद चुपके से हम भी कल देखिये लिये – राम लीला (गोलियों की रासलीला). 15 नवम्बर को रिलीज होने के बाद से बहुत लोग बहुत तरह का बात बोला, अच्छा है, बेकार है. मगर हमरा त पुराना सिद्धांत है, अनुभव हमेसा अपने होता है, दोसरा का अनुभव त हमरे लिये जानकारिये हुआ ना. इसलिये देखने बइठ गये कि कुछ न कुछ त अच्छा होबे करेगा, आखिर एतना काबिल डायरेक्टर हैं संजय लीला भंसाली.

सिनमा चालू होते के साथ बुझा गया कि चचा सेक्सपियेर का मसहूर रोमियो ऍण्ड जुलियेट का कहानी है. का मालूम केतना सिनेमा बना है इसके ऊपर. एगो अऊर सही. सेक्सपियेर के कॅप्युलेट अऊर मोण्टेग खान्दान के तरह एहाँ भी सनेड़ा अऊर रजाड़ी खानदान का दुस्मनी अऊर दुनो खानदान के लड़का-लड़की का प्यार. सुरुआत अऊर अंत के बीच में बस गोलियों की रासलीला है. अंत, जब रोमियो-जुलियेट वाला कहानी है, त बताने का जरूरत नहीं.

सिनमा, नाम से कोनो लभ-स्टोरी मालूम पड़ता है अऊर होना भी चाहिये था. लेकिन पूरा सिनमा में गोलाबारी के अलावा कुच्छो नहीं है. एहाँ तक कि दुन्नो प्रेमी-प्रेमिका भी हर समय बन्दूक ताने रहता है. परकास झा का फिलिम राजनीति में जइसे पोलिटिकल पार्टी का नेता लोग एक के बाद अपना बिरोधी को तड़ से गोली मार देता था, ओइसहिं ई सिनमा में भी बस गोली मारने का कम्पटीसन लगाये हुये था सब. सायद एही सब देखते हुये लोग ई सिनमा को नापसन्द किया होगा. गुज़ारिश जइसा सिनमा के बाद ई राम-लीला भी बहुत अच्छा लभ इस्टोरी हो सकता था, लेकिन का मालूम का कहना चाह रहे थे संजय बाबू.

कुच्छो हो, जब साठ-सत्तर करोड़ रुपया लगाकर संजय लीला भंसाली कोनो फिलिम बनाए हैं, त कुछ न कुछ त निमन बात होबे करेगा. हमरे लिये त फिलिम का पइसा बसूल बात है सुप्रिया पाठक. बाज़ार की छरहरी छोकरी आज फैलकर राम लीला का धनकौर बा बन गयी है, मगर जब करेक्टर में उतरती है त उसका भिलेनई के आगे अमरीस पुरी भी काँप जाएँ. उनका गेट-अप, मैनरिज्म, डायलॉग बोलना अऊर अपना हर अंग से ऐक्टिंग करना... बस कमाल छोड़कर कोनो दोसरा सब्द नहीं है हमारे पास. अब ई मत कहिएगा कि हम एतना तारीफ इसलिये कर रहे हैं कि इनकी अम्मा ओहीं की हैं जहाँ हम आजकल बिराजमान हैं जिला अमरेली, गुजरात. ई त संजोग है! धनकौर बा का करेक्टर बास्तव में भंसाली साहब पोरबन्दर की संतोकबेन जाडेजा (जिनके ऊपर फिलिम बना था गॉडमदर) को ध्यान में रखकर गढ़े हैं, मगर एहाँ सुप्रिया, सबाना आजमी से एक्कईस साबित हुई है. दोसरा ऐक्टर जो अपना छोटा सा रोल में परभावित किया ऊ है सरद केलकर, लीला का बड़ा भाई कांजी भाई. कमाल का आवाज है. आवाज का क्वालिटी के साथ सम्बाद का उतार-चढाव और आँख से एक्स्प्रेस करना बहुत परभावसाली है, हाँ इसमें फिलिम के लाइटिंग का भी जबर्दस्त जोगदान रहा है. हर पात्र का करेक्टर उभर के सामने आया है.

फिलिम के सम्बाद को अलग-अलग हिस्सा में बाँटकर देखने से सायद हम अपना बात खुलकर कह पायेंगे. पहिला बात- गुजरात का बैकग्राउण्ड होने के कारन सम्बाद को गुजराती देखाने के लिये कहीं-कहीं पर जबर्दस्ती छूँ या छे डाल दिया गया है. दूसरा बात – सम्बाद का स्तर बहुत अच्छा है. खासतौर पर धनकौर बा का सम्बाद सब. सुप्रिया पाठक के अदायगी को सम्बाद के कारन अऊर निखार मिला है. तीसरा अऊर सबसे अच्छा बात – राम अऊर लीला का सम्बाद. फिलिम के सुरुआत में जब ऊ दुनो पहिला बार मिलते हैं, त बात सचमुच सुनने लायक है. एक के बाद एक सम्बाद - लगता है बन्दूक से गोली छूट रहा है. पूरा सिक्वेंस सायद आधा घण्टा का होगा, मगर पाँच मिनट में फिसल कर पार हो जाता है. सबसे मजेदार बात त ई है कि पूरा सम्बाद एस.एम.एस. सायरी को मिलाकर बनाया गया है. ठीक एही सिचुएसन तब आता है जब लीला अऊर उसकी भौजाई रसीला बेन (रिचा चड्ढा) में बातचीत होता है, जिसमें ऊ लीला को सादी कर लेने के लिये कहती है.

पटकथा में जबर्दस्त इस्पीड है, कहीं भी कहानी भटकता नहीं है. गाना सब त पहिलहिं से चल रहा है मार्केट में, मगर सिचुएसन के हिसाब से ठीक ठाक है. गाना के पिक्चराइजेसन में त इनको महारत हासिल है. भेसभूसा (कॉस्च्यूम) एकदम ऑथेंटिक है अऊर असली लोकेसन के अलावा सेट भी बहुत भब्य बनाया गया है. देवदास के अंत में जब पारो भागते हुये सीढी से उतरती है त उसका दस मीटर का साड़ी पर्दा का ई कोना से ऊ कोना तक लहराता है, एकदम ओही बिसालता “राम लीला” में भी है.

अंत में दूगो बात कहने को बाकी रह गया. संजय बाबू का फिलिम ब्लैक में काला रंग था, गुज़ारिश में नीला अऊर इसमें लाल है – खून से लेकर समूचे सेट अऊर बैकग्राउण्ड का. ई सिनेमा देखने के बाद हम भी एही कहेंगे कि रोमियो ऍण्ड जुलियेट का प्रेम आज भी मिसाल है रोमांटिसिज्म का, जबकि यहाँ ऊ बात नहीं है. गुज़ारिश का मौन प्रेम देखने वाले के दिल को झकझोर देता था, मगर राम लीला का परेम दिल को नहीं छू पाता है. दीपिका अऊर रणवीर सिंह कहीं भी नाटक करते हुआ नहीं बुझाते हैं. जइसा लोग कह रहा था, ऊ दुनो का केमिस्ट्री सचमुच कमाल का है. उनका परेम भी असली लगता है अऊर चाँदमारी भी.

भंसाली साहब का देवदास देखने के बाद कोई बोला था कि – बिमल रॉय का देवदास में आदमी हॉल से निकलते समय आह कहते हुये निकलता था जबकि भंसाली साहब का ‘देवदास’ देखने के बाद आदमी वाह कहते हुये निकलता है. त इतिहास दोहराता है - रोमियो ऍण्ड जुलियेट का जो क्लाइमेक्स सेक्सपियेर साहब लिख गये, उसके हिसाब से अंत देखकर मुँह से बहुत गहरा आह निकलता है, लेकिन रामलीला खतम होने के बाद आपके मुँह से वाह निकले न निकले, आह त नहिंये निकलेगा!

पुनश्च:
मेरी यह पोस्ट फिल्म "राम लीला" की समीक्षा नहीं है. फिल्म देखते हुए जो भी मेरे मन आया, बस वही यहाँ पोस्ट करने की कोशिश की है मैंने. 

रविवार, 24 नवंबर 2013

तुझे ज़मीं पे बुलाया गया है मेरे लिये

अपना प्यारी-प्यारी बेटी के लिये... दूर अकेले रहते हुए बीमार होने पर जिसका इयाद हमको सबसे जादा कल आया. बस लगा कि उससे मिलना है, एक दिन का भी इंतज़ार नहीं हो पा रहा था. बस उसी को इयाद करते हुए पहिला बार एतना लंबा नज़्म लिखने का कोसिस किये हैं. अब नज़्म का है, ई त बस हमरे मन का बात है. हम कोई पंडित नेहरू त हैं नहीं कि हमरा बात भी लोग ‘पिता का पत्र पुत्री के नाम’ मानकर पढेगा. मगर बाप-बेटी के प्यार पर त कोनो खानदान बिसेस का अधिकार नहीं होता है न. त आपलोग के सामने एगो बाप का “बापता” हाजिर है.



दूब की फैली हरी चादर पे
जैसे बिखरी हो नर्म सुबह की ओस
सुनहरी धूप मे वैसा ही चमकता चेहरा
और मासूम हँसी, कूकती कोयल जैसे
मुझको जब देखती है आके लिपट जाती है
चूम लेता हूँ मै फिर उसका दमकता माथा
गोद में बैठ के बतियाती है दुनिया की बात
कौन सी फ़िल्म, कौन गाना, कौन टीवी सिरीज़
कोई भी हिन्दी नहीं और हिन्दुस्तानी नहीं
कुछ भी मेरी समझ में आता नहीं
फिर भी मैं हाँ में हाँ मिलाता हूँ
मेरी अम्मा की तरह कितनी ही बातें मुझको
वो बताती है जो मालूम भी नहीं मुझको
उसकी अम्मा को चिढाते भी हैं मिलकर हमलोग
उसकी नासमझी पे हँसते हैं मिलके आपस में.
जब कभी प्यार से कह देता हूँ बिटिया रानी
मैं किसी दूसरे को, तब बड़ा चिढ जाती है
उसको लगता है कि इस जुमले के
सारे जुमला हुकूक उसके हैं
बैठ जाती है कभी पास मेरे
हाथ में देके वो कंघा मुझको
ठीक से बाल झाड़ दो मेरे
और कहती है कि चोटी भी बना दो मेरी
ज़िद कभी करती नहीं याद दिला देती है
ये घड़ी टूट गयी है मेरी, दिलवा दो नई!
स्टडी टेबल कब दिलाओगे?
एक स्कूटी दिला दो, तो ज़रा राहत हो!
अगले हफ्ते जो तुम आओगे तो पढना है बहुत
मुझको बस तुमसे समझना है सारे फाइनल अकाउण्ट्स
कैसे ड्रा करते हैं मुझको बताओ बैलेंस-शीट
प्रॉफिट ऐण्ड लॉस भला ट्रेडिंग से डिफरेण्ट क्यों है.
एक एंट्री मुझे बिल्कुल नहीं आती है समझ
कल मेरा टेस्ट है बस फोन पे बता दो मुझे!
अपनी अम्मा से झगडती भी है, रखती है ख्याल
डैडी! मम्मा का ब्लड-प्रेशर अभी लिया मैने
एक सौ चौंसठ बटा एक सौ दस आया है
ये बताओ मुझे ज़्यादा है कि कम
मम्मा बेचैन दिख रही है मुझे
रात छत पे टहलते देखते तारों को मैं
जोड़कर देखता हूँ शक्ल कोई बन जाये
मेष या वृष या मिथुन, कर्क, सिंह. कन्या तुला,
हो वृश्चिक या धनु, मकर कुम्भ या हो मीन
मुझको बस एक शक्ल दिखती है हर रोज़ मगर
मेरी प्यारी सी, बड़ी प्यारी सी बिटिया रानी
चाँद सी देखके मुस्काती हुई, तारों में
रात के दस बजे हैं फोन बस आने को है
अब ये मोबाइल की घण्टी मेरी बजेगी अभी
और वो बोलेगी – गुड नाइट डैडी!
एक मामूल है कि जिसके बिना
ना वो सोती है वहाँ और न मैं सो पाता हूँ
बेटियाँ भी अजीब शै हैं, खुशनसीब हूँ बिटिया रानी
मैंने ख़ुद तुझको इंतिख़ाब किया अपने लिये

अबसे पहले तू सितारों में बस रही थी कहीं
तुझे ज़मीं पे बुलाया गया है मेरे लिये!

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम

हमसे दिल्ली का छूटा, लिखने छूट गया. केतना तरह का परेसानी, काम का जबर्दस्ती दबाव, परिवार से अलग रहने का मोस्किल, खान-पान का दिक्कत अऊर बेमतलब का भाग-दौड़. ई सब तकलीफ अदमी भुला जाता है जब उसको कोई खाली एतने कह देता है कि साबास! मगर जमाना बहुत बदल गया है अऊर जेतना जमाना नहीं बदला, उससे कहीं जादा अदमी बदल गया है. बहुत जादे दिन का बात नहीं है, एही 10-15 साल पहिले का बात है, लोग अच्छा काम करने पर पीठ थपथपाता था. आजकल त कोई पीठ थपथपाये त सचेत होना चाहिये कि कहीं थाह-थाह कर ई त नहीं देख रहा है कि पीठ में छुरा घोंपने के लिये सही जगह कहाँ पर है.

साल 2000. जगह कोलकाता
उमर भी कम था हमरा अऊर काम को बोझा समझने का आदतो नहीं था. हमरी माता जी हमेसा सिखाती थीं कि दुनिया का बड़ा से बड़ा काम तुमसे बड़ा त कोनो जनम में नहीं हो सकता. इसलिये काम का बोझा देखकर परेसान होने से परेसानी अऊर बढेगा. बस उसको देखकर उसका मजाक उड़ाओ, त सब बोझा हल्का लगने लगेगा. बस एही बात गांठ बाँधकर हँसते, मजाक करते काम एनजॉय करते थे.

ओही समय हमरे ऑफिस में हमरी चेयरमैन का दौरा हुआ. खबर पहिलहिं आ गया था कि उनको पीला गुलाब बहुत पसन्द है. मंगवा लिया गया गुलदस्ता. उनका आने का टाइम एगारह बजे दिन में था अऊर ऊ आईं करीब तीन साढे-तीन बजे. खैर जब उनको पीला गुलाब का गुलदस्ता दिया गया त बहुत खुस होकर बोलीं,आई लव येलो रोज़ेज़!
हमरे मुँह से अचानक निकल गया (अचानक त नहिंये, लोग बताया था कि ऊ बहुत जिन्दादिल औरत हैं इसलिये जानबूझकर निकला था),वास्तव में ये लाल गुलाब थे, आपके इंतज़ार में पीले पड़ गये हैं! एतना सुनने के बाद ऊ बहुत खुलकर हँसीं अऊर पूरा ऑफिस से सॉरी बोलीं. आज का जमाना होता तो सौरी बोलना त दूर हमरा जो दसा होता ऊ कल्पना से बाहर है.  

ऊ टाइम हमरे ऑफिस में हमरे बॉस थे सिरी असोक कुमार सेनगुप्ता. हम उनके यूनियन के सदस्य नहीं थे. इसलिये ऊ खुलकर बोलते थे, भार्मा! भेन आई हैभ टु डिपेंड, आई उविल डिपेंड ऑन यू. बट भेन आई हैभ टु रेकमेण्ड, आई उविल रिकमेण्ड शुप्रभात! हम ई बात का बुरा नहीं मानते थे, काहे कि ऊ सच्चो हमरे ऊपर बहुत डिपेण्ड करते थे.

एक रोज साम को जाते समय हमको बोलाए अऊर बोले, भार्मा! ऐक्टा अर्जेंट काज आछे. (एक ज़रूरी काम है)
हैं, बोलून! (जी बोलिये!)
एई ऐकटा खूब अर्जेण्ट प्रोपोज़ल आछे. होय जाबे? (ये बहुत ज़रूरी प्रोपोज़ल है, हो जायेगा)
ठीक आछे, काल के एटाई कोरे दिच्छी! (ठीक है, कल इसी को कर देता हूँ)
एक्टू ताड़ा-ताड़ी आछे! (थोड़ी जल्दी है)
कोतो शोमोय देबेन! (कितना समय देंगे मुझे)
ऊ हमसे आँख चोराते हुये बोले, काल के एगारा टा नागाद! (कल ग्यारह बजे तक)
साम को छौ बजी ई बात हो रहा है अऊर अगिला दिन एगारह बजे तक खतम होना है काम, सब काम छोड़ियो के अगर कोई करे, त कम से कम आठ घंटा लगेगा. ऊ भी तब, जब सब कागज-पत्तर पूरा हो.

हम बिना कुछ बोले उनके पास से चले गये. रात में घर पर पड़ोसी से कम्प्यूटर माँग के काम किये, फ्लॉपी में सेभ किये अऊर सबेरे दस बजे ऑफिस पहुँचने पर प्रिंट करके अऊर दस्तखत करके सेनगुप्तो दा के आने के पहले उनके टेबुल पर पूरा फाइल रख दिये. ऊ आये, देखे अऊर फाइल लिये हुये हमरे हमरे पास आये. चुपचाप खड़े रहे, मगर उनका आँख में भरा हुआ भाव सब्द में कहने से बाहर था. खाली एतने बोले, कोखोन कोरले? (कब किया)
छाड़ून शेनगुप्तो दा! शे काज टा आमाकेई तो कोरते होतो, कोरे दिलाम! (जाने दीजिये शेनगुप्तो दा, वो काम मुझे ही तो करना था, कर दिया)

एक बार कोनो एक्झीक्यूटिव के आने पर, ऊ हमरा पीठ थपथपाकर बोले कि ई बहुत इंटेलिजेंट ओफिसर है हमारा. आऊर जवाब में हम बोले कि हमको काम का तनखाह मिलता है बस. अऊर पीठ थपथपाने से डर लगता है कि कहीं कोई पीठ में छुरा घोंपने का जगह त नहीं खोज रहा है. बात हँसी में खतम हो गया, मगर ऊ बाद में बोले कि उनको ई बात अच्छा नहीं लगा.

ई घटना हम फेसबुक पर लिखे त बहुत सा लोग बहुत तरह का बात बोला. सरिता दी फोन करके हमको समझाईं कि अपना से बड़ा लोग के बारे में ऐसा बात असम्मान समझा जाता है, चाहे ऊ बात केतनो मजाक में कहा गया हो. साथ में ईहो बोलीं कि मोहावरा बोलते समय बहुत होसियारी का जरूरत होता है, काहे कि बहुत सा लोग उसका साब्दिक माने लगाकर नाराज हो जाता है. हम सरिता दी को बिस्वास दिलाये कि आगे से हम दुनो बात का ख्याल रखेंगे.

कल रात अचानक (हमारे ‘शुभो बिजोया’ के मेसेज के जवाब में) सेनगुप्ता दा का फोन आया. पहिले त ऊ हजार गण्डा आसीर्बाद दिये ( आम तौर पर बिहार में हजार गंडा मुहावरे के साथ गाली का प्रयोग होता है) फिर फेसबुक वाला हमरे स्टैटस के बारे में बोलने लगे कि ऊ बात त ऊ कहिये भुला गये. अऊर उनको त ऊ घटना इयादो नहीं था. कहने लगे कि तुमरा अच्छा बात सब एतना इयाद है कि ई सब छोटा-मोटा बात इयाद करने का फुर्सत कहाँ है. इसके बाद ऊ जो बात बोले ऊ हमको एतना भावुक कर दिया कि हमरे आँख से आंसू निकल गया. ऊ बोले, भार्मा! आज तक कोई भी बॉस अपना ऑफिसर के बारे में सी.आर. में जो बात नहीं लिखा होगा, वो बात हम तुम्हारे बारे में लिखे थे. रेटिंग के अलावा हम लिखे कि किसी भी ऑफिस में कोई भी आदमी इन-डिस्पेंसिबल नहीं होता है, लेकिन यह ऑफिसर अगर इन-डिस्पेंसिबुल नहीं है तो भी हमारे संस्थान के लिये एक बेशकीमती ऐसेट है!

अब बुझाता है कि उनके एही सब बात का असर रहा होगा कि परदेस में रहते हुये, बहुत सारा लोग के बीच से हमको बिदेस में चार साल का पोस्टिंग मिला.

ई बंगाल का जादू भी हमरा पीछा नहीं छोडता है.


बुधवार, 1 मई 2013

Ray of Ray


(यह आलेख मेरे भाई शशि प्रिय वर्मा के अंग्रेज़ी लेख का अनुवाद है. यह आलेख उसके पुत्र अनुभव प्रिय की स्कूल पत्रिका के लिए अभिभावकों की श्रेणी में प्रकाशित हुआ था. आज सत्यजीत राय की जयन्ती के अवसर पर उस लेख का हिन्दी अनुवाद श्री शिवम मिश्र के विशेष आग्रह पर!)

गांधी”, सिनेमा के इतिहास में एक महानतम फिल्म है. इसने ग्यारह ऑस्कर के लिए नामांकित होकर आठ ऑस्कर जीते, जिसमें भारतीय कौस्च्यूम डिजाइनर भानुमति अथय्या ने संयुक्त रूप से यह पुरस्कार प्राप्त किया और वो भारत की पहली ऑस्कर विजेता बनीं.
लेकिन मैं न तो ऑस्कर की बातें करने जा रहा हूँ, न भानु अथय्या की!

सर रिचर्ड एटेनबरो ने उस फिल्म का निदेशन किया था, जो स्वयं एक बेहतरीन अदाकार हैं और जिन्होंने अभिनय की शिक्षा RADA (Royal Academy of Dramatic Arts) से ग्रहण की. उन्हें भी इस फिल्म के लिए ऑस्कर मिला था. उनकी अदाकारी जुरासिक पार्क (१९९३) में देखने को मिली थी, वो भी वर्ष १९७७ में उनके द्वारा अभिनीत एक फिल्म के बाद.
लेकिन मैं एटेनबरो की बात भी नहीं करने जा रहा. मैं तो उस फिल्मकार की बात करने जा रहा हूँ जिसके लिए उन्होंने वर्ष १९७७ में काम किया था.

इसके पहले कि मैं उनका नाम लूँ, उनका एक छोटा सा परिचय ज़रूरी हो जाता है. वह अपनी पहली फिल्म से ही एक चुनौती बन गए थे, दुनिया भर के फिल्मकारों के लिए. उन्होंने दुनिया भर के लगभग तमाम फिल्म-पुरस्कार हासिल किये और साल दर साल सारे पुरस्कारों को एक से ज़्यादा बार हासिल किया, सिवा ऑस्कर के. आखिरकार, ऑस्कर भी उनके पास आया, फ़िल्म-जगत को उनके योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्डके रूप में. बीमारी के कारण वो पुरस्कार प्राप्त करने नहीं जा सके इसलिए ऑस्कर कमिटी ने खुद उन तक जाकर उन्हें वो पुरस्कार प्रदान किया. उन्हें फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान और भारतवर्ष का भारत रत्नसम्मान प्रदान किया गया. जी हाँ, वो एक भारतीय था, जिसने हिन्दी में सिर्फ दो फ़िल्में ही बनाईं, बाकी अपनी मातृभाषा बांग्ला में. वर्ष 1977 में सर रिचर्ड एटेनबरो ने उनकी ही फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में काम किया, जो उनकी पहली हिन्दी फिल्म थी. वे फिल्मकार और कोई नहीं सत्यजित राय थे!

उनके जीवन काल के विषय में बहुत कुछ उपलब्ध है. उन्हें मैं दोहराने नहीं जा रहा. सत्यजीत राय की चर्चा अधिकतर उनकी फिल्मों को लेकर ही हुई है. यह बात भी सही है कि वो भारतीय सिनेमा के महानतम फिल्मकार थे. लेकिन जैसे खोटा सिक्का दोनों तरफ से ही खोटा होता है, वैसे ही खरे सिक्के के दोनों ओर कोई नहीं देखता. मुझे उनके दूसरे पहलू का तब पता चला जब मेरा उनके साहित्य से सामना हुआ. तब मैंने जाना कि वे भले ही एक महान फिल्मकार थे, किंतु दिल से बच्चे ही थे. वर्ष 1961 में उन्होंने अपने दादा जी के प्रकाशन का काम सम्भाल लिया, जो दादा जी ने बीच में ही छोड़ दिया था. राय ने बाल-पत्रिका सन्देश का पुन: प्रकाशन प्रारम्भ किया. उनकी कहानियाँ रहस्य-रोमांच से भरपूर और सामान्य जानकारियों से बुनी हुई होती थीं. उन्होंने अपनी कहानियों में गणित, भूगोल, इतिहास, मनोविज्ञान, संगीत तथा पुरातत्व के तथ्यों का भरपूर इस्तेमाल किया. उनकी कहानी कहने की कला रोमांचक और कई बार रोंगटे खड़े कर देने वाली होती थी. यही नहीं उनकी कहानियों में हर उम्र के व्यक्ति के लिये कुछ न कुछ अवश्य होता है.

मैंने उनकी पहली पुस्तक जो खरीदी वो थी प्रकाशन विभाग, भारत सरकार की हंसने वाला कुत्ता. मैं शुरू में इस किताब को खरीदने के प्रति उदासीन था और इसे मैने तब जाकर खरीदा जब ये 50% की छूट पर बिकने को आई. एक कुत्ता जो इंसान की तरह हंसता है और एक आदमी उसे किसी भी कीमत पर खरीदना चाह्ता है. चेक बुक निकालकर जब वो उसकी कीमत देना चाहता है तो वह कुत्ता ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगता है. कुत्ते के मालिक ने बताया कि उसके हंसने का कारण सिर्फ इतना है कि उस कुत्ते को पता है कि दुनिया में हर चीज़ पैसे से नहीं खरीदी जा सकती!

इस पुस्तक की सारी कहानियाँ पढने के बाद अगले ही दिन मेरे हाथ में सत्यजीत राय की पाँच और किताबें थीं. सोने का किला (राजकमल प्रकाशन), बादशाही अंगूठी (राधाकृष्ण प्रकाशन), सत्यजीत राय की कहानियाँ (राजपाल), जहाँगीर की स्वर्णमुद्रा (राजकमल) और मुल्ला नसरुद्दीन की कहानियाँ (राजकमल).

उनकी सारी कहानियों में सबसे उल्लेखनीय बात है उनके गढे हुए चरित्र, उनका नैरेशन और उनकी कल्पना की उड़ान. फेलु दा जैसा ज़हीन, जटायु जैसा थ्रिलर लेखक, प्रो. शंकु जैसा वैज्ञानिक (जिसने कम लागत में बड़े आविष्कार किये), प्रो. हिजबिजबिज जैसा सर्जन (जो मोमबत्ती की रोशनी में भी ऑपरेशन कर सकता है) सिर्फ उनकी सोच से ही जन्म ले सकते है. कहानियों का वर्णन इतना स्पष्ट कि वास्तविकता का आभास होता है. उनकी कहानियों को पढने के बाद आप फ्रांस, बेंगलुरु, जर्मनी, राजस्थान घूमने जायें तो आपको लगेगा कि आप यहाँ पहले भी आ चुके हैं. और उनकी कल्पनाशीलता तो कल्पना से भी परे है.

उनकी कल्पनाशक्ति की तुलना महान शेक्सपियेर से की जा सकती है जिन्होंने कॉमेडी ऑफ एरर में दो जोड़े जुड़वाँ की कल्पना की थी या फिर ‘मैकबेथ’ में उसकी मृत्यु का क्लाइमेक्स लिखा था.

मेरा अनुरोध है सभी बच्चों से और उनके अभिभावकों से कि अगर वे सत्यजीत राय को केवल एक फिल्मकार मानते हैं, तो एक बार उनकी कहानियाँ अवश्य पढें. मेरा अनुरोध उन सभी सिने-प्रेमियों से भी है जो उन्हें केवल एक प्रादेशिक या आंचलिक फिल्मकार मानते हैं कि वे उनकी फिल्में एक बार अवश्य देखें. उनकी फिल्मों का इतिहास और उनके द्वारा प्राप्त सम्मान/पुरस्कार इस बात के प्रमाण हैं कि कम्युनिकेशन गैप को भरने के लिये कम्युनिकेशन से बेहतर कोई रास्ता नहीं.

उनकी कहानी की पुस्तक के हर दूसरे तीसरे पृष्ठ पर उस कहानी से जुड़ा कोई रेखाचित्र आपको मिलेगा जिसे स्वयम सत्यजीत राय ने बनाया है. वे थीम के अनुसार स्केच बनाते थे और स्केच के अनुसार दृश्य को विज़ुअलाइज़ करते थे. फिल्मों की पटकथा लिखते समय उन्हें इससे काफी मदद मिलती थी. यही नहीं, उनके विस्तार का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपनी शुरुआती तीन फिल्मों को छोड़कर उन्होंने सभी फिल्मों का संगीत निर्देशन किया और हर पात्र के ड्रेस डिज़ाइन करने से लेकर फिल्म के पोस्टर तक डिज़ाइन किये. 

आज कई फिल्मकार अपने नाम से पहले ड्रीम मर्चेण्ट या शो-मैन जैसी उपाधि लगाते फिरते हैं, सत्यजीत राय ने कभी इन शब्दों की ओर ध्यान भी नहीं दिया. वे स्वयम लफ्ज़ों के शाहंशाह थे.

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि 2 मई 1921 को जन्मा, यह एक बहुत ही दुर्लभ प्रजाति का प्राणि था, जो 23 अप्रैल 1992 को इस जगत से विलुप्त हो गया.