रविवार, 1 दिसंबर 2013

A violent love story


एगो बहुत पुराना कहावत है कि बिना किताब के कमरा, बिना आत्मा के सरीर जइसा होता है. मगर हमरे साथ तनी बात दोसरा है. हमरे लिये त बिना डीवीडी के कमरा भी, बिना आत्मा के सरीर जइसा है. आजकल अकेले रहने अऊर हर हफ्ते बस का सफर करने के कारन अपना दुन्नो आत्मा को अपने सरीर में बसाए रखने का मौका मिला. बस में किताब पढ़ना अऊर घर पर सिनेमा देखना. एक अस्टार से लेकर फाइभ अस्टार तक का सिनेमा देख गये. कुछ नामवर – कुछ अनजान. लेकिन एही चक्कर में बहुत सा बढ़िया सिनेमा भी देखने को मिला.


खैर, गुजरात में हंगामा अऊर तोड़फोड़ के बाद चुपके से हम भी कल देखिये लिये – राम लीला (गोलियों की रासलीला). 15 नवम्बर को रिलीज होने के बाद से बहुत लोग बहुत तरह का बात बोला, अच्छा है, बेकार है. मगर हमरा त पुराना सिद्धांत है, अनुभव हमेसा अपने होता है, दोसरा का अनुभव त हमरे लिये जानकारिये हुआ ना. इसलिये देखने बइठ गये कि कुछ न कुछ त अच्छा होबे करेगा, आखिर एतना काबिल डायरेक्टर हैं संजय लीला भंसाली.

सिनमा चालू होते के साथ बुझा गया कि चचा सेक्सपियेर का मसहूर रोमियो ऍण्ड जुलियेट का कहानी है. का मालूम केतना सिनेमा बना है इसके ऊपर. एगो अऊर सही. सेक्सपियेर के कॅप्युलेट अऊर मोण्टेग खान्दान के तरह एहाँ भी सनेड़ा अऊर रजाड़ी खानदान का दुस्मनी अऊर दुनो खानदान के लड़का-लड़की का प्यार. सुरुआत अऊर अंत के बीच में बस गोलियों की रासलीला है. अंत, जब रोमियो-जुलियेट वाला कहानी है, त बताने का जरूरत नहीं.

सिनमा, नाम से कोनो लभ-स्टोरी मालूम पड़ता है अऊर होना भी चाहिये था. लेकिन पूरा सिनमा में गोलाबारी के अलावा कुच्छो नहीं है. एहाँ तक कि दुन्नो प्रेमी-प्रेमिका भी हर समय बन्दूक ताने रहता है. परकास झा का फिलिम राजनीति में जइसे पोलिटिकल पार्टी का नेता लोग एक के बाद अपना बिरोधी को तड़ से गोली मार देता था, ओइसहिं ई सिनमा में भी बस गोली मारने का कम्पटीसन लगाये हुये था सब. सायद एही सब देखते हुये लोग ई सिनमा को नापसन्द किया होगा. गुज़ारिश जइसा सिनमा के बाद ई राम-लीला भी बहुत अच्छा लभ इस्टोरी हो सकता था, लेकिन का मालूम का कहना चाह रहे थे संजय बाबू.

कुच्छो हो, जब साठ-सत्तर करोड़ रुपया लगाकर संजय लीला भंसाली कोनो फिलिम बनाए हैं, त कुछ न कुछ त निमन बात होबे करेगा. हमरे लिये त फिलिम का पइसा बसूल बात है सुप्रिया पाठक. बाज़ार की छरहरी छोकरी आज फैलकर राम लीला का धनकौर बा बन गयी है, मगर जब करेक्टर में उतरती है त उसका भिलेनई के आगे अमरीस पुरी भी काँप जाएँ. उनका गेट-अप, मैनरिज्म, डायलॉग बोलना अऊर अपना हर अंग से ऐक्टिंग करना... बस कमाल छोड़कर कोनो दोसरा सब्द नहीं है हमारे पास. अब ई मत कहिएगा कि हम एतना तारीफ इसलिये कर रहे हैं कि इनकी अम्मा ओहीं की हैं जहाँ हम आजकल बिराजमान हैं जिला अमरेली, गुजरात. ई त संजोग है! धनकौर बा का करेक्टर बास्तव में भंसाली साहब पोरबन्दर की संतोकबेन जाडेजा (जिनके ऊपर फिलिम बना था गॉडमदर) को ध्यान में रखकर गढ़े हैं, मगर एहाँ सुप्रिया, सबाना आजमी से एक्कईस साबित हुई है. दोसरा ऐक्टर जो अपना छोटा सा रोल में परभावित किया ऊ है सरद केलकर, लीला का बड़ा भाई कांजी भाई. कमाल का आवाज है. आवाज का क्वालिटी के साथ सम्बाद का उतार-चढाव और आँख से एक्स्प्रेस करना बहुत परभावसाली है, हाँ इसमें फिलिम के लाइटिंग का भी जबर्दस्त जोगदान रहा है. हर पात्र का करेक्टर उभर के सामने आया है.

फिलिम के सम्बाद को अलग-अलग हिस्सा में बाँटकर देखने से सायद हम अपना बात खुलकर कह पायेंगे. पहिला बात- गुजरात का बैकग्राउण्ड होने के कारन सम्बाद को गुजराती देखाने के लिये कहीं-कहीं पर जबर्दस्ती छूँ या छे डाल दिया गया है. दूसरा बात – सम्बाद का स्तर बहुत अच्छा है. खासतौर पर धनकौर बा का सम्बाद सब. सुप्रिया पाठक के अदायगी को सम्बाद के कारन अऊर निखार मिला है. तीसरा अऊर सबसे अच्छा बात – राम अऊर लीला का सम्बाद. फिलिम के सुरुआत में जब ऊ दुनो पहिला बार मिलते हैं, त बात सचमुच सुनने लायक है. एक के बाद एक सम्बाद - लगता है बन्दूक से गोली छूट रहा है. पूरा सिक्वेंस सायद आधा घण्टा का होगा, मगर पाँच मिनट में फिसल कर पार हो जाता है. सबसे मजेदार बात त ई है कि पूरा सम्बाद एस.एम.एस. सायरी को मिलाकर बनाया गया है. ठीक एही सिचुएसन तब आता है जब लीला अऊर उसकी भौजाई रसीला बेन (रिचा चड्ढा) में बातचीत होता है, जिसमें ऊ लीला को सादी कर लेने के लिये कहती है.

पटकथा में जबर्दस्त इस्पीड है, कहीं भी कहानी भटकता नहीं है. गाना सब त पहिलहिं से चल रहा है मार्केट में, मगर सिचुएसन के हिसाब से ठीक ठाक है. गाना के पिक्चराइजेसन में त इनको महारत हासिल है. भेसभूसा (कॉस्च्यूम) एकदम ऑथेंटिक है अऊर असली लोकेसन के अलावा सेट भी बहुत भब्य बनाया गया है. देवदास के अंत में जब पारो भागते हुये सीढी से उतरती है त उसका दस मीटर का साड़ी पर्दा का ई कोना से ऊ कोना तक लहराता है, एकदम ओही बिसालता “राम लीला” में भी है.

अंत में दूगो बात कहने को बाकी रह गया. संजय बाबू का फिलिम ब्लैक में काला रंग था, गुज़ारिश में नीला अऊर इसमें लाल है – खून से लेकर समूचे सेट अऊर बैकग्राउण्ड का. ई सिनेमा देखने के बाद हम भी एही कहेंगे कि रोमियो ऍण्ड जुलियेट का प्रेम आज भी मिसाल है रोमांटिसिज्म का, जबकि यहाँ ऊ बात नहीं है. गुज़ारिश का मौन प्रेम देखने वाले के दिल को झकझोर देता था, मगर राम लीला का परेम दिल को नहीं छू पाता है. दीपिका अऊर रणवीर सिंह कहीं भी नाटक करते हुआ नहीं बुझाते हैं. जइसा लोग कह रहा था, ऊ दुनो का केमिस्ट्री सचमुच कमाल का है. उनका परेम भी असली लगता है अऊर चाँदमारी भी.

भंसाली साहब का देवदास देखने के बाद कोई बोला था कि – बिमल रॉय का देवदास में आदमी हॉल से निकलते समय आह कहते हुये निकलता था जबकि भंसाली साहब का ‘देवदास’ देखने के बाद आदमी वाह कहते हुये निकलता है. त इतिहास दोहराता है - रोमियो ऍण्ड जुलियेट का जो क्लाइमेक्स सेक्सपियेर साहब लिख गये, उसके हिसाब से अंत देखकर मुँह से बहुत गहरा आह निकलता है, लेकिन रामलीला खतम होने के बाद आपके मुँह से वाह निकले न निकले, आह त नहिंये निकलेगा!

पुनश्च:
मेरी यह पोस्ट फिल्म "राम लीला" की समीक्षा नहीं है. फिल्म देखते हुए जो भी मेरे मन आया, बस वही यहाँ पोस्ट करने की कोशिश की है मैंने. 

28 टिप्‍पणियां:

  1. दादा आपकी समीक्षा का जवाब नहीं.....
    वैसे हमें तो एक दम बकवास लगी थी फिल्म मगर आपने कुछ positive एंगल्स भी दिखा दिए....
    दरअसल भंसाली साहब से ऐसी उम्मीद नहीं थी....एक तो ऐसा माहौल जाने कहाँ होता है हिन्दुस्तान में...और दूसरा हद्द घटिया डायलाग ......बदकिस्मती से वैसे ही घटिया लोग पीछे की लाइन में बैठे थे डायलाग दुहराते हुए.....खूब कोसा भंसाली जी को...(1.60 की टिकट लेकर बैठे हों जैसे...inox में....)
    आपने हिरोइन की खूबसूरती की तारीफ़ नहीं की ???
    वो एक चीज़ तो देखने लायक थी फिल्म में ....
    खैर हमारे मुंह से तो न आह न वाह...ओह!!! निकला था रामलीला ख़तम होने के बाद ...:-)
    सादर
    अनु

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  2. दादा एक चीज़ और गौर किए आप ... यह वही सुप्रिया पाठक है जो "खिचड़ी" नाम के टीवी सिरियल मे भी एक गुजराती किरदार निबाह चुकी है पर उस मे मामला बिलकुल उल्टा था ... वहाँ टोटल कॉमेडी थी ... और यहाँ कॉमेडी का सहारा अपनी संजीदा बात कहने के लिए लिया धनकौर बा ने ... जैसे राम जी को आरती का निमंत्रण देते समय कार्यक्रम को जान कर क्रियाकर्म कहना उस के बाद भूल सुधार करना ... मैंने भी यह फिल्म केवल सुप्रिया पाठक जी के कारण ही देखी ... संजय लीला भंसाली ने तो इस बार थोड़ा निराश ही किया ... :(

    चलिये फिल्म के बहाने ही सही ... हम लोगो को आपकी एक और पोस्ट तो मिली ... जय हो ... :)

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  3. आपका अनुभव इस पोस्ट में बखूबी झलकता है... फिल्म की समीक्षा में हमेशा की तरह आपके अनुभव भी संयुक्त हैं...

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  4. फ़िल्म देखने की उत्सुकता बढ़ाने में सक्षम है आलेख

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  5. बाऊ जी , संजय लीला भंसाली की किसी भी फिल्म में आप देखिये , फिल्म का सेट आपको किसी अलग ही दुनिया की सैर कराएगा (कुछ हद तक ख़ामोशी में भी) , साँवरिया तो इसका सबसे बड़ा उदाहरण है | हर फिल्म में किसी एक रंग का प्रभुत्व होता है (हालाँकि हम दिल दे चुके सनम में ये बात काफी हद तक लागू नहीं होती ) ख़ामोशी-सफ़ेद, देवदास-लाल;सफ़ेद, ब्लैक - काला, संवरिया - हरा;काला;नीला , गुजारिश-नीला;काला, और इसमें लाल | एक और खास बात कि इनकी फिल्मों के डायलोग एक तरह कि लय लिए हुए होते हैं (गद्यगीत जैसे), इस फिल्म में भी हैं | अदाकारी तो एक नम्बर की होती है | संगीत बेहद मधुर (हालाँकि मुझे इस फिल्म के गानों में इनकी कुछ पुरानी फिल्मों के गानों की छाप जरुर लगी जैसे नागदा संग ढोल बाजे और ढोली तारो ढोल बाजे)|
    लेकिन एक बात जरुर चुभी कि इस फिल्म में टिपिकल भंसाली टच कम कमर्शियल टच ज्यादा लगा |

    सादर

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  6. यकीन नहीं हो रहा था मैं उन्हीं की लिखी फिल्म देख रहा था जिन्होने कभी खामोशी, हम दिल दे चुके सनम और गुजारिश जैसा कुछ लिख डाला था... भंसाली ने जब भी कोई फिल्म बनाई है हर फिल्म के साथ कई उम्मीदें जगाई हैं.... एक दर्शक के तौर पर वही उम्मीद इस फिल्म में बिखर सकती है... इतना सब कुछ बेहतरीन बनाने के बावजूद कमजोर कहानी निराश कर गयी है... चटख रंगों में छिपा भंसाली का निर्देशन चकाचौंध कर जाता है... दीपिका के द्वारा किसी फिल्म में किया गया ये सर्वश्रेष्ठ अभिनय है.... रणवीर अपने चिरपरिचित अंदाज़ में हैं... और अगर आप पूरी फिल्म में सुप्रिया जी के अभिनय के दीवाने न हो गए तो बेकार है.... गाने अच्छे हैं, बस प्रियंका चोपड़ा वाला आइटम सॉन्ग बेकार है और फालतू में घुसाया गया है... कुल-मिला कर फिल्म का सबसे ज़रूरी पहलू "कहानी" ही कमजोर हैं.... कास्टिंग में भंसाली लिखते हैं ये कहानी रोमियो-जूलियट से इंस्पायर्ड है, लेकिन मुझे तो ये फिल्म "इशकजादे" से ज्यादा इंस्पायर्ड लगी...

    फिल्म तो देख ही सकते हैं लेकिन फिल्म देखते जाते समय दिमाग में खामोशी, हम दिल दे चुके सनम, ब्लैक, देवदास या गुजारिश जैसा कुछ लेकर न जाएँ, निराश होंगे...
    +++++++++++++++++++++++++
    ये हमारा रिव्यू था....

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  7. बोले तो सुप्रिया पाठक की फ़िल्म है यह -आपकी ननिहाल भी गज़ब है सलिल भाई कौनो सिनेमा है इहाँ और आप ऐसे ऐसी फिल्मन का जिक्र कर
    दिल झन्न कर देते हैं !

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  8. रंगों की कलाकारी में माहिर हैं भंसाली बाबू।

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  9. बहुत समय हुआ अब फ़िल्म देखना लग्ज़री लगता है हालाँकि सफ़र में लगते समय को देखते हुये रोज दो मूवी निबटाई जा सकती हैं। आपकी पोस्ट पढ़कर बिना फ़िल्म देखे भी इसकी समीक्षा कर सकते हैं।
    संजय @ मो सम कौन

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  10. भंसाली बाबू की फिल्म दूसरों से हट कर होती है !सुंदर उत्कृष्ट समीक्षा ....!
    ==================
    नई पोस्ट-: चुनाव आया...

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  11. फिल्म नही देखी लेकिन थीम सुनकर सबसे पहला ऐतराज फिल्म के नाम( रामलीला साथ में एक अजीब सा टैग भी --गोलियों की रासलीला ) पर हुआ । सोचा था कि पारम्परिक रामलीला विषयक कोई नया आइडिया होगा । लेकिन अफसोस यह नायक-नायिका का नाम है । चूँकि यह भंसाली की फिल्म है इसलिये भव्यता तो होगी ही लेकिन अपेक्षाएं पूरी नही करती यह फिल्म ,ऐसा सुन पढकर फिल्म देखने का मन ही नही हुआ ।
    हाँ आपकी समीक्षा कमाल की है ।

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  12. बहुत ही सुंदर समीक्षा की है आपने...... मैं तो अभी फ़िल्म नहीं देखी लेकिन हर के विचार से लगा की फ़िल्म ठीक नहीं है... भंसाली जी की हर फ़िल्म देखती जरुर हूँ ......

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  13. अपने तो सांड टाइप हीरो में दिलचस्‍पी नहीं है तो देखने का मन नहीं है।

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  14. bhansali se to ham bahut door ho gaye hain... sanwariya hamari deepawli kharab kar di thi.... guzarish bhi udaai hui kahani thi.. (jaisa ki bhansali sahab karte hain) the sea inside... original cinema me bhansali wali bhavyta chaahe n ho.. cinema usse badhiya hai... actually bhansali cinema me ghalat aa gaye.. painter hona chahiye tha... :)

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  15. सुप्रिया की अभिनय क्षमता लाज़वाब है , फ़िल्म में भी रही है , आपकी पोस्ट ने बताया !
    समय बिताने के लिए फ़िल्म देखने वालों के लिए फिर भी ठीक रहे , मगर कुछ ख़ास नहीं है। संजय कई बार निराश करते हैं !

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  16. ये फ़िल्म देखने की कोई इच्छा नहीं थी किन्तु पतिदेव के साथ फ़िल्म देखने का मौका था , और दूसरी कोई फ़िल्म नहीं थी सो इसे देखने चले गए , २० मिनट की फ़िल्म और अश्लील संवाद देखने के बाद मैंने कहा फ्रस्टेडेंड राजकपूर नंबर दो , मेरा नाम जोकर के फ्लाप होने के बाद उन्हें ऐसा झटका लगा की एक बार में कुल गया पैसा वसूलने के लिए बॉबी बना दी बिकनी के साथ बिकने के लिए , ब्लैक , सांवरिया और गुजारिश के फ्लाप होने के बाद लीला भंसाली को हर हालत में एक हिट की जरुरत थी सो उन्होंने फ़िल्म में सारे मसाले डाल दिए हिट कराने के लिए , रोमियो जूलियट की कहानी में आत्मा का प्रेम और जुड़ाव ही गायब , पहली बार मिलते है नायक नायिका किस करना शुरू कर देते है , और बेमतलब के अश्लील संवाद , दो दुश्मन ये बाते कही कही करे तो पच जाता है किन्तु हर किरदार ही बेमतलब के अश्लील संवाद बोले से पचता नहीं है । मस्ती ३ देखने गई होती तो पच जाता लेकिन हम तो लीला भंसाली की फ़िल्म देखने गए थे , अश्लील संवाद को किनारे भी कर दे तो प्रेम कहानी से आत्मा का प्रेम ही गायब हो ये माफ़ी के लायक नहीं है ।

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  17. अभी तक नहीं देखी यह फिल्म .. क्या है कि हिम्मत ही नहीं हुई. रणवीर और उसपर भंसाली ... दोनों ही ओवर रेटेड लगते हैं मुझे तो.

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  18. फ़िल्म तो अभी तक नहीं देखी मगर ये review बहुत ही entertaining है…

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  19. फिल्म अभी देखि नहीं तो कमेन्ट कर नहीं सकते अभी ... पर आपकी शैली और अंदाजे बयाँ पे जरूर कहेंगे की .... मज़ा आ गया ....

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  20. बहुत खूब अंदाजे बयां...देखनी पड़ेगी फ़िल्म .....फिर देखते हैं आह लिखती है या वाह!

    बहुत खूब!

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  21. आप भी कमाल करते हैं! अइसा लिखते हैं कि लोग फिलिम देख के फिर पढ़ें अउर बुड़बक बन जांय।

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  22. तुम्हारा लेख पढ़कर आनंद आ रहा था मगर इत्ते लोगों के कमेंट पढ़कर कन्फ्यूज़ हो गए , साल में एक फ़िल्म देखते हैं , इसे देखने जाएँ या न जायं ये बताओ दुबारा !
    :)

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  23. सही लिखा है आपने-गोलियों की रासलीला है ....भंसाली जी ने निराश किया ....!!

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  24. सनीमा के लिये आह। लिखाई के लिये वाह!

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