सोमवार, 13 सितंबर 2010

द ट्रेन...

अकेले सफर करने में आदमी थोड़ा निस्चिंत रहता है. सामान कम, बच्चा को सम्भालने का झंझट नहीं अऊर सबसे बड़ा आराम कि सीट कोनो मिल जाए परेसानी नहीं. नहीं त सिरीमती जी को नीचे वाला सीट चाहिए, बेटी को बीच वाला अऊर हमरे लिए जऊन बच गया सो. मगर अकेले... ई सबसे मुक्त होकर बिना कोनो सफरिंग के सफर.

हमको मिल गया पहिला वाला साइड लोअर सीट. हर दस पाँच मिनिट पर टॉयलेट आने जाने वाला लोग बीच का दरवाजा का खोलकर चला जाता था, अऊर ऊ अपने आप बंद होता था धड़ाम से. हम समझ गए कि रात भर एही चलने वाला है. रेलवे का तकिया से कान बंद कर के सोना पड़ेगा. एक नजर पड़ोस में डाले, त देखे कि बगल में एगो आदमी पचीस छब्बीस साल का, उसके साथ उसकी गर्भवती पत्नी अऊर एक पैंतीस चालीस की औरत. उसकी पत्नी का पेट देखकर समझ में आया गया कि बस प्रसव का दिन करीब है. गोस्सा भी आया कि ऐसा टाइम में काहे सफर कर रहा है, लेकिन रहा होगा कोनो मजबूरी, कौन जाने.


       ( चित्र साभारः mikophotography)
आधा रात के बाद नींद गहराया होगा कि हमको कराहने का आवाज सुनाई दिया. घबरा कर हम उठ कर बईठ गए. सामने पर्दा लगा हुआ था अऊर उसी के पीछे से कराहने का आवाज आ रहा था. अब हमरे मन में भी परिस्थिति को देखकर डर समाने लगा. हम उठकर पूछे उस आदमी से लेकिन ऊ बोला कि घबराने का कोनो बात नहीं है.

उसके बाद हम सो नहीं सके, काहे कि उसका कराहना बढता जा रहा था अऊर पूरा डिब्बा में खाली हम जाग रहे थे. सब लोग अपना एयर कंडीशंड बर्थ पर तकिया से कान दबाकर सोया रहा. अब हमरा घबराहट गोस्सा में बदल गया. हम ऊ आदमी से बोले, “ अईसा हालत में आप काहे लेकर जा रहे हैं दिल्ली. घर में लोग नहीं है कि घर से निकाल दिया है?”

“नहीं, ई बात नहीं है. हम फौज में हैं, दिल्ली में फौजी अस्पताल में सब मुफ्त में हो जाएगा.”

“पागल कहीं का, मुफ्ते में डिलिभरी करवाना था त पटना में दानापुर मिलिट्री हॉस्पीटल नहीं था!!”

उसके बाद त हमरा गोस्सा बढा जा रहा था. उ आदमी भी परेसान बुझाया. सबसे जादा परेसानी ई था कि ऊ औरत का दर्द अऊर बेचैनी बढ़ रहा था. सुबह के टाइम में लोग का नींद भी बहुत गाढा हो गया. गाड़ी सीधा दिल्ली रुकने वाला अऊर हमलोग अभी टुंडला से निकले थे. लग रहा था कि ई औरत दिल्ली तक जाने का हालत में नहीं है. उसका चेहरा एकदम पीला होता जा रहा था.

अब हम उठे अऊर पहिला बार अपना पिताजी का दिया हुआ रेलवे ज्ञान इस्तेमाल किए. कण्डक्टर से रिजर्वेसन का चार्ट लेकर सबसे पहिले देखे कि कोनो डॉक्टर सफर कर रहा है कि नहीं. देखे कि दू डिब्बा आगे एगो डॉक्टर था. हम भागे, मन ही मन एही मनाते हुए कि कहीं ऊ पीएच. डी. वाला न हो. खैर ऊ डॉक्टर को हम बिनती किए अऊर समझाए. सीरियस समझ कर ऊ भी नहीं आना चाहा. मगर हमरा बात सुनकर अऊर अनजान आदमी को परेसान देखकर ऊ आया, नब्ज देखा अऊर बोला कि देरी करने से परेसानी हो सकता है. अऊर केस अईसा है कि बिना इंतजाम के कुछ भी नहीं किया जा सकता है.

हम उसको धन्यवाद दिए अऊर क्ण्डक्टर को बोले की वॉकी टॉकी पर गाड़ी के इंचार्ज गार्ड से बात करवाओ. ऊ बोला नहीं हो पाएगा. मगर हमरे अन्दर पता नहीं कहाँ से अजीब सक्ति समा गया था. हम बोले, “ नहीं होगा त तुम सब जेल जाओगे. हमको सिखाते हो. हमरे पिताजी एही सेक्सन पर काम करते थे अऊर हमको सब पता है.”

ऊ घबराया कि हमरा बात से संतुष्ट हुआ, मगर हमको वॉकी टॉकी लाकर पकड़ा दिया. हम गार्ड से बोले, “सर यहाँ जिंदगी मौत का सवाल है. आपको अलीगढ़ में गाड़ी रुकवानी होगी. और वहाँ मेडिकल युनिट को प्लेट्फॉर्म पर रहने को कहना होगा.”

“मैं ख़बर करता हूँ. मगर आपको सिर्फ दो मिनट का समय मिलेगा.”

“धन्यवाद सर! दो मिनट बहुत होते हैं.”

ऊ फौजी हमरा मुँह देख रहा था, औरत चीख रही थी, मगर अब चीख का आवाज़ कुछ कम हो गया .हम उस आदमी को कहे कि सामान दरवाजा पर लेकर जाओ. गाड़ी रुकते के साथ सामान लेकर अपनी दीदी (जो औरत साथ में थी) को उतरने को बोलो, अगिला दरवाजा से. ई दरवाजा से हम दुनो मिलकर इनको बिछावन समेत उठाकर नीचे ले जाएंगे. तब तक स्ट्रेचर भी आ जाएगा.

अलीगढ़ इस्टेसन के पहिले ही जब गाड़ी में झटका लगा त हम समझ गए कि गाड़ी मेन लाइन से लूप लाइन में आ गया है यानि प्लेटफारम पर. भागकर देखे त आधा दर्जन नर्स का टीम स्ट्रेचर लेकर खड़ा था. ऊ आदमी औरत का सिरहाना पकड़ा अऊर हम दुनो गोड़ के तरफ से धीरे से सहारा देकर उठाए.

संजोग देखिए, दरवाजा तक पहुँचते पहुँचते हमको नबजात बच्चा का रोने का आवाज सुनाई दिया. तब तक हम स्ट्रेचर पर उस औरत को उतार चुके थे. उसका चीख तेज होकर बंद हो गया था. हम अबाक पायदान पर खड़े थे. गाड़ी चलने लगा. अचानक ऊ औरत स्ट्रेचर पर से करवट बदली अऊर हमरे तरफ घूमकर देखी. उसका आँख से मोटा मोटा लोर टपक रहा था.

52 टिप्‍पणियां:

  1. वाह-वाह शानदार इंसानियत की मिसाल ...तारीफ के शब्दे नहीं मिल रहा है ....

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  2. सलिल जी आपकी रेल यात्रा त बहुत्ते अच्छी रही !

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  3. वाह सर, सही हीरो वाला काम किया आपने। सार्थक यात्रा, सार्थक पोस्ट।

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  4. बहुत सुन्दर काम किये आप, हमारी बधाई स्वीकारें।

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  5. रक्षाबन्धन को बीते कुछ ही दिन हुए है .......आज आपने रक्षाबन्धन का सही मतलब समझा दिया !! सलाम करता हूँ आपको !

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  6. "हम तीन माँ के बेटा है"............आपका कार्य अनुकरणीय....नमन आपको....

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  7. वाह!
    बहुत अच्छी मिसाल दी आपने।
    क्या कहू.... बस
    सलाम है आपको।

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  8. एक अनुरोधः
    कृपया इस पोस्ट पर अपना टिप्पणी से हमारा बात निकाल दें... इस घटना से आपका मन में हमारे लेखन अऊर उससे भी जादा लोगों के ब्यवहार के प्रति जो बिचार आता है ऊ लिखें त अच्छा होगा. हम बस ओही किए जो हमको हमरे संस्कार में मिला.. अऊर एक आम आदमी को उस हालत में करना चाहिए था... सायद रेलवे का नमक हमरे नस में भरा है इसलिए कुछ हो जाता तो अपने स्वर्गीय पिता जी को मुँह भी नहींदेखा पाते, इसलिए हम किए. मगर हमरा अनुरोध सुइकारिए, हमरे बारे में मत लिखिए.

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  9. आज जब नमक हारमो की कमी नहीं है ........अगर कोई नमक हलाल मिले तो क्या हम लोग सलाम भी ना करें उसे ??
    नमक केवल रेलवे का नहीं .....देश का भी अदा किया है आपने !

    हम में से कितने लोग करते है जो हम को करना चाहिए ??

    अगर हम सब वह करने लगे जो हमे करना चाहिए तो देश की हालत यह नहीं रहेगी जो आज है ......हम लोगो में सिविक सेन्स की कमी है .... आपने जो किया वह सिविक सेन्स का एक बेहद उम्दा उदहारण है !

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  10. अब हम क्या कहें वर्मा जी, आपने हमारी जुबान पर ताला जो जड़ दिया! भगवान आपको सदा मुसीबतजदाओं की बगल वाली सीट अता फरमाए- आमीन!!

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  11. साधुवाद आपको. आप भले इन्सान हैं, मैं जानता था.



    हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

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  12. हमारे देश में भी सब कुछ सम्‍भव है यदि आप जैसे कर्तव्‍यनिष्‍ठ नागरिक हों तो। लेकिन लोग तो दूसरों को गरियाने के सिवाय कुछ करते नहीं। आपने हिम्‍मत दिखायी तो चिकित्‍सा दल आया और काम हुआ। यहाँ तो चिकित्‍सकों को और भारत की व्‍यवस्‍थाओं को गाली देने का फैशन ही पड़ गया है। आपने एक सकारात्‍मक पोस्‍ट लगायी इसके लिए आभार।

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  13. "jako rakhe saiyan maar sake na koi" - bhagwan ne sab kuchh pahle se fit kar rakha tha, tabhi to uske parosi aap the, koi dusra nahi........dhanyawad!! jindagi bachane ke liye bihari babu!!

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  14. अब आपने इस अद्भुत काम के लिए अपनी प्रशंशा करने के लिए मना कर दिया है तो हम मन ही मन आपको नमन कर लेते हैं.
    जिस स्त्री के भाग्य में आप जैसे रहनुमा न लिखें हों उसका क्या होगा? जिसकी रेलवे में जान पहचान न हो उसके लिए भी मुसीबत है...ऐसे में आम इंसान क्या करे? क्या रेलवे की तरफ से इस आपातकाल के लिए कोई सुविधा होती है?
    नीरज

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  15. अचानक ऊ औरत स्ट्रेचर पर से करवट बदली अऊर हमरे तरफ घूमकर देखी. उसका आँख से मोटा मोटा लोर टपक रहा था


    सारी बात इस पंक्ति में समा गयी ....हर इंसान अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहे तो स्वर्ग इसी धरती पर है ...उस स्त्री के लिए भगवान का रूप आपने धरा होगा ...आखिर भगवान भी हर जगह तो नहीं जाते न ..अपने प्रतिनिधि भेज देते हैं ...

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  16. बड़ा पुण्य का कम किया सर आपने ! वईसे आपके लेख का पहला पैराग्राफ पढ़ा तो हमका हँसी भी आया, एकदम दुखती रग में उंगली रख दिए आप तो ! :)

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  17. सलिल भाई काम तो आपने वही किया जो आपको उस समय करना चाहिए था। असल में सोचते सब हैं लेकिन पहल कोई नहीं करता। पहल करने के लिए हिम्‍मत चाहिए होती है। वह आपने दिखाई,इसके लिए तो आपको सलाम लेना ही होगा।
    नीरज जी ने पूछा है कि रेल्‍वे में ऐसी आपतकालीन स्थिति के लिए क्‍या व्‍यवस्‍था होती है। व्‍यवस्‍था यही है जिसका सलिल जी ने उपयोग किया। हम सब ने अगर आरक्षण करवाते वक्‍त ध्‍यान दिया हो तो देखा होगा कि वहां फार्म में पूछा जाता है कि अगर आप डॉक्‍टर हैं तो कृपया इस बात का उल्‍लेख करें,ताकि जरूरत पड़ने पर आपकी सेवाओं का उपयोग किया जा सके।
    हिम्‍मत सलिल जी ने दिखाई,उससे ही कंडक्‍टर,गार्ड,और अलीगढ़ के रेल्‍वे प्रशासन को अपना काम करने के लिए आगे आना ही पड़ा। सलाम हमें उनको भी करना चाहिए। वे भी इसके हकदार हैं।
    सलिल भाई आपका वर्णन बिलकुल ऐसा है जैसे हम कोई फिल्‍म देख रहे हैं। बहुत बहुत बधाई आपको इस पोस्‍ट के लिए।

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  18. सलिल भाई आपको बहुत बहुत बधाई और धन्‍यवाद.

    हमें यह भी पता चला कि कन्‍डेक्‍टर के पास वाकी टाकी होता है और गार्ड चाहे तो कम समय में ही स्‍टेशन पर सुविधायें प्रस्‍तुत करवा सकता है.

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  19. तरीका तै बहुतै लोगन के मालूम मगर मुस्किल में दुसरे कै मदत करै वाला आप जैसन कलेजा हर अदमी के पास कहां ......बस कउन पडय परशानी मे।
    इन्सानियत की एक अनुकरणीय मिशाल सबके लिये... सलाम

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  20. कमाल कर दिया आपने तो..अगर देश का हर चौथा नागरिक भी आप जैसा हो जाये न ..तो भारत कहाँ से कहाँ पहुँच जाये..

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  21. आपका कार्य तो अनुकरण योग्य है ही और आपका यह पोस्ट पढ़कर बहुत लोगों को यह जानकारी भी हो गयी कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए. कई लोग जानकारी के अभाव में भी चाहकर कुछ नहीं कर पाते.पर सबसे बड़ी बात है, कि किसी की भी मुश्किल घड़ी में उसका साथ देना और बिना घबराए अपने स्वविवेक का इस्तेमाल करना...जो आपने बखूबी किया. सबों को एक सीख मिलेगी इस से.

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  22. प्रणाम ,

    अभी त रउरा लेखनी के प्रशंसक रहनी .. आज से आप के भी ..

    प्रणाम स्वीकार करी...

    पंकज प्रवीण

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  23. .
    आपके इस निर्णय में जागरूकता, इंसानियत, तथा एक स्त्री के प्रति समय से की जाने वाली मदद स्पष्ट दिख रही है। विरला ही कोई इतनी तकलीफ उठाता है अपने भारतीय भाई-बहनों के लिए। आपकी इस पोस्ट के माध्यम से बहुत से लोग शिक्षा लेंगे और जरूरत पड़ने पर अपने नैतिक दायित्वों से विमुख नहीं होंगे। हमारे साथ अपना अनुभव बांटने के लिए आभार। आपकी पोस्ट मानस-पटल पर अंकित हो गयी है।
    .

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  24. आपके बारे में नहीं लिखना है...सो नहीं लिखूंगा...:)
    चित्र खींचता चला गया आँखों के सामने और बिना चढ़े, पहली बार एसी यात्रा कर ली मैंने भी...पर्दा, दरवाजा, अलीगढ...और वो पनीली आँखें ...सब कुछ, बिलकुल सब कुछ..
    आपका नहीं कहना है...सो ऐसा लिखने का शुक्रिया.. :)

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  25. काश आपके जैसा इंसान हमारे देश के हर कोने कोने में हो फिर हमारा देश उन्नति की ओर बढ़ पायेगा! आपकी रेलयात्रा तो बहुत ही शानदार और ज़बरदस्त रही! बहुत अच्छा लगा आपका ये पोस्ट पढ़कर!

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  26. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से, आप इसी तरह, हिंदी ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

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  27. Kal se padhne ki koshish me thi..pahle network down ho gaya bad me mai.
    Sab manzar aankhon ke aage se guzar gaya! Bemisal lekhan aur waise hi insaan hain aap!

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  28. चाचा जी हम क्या कहें इस पोस्ट समझ नहीं आ रहा...आप कुछ भी कहे, लेकिन आपने जो किया, वैसा बहुत कम लोग करते..जैसा की आपने कहा की ऐ.सी बोगी में सब लोग आराम से कान पे तकिया रख सो रहे थे.बहुत लोग तो देख के भी अनसुना कर देते हैं,
    बाकी रश्मि दी की बात भी सही है, कुछ ऐसे भी लोग हैं जो करना चाहते हैं कुछ लेकिन जानकारी के आभाव में नहीं कर पाते...


    अच्छा वैसे, साइड लोअर मेरा फेवरिट बर्थ है..:)

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  29. वाह .... इसको कहते हैं इंसानियत और जिंदादिली और कुछ करने का ज़ज़्बा .... बहुत अच्छा लगा आपकी पोस्ट पढ़ कर और उससे भी ज़्यादा ये जान कर की आपने ऐसे समय में अपना कूल बनाए रक्खा और अपना ज्ञान का समूचा इस्तेमाल किया .... बधाई इस नेक कर्म के लिए .....

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  30. संस्मरण के अंत में हमारी आँखों में भी आंसू थे... या कहिया लोर ... जिस तरह से आपने वर्णन किया है... आपके लेखन में अदभुद सामंजस्य है.. कम शब्दों में संवेदना को संप्रेषित करने की लाजवाब क्षमता है.. बाकी आते हैं इंसानियत की बात पर.. तो आप उस महिला के लिए किसी इश्वर के कम नहीं थे.. बाकी बेचारा फौजी की हालत तो देखिया.. वो अपनी जान देकर हमें चैन की नींद .. सुकून देता हैं लेकिन उसके लिए यह देश क्या करता है.. मैंने कई बार देखा है कि जब उन्हें रिजर्वेसन नहीं मिलता है तो लोग उन्हें अपने आसपास सीट नहीं देते.. ख़त्म हो रहे इंसानियत के बीच ए़क मार्मिक और प्रेरित कर देने वाला संस्मरण.. संवेदना से भर गया मन...

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  31. बाबूजी आप जो किए सही किए लेकिन एक ज़ोरदार डांट उस आदमी को भी लगनी चाहिए थी जो अपनी पत्नी को ऐसे समय में मुफ्त इलाज़ के लिए ले कर जा रहा है अगर मुफ्त इलाज़ करवाना ही था तो पहले से ही क्यों नहीं ले गया और आखिर कमा किसके लिए रहा है वो ?? जिसके लिए कमा रहा है उसकी की जिंदगी दाव पर लगा दी !

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  32. रेलवे में कई बार आपात् स्थितियां पैदा होती हैं मगर ट्रेन छोड़ने अथवा किसी तरह गंतव्य तक पहुंचने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता। आपात् स्थिति में बात करने की सुविधा लिफ्ट से इतर भी होनी चाहिए। ममता बैनर्जी ने घोषणा की थी कि लंबी दूरी की ट्रेनों में डाक्टर की व्यवस्था की जाएगी। रेलवे में जिस टाइप के डाक्टर होते हैं,उसे देखते हुए,यह रोगी के लिए नहीं तो डाक्टर के लिए निश्चय ही अच्छा अवसर होता। मगर नज़र राइटर्स बिल्डिंग से हटे तब न!

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  33. इंसानियत जिन्दा है अभी जब तक आप जैसे संवेदनशील लोग हैं... बहुत खुशी हुई ये सब जानकर कि आपने इतनी हिम्मत करके एक जीवन नहीं बल्कि दो जीवनों को बचाया..

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  34. insaniyat ka ye zazba jangal kee aag kee tarah faile ya fir choot keebimaree ban kar hee fail jaye charo taraf .
    isee duaa hai meree .

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  35. इहे त ह संवेदना ...और इ ह मिसाल सबके खातिर ..दूसरा बात एगो जज्ञानों के बात पता चलल कि कैसे रेल मे चिक्तिसा सुविधा हासिल कइल जा सकेला ..

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  36. देरी से पहुंची लेकिन आपका ये संस्मरण पढ़ कर मानो आप पर गर्व हो आया. और सबसे बड़ी बात तो ये की आपको इन सब की जानकारी थी...वर्ना आम जनता को ये सब ज्ञान ना होने की वजह से घटना कोई भी मोड ले सकती थी.

    एक अच्छे नागरिक का कर्तव्य सकुशल निभाया आपने.

    आभार.

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  37. इस अनुकरणीय प्रयास से प्राप्त सुकून आपको हमेशा याद रहेगा !यह बिहारी समाज को बहुत कुछ देकर जाएगा ! शुभकामनायें !

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  38. काश ऐसी इन्सानियत हर नागरिक मे हो। बहुतच्छी लगी पोस्ट। धन्यवाद।

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  39. सलिल जी !!! बहुत ही साहस का काम किया आपने !!! इस जज़्बे को सलाम । बहुत ही प्रेरक पोस्ट ।

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  40. waah aapne insaniyat ka naam kafi uncha kar diya " aur wo apne aankho me mote mote aansu bhar kar aapka sukriya bhi ada kar di "aapke jaise yadi insaan sonchne lage to kya baat hai ........har tarf bas khusiyan insaniyat ka mahual ho jayega.....

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  41. सलिल साहब मेरे ब्लाग पर आकर कीमती सुधाव देने के लिये घन्यबाद । आपका बहुत आभार ।

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  42. निशब्द हूँ आपकी इस सूझबूझ और कर्तव्य परायणता पर |
    नमन आपको |ऐसे प्रसंग पढ़कर मानवता पर gahra विश्वास होता ही |

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  43. उस अनुभव को मैं पढ़ के महसूस ही नहीं कर सकता हूँ जो प्रसन्नता आपने अनुभव की होगी |

    सादर

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  44. मैंने यह पोस्ट अभी तक नही पढ़ी थी । यह संयोग ही है कि आपने इसका उल्लेख कर दिया । अभिभूत हूँ । घटना पर नही । लेखन पर भी नही क्योंकि वह तो आपके लिये बहुत छोटी बात है । अभिभूत हूँ आपकी सूझबूझ और तत्परता से उपाय करने पर । मानवीय संवेदना का इससे अच्छा उदाहरण क्या होसकता है । निश्चित ही आपने अपने संस्कारों वश किया । संवेदना तो कई लोग रखते लेकिन संवेदना को जिस तरह आपने साकार किया वह भी इतनी त्वरित गति से ...मतलब कि विश्वास ही नही हो रहा कि ऐसा भी हो सकता है । आप इतना जीवन्त कैसे लिख लेते हैं आपके ऐसे प्रसंग पूरी तरह समझा देते हैं ।

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