रविवार, 5 सितंबर 2010

विवेक शर्मा, भिखारी और भिखारी का ताजमहल!!

एगो बात बताएँ... ब्लॉग पढने का लत हमको “बिग अड्डा” पर विवेक शर्मा (निदेशक: फिल्म भूतनाथ और कल किसने देखा) के ब्लॉग से लगा. जिन्नगी का एतना छोटा छोटा घटना अऊर उससे मिलने वाला एतना बड़ा बड़ा संदेस.विवेक शर्मा का कहानी कहने का अंदाज बस पहिला लाइन से बाँध लेता है पढने वाले को अऊर आखिरी लाईन तक आते आते आप अवाक् रह जाते हैं, बस ऊ कहानी और संदेस के साथ.

दोसरा खासियत,अगर सचमुच ब्लॉगर और ब्लॉग पाठक के बीच का रिस्ता देखना हो तो उनका ब्लॉग पढकर देखिए.पढने के बाद कमेंट दिए बिना कोई नहीं रह पाता है और कमेंट देने के तुरत बाद उनका दोस्ताना जवाब. हफ्ता दस दिन के अंदर लगा कि रिस्ता बन गया है उनसे. जब हम अऊर चैतन्य मिलकर “सम्वेदना के स्वर” लिखना सुरू किए त बस एक अनुरोध किए विवेक शर्मा से कि हमारे ब्लॉग पर कुछ कहिए.अऊर अगला छन में उनका संदेस हमारे कमेंट बॉक्स में चिपका हुआ था.

बहुत सम्बेदनसील हैं विवेक जी.एक बार, एक घटना का जिकिर किए थे ऊ अपना पोस्ट पर. भोपाल इस्टेसन पर ऊ अपनी बहन के साथ गाड़ी का इंतजार कर रहे थे.अचानक एगो चोर,ओहीं खड़ा दोसरा आदमी का झोला लेकर भागा. ऊ आदमी भागकर चोर को पकड़ा. चोर ऊ आदमी को लात से मारकर भागना चाहा, उसको घूँसा थप्पड़ से मारा, मूँह से खून तक निकाल दिया मारकर. मगर ऊ आदमी छोड़ा नहीं चोर को. भाग गया चोर अंत में झोला फेंककर.

लोग पूछा कि का था ई झोला में. तब ऊ आदमी जवाब दिया, “कुछ नहीं! लेकिन जो है बस यही है मेरा सबकुछ!”

विवेक जी लिखे थे कि ई घटना को ऊ अपना आने वाला फिल्म “बुद्धम् शरणम् गच्छामि” में इस्तेमाल करेंगे. फिल्म जब आएगा, तब आएगा, लेकिन हमरे मन में जो कबिता बना, ऊ बतौर कमेंट हम चिपका आए वहाँ पर.

पिछला हफ्ता बहुत ब्यस्त रहे अऊर लगता है कि ई सिलसिला अभी चलेगा त ओही कबिता आज साल दू साल बाद यहाँ पोस्ट कर रहे हैं.

लोग का कहना है कि इण्टरनेट का इस्पीड, रोसनी का इस्पीड जईसा है...लेकिन “बिग अड्डा” से “ब्लॉगर” तक आने में ई कबिता को दू साल लग गया!!




भिखारी का ताजमहल

पोटली में लगे पैबंद हैं दौलत मेरी.

तेरी ये ज़िद थी इसे सिल के ही दम लेगी तू!
बूढ़ी आँखों से दिखाई तुझे कम देता था
सुई कितनी दफा उंगली में चुभी थी तेरी
उंगलियों से तेरी कितनी दफा बहा था ख़ून.
कौन सा इसमें ख़ज़ाना था गिरा जाता था
कौन सी दुनिया की दौलत थी लुटी जाती थी.

आज जब तू नहीं दुनिया में तो आता है ख़याल
दौलत-ए-दो-जहाँ से बढके पोटली है मेरी
संगेमरमर की नहीं यादगार, क्या ग़म है
सोई पैबंद के पीछे मेरी मुमताज़ महल.

पोटली में लगे पैबंद हैं दौलत मेरी.

40 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी पंक्तिया लिखी है आपने .....

    यहाँ भी आइये .....
    (आजकल तो मौत भी झूट बोलती है ....)
    http://oshotheone.blogspot.com

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  2. बहुते बढ़िया और सौ टका सच्चा अभिव्यक्ति ....

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  3. ऐसे चोर और ऐसे प्रेमी भोपाल में ही पाए जाते हैं। आपने अपनी कल्‍पना का बेहतर और संवदेनशील इस्‍तेमाल किया है। बधाई।

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  4. बहुत बढ़िया कविता है, सलिल भाई !
    कंप्यूटर की समस्या के चलते आजकल थोडा दूर हूँ ब्लॉग जगत से !

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  5. आपकी कविता पढ़ने पर ऐसा लगा कि आप बहुत सूक्ष्मता से एक अलग धरातल पर चीज़ों को देखते हैं। इस कविता में बहुत बेहतर, बहुत गहरे स्तर पर एक बहुत ही छुपी हुई करुणा और गम्भीरता है। इस कविता की कोई बात अंदर ऐसी चुभ गई है कि उसकी टीस अभी तक महसूस कर रहा हूं।

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  6. आज जब तू नहीं दुनिया में तो आता है ख़याल
    दौलत-ए-दो-जहाँ से बढके पोटली है मेरी

    बहुत संवेदनशील पंक्तियाँ ...

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  7. सलिल जी, हम आध-एक घंटा बतियाए हैं विवेक जी से वे वाकई में बेहतरीन इंसान हैं। जबलपुर उनका गृह नगर है वहीं उनसे मुलाकात हुई रही। उनसे बातचीत करने में कतई नहीं लगा कि वे माया नगरी से हैं, बिल्कुल सहज दिखे। उन्होंने जो मान अपने गृह नगर के वासियों को दिया उस जज्बे को देख कर आज भी मैं उन्हें नहीं भूल पाया हूं। वे अपने गुरु का बेहद सम्मान करते हैं। विवेक जी ने मंच से उतर कर अपने गुरु के चरणों में शीष नवाया था, हजारों लोगों की भीड़ थी। नई दुनिया ने जबलपुर के नवरत्न चुने थे। उसी कार्यक्रम में वे और आदेश श्रीवास्तव, सुभाष घई आदि आए हुए थे। आदेश श्रीवास्तव भी जबलपुर के ही हैं। लेकिन उनसे कई गुना बेहतर इंसान विवेक जी हैं। और अंत में आपकी कविता बहुत प्यारी लगी........
    मेरी विवेक जी से फिर से बात करने की बड़ी इच्छा है।

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  8. आज जब तू नहीं दुनिया में तो आता है ख़याल
    दौलत-ए-दो-जहाँ से बढके पोटली है मेरी
    संगेमरमर की नहीं यादगार, क्या ग़म है
    सोई पैबंद के पीछे मेरी मुमताज़ महल.

    पोटली में लगे पैबंद हैं दौलत मेरी.

    बहुत ही उम्दा पंक्तियाँ !!!

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  9. सरिता दी अपनत्व का ई मेल से प्राप्त टिप्पणीः
    dear busy personalities
    kaise ho thouno ?
    Ek to garmee se pareshaan aur doosareka kya haal hai?
    mamatv se badee dhanrashi aur kya ho saktee hai?
    ek Tajmahal kya all tha wonders of world feeke hai mamatv ke aage .
    kavita suee see chubhan chod gayee .
    Chaitany se kahna judgemental hona theek nahee........
    maine write up pada hai.
    vaise unhe khud ko bhee samjh aa hee gaya.
    Arna 2 wks kee ho gayee hai.....
    Nanee ko vyst rakhane me mahir hai .
    s sneh
    sarita di

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  10. kavita to behtareen hai hai, us par se jo aap likhte hai to wo us se bhi badh kar ho jata hai.......ek alag sa soundha sa mahak aata hai aapke post se bhi bihari bahu..........:)

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  11. बहुत संवेदनशील रचना .... ये बस महसूस करने वाली बात है ... वैसे तो ताज महल भी किस के पास रहता है ... पर ये झोला और इसमें लगे पैबंद .... हथेलियों से सिलि भावनाएँ जो इस पत्थर से ज़्यादा अहमियत रखती है ... जिसमे जुड़ाव है ..

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  12. आदमी का अपना यदि कुछ है,तो बस अनुभव ही है। जिसके भीतर करूणा होगी,वही इन छोटी-छोटी बातों में जीवन के तत्व ढूंढ पाता है।

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  13. वाह भाई वाह...बहुत खूब लिखा है आपने...बेहतरीन...इस्मत चुगताई जी एक कहानी में जिसमें एक भिखारिन का चौला बन्दर उठा कर ले जाते हैं और उसमें से चीजे निकाल निकाल कर फैंकते हैं जिन्हें पब्लिक देख कर हंसती है क्यूँ के वो सारा फ़ालतू का सामान होता है...चीजों का यूँ मज़ाक बनता देख कर शर्मिंदगी से भिखारिन मर जाती है...
    बेहतरीन
    नीरज

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  14. तेरी ये ज़िद थी इसे सिल के ही दम लेगी तू!
    बूढ़ी आँखों से दिखाई तुझे कम देता था
    सुई कितनी दफा उंगली में चुभी थी तेरी
    उंगलियों से तेरी कितनी दफा बहा था ख़ून.
    कौन सा इसमें ख़ज़ाना था गिरा जाता था
    कौन सी दुनिया की दौलत थी लुटी जाती थी.

    सुन्दर , लेख शुरू में तो समझा था की आज आप भी चिटठा चर्चा करने उतर गए!

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  15. संवेदनाओं की इतनी सूक्ष्म अभिव्यक्ति बहुत कम देखने को मिलती है। यही पकड़ आम आदमी और कवि के बीच के भेद को रेखांकित करती है। देखते तो सभी हैं लेकिन चीजों को देखने का नज़रिया अलग होता है। प्रस्तावना और कविता दोनो ह्रदय स्पर्शी हैं.
    ..आभार।

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  16. बहुत ही संवेदनशील कविता है...

    और हर चीज़ का समय नियत है अब तो ये विश्वास और पक्का हो गया....मुझे भी एक पोस्ट जो मैने अपना ब्लॉग शुरू करने से पहले...किसी और ब्लॉग के लिए लिखा था, उसे भी अपने ब्लॉग तक लाने में एक साल लग गए...अब अगली पोस्ट वही पोस्ट होगी.

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  17. कहने का अंदाज़ तो आपका भी कुछ कम नहीं है! ...और आपका वो टाट का ताजमहल तो संगेमरमर के ताजमहल से भी कहीं ज्यादा खूबसूरत है!!

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  18. बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार कविता जो काबिले तारीफ़ है! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है! बधाई!

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  19. chacha ji kavita bahut achhi hai, aur vivek ji ka blog bhi padha...ab padhte rahgunga :)

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  20. इंटरनेट की गति प्रकाश के बराबर!!!!!!!!!! :)
    कविता ने तो मन को तडपा दिया.. पूरे से शायद ना पहुंचा होऊं लेकिन काफी हद तक आपकी भावनाओं को महसूस कर पाया..

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  21. मैं पहली बार आपके ब्लॉग तक आया हूँ. भोजपुरी में एक सार्थक ब्लॉग देकर आपने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है. चूंकि मैं गोरखपुर से हूँ, भोजपुरी से बखूबी वाकिफ हूँ. भोजपुरी भाषा में पहला ब्लॉग है जहां भंडैती नहीं है. वरना फूहड़ हास्य या अश्लीलता ही परोसे जा रहे हैं ऐसे ब्लोग्स पर.
    ताजमहल, आपके ताजमहल ने साहिर के ताजमहल की याद दिला दी. मेरे पास शब्द नहीं इस रचना की प्रशंसा के लिए. एक शब्द में बोलूँ तो ---शानदार.
    मुझे आपकी मेल आई.डी. दरकार थी जो आपके प्रोफाइल या ब्लॉग पर भी नहीं मिली. मजबूरन कमेन्ट बॉक्स का सहारा ले रहा हूँ. मैं अपनी मेल आई.डी.और फोन नम्बर यहाँ अंकित कर रहा हूँ ताकि आपसे सम्पर्क के माध्यम मुझे प्राप्त हो सकें.
    sarwatjml63@gmail.com sarwat.jamal@yahoo.com
    09696318229 09792525923
    आशा है आप मुझे सम्पर्क सूत्र से अवगत कराएंगे.

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  22. bohat hi achchi panktiyan hai Salil ji...Aapne mer hausla badhaya...dil se aabhari hoon:)

    vivek sharma

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  23. बहुत दिनों बाद पढने को मिली आपकी पोस्ट पढ़ कर अच्छा लगा !

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  24. प्रिय सलिल जी,
    आपकी लेखनी को मेरा प्रणाम!
    अत्यंत संवेदनशील रचना है "भिखारी का ताजमहल" ... मानो एक-एक शब्द को आंसुओं में डुबोकर लिखा है आपने...
    शब्दों की भावपूर्ण अभिव्यक्ति....
    शलभ गुप्ता

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  25. आज जब तू नहीं दुनिया में तो आता है ख़याल
    दौलत-ए-दो-जहाँ से बढके पोटली है मेरी
    संगेमरमर की नहीं यादगार, क्या ग़म है
    सोई पैबंद के पीछे मेरी मुमताज़ महल.

    पोटली में लगे पैबंद हैं दौलत मेरी.
    .......एक कटु सत्य को बहुत ही सहजता से उकेरा है आपने .... गहन संवेदनाभरी प्रस्तुति हेतु धन्यवाद ...

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  26. सलिल जी,पता नहीं क्यों , पहली बार लगा कि जीवन मे एक सच्चे व्यक्ति से मेरी बातचीत हो रही है, आपकी सलाह मेरे लिए निस्संदेह अत्यधिक उपयोगी है, 'संवेदना के स्वर ' का तो अनुशरण करने लगा हूँ मैं. पेशे से शिक्षक हूँ , केंद्रीय विद्यालय मे , विज्ञानं पढ़ाता हूँ , पर कई शौक हैं मेरे , कभी इप्टा से भी जुड़ा रहा था .नक्र मे ही हूँ , इतना तो पता चल ही गया होगा, प्योर balliatik हूँ.तो आपकी चला बिहारी की भाषा मेरे लिए जीवन दायिनी है, पुरानी यादें , pure nostalgic !. आपकी कविता ...पोटली मे .........
    "तेरी ये ज़िद थी इसे सिल के ही दम लेगी तू!
    बूढ़ी आँखों से दिखाई तुझे कम देता था
    सुई कितनी दफा उंगली में चुभी थी तेरी
    उंगलियों से तेरी कितनी दफा बहा था ख़ून.
    कौन सा इसमें ख़ज़ाना था गिरा जाता था
    कौन सी दुनिया की दौलत थी लुटी जाती थी."
    शानदार पंक्तियाँ हैं ,सहेज कर रक्खी जानी चाहियें. शायद इतनी संवेदना तो 'संवेदना के स्वर मे भी नहीं . मेरा साधुवाद.

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  27. बहुत अच्छी कविता थी चचा |
    साथ ही विवेक जी के बारे में भी जानने को मिला , वर्ना मैं तो उन्हें निर्देशक के तौर पे ही जानता था |

    सादर

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