सोमवार, 25 जुलाई 2011

बातें हैं बातों का क्या


घटना, खबर अउर अफवाह में कोनों समानता हो, चाहे न हो, बाकी सम्बन्ध जरूर है. कानों कान खबर होना, दीवारों के भी कान होना (“सुना है लिफ्ट की दीवारों के कान नहीं होते” वाला अपवाद को छोडकर) आदि मोहावरा सब एही सम्बन्ध साबित करता है. अउर एही चक्कर में असली घटना अउर असली खबर बेचारा “दुहाई माई-बाप” करते रह जाता है.
एक बार इलाहाबाद में अइसने बात हुआ. एगो अखबार में खबर देखे कि साहित्यकार उपेन्द्र नाथ “अश्क” जी अपना घर में लेमू (नीम्बू) बेच रहे हैं. मन में बड़ा तकलीफ हुआ. नाप दिए रस्ता उनके घर का, लीडर रोड पर खुसरोबाग के बगल में. जाकर देखे कि अश्क जी एगो छोटा सा परचून का दोकान खोले हुए हैं. लौटते समय रास्ता भर हम दुनो भाई एही सोचते हुए लौटे कि लेमू तो कहीं था नहीं, त अखबार में लेमू कइसे लिख दिया. तब सायद दोसरा दिन अखबार में खुलासा आया कि एगो हिन्दी अखबार में खबर छपा था - अश्क जी परचून का दोकान खोले हैं घर में. अंगरेजी वाला चून देखिस अउर चून का अनुबाद कर दिया “लाईम”. उसके बाद कोनों हिन्दी अखबार वाला नक़ल मारिस अउर लाइम का हिन्दी बनाया लेमू. बस हो गया घटना के साथ दुर्घटना. खैर एही बहाने हमको उनका दरसन का सौभाग्य प्राप्त हुआ.
दूर कहाँ जाते हैं, घरे में देख लीजिए ना. एक दिन सिरीमती जी से कहे, “ए जी! बहुत दिन से छुट्टी नहीं लिए हैं ऑफिस से. अब रिलैक्स करने का मन करता है. बेटी का इस्कूल बंद हो, तब सोचते हैं छुट्टी लेकर पटना चलें. सब टेंसन भूल-भाल कर आराम से रहेंगे हफ्ता भर.”
सबेरे ऑफिस जाने के पहिले नाश्ता करते समय ई बात हुआ था. अभी मेट्रो में जमुना बैंक भी नहीं पहुंचे थे कि ससुर जी का फोन आ गया,
“तब... कब का प्रोग्राम बना रहे हैं.”
“अभी कहाँ. ऑफिस से इतना आसानी से कहाँ छुट्टी मिलता है. बस उठकर चले आयेंगे कभी.”
“१५ को आ रहे हैं तो बहुत अच्छा है. उस समय पुतुल भी अपना बच्चा को लेकर आएगी. आपलोग छट्ठी में नहीं आए थे, तो सब लोग याद कर रहा था.”
अच्छा हुआ कि उसी समय सिग्नल ड्रॉप हो गया अउर मोबाइल बंद. सिग्नल चालुए हुआ था कि सासू माँ लाइन पर मौजूद,
“मेहमान! १५ को जब आ ही रहे हैं, तो तनी बेसी दिन का छुट्टी लेकर आइयेगा. हमलोग बूढा बूढ़ी भी तनी नतिनी के साथ रहना चाहते हैं. आप तो सुबह आते हैं अउर साम को भाग जाते हैं अपने घर.”
“मम्मी! अब आपके यहाँ कोइ बतियाने वाला है नहीं अउर आप लोग से हम बेसी बतिया भी नहीं पाते हैं. मगर ई बताइये, आपको १५ तारिख कौन कहा?”
“अबके तो पापा बताए हैं कि १५ तारिख को अचानक उठकर चले आइयेगा आप लोग.”
“मम्मी! अभी ऑफिस पहुंचकर बात करते हैं. बहुत भीड़ है मेट्रो में.”
माथा अब हमारा गरमाने लगा था. मगर का करें, रिश्ता अइसा कि बोल नहीं सकते. ऑफिस पहुंचे अउर अभी टिकाए भी नहीं थे तसरीफ कि मोबाइल घनघनाने लगा. हमारी दिल्ली वाली साली,
“वाह जीजा जी! आप तो छुपे रुस्तम निकले!”
“मेम साहब! अब इस उम्र में छुपा रुस्तम वाला कोइ काम नहीं करने वाले हैं हम.”
“पन्द्रह तारीख का राजधानी में टिकट बुक भी हो गया अउर हमको बताए भी नहीं. आज आपको राजेश मम्मी के लिए एक साड़ी दे जायेंगे. लेते जाइयेगा. और हाँ, पुतुल की बेटी के लिए चांदी का पायल दीदी को बोल दिए हैं, खरीद लेगी हमारे तरफ से.”
“सुनिए जी! राजधानी क्या, किसी भी ट्रेन में टिकट नहीं मिल रहा है १५ तारीख का. जब जायेंगे तो कह देंगे आपको.”
“बनाइये मत! आपका आदत है मजाक करने का.”
जैसे तैसे पीछा छूटा. डर से सिरीमती जी को फोन नहीं कर रहे थे कि झगड़ा हो जाएगा. मगर दिमाग में आग लगा हुआ था. हई देखिये..आग में घी, हमारी छोटकी साली सहारनपुर से,
“तब जीजा जी! क्या हाल चाल है.”
“जिस बात के लिए फोन की हैं ऊ कहिये दीजिए, तब हम ऑफिस का काम सुरू करें.”
“आप तो गुस्सा हो जाते हैं. आप ठहरे बड़े आदमी.”
“अब देखिये! ई बड़ा-छोटा कहाँ से आ गया!!”
“और क्या, १५ तारीख को राजधानी का टिकट नहीं मिला तो फ्लाईट में टिकट बुक कर लिए हैं आप. हम तो नहीं कर सकते हैं ना.”
“अच्छा तो आपको भी १५ तारिख का हवा लग गया!”
“हम भी आ रहे हैं १४ को दिल्ली, आपके साथ चलेंगे पटना. हमारा भी फ्लाईट का टिकट कटा दीजिए. सबसे बड़े जीजा जी हैं, इतना भी नहीं कर सकते!”
“अरे आपके लिए तो हम चार्टर्ड फ्लाईट कर सकते हैं, मगर जा कौन रहा है.”
बहुत मोसकिल से पीछा छूटा. जब १५ तारिख निकल गया तब जाकर सबको बिस्वास हुआ.
हमरी सिरीमती जी असल में अकेले पटना जाना भी नहीं चाहतीं. नहीं त हम १५ तारीख को भेज देते. मगर ऊ बोलीं कि आप नहीं जाइयेगा तो हम भी नहीं जायेंगे.
इसको लेकर हमरे सोसाइटी में बहुत तरह का खबर फैला हुआ है.
“मिसेज वर्मा पल्लू से बांधकर रखती हैं. इसीलिए कभी छोडकर नहीं जातीं अकेले पटना कुछ दिनों के लिए.”
“अरे नहीं! वर्मा जी के चालचलन पर शक होगा, तभी नहीं छोड़तीं.”
“अब इतना भी शक क्या करना. दिन भर मर्द बाहर ही तो रहते हैं.”
“मुझे तो वर्मा जी बहुत सीधे सादे लगते हैं. नज़र झुकाकर आते जाते हैं. नज़र मिल जाए तो नमस्ते ज़रूर करते हैं.”
मगर असली बात हम जानते हैं. हमको खाना बनाना नहीं आता है. अउर बाहर का खाना हमको पसंद नहीं. अइसे में अगर कहीं ई हफ्ता भर के लिए पटना चली गयीं, त हमारा तो ब्रेकफास्ट से लेकर डिनर तक हो गया ब्रेड अउर दूध चाहे चूडा-दूध. बेचारी हमारे खाने के परेसानी से नहीं जाती हैं अउर लोग का-का बात बनाता है. बात भी सहिये है जीभ में हड्डी त होबे नहीं करता है, जो मन में आया बोल दिया.
मगर पिछला ५-६ दिन से उनको वायरल बुखार हो गया था. एकदम हिल-डोल बंद. कोसिस करके कोनों कोनों तरह से नास्ता, खाना बनाना सुरू किये. कुछ प्रयोग भी किये मसाला के साथ. ताज्जुब एक्के बात का हुआ कि हमसे एक्को दिन, न नमक बेसी हुआ, न मिर्चा जादा, न मसाला कम. अउर स्वाद अद्भुत! कुछ तो मेहनत का फल था इसलिए मिठास था खाना में अउर कुछ ई सब हम सेवा के भावना से कर रहे थे इसलिए भी स्वाद था. तनी तबियत ठीक हुआ उनका त हम बोले, “अब तुमको हमारे खाना का चिंता नहीं करना पडेगा. तुम निश्चिन्त होकर हमको छोड़कर जा सकती हो.”
“छोड़कर नहीं जाने वाले हैं हम. अभी तो पहिला जन्म भी कम्प्लीट नहीं हुआ है. करार तो सात जन्म का है ना!”

रविवार, 10 जुलाई 2011

बीमार से मिलने कोइ बीमार तो आए!!


भगवान ना करे, मगर कभी बीमार पड़े हैं आप लोग? आप कहिएगा ई भी कोनो बात हुआ. आदमी का बीमार पड़ना, उसके स्वस्थ रहने का निसानी है अउर ई दुनिया में कउन है अइसन आदमी जो बीमार नहीं पड़ा हो! मगर तनी सोचकर देखिये कि आप बीमार हैं अउर कोनो देखने नहीं आए, तब कइसा लगेगा आपको? हम जानते हैं कि ई बहुत बेचैनी वाला बात है. पत्नी भी सुनाने से बाज नहीं आएंगी कि फलाना आपका बहुत अच्छा दोस्त था, एक्को बार देखने भी नहीं आया. देखना त दूर, फोन करके हालचाल भी नहीं पूछा! नवीन जी को देखिए, केतना अच्छा आदमी हैं बेचारे, ओतना दूर से मिलने आए.
अब उनको हम का समझाएं कि हम जानकर दोस्त लोग को मना कर दिए थे आने से. असल बीमारी में लोग देखने तो आ जाता है, मगर मुसीबत होता है बीमार का. का हुआ है, कइसे हो गया, किसका इलाज चल रहा है, का का दवाए दिए हैं, जांच हो गया, बहुत सीरियस तो नहीं है ना कुछ, ऑफिस का चिंता मत करना, जेतना दिन रेस्ट बोला है डॉक्टर ओतना दिन से पहिले ज्वाइन मत करना, पूरा ठीक हो जाओ तब्बे ऑफिस जाना, परहेज से परहेज मत करना, एक बार उनको भी देखा लेते, राजेस उन्हीं से एक हफ्ता में ठीक हो गया था, बहुत कम दवाई देते हैं, होमियोपैथी भी इसमें बहुत फायदा करता है, खट्टा फल मत खाना, डॉक्टर सब खाने को बोलता है, मगर तुम परहेज ही करना, पानी जेतना पियो ओतने फायदेमंद है, पपीता पसंद नहीं है तइयो खाने का कोसिस करो...! जेतना लोग, ओतने सवाल अउर ओतने सलाह.
अब इतना सवाल का जवाब हर आदमी को दिन भर लगातार देना पड़े त आदमी का बीमारी बढ़ेगा कि कम होगा! इसीलिये हम मना कर दिए कि सिरीमती जी का ताना बर्दास्त कर लेंगे, मगर दोस्त लोग का सवाल अउर सलाह नहीं बर्दास्त होगा हमसे.
एही से हम जब कोनो बीमार को देखने जाते हैं (जाना पड़ता है... नहीं त सिरीमती जी कहेंगी कि हमलोग नहीं गए त बहुत बदनामी होगा. आप बीमार थे त बेचारे सुबह साम आते थे) त कोसिस करते हैं कि ऊ सब सवाल नहीं करें जो हमको नापसंद है. अब आदमी का इलाज चलिए रहा है, त अपना समझ से अच्छा डॉक्टर को देखइबे किया होगा, अच्छा डॉक्टर होगा तो दवाई भी ठीके दिया होगा. अब हम कोनो डॉक्टर त हैं नहीं. का फायदा ई सब फालतू बात करने से. इसलिए हम मरीज को हंसाने अउर खुस रखने का काम करते हैं. चुटकुला सुनाना (डॉक्टर मरीज वाला), चाहे किसी के बात से बात निकालकर मजाक करते हुए माहौल को हल्का बनाते रहना. इससे फायदा ई होता है कि मरीज को भी थोड़ा सा खुसी मिल जाता है अउर बीमारी के माहौल से थोड़ा रिलीफ भी. बेचारा सुई, दवाई अउर परहेज के जेल में पहिलहीं बंद है, उसको ओही सब याद दिलाकर अउर तकलीफ काहे बढ़ाना.
हमरे ई गुन के कारन हम सोसाइटी में बहुत पॉपुलर विजिटर माने जाते हैं. दूर दूर से लोग हमको खाली मरीज को देखने के लिए बुलाता है. जेनेरल ओपिनियन एही है हमरे बारे में कि वर्मा जी के आने से मरीज उनके बात को सुनकर आधा ठीक हो जाता है. लगता ही नहीं है कि आदमी बीमार है. आधा घंटा में आधा लीटर खून बन जाता है मरीज का देह में. मरीज ओतना देर तक सब परेशानी भुला जाता है, जेतना देर वर्मा जी रहते हैं सामने. हमरे सोसाइटी के सर्वे से भी पता चला है कि जउन मरीज को हम देखने जाते हैं ऊ दोसरा मरीज के तुलना में तीन दिन पहिले ठीक हो जाता है.
मगर हमको उस दिन बहुत गहरा सदमा लगा जब हमरे एक बुजुर्ग पड़ोसी की पत्नी का ऑपरेशन हुआ अउर हम उनको देखने हस्पताल गए. उन दोनों का हमरे ऊपर बहुत स्नेह है. उम्र में भी काफी बड़े हैं ऊ हमसे. उनकी पत्नी का पेट का ऑपरेशन हुआ था अउर हम सिरीमती जी के साथ गए थे देखने. हम पांच मिनट रुके होंगे वहाँ पर कि ऊ बोलीं, “वर्मा जी! जब तक हम पूरा तरह से ठीक नहीं हो जाते हैं, आप हमको मत देखने आइयेगा!”
हमरी सिरीमती जी का मुँह उतर गया अउर हम भी घबरा गए कि का गलती हुआ हमसे जिसके कारन ऊ हमको आने से मना कर दीं. उनको भी समझ में आ गया सब बात. तुरत हँसकर बोलीं, “आप जेतना देर रहते हैं, कोई न कोई बात पर हंसाते रहते हैं. आपके बात पर कोई हँसे बिना रह भी नहीं सकता है. मगर हमको डॉक्टर हँसने से मना किया है, क्योंकि हँसने से पेट पर जोर पड़ता है अउर टाँका टूट जाने का डर है.” 
उनका ई बात पर सब लोग ठठाकर हँस दिया अउर हम भी बिदा लेकर चलने लगे. उसी समय पता नहीं कौन सा महँक नाक में गया कि हमको छींक आ गया. ऊ दुनो बुजुर्ग के मुँह से एक साथ निकला, “शतन्जिवी!!” 
कोइ छींकता है तो हमारे यहाँ “शतन्जिवी” कहते हैं, हमारा एगो आंध्र प्रदेश का दोस्त था ऊ “शातायुष” कहता था. गूगल पर बहुत सा बात लिखा था इसके बारे में. मगर असल मतलब त एक्के है कि “सौ साल जियो!”
अब सौ साल जी पाते हैं कि नहीं ई दुनिया में - का पता, मगर ब्लॉग-दुनिया में हम भी आज सौवाँ पोस्ट लिखिए दिए!! हो गए हम भी “शतन्जिवी!!”

बुधवार, 29 जून 2011

मैं और मेरी परछाईं

पन्द्रह अगस्त अउर छब्बीस जनवरी का राष्ट्रीय त्यौहार हमरे अपार्टमेंट में बहुत जोस के साथ मनाया जाता है. सुबह झंडा फहराना, फिर बच्चा लोग का कबिता, गाना अउर भासन, दिन भर खेल कूद का परतिजोगिता अउर रात में कल्चरल प्रोग्राम. तब चैतन्य जी भी हमरे साथ रहते थे. हम दुनो मिलकर प्रोग्राम का रूपरेखा बनाते, पोस्टर लगाते, रिहर्सल देखते, गाना सुनते अउर इसके अलावा नौकरी भी कर लेते थे.

ऊ साल चैतन्य जी डिसाइड किये कि रियलिटी शो के जईसा हम लोग भी तीन ठो जज रखेंगे इस्टेज पर. एगो नया आइटम भी हो जाएगा अउर जब तक जज लोग का कमेन्ट अउर मजाक चलेगा, तब तक अगिला प्रोग्राम का बच्चा लोग तैयार हो जाएगा. हो गया फाइनल, तीन जज में से हम, चैतन्य अउर हमरे एगो साथी की पत्नी, रचना भाभी का नाम फाइनल हो गया. स्क्रिप्ट पर काम चलने लगा. तब अचानक एक रोज बातचीत करते करते हम बिहारी भासा में कुछ मजाक में बोले. बस चैतन्य जी उठकर खडा हो गए, बोले, “मिल गया मुझे तीनों जजों का कैरेक्टर.”

उनका कहना था कि हमलोग अपने असली रूप में नहीं रहेंगे. जब मजाक करना है त दोसरा कैरेक्टर में बनकर हमलोग मजाक करेंगे, “आपका कैरेक्टर फाइनल है लालू यादव का और आपका नाम रहेगा आलू यादव. मैं किशोर कुमार और मेरा नाम शोर कुमार. भाभी जी बनेगी ऋतू बेरी और कहलाएंगी फेंकू बेरी, क्योंकि इनसे लंबी-लंबी फेंकने वाली औरत के डायलाग बुलवाने हैं.”

बस सबकुछ तय हो गया. अपार्टमेंट में पोस्टर लगा दिया गया कि तीन मसहूर मेहमान हमारे प्रोग्राम में पधार रहे हैं, वही जज होंगे प्रोग्राम के. नाम नहीं बताया गया था. बस कहा गया कि कुछ ख़ास कारन से उनका नाम अभी गुप्त रखा गया है. अपार्टमेंट में कानाफूसी सुरू हो गया. कहीं भी कोइ मिल जाता तो धीरे से पूछता था कि बर्मा जी किसको बोला रहे हैं. औरत मंडली हमलोगों के धरमपत्नी को टटोलने में लगा हुआ था. मगर सस्पेंस जो बहाल हुआ सो आख़िरी टाइम तक नहीं टूटा.

प्रोग्राम सुरू होने के पहले मंच पर कोना में टेबुल अउर तीन ठो कुर्सी लाकर रख दिया गया. टेबुल पर गुलदस्ता सजा दिया गया. अभी भी सस्पेंस बाकी था. चैतन्य जी अउर रचना भाभी का मेकप लगभग ओरिजिनल था. माने उनका चेहरा हर रोज के जईसा था. हमको कहा गया गया था तनी इस्पेसल मेकप करने के लिए. साथ में हिदायत भी कि हमको बाद में आना है. चैतन्य जी का आदेस था कि हम मोटर साइकिल पर, दुनो तरफ अपने अपार्टमेंट के दू गो गार्ड के साथ (नकली) बन्दूक के सिकोरिटी में दरसक लोग के बीच से आयेंगे. आने के पहले तीन चार बार घोसना किया जा चुका था कि बस अब हमारे अतिथि आ चले हैं.

हम मेकप करके घर में बंद थे. सबलोग प्रोग्राम अउर चीफ गेस्ट के इंतज़ार में था, इसलिए हमरे तरफ किसी का ध्याने नहीं गया कि हम देखाई नहीं दे रहे हैं. चैतन्य जी धीरे से हमलोग के एगो सहकर्मी ससांक को इसारा किये कि जाकर बर्मा जी को बुला लाओ. नीचे गार्ड रूम में मोटर साइकिल रेडी था. ऊपर चौथा मंजिल पर हमरे फ़्लैट में ससांक घंटी बजाया. किचेन से झांककर देखे कि ससांक है, त हम दरवाजा खोले.

ससांक हमको देखकर बोला, “प्रणाम चाचा जी! वर्मा सर अंदर हैं? ज़रा बुला दीजिए.”

हमको लगा कि मेकप एकदम पक्का है. हंसकर हम बोले, “ अरे शशांक बाबू, हम ही हैं. चलिए.” ससांक का लजाया हुआ चेहरा देखने लायक था. अउर जब हमरा एंट्री हुआ त दरसक लोग भी सुरू में सोच में पड़ गया कि ई कौन है.

प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा. हम तीनों का कैरेक्टर एस्टैब्लिश हो गया. आज भी ओही प्रोग्राम का तस्वीर हमरा ब्लॉग का प्रोफाइल फोटो है. हमरा फोटो को लेकर केतना लोग के अंदर कन्फ्यूजन बना हुआ था. अभी भी हो सकता है पता नहीं. केतना लोग नाराज हो गए “संवेदना के स्वर” पर हमरा फोटो देखकर अउर इहाँ पर वाला फोटो देखकर. ऊ लोग का कहना था कि हम धोखा दिए हैं. बहुत समझाने के बाद ऊ लोग माने.

अउर अब तो ई फोटो हमरा ट्रेड मार्क हो गया है.

शुक्रवार, 24 जून 2011

जसोदा

रूपा जब बहुत खुस होकर ई खबर अपना घर के लोग को फोन पर सुनाई कि ऊ माँ बनने वाली है, त पूरा घर में खुसी का लहर दौड़ गया. मगर खुसी के साथ साथ घर का बुजुर्ग औरत लोग को चिंता भी घेरे हुए था कि परदेस में रूपा कइसे अपना देखभाल करेगी. परदेस में नौकरी करने के कारन आजकल संजुक्त परिबार मजबूरी में भी टूट कर बिखरता जा रहा है. अब अपना सहर से इतना दूर बिआह कर अपने पति के पास अकेले रहना, रूपा का मजबूरी था. अउर ई हालत में घर छोडकर एतना दिन के लिए कोइ बुजुर्ग औरत उसके साथ रहे, ई घर वाला का मजबूरी.

रूपा के बगल में ज्योति का फ़्लैट था. दूनो के आदमी एक्के जगह काम करते थे. आना जाना भी था. रूपा ज्योति को दीदी बोलती थी. मगर दूनो के उम्र में इतना फरक था कि अगर रूपा उसको आंटी भी बोलती तो कोनो अन्तर नहीं पड़ता. ज्योति को जब पता चला तो अचानक ऊ अचानक दीदी से माँ के अबतार में आ गयी. आधा घंटा लेक्चर ई बात पर कि कइसे रहना है अउर कइसे उठना बैठना, चलना फिरना, घूमना टहलना है. रूपा को जो खाना पसंद होता, ऊ फट से ज्योति के घर तैयार. रूपा के घर का लोग भी निश्चिंत हो गया कि चलो कोइ तो है देखभाल करने वाला.

ज्योति का सोभाव ही अइसा था कि रात-बिरात अगर कोनो जरूरत हो तो ज्योति का घंटी बजा दीजिए. आपको दरवाजा खोलने पर ज्योति हमेसा हंसते हुए मिलेगी. लेकिन रूपा के साथ तो अजीब बात देखाई दे रहा था. सब लो दांग था ज्योति का समर्पण देखकर. कारन एही कि ज्योति को अपने कोनो औलाद नहीं था.

देखते देखते टाइम अइसा पार होने लगा कि कहा नहीं जा सकता. रूपा को हस्पताल लेकर जाना, जांच करवाना, दवाई देना, खाना पीना सबका जिम्मा ज्योति के ऊपर था. अइसा बुझाता था कि रूपा का बच्चा उसी के पेट में पल रहा है. रूपा के लिए ऊ कभी दीदी, कभी माँ, कभी सहेली, कभी नर्स बन जाती. खुद रूपा के नैहर अउर ससुराल से उसकी माँ अउर सास तब पहुंचीं जब उसको लेबर रूम में ले जाया गया.

ज्योति हस्पताल के गलियारा में बेचैनी में टहल रही थी. तब अंदर से नर्स निकलकर बोली कि बधाई हो लक्ष्मी आई है! नोर्मल डेलिवरी था इसलिए रूपा होस में बाहर आई. उसी समय ज्योति हस्पताल का बिल जमा करने के लिए काउंटर पर चली गयी.

नर्स बच्चा को जब उसकी सास के गोद में देने लगी तो उसकी सास बोली, “नहीं! सबसे पहिले बच्चा को ज्योति के गोद में दीजिए. ओही ई बच्चा की असली माँ है!”

रूपा सास को पास बोलाकर धीरे से कान में बोली, “नहीं! सबसे पहिले बाँझ औरत के गोदी में बच्चा मत दीजिए!”

गुरुवार, 2 जून 2011

एलेमेन्टरी माई डियर वाटसन!

आइये आज आपको एगो अपने पुराना परिचित से मिलवाते हैं. आप में से बहुत सा लोग मिले भी होंगे इनसे, त उनके लिए दोबारा मिलने जइसा होगा. सबसे पाहिले उनका पर्सनाल्टी के बारे में:

साहित्त, दर्सनसास्त्र अउर खगोलसास्त्र का ज्ञान: शून्य
राजनीति का ज्ञान: बहुत कम
बनस्पतिसास्त्र का ज्ञान: बेलाडोना, अफीम अउर जहर के बारे में पूरा जानकारी
भौमिकी (जियोलॉजी) का ज्ञान: मट्टी के बारे में जबर्दस्त जानकारी
रसायनसास्त्र का ज्ञान: पारंगत
एनाटॉमी का ज्ञान: सटीक मगर बेतरतीब
सनसनीखेज साहित्त का ज्ञान: पूरा सताब्दी में घटा हर घटना का गहन अध्ययन
संगीत का ज्ञान: वायलिन बहुत अच्छा बजाना आता है
खेल खेलना: मुक्काबाजी और तलवारबाजी में माहिर
क़ानून का जानकारी: स्थानीय क़ानून का ब्यवहारिक ज्ञान

खगोलसास्त्र का इनका जानकारी एतना शानदार है कि इनको ई भी नहीं पता है कि सोलर सिस्टम का होता है अउर सूरज, पृथिबी अउर चन्द्रमा में से कउन किसके पीछे चक्कर लगाता है. जब इनको बता दिया गया त ई बोले कि बेकारे बता दिए, अब इसको भूलने में टाईम लग जाएगा.
इनका मानना है कि आदमी का दिमाग घर के अंदर छत के नीचे बना हुआ बोंक्स रूम के जईसा होता है. सुरू-सुरू में त जेतना सामान इसमें फेंकिए, सब समा जाता है. बाकी एगो समय अइसनो आता है, जब एगो सामान फेंकिये, त दोसरा सामान बाहर गिर जाता है, चाहे पहिलके सामान अंदर नहीं समाता है. अउर इसमें कोनों जबरदस्ती भी नहीं चलता. उनका कहने का मतलब ई है कि आप अपना दिमाग में ओही बात या जानकारी रखिये जिसका आपको जरूरत है अउर समय पर आपको याद आ जाए. बाकी फालतू सब बाहर कर दीजिए. अब सूरज पृथिबी का चक्कर लगाए कि पृथिबी सूरज का, दिन रात होने में फरक त नहिये होने वाला है.
इतना परिचय के बाद, ई बताने का जरूरत है कहाँ कि उनका नाम शर्लोक होम्स है. सर आर्थर कानन डायल का रचा हुआ महान जासूस. ऊ अपने दोस्त डॉ. वाटसन के साथ मिलकर बहुत सारा अपराध चुटकी में हल कर दिए. हल करने का तरीका एतना साधारण कि “चुटकी में” सब्द मोहावरा नहीं, सचाई लगता था. जूता में लगा हुआ मट्टी देखकर बता देना कि ई आदमी लन्दन के किस हिस्सा से चलकर आ रहा है, आपके आने का समय से ई बताना कि आप कहाँ से आ रहे हैं, काहे कि इस समय ओहीं से गाड़ी सुबह-सुबह आता है. आज भी बहुत सा जासूसी सीरियल इन्हीं का भोंडा नक़ल करके बनता है अउर मसहूर भी होता है. मगर ऊ क्राइम कम कोमेडी जादा लगता है.
सत्यजीत राय भी फेलु दा (प्रदोस चन्द्र मित्तर) के नाम से एगो जासूस का चरित्र गढे थे, जो आज भी मसहूर है. हमरा बेटा त दीवाना है फेलु दा का. बंगाल में सरदेन्दु बंद्योपाध्याय द्वारा रचित ब्योमकेस बक्सी भी घर-घर में जाना जाता है. टीवी पर भी इसका सीरियल देखाया जाता था. ओइसहीं करमचंद, डिटेक्टिव ओंकार नाथ, के.डी.पाठक जैसा केतना जासूस देखाया गया.
बंगाल से याद आया. जब हम कलकत्ता में थे तब एक दिन कोनों दोकान में कुछ खरीदारी करने गए. पांच सौ का नोट था हमरे पास, सो हम दिए. दोकानदार बाकी पैसा हमको लौटाया, त हम सहेजकर पर्स में रखने लगे.
दोकानदार पूछा, “दादा! आपनी की बैंके चाकरी कॉरेन?” (क्या आप बैंक में नौकरी करते हैं?)
उसका उत्तर देने से पहले हम अपने दिमाग को मथ डाले. हम विदेशी-मुद्रा विभाग में काम करते हैं और हमरे इहाँ तो खाता भी नहीं खुलता है. माने इस आदमी का खाता भी हमरे ऑफिस में नहीं हो सकता. न ई हमरे घर के पास का बासिंदा लगता है कि जानता होगा कि हम बैंक के अपार्टमेंट में रहते हैं. सस्पेंस हमसे बर्दास्त नहीं होता है.
हम जवाब में सवाल पूछ लिए, “आपनी की कोरे बूझलेन?” (आपको कैसे पता चला?)
ऊ हंसने लगा. बोला, “ आमी टाका फेरोत दिलूम, त आपनी नोटेर सादा पोर्शन टा एक साइड कोरे शाजिये राखलेन. एई टा बैंकर लोकदेर अभ्येश!”

कमाल का चरित्र था. कहने लगा कि हमरे पैसा वापस करने पर आप जो नोट का सफ़ेद वाला हिस्सा को एक तरफ करके सजा रहे थे, तो हमको लगा कि आप बैंक में काम करते होंगे. उन्हीं लोगों को आदत है ऐसा करने का.

हम मुस्कुरा कर निकल आये दोकान से. सोचते हुए कि ऊ आदमी का नाम का था शर्लोक घोष या फेलू बंदोपाध्याय या ब्योमकेस मित्रा!

बुधवार, 25 मई 2011

कहानी फ़िल्मी नहीं है!

अगर कोनो आदमी, बिना दिन तारीख बताए हुए किसी का घर में चला आवे, त उसको अतिथि कहते हैं. ओइसहीं अगर कोनो अईसन घटना घट जाए जिसका उम्मीद नहीं हो त उसको संजोग कहते हैं. एगो अउर परिभासा है संजोग का जो हमरे घर में बहुत परचलित है. हमलोग संजोग को “सिनेमा जईसा घटना” बोलते हैं. जइसे सनीचर को अचानक हमरा चंडीगढ़ जाने का प्रोगराम बन गया अउर जब हम चैतन्य बाबू के सामने खडा हुए, तो सिनेमा का घटना का जईसा लगा उनको अउर ऊ एकदम अबाक रह गए अउर हमसे हाथो नहीं मिला सके. तनी हमरा पुराना पोस्ट पर नजर दौड़ाइयेगा त याद आ जाएगा कि अनुराग जी से हमरा मुलाक़ात भी एकदम सिनेमा का घटना जईसा हुआ था.

असल में तीन घंटा के भीतर का मालूम केतना साल का खिस्सा देखा देता है सिनेमा में. कभी कभी त पिछला जनम तक का कहानी उसमें रहता है. अब सब बात तीन घंटा में देखाने के कारन, घटना एतना तेजी से घटता है कि बिस्वास नहीं होता है कि जिन्नगी कहीं इतना तेजी से चलता है. एही से सिनेमा का घटना सब संजोग लगता है. एगो रईस बिजनेसमैन, अचानक सड़क पर आ गया, घर नीलाम हो गया, दोस्त धोखा दे गया, बाल-बच्चा नालायक निकल गया अउर ऊ बेचारा दाना-दाना के लिए मोहताज हो गया. संजोग से एगो दोस्त भेटा गया, जो उसको नौकरी दिया अउर मेहनत से सिनेमा के अंत में ऊ फिर से आलीशान कोठी का मालिक. जइसे उनका दिन बहुरा, भगवान सात घर दुसमन का दिन भी बहुराए.

ब्लॉग के दुनिया में एतना फास्ट घटना क्षमा जी के “बिखरे सितारे” पर घटता है. अपना सामाजिक जीबन में, बहुत सा महिला लोग से उनका मुलाक़ात हुआ, बहुत सा बात उनको पता चला, बहुतों का जीबन सुधारने के लिए ऊ कोसिस कीं. अउर उनसे हमलोग का भी परिचय करवाईं. ऊ महिला लोग के जीबन का उथल पुथल देखकर मन बहुत दुखी हो जाता था. उनके पोस्ट पर केतना बार हम कमेन्ट किये कि “ये सारी घटनाएँ, फिल्मी घटनाओं सी लगती हैं. ऐसा लगता है कि सारी दुनिया उस किरदार की दुश्मन बनी बैठी है और सारे दुःख, तकलीफें सिर्फ उसी का इंतज़ार कर रही हैं. आप एक अच्छी पटकथा लिख सकती हैं.” उनके साथ बतियाने में भी ई बात हम उनको बताए कि आपके चरित्र को क्या एक भी अच्छा आदमी नहीं मिलता या एक बार धोखा खाने पर वो कैसे विश्वास कर सकती है दूसरे धोखेबाज़ पर? लेकिन उनका जवाब एक ही होता, “तुम्हारे कहने से मैं उन घटनाओं को नहीं बदल सकती, जो उन महिलाओं के साथ हुई हैं. तुम्हें ये बातें फ़िल्मी भले लगती हों, लेकिन जिनपर बीती हैं, मैं उनकी साक्षी रही हूँ” कभी न उनके बात का हम बुरा माने, न ऊ हमारे बात का बुरा मानीं.

ओशो कहते हैं कि चारों ओर हमारी ही फेंकी हुई ध्वनियाँ प्रतिध्वनित होकर हमें मिल जाती हैं. थोड़ी देर अवश्य लगती है. ध्वनि टकराती है बाहर की दिशाओं से और लौट आती है. जब टक लौटती  है तब तक हमें ख्याल भी नहीं रहता कि हमने जो ध्वनियाँ फेंकी थी, वही वापस लौट रही हैं.

क्षमा जी से कहा हुआ बात इतना जल्दी वापस आ जाएगा कभी सोचे नहीं थे. पीछे एक डेढ़ महीना में आठ साल पुराना लैपटॉप परेसान करने लगा. बनवाए तो एकदम फस्ट क्लास हो गया. मगर एक हफ्ता के बाद दम तोड़ गया बेचारा. सरीर का कोनों अईसा अंग खराब हुआ कि कोइ डोनर नहीं मिला. ईस्वर उसका आत्मा को सांति दे. हमारे दाहिना हाथ का दर्द एतना बढ़ गया कि बर्दास्त करना मोस्किल हो गया. बीमारी सचिन तेंदुलकर वाला अउर कारण ओही लैपटॉप. पता नहीं उसके बीमारी का कारण हम थे कि हमरा बीमारी का कारण ऊ. अभी इसी में ओझराए थे कि एडी का दर्द के चलते, गोड जमीन में धरना दुस्वार. ऑफिस, घर, परिबार सब तरफ से पेंडिंग, सब परेशानी अपना हिसाब मांगने चला आया. इनकम टैक्स बिभाग भी नोटिस भेज दिया कि हम अपना एतना इनकम छुपाए हैं, जेतना ई मामूली तनखाह पाने वाला आदमी का तीन महीना का तनखाह होता है. त हम जो बारह महीना का टैक्स दिए ऊ साल साल में कहीं १५ महीना तो नहीं था!! का मालूम होइयो सकता है.

अंत में हमको मिली क्षमा जी के कहानी वाली औरत. हमरे फ़्लैट के ऊपर रहती थी. एतवार को हमरी बेटी खेलने के लिए निकली, अउर तुरत लौट कर बोली, “डैडी!! ऊपर एक आंटी ने फांसी लगा ली है!” उसको घर में रुकने को बोलकर हम भागकर ऊपर गए. देखे कि हॉल में घर का मालिक (अफ़सोस ऊ हमरे संस्थान में काम करता है) सराब के नसा में धुत्त आराम से बईठा हुआ है. हम अंदर जाकर देखे तो कमरा बंद, अऊर जब दरार से आँख लगाकर देखे त हमरा देह ठंडा हो गया. पंखा से ऊ औरत झूल रही थी. सफाई करने वाला आदमी को जब पता चला त चिल्लाकर भागा था अउर हमरी बेटी सुनी. सोसाइटी के पदाधिकारी होने के नाते अउर सामाजिक होने के नाते पुलिस, पोस्टमार्टम का इंतजाम किये. ऊ आदमी को कोइ होस नहीं. बयान तक नहीं दे पाया पुलिस के सामने. आधा रात के बाद जब आंध्र परदेस से उसकी बेटी आ गयी, तब हम घर लौटे.

मरने वाली के बेटी का रोना अउर तेलुगु में रोते हुए बाप को कोसना अउर माँ को याद करना, हमरे कान में टीस मार रहा था. जब उधर से दिमाग हटा तो हम क्षमा जी को फोन किये और बोले, “आज आपकी कहानी के एक और किरदार से मिला मैं. साल भर से मेरे घर के ऊपर रह रही थी. और सचमुच ये सिनेमा की कहानी नहीं है.”

शनिवार, 7 मई 2011

बिना शीर्षक!!


जब से वो ट्रांसफर होकर यहाँ आया था, तकरीबन एक साल पहले, तब से ही बहुत परेशान रहा करता था. किसी से कुछ बतियाता भी नहीं था और किसी को कुछ बताता भी नहीं था. लोग कहते कि पहली बार घर से बाहर आया है इसलिए होम-सिकनेस है. साल भर के अंदर उसने छुट्टियाँ भी काफी लीं. तब पता चला कि उसका १४-१५ साल का बेटा दिमागी तौर पर बीमार है और कभी कभी तो उसकी तबियत इतनी बिगड जाती है कि बस अब-तब की हालत हो जाती है. इसी वज़ह से कई बार उसे अचानक छुट्टी पर जाना पड़ जाता था.  
यूनियन के नेताओं से बात की, उच्च अधिकारियों को मजबूरी बताई. ये भी बताया कि बेटे का इलाज एक ही डॉक्टर इतने सालों से कर रहा है, इसलिए बच्चे को यहाँ लाकर नए सिरे से इलाज नहीं कराया जा सकता है और दिमाग का मरीज़, बाप के सिवा किसी से संभालता भी नहीं. लेकिन सारी पैरवी बेकार. सबों ने अपनी-अपनी मजबूरी जता दी और कहा कि तीन साल से पहले वापस ट्रांसफर संभव नहीं. उलटे उसे जली-कटी भी सुनने को मिली कि बिना बताए छुट्टी पर चला जाता है. काम की तो कोइ फ़िक्र ही नहीं. इसे तो किसी और मुश्किल जगह पर ट्रांसफर करना पडेगा, तब पता चलेगा.
एक रोज फिर वो इसी तरह गायब हो गया. एक समझदार व्यक्ति ने उसकी सारी समस्या फिर से यूनियन नेताओं को बताई और कहा कि उसके बेटे की हालत बहुत खराब है, जो बाप के पास न रहने से और भी बिगड गयी है. किसी भी तरह से उसका ट्रांसफर वापस उसके शहर करवा दिया जाए तो, बड़ा उपकार होगा उसपर. नेताओं और अधिकारियों ने इस बार सच्चे दिल से उसके बारे में सुना और सोच-विचार किया. फ़ाइल ऊपर बढाई गयी और संकेत मिले कि काम हो जाएगा.
इस बीच वो लौट आया. सर मुंडाए, और भी ज़्यादा उदासी लपेटे. लोगों की समझ में सारी बात आ गयी कि उसका बेटा चल बसा. कई लोगों ने सांत्वना व्यक्त की, कई लोगों ने कहा कि उस बच्चे को कष्ट से मुक्ति मिल गयी. नेताओं ने समझाया कि हमारी भी मजबूरियाँ होती हैं, हम तो कोशिश कर ही रहे थे और फ़ाइल आगे बढ़ भी चुकी थी. वो सबों की बातें चुपचाप सुनता रहा. पहली बार उसकी आँखों से टप-टप आंसू बह रहे थे.
यूनियन के नेता अधिकारियों के पास गए और उनमें बातचीत शुरू हुई.
“चलो अच्छा हुआ उसका बेटा मर गया, सारे ट्रांसफर हो जाने के बाद बीच में किसी का ट्रांसफर करवाना कितना मुश्किल होता है, ये हम ही जानते हैं.”
“फ़ाइल वापस लौटाने का कोइ फायदा नहीं है. एक बार ट्रांसफर की परमिशन आ जाए, तो देखेंगे उसकी जगह किसी अपने आदमी को एडजस्ट कर लेंगे. क्या कमाल का संजोग है!”
पुनश्च: यह मात्र कथा नहीं, एक सत्यकथा है. इसमें पात्रों, शहर, संस्थान आदि के नाम नहीं लिखे हैं, इसलिए किसी से मेल खाने का प्रश्न नहीं उत्पन्न होता है. घटना के मेल होने की स्थिति में इसे भी उसी घटना की श्रेणी में मानें.
(टंकक: सुधीर)