शनिवार, 8 मई 2010

राजीब सुक्ला का दुख भरा दास्तान!!



आज भोरे भोरे जब हमरी सिरीमती जी हमरे लिए चाह बनाकर लाईं, त हाथ में “दैनिक जागरण” धरा कर चली गईं. चाह का चुस्की के साथ, हम अखबारो चाटने लगे, खासकर बिचलका पन्ना. ई पन्ना पर बड़ा बड़ा लोग का छोटा छोटा आर्टिकिल छपता है, जिसको पढकर असली खबर मालूम होता है. माने बाकी खबर त खबरे है, लेकिन अंदर का बतिया त एही बड़ा लोग बताता है. फलाना एग्रीमेंट भारत अऊर अमरीका के बीच हो गया – ई खबर है; अब ई बड़ा लोग, अखबार का बीच वाला पन्ना में बताता है कि ई एग्रीमेंट में केतना फायदा है केतना नोकसान.
आज का अखबार में बिचलका पन्ना पर परम आदरनीय राजीब सुक्ला जी का आर्टिकिल पढने के बाद त हमरा आँख में लोर भर गया. हमरी सिरीमती बोलीं, “ए जी! कल मदर्स डे है, एही से का आप माता जी को याद करके सेंटीमेंटल हो गए. कल बतिया लिजिएगा फोन से.”
हम बोले, “दुर् बुड़बक! हम त अपना माई को रोजे याद करते हैं अऊर रोजे मदर्स दे मनाते हैं. ई त राजीब भाई जे सांसद लोग का दुर्दसा बयान किए हैं, ऊ पढ़कर दुःख हो रहा है. अब समझ में आया भारत माता काहे एतना दुःखी है. जिसका बाल बच्चा एतना कस्ट में होगा, ऊ माई को कइसे खुसी हो सकता है.”
तनी आप लोग भी बिचारिए कि हमरा नेता लोग केतना तकलीफ में हैं,हम एक एक करके गिनाते हैं राजीब सुक्ला जी के सौजन्य से:
  • बेचारा एम्पी लोग को मात्र 16000 रुपया तनखा मिलता है, ई सरकारी किरानी से भी कम है- भला आम आदमी का तनखा आम आदमी का सेवक से बेसी कइसे! बहुत बेइंसाफी है!!
  • जब एम्पी लोग का बेतन का बात होता है त मीडिया आलोचना सुरू कर देता है – एकदम गलत बात है, कम से कम ई मुद्दा पर सब लोग पार्टी का भेद भूल कर एक सुर में बोलता है. सब लोग को ई बात का स्वागत करना चाहिए.
  • सन 1954 में खाली स्वतंत्रता सेनानी लोग एम्पी बनता था, त ऊ लोग कभी माँगे नहीं किया कि बेतन बढाइए, इसमें उनका कोनो रुचि नहीं था – सब जनता सुखी था, इसलिए नेतवन आलसी था. जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया.
  • मैथिली शरण गुप्त झांसी से एक हफ्ता का पूरी लेकर आते थे, ओही खाते थे अऊर रसोइया नहीं रखते थे – बासी पूरी खाकर कहीं देस सेवा होता है. जब तक मुर्गा नहीं खाकर सोचिएगा तब तक देस का भलाई का आइडिया कइसे आएगा दिमाग में. कबिता लिखने अऊर जनता का भलाई करने में फरक होता है.
  • एम्पी को कम से कम चार पाँच ठो गाड़ी चाहिए, बहुत भाग दौड़ करना पड़ता है – एकदम जायज बात। मेम साहेब को खान मार्केट, बेबी को दिल्लि हाट, बाबा को डिस्को जाने के लिए त गड़िया अलगे अलगे चाहिए, सब पर लाल बत्तीयो जरूरी है.
  • इसके आगे त राजीब भाई बहुत जेनुईन खर्चा गिनाए हैं, जइसे आने वाला लोग को चाह पिलाना, गरीब का ईलाज करवाना, बिआह सादी में आसिर्बादी देना – जेब्बात! जनता के सेवक होने का माने मुफत में सेवा करना त नहिंए है.
  • डेढ़ लाख फोन कॉल फिरी का है, बाकी लोग बाग एम्पी के घरे में जाकर फोन करता है, त ई लिमिटवो खतम हो जाता है अउर उपर से पइसो देना पड़ता है – ई त अन्याय है. दुनिया भर का पब्लिक फोन छोड़कर सारा जनता एम्पी साहेब के घर चला जाता है, त ऊ काहे भरे बिल. एही से त करोड़ों रुपया बकाया रहता है उनका उपर. ई पइसा जनता से बसुलिए, बेचारा नेता जी को काहे दोस देते हैं कि ऊ बिल नहीं भरते हैं.
  • नेता लोग को केवल 34 हवाई जात्रा साल भर में मिलता है, चुनाव छेत्र का दौरा में ऊ कब खतम हो जाता है पते नहीं चलता है. रेल जात्रा भी है,लेकिन उसके लिए सफर करना जरूरी है – तबो जनता चिल्लाता रहता है कि नेता जी खाली भोटे लेने आते हैं. 365 दिन में 34 हवाई जात्रा,माने हर दस दिन पर नेता जी अपना जनता का दुख देख आते हैं, अऊर लोग कहता है अएबे नहीं करते हैं नेता जी. रेल में सफर करना जरूरी है, ई बात का मतलब समझ में नहीं आया.पूछ कर बताएंगे.
  • नेता जी का इस्टाफ का बेतन भी इस्टाफे के हाथ में मिल जाता है, नेता जी का हाथ में नहीं मिलता है – बताइए जिसको जनता चुन के भेजा है उसका करेक्टर का ऊपर सक. नेताजी का हाथ में मिलेगा त ऊ खा जाएंगे का. उहो त इस्टाफे को देंगे, ऊ चोरा लेंगे ???
  • सांसद निधि का दू करोड़ रुपएवो जिलाधिकारी को मिलता है। नेता जी खाली बताते हैं कि कऊन जोजना में कइसे देना है – ई त हद्दे हो गया अबिस्वास का। जनता का पइसा, जनता का सेवक के हाथ में देने में का हरज है. अल्टिमेटली त ओही बताएंगे कि किसको देना है. अब ई लाठी से घोड़ा को घास काहे खिला रहे हैं जिलाधिकारी को देकर. सीधा नेता जी के कर कमल के द्वारा खिलाने दीजिए.

हमरा त करेजा फट गया उनका दुख भरा कहानी सुनकर. आँख खुल गया. आज तक हम का, सारा देस एही समझता था कि नेताजी बहुत ऐसो आराम में रहते हैं,करोड़ों रुपया डिक्लियर कर देते हैं एलेक्सन का टाईम में, लेकिन अपना पसीना का पइसा के लिए केतना बिनती करना पड़ता है. हम त बोले कि जाने दीजिए ई नेतागिरी, एतना कम तनखा में कोई खाक जनता का सेवा करेगा! अभिए रिजाईन करिए, अऊर कान पकड़िए कि कहिओ एम्पी का चुनाव नहीं लड़िएगा.
नेताजी बोले, “रिजाईन त हम करिए देते, लेकिन हमसे जनता का दुख देखा नहीं जाता.तनखा त हम बढवा लेंगे, लेकिन सेवा करने का भावना के साथ कम्प्रोमाईज नहीं किया जाता.”
हमरा मन एकदम से उनके चरनों में बिछ गया. आइए! सब लोग मिलकर प्रार्थना कीजिए कि उनका सुनवाई हो अऊर उनका बेतन बढ जाए. तबे भगवान करे, ऊ किसान जिसका आमदनी सालाना तीन हजार बताए थे (सम्वेदना के स्वर) नेता जी बढवा दें, नहीं त ऊ नरेगा वाला मजदूर साल में सौ दिन का 100 रुपया रोज का आमदनी से बेसी कमा सकेगा अऊर छः अदमी का परिवार पाल सकेगा. कम से कम ई बात त मानना पड़ेगा कि राजीब बाबू का मन में टीस है, तबे ई बात बोले हैं. नहीं त उनको का फरक पड़ता है, ई सब बेतन बढाने से..उनका त अपने उद्योग है, चैनेल है, अऊर बीसीसीआई का बोझ भी ढो रहे हैं बेचारे. सच्चो नाइंसाफी है... सोलह हजार रुपया महीना देकर, जनता का सेवा भी करवाइएगा, अऊर खून भी चूसिएगा. हाथ जोड़िए अऊर भगवान से बिनती कीजिए कि जईसे सात घर दुस्मन का दिन बहुरा, वैसे ई नेता जी का दिन भी बहुरे. जनता का दिन त अपने बहुर जाएगा.

10 टिप्‍पणियां:

  1. बिचारे M.P. साहब !! बहुत ही दुःख हुआ जान के इन की दुर्दशा के बारे में ...........क्यों ना हम सब मिल कर इन के लिए थोडा बहुत चंदा करें ओर इन की मदद करे !! शक्ल से तो भले आदमी ही लगते है !!

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  2. अंगेजी में कहावत है, u can feed "the need" but can never feed "the greed".

    तीसरे दर्जे के नेताओं से तो अच्छा तो हम,ललित मोदी को M P बना देते तो वो शायद ऐसी बेतुकी बातें न करते.

    ये कैसा व्यापारी मन है जो घर आये मेहमान को पिलायी चाय के भी पैसे मांगता है.

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  3. यही देश का दुर्भाग्य है..विचारोत्तेजक पोस्ट.

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    'शब्द सृजन की ओर' पर 10 मई 1857 की याद में..आप भी शामिल हों.

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  4. बहुत अच्छे टोपिक पे बहुत नए ढंग से लिखे हैं जी आप लेकिन सॉरी सर , मेरी हँसी नहीं रुक रही |
    बीच बीच की पंक्तियाँ इतनी चुटीली थी कि मजा आ गया |

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  5. पत्रकारों दलाली छोड़ो, दलालों पत्रकारिता छोड़ो

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  6. चाटुकारिता की नयी पहचान राजीव शुक्ला

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  7. हमारी तरफ कहावत है भिगो भिगोकर मारना । आपने यही किया है राजीव शुक्ला के लिये । क्या व्यंग्य है । वाह..

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