बुधवार, 26 मई 2010

हमरा पहिला कबिता !!


अचानक हमरे अंदर छिपा हुआ कबि जाग उठा, अऊर हमको लगा कि हम एही भासा में लिखें... लेकिन फिर लगा कि नहीं कबिता को कबिता रहने देते हैं, अऊर सब लोग के खातिर हिंदिये में लिखने का कोसिस किए हैं॥ आपलोग का आसिरवाद चाहिए...

भयाक्रांत मन पिशाच
क्यों रहा है नाच!!
जीवन के स्वर्णिम मुहाने पर
कैसा है झंझावात!!

चलो बादलों को हटा दो
हम अपना घर ढूंढ लेंगें कहीं
पत्तो को रोक लो पीला होने से
दहलीज़ पर कौन ठिठक कर बैठ गया
हाँक लो सारी गायें
चलो अब फिर जी जायें!

30 टिप्‍पणियां:

  1. ए भाई,लगता नहीं है कि ई आपका पहला कोसिस है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ए भाई,सही में लगता नहीं है कि ई आपका पहला कविता है / और एगो बात पहचान काहे छुपाते हैं ,खुले आम होइए ,आप एक बिहार की शान हैं ,हम सब की आन हैं /

    उत्तर देंहटाएं
  3. भाई जी ई आप का पहिलका कबिता हमरे करेजा में एटम बोम्ब की तरह फूटा है

    लगे रहिये बिहारी बाबु

    उत्तर देंहटाएं
  4. @ Kumar radharaman :
    @ Abhi:
    @ Maadhav:
    हमरा हिम्मत बढाने का बहुत बहुत सुक्रिया !! त हम कबिता भी चालू रखते हैं साथे साथ!! बने रहिएगा.

    उत्तर देंहटाएं
  5. @ Anup shukl
    सबसे पहिले त आप जईसे परतापी पंडित जी का हमरी कुटिया में आगमने हमरे लिए सौभाग्य का बात है. अब आप से का छिपा है किसन महराज!

    न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता.
    डुबाया हमको होने ने, न होते हम त का होता.

    कऊन पहिलौठ का है अऊर कऊन पेटपोंछन, एही फेर में बेचारा कंस केतना सिसु का हत्या कर गया.
    आपका आसिस स्वीकार!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बच गए होते हम भी मझधार से
      अगर खुदा को नाखुदा मान लेते

      हटाएं
  6. प्रणाम चाचा, आपका कविता पढने के बाद तो मन कर रहा है की अभी के अभी पटना लौट जाएँ .... :-(

    उत्तर देंहटाएं
  7. @इस्तुतिः
    बड़ा दिन बाद चाचा का याद आया है??? भोर के भुलावल सांझ के मिल जाए त भुलावल नहीं कहाता है.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बाह भैया जब इ अहाँ के पहला कविता छै तो दोसर तो इहो से जबरजस्त होते

    उत्तर देंहटाएं
  9. सलिल वर्मा जी कृपया आप मुझे इस नंबर पर फोन करें -09810752301

    उत्तर देंहटाएं
  10. जीवन के गहन रहस्य को उजागर करती तथा उस परमशक्ति के होने का आभास कराती कविता. अंतिम पंक्तियों में यदि “गायों” की जगह “भेड़ें” का प्रयोग किया गया होता तो जीवन की भेड़ चाल जीवंत हो उठती. और यदि “गायों” का प्रयोग किया ही था तो फिर अंतिम पंक्ति में “चलो अब फिर जी जायें” के स्थान पर “चलो अब फिर मिल गायें” यमक अलंकार का अनूठा उदाहरण हो सकता था… इसे मात्र सुझाव समझेंगे, बाध्यता नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
  11. हाँक लो सारी गायें
    चलो अब फिर जी जायें!

    आपका चिंतन हैरत में डाल देता है..

    पत्तो को रोक लो पीला होने से
    दहलीज़ पर कौन ठिठक कर बैठ गया

    मेरा फिर कहना है आप मुल्ला नसीरुद्दीन के बिहारी अवतार हैं शायद!

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह! कमाल की रचना है भैया, आपका परिचय जानकर भी खुशी हुई!

    उत्तर देंहटाएं
  13. मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है

    विलुप्त नहीं हुई बस बदल गई हैं पंरंपराएं.......!!!
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/05/blog-post_26.html

    उत्तर देंहटाएं
  14. देर से आने के लिए क्षमा
    लेकिन ये आपकी पहली कविता है लगता तो नहीं है .
    अच्छी है अगली भी ज़रुरु लिखना .........

    उत्तर देंहटाएं
  15. चलो अब फिर जी जायें!...क्या बात है बिहारी बाबू..तबीयत तो ठीक है. ऐसा ऊँचा ऊँचा कवित्तई करियेगा और कहते हैं कि पहला कविता है. चले आओ, कविता के चमन में..हम इन्तजार करते हैं. बेहतरीन रचे हैं, सच में और लिखिये. शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  16. अब महाराज आप बोले हो पहला तो माने पहला कविता है ...............ता ई बतावो दूसरा कब आइबे करेगा !! एकदम धोती कस के बैठे है पहला टिपण्णी हमरा ही होगा हाँ !!

    उत्तर देंहटाएं
  17. ये पहली कोशिश तो नही है ... इतना गहरा लिखा है .. साधा हुवा ... ले में भी है ... जोरदार ...

    उत्तर देंहटाएं
  18. भयाक्रांत मन पिशाच
    क्यों रहा है नाच!!
    जीवन के स्वर्णिम मुहाने पर
    कैसा है झंझावात!!

    चलो बादलों को हटा दो
    हम अपना घर ढूंढ लेंगें कहीं
    पत्तो को रोक लो पीला होने से
    दहलीज़ पर कौन ठिठक कर बैठ गया
    हाँक लो सारी गायें
    चलो अब फिर जी जायें!

    मन सचमुच भय से भरा हुआ पिशाच ही है
    जो अपने झूठे डरों से ही नाच (डोल) रहा है
    फिर इस कोलाहल भरे जीवन में भी स्वयं को स्वर्णिम द्वार पर खड़ा हुआ महसूस करता है और विचारों के इस झंझावात में निराकार बादलों को से भी लड़ने की हिम्मत जुटाने लगता है और आकाशकुसुम में अपने घर का सपना बुनता है और असंभव को संभव कर दिखाने के लिए अतिश्योक्ति में पतों को पीला नहीं होने की भी ठान लेता है ???? वो देखो जीवन की दहलीज पर ही मन ठीठक कर बैठ गया है और स्वयं को गाय साबित करते हुए सभी गायों पर कब्जा कर इस जीवन में फिर-फिर से जीने की एक कोशिश करता है मन ...

    शायद यही अर्थ है इस कविता का ... नहीं है तो दूसरे का इंतजार कीजिए कल तक

    उत्तर देंहटाएं
  19. कल 13/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  20. ागर ये पहली कोशिश है तो आखे क्या होगा/ लगता है शब्दों का आकाश छूने की तमन्ना है। शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  21. कविता भी बहुत अच्छी है |
    ईमानदारी से कहूँ तो मैं इस कविता को कुछ और देर जारी रखना चाहता था |

    आकाश

    उत्तर देंहटाएं