रविवार, 11 सितंबर 2011

इनसे मिलिए!!


इधर कुछ ब्यस्त रहे, कुछ परेसान रहे अउर कुछ... बस का मालूम काहे अस्थिर से बइठकर कुछ लिखने का मने नहीं किया. आज मनोज भारती जी से बात होने लगा त हर बार के तरह बात सुरू करते हुए ऊ पूछे कि अगला पोस्ट में हम का लिखने जा रहे हैं. कुछ तय नहीं था त हम भी कहे कि देखते हैं. तब ऊ जिद करने लगे कि अभी आप अपना इंटरव्यू के बारे में लिखे हैं, मगर एगो इंटरव्यू पहिलहीं से पेंडिंग है. ओही काहे नहीं पोस्ट कर देते हैं. तब खेयाल हुआ कि हमारा एगो पोस्ट पर आप लोग हमसे हमारा बेटी जो इंटरव्यू ली थी, ऊ छापने के लिए बोले थे. बेटी के इस्कूल में का हुआ मालूम नहीं, लेकिन इहाँ बहुत सहमकर, डरते-डरते हम ई पोस्ट कर रहे हैं.


प्रतीक्षा प्रिया: आपको ब्लॉग लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
सलिल वर्मा: इस प्रश्न का उत्तर मैं पहली बार आपको बता रहा हूँ. दरअसल मुझे ब्लॉग लिखने की प्रेरणा अमिताभ बच्चन और विवेक शर्मा के ब्लॉग से मिली. अमित जी के ब्लॉग पर कई बार मैं यह लिख के आया कि आपकी एक अंग्रेज़ी कविता, जिसका हिन्दी अनुवाद आपके पिताजी ने किया था, प्रकाशित करें. लेकिन उन्होंने उत्तर नहीं दिया और कविता भी नहीं छापी. मुझे ये एकतरफा संवाद पसंद नहीं आया. क्योंकि दूसरी ओर विवेक शर्मा के ब्लॉग पर की गई हर प्रतिक्रया वो ऐक्नोलेज करते. तब मैंने अपने मित्र चैतन्य आलोक जी के साथ मिलकर संवेदना के स्वर ब्लॉग शुरू किया. चला बिहारी तो बहुत बाद में आया.

प्र. प्रि.:  आपने ब्लॉग लेखन के लिए यह भाषा क्यों चुनी?
स.व.: मेरे ब्लॉग की भाषा हिन्दी ही है. बिहार के अधिकतर लोग हिन्दी इसी तरह बोलते हैं. कई लोगों ने मुझसे कहा भी कि आप भोजपुरी में क्यों नहीं लिखते. उसका कारण भी यही है कि भोजपुरी मेरी भाषा नहीं है. बिहार में मैथिली भाषा के साथ-साथ भोजपुरी, मागधी और वज्जिका बोलियां बोली जाती हैं. मैं मगध से हूँ इसलिए मेरी बोली मागधी है. आज भी घर पर कुछ सम्बन्धियों के साथ इसी बोली में बतियाता हूँ. मेरी माताजी भोजपुरी अंचल से आती हैं. लेकिन अब तो वो भी नहीं बोल पातीं. इस बोली में ब्लॉग लिखने का कारण मात्र इतना है कि मैं इसमें अपनी आत्मा महसूस करता हूँ. कई लोगों ने शिकायत की कि पढ़ने में तकलीफ होती है, हिन्दी में लिखें. लेकिन मेरा उत्तर यही रहा है कि फिर तो इस ब्लॉग की आत्मा समाप्त हो जाएगी.

प्र. प्रि.: आप अपनी लेखन शैली के विषय में क्या कहना चाहेंगे?
स.व.: बस इतना कि मैं कोइ साहित्यकार नहीं हूँ और न ही साहित्य का विद्यार्थी रहा हूँ. हाँ, अच्छे साहित्य की समझ भर है मुझमें. मुझसे अच्छा लिखने वाले कई लोग ब्लॉग जगत में हैं और उनके ज्ञान और भाषा-शैली की बराबरी मैं कभी नहीं कर सकता. इसलिए मैंने बात करने की शैली अपनाई. मेरी हर पोस्ट पाठक से बात करती हुई मालूम होती है. वैसे सही शब्द होता बतियाती हुई होती है. मेरी कोशिश यही रहती है कि हर पढ़ने वाले के साथ पोस्ट के माध्यम से एक जुड़ाव पैदा कर सकूं. कितना सफल हुआ यह तो मेरे पाठक ही बता सकते हैं.

प्र. प्रि.: आपके पसंदीदा ब्लॉग कौन-कौन से हैं?
स.व.: कोइ टिप्पणी नहीं. वो सारे ब्लॉग जिन्हें मैं पढता हूँ, जिनपर अपनी बात कहता हूँ, वो सब मेरे पसंदीदा ब्लॉग हैं.


प्र. प्रि.: आप अपने लेखन के लिए विषय कैसे चुनते हैं?
स.व.: यह बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है. आधी ज़िंदगी गुज़ारने के बाद (माँ ने सौ साल जीने की दुआ दी थी) सोचा मैंने कि जीवन में कई घटनाएं मेरे साथ घटीं या शायद परमात्मा ने उन घटनाओं के एक पात्र के रूप में मुझे चुना. उन घटनाओं को सम्मान देने, उससे जुडे लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मैंने उन घटनाओं को अपनी पोस्ट का विषय बनाया. मेरी चेष्टा यही रही कि इन घटनाओं के बहाने मेरे पाठकों को अपने जीवन की ऐसी ही किसी घटना को पुनः जीने का अवसर मिले.

प्र. प्रि.: इस पूरी ब्लॉग-यात्रा में आप किसी व्यक्ति विशेष का नाम लेना चाहेंगे?
स.व.: निस्संदेह ऐसा व्यक्ति तो बस एक ही हो सकता है. मेरे मित्र चैतन्य आलोक. जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व को एक नया आयाम दिया, मेरे ज्ञान को एक नया विस्तार दिया और मुझे दुबारा लिखने को प्रोत्साहित किया. मेरी हर पोस्ट के वे पहले श्रोता हैं और अगर किसी कारणवश वो पोस्ट उनको न सुनाई जा सकी तो पोस्ट टाल दी है मैंने, मगर सुनाना नहीं टला.

प्र. प्रि.: अंत में एक व्यक्तिगत प्रश्न... क्या आपके परिवार के लोग आपका ब्लॉग पढते हैं? उनकी क्या राय है आपके ब्लॉग के विषय में?
स.व.: मेरी पत्नी बिलकुल नहीं पढ़तीं. कभी-कभार अपनी कोइ पोस्ट पढकर ज़बरदस्ती सुना देता हूँ उनको, तो सुन लेती हैं. यह पूछने पर कि कैसी लगी, उनका एक ही उत्तर होता है कि आपने लिखी है तो बुरी हो ही नहीं सकती. पटना में मेरा पुत्र, मेरा भाई, उसकी पत्नी और मेरी माँ बहुत पसंद करते हैं. विशेष तौर पर वे पोस्ट जिनमे उनसे जुडी यादें सिमटी हों.

प्र. प्रि.: बहुत अच्छा लगा आपसे बातें करके. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!

52 टिप्‍पणियां:

  1. झूमी की एक तस्वीर डालकर इसे और रोचक बना देते. जो बिहारी परिवेश, विशेषकर, पटना शहर और आस पास रहे होंगे उन्हें यह निश्चित तौर पर पसंद आती होगी. लेकिन जो कंटेंट होता है वह सभी से कम्युनिकेट कर लेता है. इससे सरल कुछ नहीं होगा और बात पहुंच जाती वहाँ तक, जहां इसे पहुंचना चाहिए. हाँ, कबीर भी तो इसी शैली में लिखते थे या कहते थे अपनी बात जिसे हम रोज दुहराते हैं अपनी बातचीत में...

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपका यह ब्लॉग लिखता नहीं है ...सामने खड़े होकर कहता है ....और हम सुनते हैं. इसकी इसी विशेषता ने मुझे पहली नज़र में खींचा था ....पहली नज़र का पहला प्यार ! ....सदा ताज़ा ( कुंवारा ) जैसा लगता है.
    अमिताभ जी बड़े आदमी हैं ....बड़े कलाकार हैं .......इतने बड़े कि नीचे की चीज़ दिखाई नहीं देती उनको. यहाँ एक आदिवासी शिल्पकार ने सागौन पर पूरी मधुशाला उत्कीर्ण की थी. इससे पहले वह दिल्ली जाकर जया जी से आशीर्वाद लेने भी गया था. उसका आशय था कि वे उसके प्रदर्शन और विक्रय में कुछ सहयोग कर दें. ऐसा उसे आश्वासन भी मिला पर बाद में उन दोनों महान कलाप्रेमियों ने उस निर्धन कलाकार की बात पर ज़रा भी गौर नहीं किया. तब रायपुर में हमने प्रदर्शन भी करवाया और मधुशाला का मंचन भी. उत्तरमधुशाला भी हमने तभी लिखी थी. सलिल भैया ! अमीर कला गरीब कला को नहीं पहचानती.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपका ब्लॉग सच में बातें करता है .और मेरे ख़याल से ब्लोग्गिंग का यही असली स्वरुप भी है.बड़े लोगों की बातें जाने दीजिए.हम तो अपनी दुनिया में खुश हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  4. इंटर्व्यू के लिये बधाई! आपके ब्लॉग का अन्दाज़ अनूठा है। दिल से आयी बात की खनक ही अलग होती है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. विचारों और लेखन की सहजता ,मौलिकता, निष्पक्षता ही इस ब्लॉग की पहचान है , बनी रहे ...

    शुभकामनायें!

    उत्तर देंहटाएं
  6. यह अंदाज़ और नयी जानकारी जिनके बारे में पहले नहीं जानता , बढ़िया रही !
    शुभकामनायें आपको और चैतन्य को !

    उत्तर देंहटाएं
  7. @मेरी चेष्टा यही रही कि इन घटनाओं के बहाने मेरे पाठकों को अपने जीवन की ऐसी ही किसी घटना को पुनः जीने का अवसर मिले.

    आप अपनी चेष्टा में बिल्कुल सफल है वास्तव में आप की लिखी कई घटनाओ से हमें हमारे साथ घटी घटना याद आ जाती है कई बार मैंने उसे टिप्पणियों में व्यक्त भी किया है | आप पटना के है हम बनारस के "मै" की जगह जब "हम" मिल जाता है तो आप के ब्लॉग से जुड़ाव और बढ़ ही जाता है | जब ब्लॉग शुरू किया था तो अक्सर रविवार को पति देव को मुख्य समाचार की तरह कुछ ब्लॉग दिखाती थी ( पढ़ कर सुनाती थी ब्लॉग जगत की साफ हिंदी समझना उनके बस की बात नहीं है ) पर ब्लॉग जगत में घटी एक घटना के बाद बंद कर दिया अब तो हमें भी कभी कभी जबरजस्ती ही कुछ पोस्टे पढ़ कर सुनानी पड़ती है या उस बारे में बात करती हूं और किसी भी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं करती हूं :)

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपका यह अंदाज ही तो हमें प्रिय है।

    साथ ही न जाने कितनी अपने ही जीवन की विस्मृत घटनाओं की आपने याद दिला दी। हर बार लगता, अरे! यही तो हमारे साथ हुआ था।

    आप सभी की भावनाओं और सम्वेदनाओं के दिपक में, स्मरण का घी पूरित करते है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. आप का लेखन आमने सामने बतियाता है इस में कोई सक नहीं| धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  10. एक तो जिसने साक्षात्कार लिया है उसके बुद्धि कौशल ने उतना ही नहीं बल्कि उससे ज़्यादा प्रभावित किया, जितना वे जिनहोंने सारे प्रश्नों का खुले मन और बेबाकी से जवाब दिया है। इसलिए पहले तो साक्षारकर्ता को दिल से आशीष और शुभकामनाएं।

    दूसरे आपके मन की कई बातें इस साक्षात्कार के माध्यम से पता चलीं, जो आपके विचार और दर्शन को प्रकाशित करती हैं।
    बाक़ी आपके ब्लॉग और लेखन शैली पर हम टिप्पणी तो करते ही रहते हैं, और जिस किसी ने भी आपको एक बार पढ़लिया, वह मुरीद तो हो ही गया है। हम भी।

    उत्तर देंहटाएं
  11. सही कहा कौशलेन्द्र जी ने.....आपका यह ब्लॉग लिखता नहीं है, सामने खड़े होकर कहता है और हम सुनते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बिलकुल अलग अंदाज़ का अन्दाज़ इंटर्व्यू

    उत्तर देंहटाएं
  13. मुझे इन्तजार है. प्रतिक्षा प्रिया के अगले इन्टरव्यू का .......जिसमें हमारी पसन्द के प्रश्न भी शामिल होंगे ...

    उत्तर देंहटाएं
  14. @उन घटनाओं को सम्मान देने, उससे जुडे लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मैंने उन घटनाओं को अपनी पोस्ट का विषय बनाया।

    आपकी प्रस्तुतियों से आप के आंतरिक व्यक्तित्व की झलक मिलती रहती है लेकिन उक्त कथन आपके आंतरिक व्यक्तित्व का आदमकद आईना है।

    उत्तर देंहटाएं
  15. यह विवरण न भी पढ़ती भाईजी तो ऐसा नहीं था कि आपके इन समस्त विचारों से अपरिचित रहती...

    इतने ट्रांसपेरेंट हैं आप कि सब कुछ पढ़ा जाता है ऐसे ही...

    फिर भी बड़ा सुखद लगा...

    असल में आपका लिखा पढ़,यह कहाँ लगता है कि कुछ पढ़ रहे हैं,लगता है आप सामने बैठे बतिया रहे हैं और हम सुन रहे हैं....

    लेकिन पता है भाई जी,जिसे लोग बिहारी हिन्दी कह मजाक उड़ाते थे,देखिएगा, फ्यूचर में ऐसे बतियाने में शान समझेंगे...

    उत्तर देंहटाएं
  16. बिटिया ने बड़ी समझदारी से प्रश्न पूछे हैं....आपके उत्तर तो खैर अच्छे होने ही थे...बहुत कुछ पता चला इस साक्षात्कार से.

    आपने सच कहा...इस ब्लॉग की भाषा ही इसकी आत्मा है.

    और वो अमिताभ बच्चन की कविता का उनके पिताजी द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद मेरे पास है कहीं...अगर सचमुच आपको चाहिए तो मैं ढूंढ कर मेल कर दूंगी.

    उत्तर देंहटाएं
  17. का सलिल भैया, इंटरभ्यू का मौका आया तो ब्लॉग का भाषा ही बदल गया:)
    माना ओरिजिनल इंटरव्यू ऐसा ही रहा होगा लेकिन इस ब्लॉग पर अपुन को आप वाले पेटेंट स्टाईल में भी वही मजा आता। आज हम डेंटिंग करके इनडायरैक्ट स्पीच में ये सब पढ़ रहे हैं।

    मजाक को दरकिनार, आप ने किस किसको कितना प्रभावित किया है, इसका मापतौल करने बैठें तो भी सही नतीजा नहीं आँक सकेंगे। ज्ञान के साथ जब सशक्त अभिव्यक्ति और सही नीयत जुड़ जायें तो रिजल्ट एक ही आता है - सफ़लता और आप हम लोगों के दिल जीतने में सफ़ल हैं।
    अभी क्या डर सहम रहे हैं, भतीजी से हमारी मुलाकात होने दीजिये और फ़िर हम देखेंगे आपका अगला इंटरव्यू जब embarassing प्रश्न भी उछाले जायेंगे :)

    उत्तर देंहटाएं
  18. @रश्मि रविजा:
    अरे आपने मेरी मन चाही मुराद पूरी कर दी.. कविता का शीर्षक था "Withered Flower" और अनुवाद था "विगलित पुष्प". धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी वो कविता!!
    प्लीज़ मिले तो अवश्य भेजें!! आभारी रहूंगा!!

    उत्तर देंहटाएं
  19. हम तो आपकी भाषा, लिखने की स्टाईल का एतना मजा लेता हुं कि दू बार पढे बिना चैन ही नही पडता, आपका शायद अकेला ऐसा ब्लाग पोस्ट होता है जिसे दुबारा पढने में आनंद आता है. बहुत लाजवाब शैली है आपकी.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  20. मैं ताऊ रामपुरिया जी से शत-प्रतिशत सहमत हूँ। आपकी पोस्ट पढ़ने से जी नहीं भरता। यदि भाषा को छोड़ दिया जाय तो हर पोस्ट में एक नया अन्दाज देखने को मिलता है। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  21. पहले पहले मुझे भी आपका ब्लाग पढने में असुविधा होती थी लेकिन जैसे जैसे हर पोस्ट पढना शुरू किया (भले ही थोड़ी देर लगी हो )आपकी आत्मा की आवाज होने से आत्मीय लगा |और जब आज हिदी में साक्षात्कार पढ़ा तो कुछ अधुरा सा लगा |किन्तु बहुत अच्छा लगा बिटिया का प्रश्न करना और पिता का ईमानदारी से जवाब देना |
    बिटिया को और आपको शुभकामनाये |

    उत्तर देंहटाएं
  22. सचमुच! आपकी पोस्ट सामने बैठ के बतियाती ही है।
    आपकी, आपकी शैली के बारे में तो ऊपर सभी ने ठीक ही कहा है।
    मेरे लिए यहाँ आना ऐसा है जैसे टहकारती लू में बरगद तले बैठना, जैसे पगडंडियों से उतर के रहंट पर गन्नों का रस चखना।
    आज झूमा का धन्यवाद बनता है।
    उसे ढेर सारा आशीष भी।

    उत्तर देंहटाएं
  23. ................................................

    sabne itnee tareef kee hai mere liye kuch bachaa hee nahee .
    ye upar jo bindoo dekh rahe ho vo nazar battoo hai .

    :)

    उत्तर देंहटाएं
  24. सच में आपके ब्लॉग की हर.पोस्ट में एक अलग सी मिठास होती है और लगता है बातें करती हुई ......बहुत अच्छा लगा आपका इंटरव्यू.
    .
    पुरवईया : आपन देश के बयार

    उत्तर देंहटाएं
  25. सलिल भाई,
    आपकी ब्लॉग रचना के बारे में आप ही के माध्यम से जानकार अच्छा लगा.
    दो बातें आपके ब्लॉग को बहुत रोचक बना देती हैं,भाषा और विषय वस्तु..
    और ये दो बातें ही सफल साहित्य की परिभाषा में आती हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  26. देर से आने के लिये माफी, सलिल भाई!
    व्यस्ततायें कम ही नहीं हो रहीं हैं इन दिनो :(

    झूमा की तस्वीर को इस पोस्ट में मिस किया!
    आपके मुरीदों में अग्रणी होने का गर्व है :)

    चला बिहारी के सभी टिप्पणीकार भले ही मुझे न जानते हों पर मैं हर एक को आपके माध्यम से जानता हूं। कहीं भी कोई भी रोचक पोस्ट हो, आपके माध्यम से मुझे उसकी खबर हो ही जाती है। और फिर उस पोस्ट के "समीक्षा स्वाद" का देर तक चटकारे लेकर मज़े लेना, अपने आप में अनूठा अनुभव होता है।

    मेरे लिये तो आपकी हर पोस्ट दो गुना मज़ा देती है, पहले सुनना और फिर पड़ना। शुभकामनायें !!

    उत्तर देंहटाएं
  27. jab hum pahle baar apke phone no. save kiye to naam dala 'apna'......kyon?........kyonki....ye
    blog sahi me 'batiyata' hai pathak se..........

    pranam.

    उत्तर देंहटाएं
  28. bada majedaar interview raha chacha....:) :) isko aap us post ke baad hi post kar dete...anyway abhi saath saath celebrity wala post bhi dobara padh liye :)

    उत्तर देंहटाएं
  29. सलिल जी!!!आपका स्नेह ही है जिसके कारण हम आपसे ऐसे अनुरोध करते रहते हैं...,,,और यह आपकी महानता है कि आप हमारे अनुरोध को स्वीकार कर लेते हैं;

    इन्टरव्यू वास्तव में ही बहुत प्रेरक है...झूमा ने कुछेक प्रश्नों में ही आपके ब्लॉग लेखन की सारी कहानी समेट ली!!! वह बधाई की पात्र है।

    भाभी जी से एक अनुरोध ....
    भाभी जी !!! सलिल भाई साहब की पोस्टें जरुर पढ़िए और उनके अच्छे-बुरे पहलुओं पर टिप्पणी भी जरूर कीजिए...ये तो हो ही नहीं सकता कि आप सलिल जी की रचनाधर्मिता को न पहचान सकीं हों...!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  30. झूमा ने तो interview लेकर शुरुआत कार दी है ,इंशाअल्लाह आगे और भी interview देते रहिये .आपके और चैतन्य जी की जोड़ी पर चार पंक्तियाँ------"वेदना में हम गुंथे तुमसे विंधे तुमसे, व परस्पर आवेष्टित हो गए .स्वप्न छिप्रा तीर पर कोई नहीं ये हम तुम्हारे ,किन्तु सहचर हो गए!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  31. भाई शुकर करो झूमा ने धर्म संकट डालने वाला प्रश्न नहीं पुछा ... हा हा ..
    मज़ा आ गया इस वार्तालाप का ...हिंदी दिवस की शुभकामनाएं ...

    उत्तर देंहटाएं
  32. क्षमा की बहुत देर से आया . कई और पोस्ट रह गए जिनपर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा पाया क्योंकि आपकी पोस्ट और इसकी भाषा सचमुच आत्मा तक पहुचती है.
    कार्बन वाली पोस्ट इतनी अच्छी लगी थी कि कई बार पढ़ा और टिप्पणी लिख नहीं पाया. मेरी एक कविता भी थी इसपर. शायद कहीं खो गई. जब केमेस्ट्री आनर्स छोड़ कर अंग्रेजी साहित्य पढने आया था. खैर..

    बिटिया द्वारा लिया गया यह साक्षात्कार अच्छा लगा. कल पढ़ कर गया था इसे.. आज टिप्पणी कर पा रहा हूं. मेरा बेटा ९ साल का है और मेरा ब्लॉग पढता है. अच्छा लगता है. मेरी एक कविता को उसने अपने स्कूल में सूना भी आया और तृतीय पुरस्कार भी मिला. बिटिया में पत्रकार के सभी गुण हैं. अच्छे सवाल पूछे हैं आपसे और आपका उत्तर अच्छा है क्योंकि प्रश्न अच्छे हैं. विषय का चयन वाला प्रश्न वाकई अच्छा है क्योंकि यही अचंभित करता है हर बार. बिटिया का भी संक्षिप्त परिचय देते तो अच्छा रहता.

    उत्तर देंहटाएं
  33. लीजिये जिस इंटरव्यू का इंतज़ार हम को इतने दिनों से था वो छप भी गया और हम को खबर भी नहीं हुयी ... अगर आज रश्मि रविजा जी की पोस्ट ना देखी होती तो आपकी इस पोस्ट के विषय में पता ही नहीं चलता ... आप कुछ उपाए करें मेरे हिसाब से आपका ब्लॉग खुद बा खुद लोगो की ब्लॉग लिस्ट से गायब हो रहा है ... कहीं कोई वाइरस या मालवेअर ना आ गया हो ...

    खैर इन सब के बीच मुद्दे की बात तो रह ही गई ... गजब का इंटरव्यू लिया है ... समझ में आ रहा है जवाब देते में खूब पसीना निकला होगा आपका ... झूमा को बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  34. एक बढियां साक्षात्कार ....साक्षात हुए हैं आप !

    उत्तर देंहटाएं
  35. इसमें तो कोई शक नहीं है कि इस साक्षात्‍कार से आपके बारे में हमारी जानकारी में वृद्धि हुई है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  36. ऐसन intarview लीजियेगा ता बाकि लोगन का क्या होगा...सच कहें ता अपना इ जो शैली है न वो मत छोदियेगा कभी ...अइसहीं सूरज लेखे चमकते रहिये ...

    उत्तर देंहटाएं
  37. सर जी कुछ प्रश्न मेरे भी हैं.....
    १- 'चला बिहारी ब्लोगर बनने' नाम कैसे सूझा ?
    २- इसका कोपीराईट किसके पास है ?
    ३- इतना व्यस्त रहते हुए ब्लोगिंग के लिए समय कैसे निकालते हैं ?
    ४- अच्छा ब्लोगर बनने के लिए किन-किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए ?
    ५- आपकी स्मृति इतनी अच्छी कैसे है ?
    ६- पहले कागज़ पर लिखते हैं या सीधे ब्लॉग पर ?
    ७- इन पोस्ट्स को छपवाने के बारे में क्या ख्याल है ?
    ....बाकी प्रश्न सोचकर पूछूँगा .

    उत्तर देंहटाएं
  38. @ रजनीकांत जी:
    १. इसके लिए यह पोस्ट देखें:
    http://chalaabihari.blogspot.com/2011/04/blog-post_30.html
    २. जब लोकार्पित कर दिया तो कॉपी कोई कर ले, मैं रौंग नहीं मानता. सब राईट ही है!!
    ३. जीवन ने बहुत सारी नींदें छीनी हैं मुझसे, बस उन्हीं के एवज यह पोस्टें लिखी गयी हैं. या शायद यह मेरी खुद से मिलने के दौरान लिखी गयीं!
    ४. सिर्फ एक बात का..ईमानदारी! बनावट नहीं! अभिव्यक्ति सच्ची हो तो किसी भाषा में हो दिल तक पहुँचती है. और यह ब्लॉग इसका प्रमाण है!
    ५. कहते हैं अंत समय में स्मृति स्पष्ट हो जाती है.
    ६. कागज़ पर लिखे काफी समय हो गया. सीधा वर्ड में टाइप करता जाता हूँ. हाँ, एक सिटिंग में समाप्त कर देता हूँ यानी १५-२० मिनट के अंदर. हाँ उसके पहले दिमाग में पोस्ट चलती रहती है.
    ७. कभी सोचा नहीं. एक मित्र ने कहा था जब सौ हो जाएँ तो वे छपवा देंगे.

    उत्तर देंहटाएं
  39. और सारी बातें(विशेषताएं)तो आपका यह ब्लाग पढते-पढते स्वतः ही आत्मसात् होचुकीं है लेकिन भाषा के विषय में जिज्ञासा थी क्योंकि पहली बार ही पढते लगा कि आपकी अभिव्यक्ति में जो प्रभाव है वह काफी कुछ इस अनूठी भाषा के कारण भी है । अब तो कई बार संवादों में भी कुछ-कुछ यही भाषा आजाती है । भाषा का इससे अधिक प्रभाव और क्या होगा ।

    उत्तर देंहटाएं
  40. और सारी बातें(विशेषताएं)तो आपका यह ब्लाग पढते-पढते स्वतः ही आत्मसात् होचुकीं है लेकिन भाषा के विषय में जिज्ञासा थी क्योंकि पहली बार ही पढते लगा कि आपकी अभिव्यक्ति में जो प्रभाव है वह काफी कुछ इस अनूठी भाषा के कारण भी है । अब तो कई बार संवादों में भी कुछ-कुछ यही भाषा आजाती है । भाषा का इससे अधिक प्रभाव और क्या होगा ।

    उत्तर देंहटाएं
  41. बहुत अच्छा साक्षात्कार लिया आपकी बिटिया ने, मिट्टी से जुड़े रहने का सुख सबसे बड़ा सुख है| बहुत बहुत बधाई हो........

    उत्तर देंहटाएं
  42. bahut sunder naam hai apki beti ka 'prtikcha priya',wah.bare hi sahaj aur sunder dhang se prashn aur uttar ka silsila chala hai.

    उत्तर देंहटाएं
  43. सलिल भैया ! राउर के याद बा न ! बचपन में माई सिखवले रहली के कौनो चीज आपस में मिल बाँट के लेय के चाही. हम उम्मीद करतानी के रश्मि जी से मिलल "विगलित पुष्प" के साझीदारी हमनियो के मिली.
    @ "......पर ब्लॉग जगत में घटी एक घटना के बाद बंद कर दिया"
    अंशुमाला जी ! ऐसी घटनाओं की कटु स्मृतियों को संजो कर रखने से क्या लाभ ? ब्लॉग जगत, हिन्दी साहित्य के चौराहे का एक ऐसा बरगद है जहाँ हर प्रकार के लोग आकार विश्राम करते हैं ......कुछ नभ चारी परिंदे भी आते हैं ....वहीं विश्राम करते हैं और मौक़ा देखते ही पट से बीट भी कर देते हैं. पर इस कारण पथिक वहाँ आना बंद तो नहीं कर देते न ! परिंदों का स्वभाव है विश्राम स्थल पर ही बीट करना....उनसे कैसी शिकवा-शिकायत ? आपसे अनुरोध है कि इस चौराहे पर .....बरगद की छाँव में कुछ पल बिताने आती रहिये. चौपाल की रौनक तो लोगों से ही है न !

    उत्तर देंहटाएं
  44. वाह जी वाह जी क्या कहने....सही कहा है आपने ..बोली का अपना ही मजा है। हूं तो मैं भी मागधी..और माता-पिता भी मागधी...पर मैं दिल्ली में पला बढ़ा सो उतनी पकड़ नहीं है..पंजाबी माहौल से पंजाबी और पिताजी हिंदी के पत्रकार रहे सो हिंदी अपनी भाषा रही यानि दिल्ली वाली.माता के प्रभाव से जो थोड़ा बहुत है वो सहज ही भाषा में है....इसलिए पता नहीं होता कि कब किस बोली का समावेश हो जाता है...

    उत्तर देंहटाएं
  45. बहुत दिनों से ढूँढ रहा था..अपनी भाषा..अपनी वज्जिका.
    प्रतिनिधित्व करने के लिए धन्यवाद. अच्छी शैली है..शुभकामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  46. सलिल भाई, प्रणाम. पहले तो देरी के लिए क्षमा! क्या करें ...नेट महाराज जो अंतर्ध्यान हो गए थे. कॉलेज में ब्लोग्स पढ़ तो लेते थे मगर साईट ब्लाक होने से कमेन्ट नहीं कर सकते थे. गज़ब था बाप और बेटी का आमना-सामना! बाप की तो खैर क्या कहें, मगर बेटी तो बाप की भी बाप निकली. उसके उज्जवल भविष्य के लिए हमारी शुभकामनायें!!

    उत्तर देंहटाएं
  47. काबिल पिता की काबिल पुत्री !प्रश्न सामयिक हैं और बुद्धिमतापूर्ण भी , इस साक्षात्कार को सार्वजनिक करने हेतु साधुवाद एवं बधाई ! आपकी लेखनी पर टिपण्णी करना मेरे बूते के बाहर है !

    उत्तर देंहटाएं
  48. आपका यह सुन्दर साक्षात्कार पढ़कर बहुत अच्छा लगा!
    निश्चित ही आपकी भाषाशैली अनुपम है...अपनेपन की सुगंध लिए हुए!

    उत्तर देंहटाएं
  49. :)
    क्या कहूँ इस साक्षात्कार के बारे में , कल से आप पर रेसेर्च कर रहा हूँ , सारे जवाब पहले ही दिमाग में चल रहे थे , जैसी सरल इमेज बनाए थी आपकी , वैसे ही जवाब .

    सादर

    उत्तर देंहटाएं