शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

बाद मरने के मेरे

ई आभासी दुनिया का एगो सबसे बड़ा खासियत एही है कि इसमें घूमने वाला लोग बास्तबिक है. हर कोई का आपस में तार जुटा हुआ है. एही लोग से समाचार मिलता रहता है कि सब ठीक-ठाक है या अमुक के साथ अइसा हो गया. अभी कुछ रोज पहिले अचानक निर्मला कपिला जी (निम्मो दी) का मेल मिला अऊर उसमें ऊ बताईं कि उनको बहुत सीरियस बीमारी हो गया है अऊर ऊ एकदम बेड-रेस्ट में हैं. मनोज जी के एगो पोस्ट से पता चला कि संगीता स्वरुप जी को कार दुर्घटना में चोट लगा. पाबलाजी के साथ जो पर-साल दुर्घटना हुआ था उसका खबर भी अइसहीं पंडित अरविंदमिसरा जी के माध्यम से लगा था.
अब थोड़ा सा अऊर सीरियस बात करें त डॉ. अमर कुमार के स्वर्गबास के बारे में अऊर हमरे फेसबुक दोस्त हिमांशु मोहन जी के निधन के बारे में भी अइसहीं आभासी दुनिया के बास्ताबिक लोग के मार्फ़त पता चला. अइसने कोनो अबसर के लिए निदा फाज़ली साहेब एगो सेर कहे होंगे:
उम्र होने को है पचास के पार,
कौन है किस जगह पता रखना.
मगर केतना लोग अइसा भी होगा जिनके साथ, केतना तरह का दुर्घटना, अच्छा-बुरा घटता होगा, मगर उनका किसी के साथ कोनो संपर्क नहीं. हम जान भी नहीं पाते हैं ऊ लोग के बारे में. जानना जरूरी नहीं, मगर जानने में हरज भी नहीं. तनी ढाढस हो जाता है अऊर का!! बेचारा सोचता है कि एतना लोग है हमरे साथ.
एही सब बुरा अऊर बहुत बुरा समाचार के दौर में हमरी बिटिया सोनी का एस.एम्.एस. हमको मिला एक रोज. उसमें लिखा था
बाबूजी, बताइए!
अगर आपको मेरे मरने की खबर मिले
तो कितने दिनों में आप मेरा नंबर अपने मोबाइल से
डिलीट कर देंगे!
अभी साल भर पहिले नया जिन्नगी सुरू की है अऊर ई सब बात... फोन करके हम उसको डाँटे. बोली, हमसे कोइ पूछा था तो हम सोचे कि आपसे भी पूछ लें. इमैजिनरी सवाल का बास्ताबिक जवाब दीजिए. गोस्सा में हम बोले कि पागलपन वाला सवाल का हम जवाब नहीं देते हैं. ऊ समझ गयी कि कुछ बात मजाक से बाहर होता है!
मगर ओही दिन के बाद से हम अपना बारे में भी सोचने लगे कि अच्छा है हमरे साथ चैतन्य आलोक हैं. हमरे ब्लॉग का पासवर्ड उनके पास है अऊर हमरे हर साँस का हिसाब भी उन्हीं के पास है. अगर कभी हमरा साँस रुक जाए तो कम-से-कम एक ठो आदमी तो है जो हमरे नहीं होने का खबर आप लोग तक पहुंचा सकेंगे, एक दम फर्स्ट हैंड इनफोर्मेसन. काहे से कि हम त ग्रुप में ब्लॉग लिखते नहीं हैं, इसलिए ई खबर देने के लिए ग्रुप का लोग भी नहीं है हमरे पास.
एक रोज एगो मजाक करने का मन किया कि चैतन्य जी को बोलकर एगो पोस्ट लिखवाते हैं अपने मृत्यु का सूचना देने के लिए. देखते हैं लोग का-का कहता है हमरे बारे में. सायद अपना मृत्यु का सोक-संदेस अपने से पढने वाला पहिला आदमी होंगे हम. ऐसे भी कोइ बुरा तो बोलेगा नहीं, मगर ‘भला’ के भेराईटी का फ्लेभर त देखने को मिलेगा ना! बाद में बता देंगे कि हम मजाक किये थे.
बाकी इसमें एगो नोकसान हो सकता है कि जदी सच्चो में कोनो दिन ई खबर मिलेगा आप लोग को तब???? तब त ई पोस्ट पढने वाला सबलोग समझेगा कि १४.१०.२०११ का रीठेल किया हुआ पोस्ट है. उस दिन कमेन्ट में सबलोग इस्माइली बनाएगा, लिखेगा कि बहुत अच्छे जा रहे हो, लगे रहो, आप भी बहुत अच्छा मजाक कर लेते हैं, अच्छी लगी आपकी मरने की खबर भी, हम तो दुबारा इस खबर को पढकर हंसते-हंसते बेहाल हो गए, हा हा हा, क्या कहने है आपकी मौत के!!
मगर एगो राज का बात बताएं, सच में हम एही चाहते हैं कि जब आप लोग को अलविदा कहें तो इसी तरह का कमेन्ट आप लोग से सुनने को मिले. आज तक आपलोग से कुछ नहीं मांगे हैं (टिप्पणी तक नहीं), कम-से-कम ई इच्छा तो पूरा करना बनता ही है!! वादा कीजिये!

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

एक दफा वो याद है तुमको!!


‘भयमुक्त समाज’ सुनने में बहुते अच्छा लगता है, लेकिन होता है कि नहीं, का मालूम. कम से कम हमको त एही अनुभव हुआ है कि ई सब मन बहलाने का झुनझुना है, सब आदमी के हाथ में थमा दिया गया है. बस एही देखकर खुस रहो कि सुरच्छित हो तुमलोग, एगो भयमुक्त समाज में. हमलोग भी मने मन सब जानते हुए तनी खुस हो लेते हैं कि कोनो है ऊपर बईठल जो कह रहा है कि ‘योगक्षेमं वहाम्यहम.’

जीते जी कहाँ मिलता है भय से मुक्ति. घर में रहिये त पत्नी का भय (पत्नी नहीं रहें त घर काटने को दौडता है अऊर रहें त ऊ अपने काटने को दौडती हैं), रोड पर एक्सीडेंट का भय, अपना गाड़ी में घूमिये त पेट्रोल के दाम का भय अऊर ऑफिस में हेड ऑफिस का भय! अरे ई भय से आतंकित होकर हमरे बड़े भाई श्री रविन्द्र कुमार शर्मा ‘रवि’ जी (हमपेसा हैं अऊर बहुत कोमल हिरदय वाले सायर हैं) कल एस.एम्.एस. में बैंक में काम करने वाला कर्मचारी के लिए कुछ हॉरर सिनेमा का नाम घोषित कर दिए. एतना कोमल सायर अऊर ऐसन हॉरर सिनेमा का नाम सुनकर लगा कि केतना भयग्रस्त होंगे बेचारे:

१. तडपता क्लर्क   २. ऑफिसर की मौत   ३. कातिल मैनेजर   ४. खौफनाक मीटिंग ५. टारगेट का सदमा   ६. क्लोजिंग की आहट   ७. खून का प्यासा कस्टमर

अब जउन समाज में ऐसा-ऐसा भयानक बिचार आता होगा ऊ भयमुक्त कइसे हो सकता है भगवान जाने!

एक रोज हमरे बैंक में भी एगो चिट्ठी आ गया ऊपरवाले के तरफ से... अरे ओतना ऊपर वाला के तरफ से नहीं, उससे तनी नीचे वाला के तरफ से. चिठ्ठी का था, फरमान था कि फलाना तारीख को तीन बजे दिल्ली का पूरा ब्रांच से हर लेवल का सब ऑफिसर को एगो मीटिंग में उपस्थित रहना है. अब ई कहे का त कोनो जरूरत नहिंये है कि मीटिंग में हमरे माई-बाप का भासन होना था. जगह दिल्ली सहर के बाहरी छोर पर.

अब सब के अंदर भय ब्याप्त गया. नहीं गए तो...! अब ई सवाल का जवाब खोजने से अच्छा था कि चले चलो. टैक्सी, कार, अपना चाहे किराया का, सबमें भर-भर कर गया लोग-बाग. कोनो राजनैतिक रैली टाइप का दिरिस देखाई दे रहा था. एक-एक गाड़ी में जेतना आदमी समा सकता था, समा गया अऊर अपना हाजिरी लगा आया.

लौटने के टाइम में हमरे साथी अभय के गाड़ी में हमरे अलावा तीन महिला थीं. हम अभय के साथ सामने बैठे अऊर तीनों महिलायें पिछलका सीट पर. उनमें से एगो थी ज्योति जो ६-७ महीने की गर्भवती थी. मगर मजबूरी जो न कराये इस भयमुक्त समाज में. अभय बाबू बहुत साबधानी से गाड़ी चला रहे थे. मगर सामने एगो गाड़ी वाला पास भी नहीं दे रहा था अऊर बीचोबीच गाड़ी चला रहा था अपना मस्त चाल में. होरन का आवाज का भी कोनो असर नहीं हो रहा था. अभय बाबू को वैसे भी ई सब हरकत अनबर्दास्तेबुल (नाकाबिले बर्दाश्त या असहनीय) लगता है. जगह देखकर ऊ धीरे से इस्पीड बढाए अऊर साइड से ओभरटेक करके निकल गए. ई चक्कर में बीच वाला पीला लाइन से उनका दाहिना चक्का बाहर हो गया. तनिके आगे बढे होंगे कि पीछे से पुलिस का सायरन सुनाई देने लगा. कनखिया कर देखे त एगो मोटर साइकिल पर सिपाही हनहनाये हुए आ रहा था अऊर रुकने का इशारा कर रहा था.

हम बोले कि गाड़ी साइड में खडा करिये. मामला समझने के साथ, ओही समय हमरे माथा में गुलज़ार साहब का एगो नज्म सुनाई देने लगा:

एक दफा वो याद है तुमको,
बिन बत्ती जब साइकिल का चालान हुआ था
हमने कैसे, भूखे-प्यासे बेचारों सी एक्टिंग की थी
हवलदार ने उलटा एक अठन्नी देकर भेज दिया था
एक चवन्नी मेरी थी वो भिजवा दो!

हम ज्योति को बोले कि तुम सीट पर माथा पीछे करके आँख बंद कर लो. तब-तक हवलदार भी आ गया था. गोस्सा में बोला, “ओवरटेक करते हो और लेन क्रोस करते हो. कागज़ निकालो!”
तब तक हम सामने आ गए और बोले, “देखिये सर! इमरजेंसी है!! हमारे साथ ये प्रेग्नेंट लेडी हैं और हम इनको लेकर हस्पताल जा रहे हैं. सामने वाला पास नहीं दे रहा था और बीचोबीच चला रहा था. हारकर ओवरटेक करना पडा!”

हवलदार गाड़ी में झांक कर देखिस. ज्योति आँख बंद करके पीछे के तरफ आधा लेटी थी और बाकी दूनो महिलायें उसको दूनो साइड से संभाले हुए थीं. बेचारा हवलदार आदमी निकला, पुलिस नहीं. बोला, “अब रोका है तो चालान तो करना ही होगा. रैश ड्राइविंग के लिए कम-से-कम एक हज़ार रुपया फाइन होता. मगर गलत पार्किंग के लिए सिर्फ सौ रुपये का चालान करता हूँ. आप लोग जल्दी जाओ!”

बेचारा जल्दी-जल्दी चालान काटा अऊर हमलोग चल दिए. ज्योति का हंसी नहीं रुक रहा था. हम सब लोग हंस रहे थे. देखते-देखते गाड़ी के अंदर एकदम भयमुक्त समाज अस्थापित हो गया था.

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

बधाई!!


दू गो ब्लोगर आपस में जुटेगा त का बतियाएगा? आप सोचियेगा कि सिकायत छोडकर अउर कोनो बात बतियाइये नहीं सकता है. मगर इसका अपबाद भी होता है, अर्चना के साथ बतियाने में नया गाना सुनने को मिलता है अउर परिबार का बात करने में एकदम घरेलू बातचीत. हमरी बेटी त जबसे फेसबुक पर दोस्त बनी है, तब से रोज एगो खिस्सा सुनाती है कि आज अर्चना बुआ ने ये कहा और आज वो.
बस अभी ओही सब चल रहा था कि हम अचानक १२ बजे तनी देर के लिए गायब हो गए. जब लौटे त ऊ पूछी कि कहाँ चले गए थे. “मैं डिस्टर्ब तो नहीं कर रही आपको?” हम बोले कि नहीं रे भाई! ऊ अपने मनोज जी हैं न, उनका ब्लॉग का सालगिरह है, दू साल हो गया उनके ब्लॉग का. बस उनको बधाई देने चले गए थे. मनोज जी त बत्ती बुताकर बइठे हुए थे. चैट में बधाई दिए त झट से उठकर बइठ गए. पूछे, “जगले हैं का?” अउर हमरा जवाब सुनला के पहिलहीं अंतर्धान.
अर्चना बोली कि मैं भी बधाई देना चाह रही हूँ. हम बोले कि एही मौक़ा है. मनोज जी बहुत सेवा करते हैं ब्लॉग जगत का. तुम उनका एगो पोस्ट का पॉडकास्ट बनाओ. बोली कि बिना उनके अनुमति के कइसे बनाएँ. हम बोले कि हम हैं न, छोट भाई हैं अब हम राम नहीं हैं त का हुआ, ऊ त लछमन हैं ना. हम अपना ब्लॉग पर लगा देंगे. छांटकर एगो पोस्ट का लिंक पकड़ाए ऊर एगो अनोखा तोहफा का तैयारी में जुट गए. 

त बस दस मिनट में बना हुआ ई पोस्ट/पॉडकास्ट एगो ब्लॉगर का, दोसरे ब्लॉगर के साथ मिलकर, तीसरे ब्लॉगर को उपहार है. मनोज जी, ब्लॉग जगत में नया नाम नहीं हैं. दू साल के सफर में ई अपना परिचय अपने आप हैं. इनके साथ उनके ब्लॉग में सामिल सभी लोगों को हमारे तरफ से बधाई अउर सुभकामना!!

हाजिर  है ई पॉडकास्ट.. "मनोज" ब्लॉग को समर्पित:

रविवार, 11 सितंबर 2011

इनसे मिलिए!!


इधर कुछ ब्यस्त रहे, कुछ परेसान रहे अउर कुछ... बस का मालूम काहे अस्थिर से बइठकर कुछ लिखने का मने नहीं किया. आज मनोज भारती जी से बात होने लगा त हर बार के तरह बात सुरू करते हुए ऊ पूछे कि अगला पोस्ट में हम का लिखने जा रहे हैं. कुछ तय नहीं था त हम भी कहे कि देखते हैं. तब ऊ जिद करने लगे कि अभी आप अपना इंटरव्यू के बारे में लिखे हैं, मगर एगो इंटरव्यू पहिलहीं से पेंडिंग है. ओही काहे नहीं पोस्ट कर देते हैं. तब खेयाल हुआ कि हमारा एगो पोस्ट पर आप लोग हमसे हमारा बेटी जो इंटरव्यू ली थी, ऊ छापने के लिए बोले थे. बेटी के इस्कूल में का हुआ मालूम नहीं, लेकिन इहाँ बहुत सहमकर, डरते-डरते हम ई पोस्ट कर रहे हैं.


प्रतीक्षा प्रिया: आपको ब्लॉग लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
सलिल वर्मा: इस प्रश्न का उत्तर मैं पहली बार आपको बता रहा हूँ. दरअसल मुझे ब्लॉग लिखने की प्रेरणा अमिताभ बच्चन और विवेक शर्मा के ब्लॉग से मिली. अमित जी के ब्लॉग पर कई बार मैं यह लिख के आया कि आपकी एक अंग्रेज़ी कविता, जिसका हिन्दी अनुवाद आपके पिताजी ने किया था, प्रकाशित करें. लेकिन उन्होंने उत्तर नहीं दिया और कविता भी नहीं छापी. मुझे ये एकतरफा संवाद पसंद नहीं आया. क्योंकि दूसरी ओर विवेक शर्मा के ब्लॉग पर की गई हर प्रतिक्रया वो ऐक्नोलेज करते. तब मैंने अपने मित्र चैतन्य आलोक जी के साथ मिलकर “संवेदना के स्वर” ब्लॉग शुरू किया. “चला बिहारी” तो बहुत बाद में आया.

प्र. प्रि.:  आपने ब्लॉग लेखन के लिए यह भाषा क्यों चुनी?
स.व.: मेरे ब्लॉग की भाषा हिन्दी ही है. बिहार के अधिकतर लोग हिन्दी इसी तरह बोलते हैं. कई लोगों ने मुझसे कहा भी कि आप भोजपुरी में क्यों नहीं लिखते. उसका कारण भी यही है कि भोजपुरी मेरी भाषा नहीं है. बिहार में मैथिली भाषा के साथ-साथ भोजपुरी, मागधी और वज्जिका बोलियां बोली जाती हैं. मैं मगध से हूँ इसलिए मेरी बोली मागधी है. आज भी घर पर कुछ सम्बन्धियों के साथ इसी बोली में बतियाता हूँ. मेरी माताजी भोजपुरी अंचल से आती हैं. लेकिन अब तो वो भी नहीं बोल पातीं. इस बोली में ब्लॉग लिखने का कारण मात्र इतना है कि मैं इसमें अपनी आत्मा महसूस करता हूँ. कई लोगों ने शिकायत की कि पढ़ने में तकलीफ होती है, हिन्दी में लिखें. लेकिन मेरा उत्तर यही रहा है कि फिर तो इस ब्लॉग की आत्मा समाप्त हो जाएगी.

प्र. प्रि.: आप अपनी लेखन शैली के विषय में क्या कहना चाहेंगे?
स.व.: बस इतना कि मैं कोइ साहित्यकार नहीं हूँ और न ही साहित्य का विद्यार्थी रहा हूँ. हाँ, अच्छे साहित्य की समझ भर है मुझमें. मुझसे अच्छा लिखने वाले कई लोग ब्लॉग जगत में हैं और उनके ज्ञान और भाषा-शैली की बराबरी मैं कभी नहीं कर सकता. इसलिए मैंने बात करने की शैली अपनाई. मेरी हर पोस्ट पाठक से बात करती हुई मालूम होती है. वैसे सही शब्द होता ‘बतियाती हुई’ होती है. मेरी कोशिश यही रहती है कि हर पढ़ने वाले के साथ पोस्ट के माध्यम से एक जुड़ाव पैदा कर सकूं. कितना सफल हुआ यह तो मेरे पाठक ही बता सकते हैं.

प्र. प्रि.: आपके पसंदीदा ब्लॉग कौन-कौन से हैं?
स.व.: कोइ टिप्पणी नहीं. वो सारे ब्लॉग जिन्हें मैं पढता हूँ, जिनपर अपनी बात कहता हूँ, वो सब मेरे पसंदीदा ब्लॉग हैं.


प्र. प्रि.: आप अपने लेखन के लिए विषय कैसे चुनते हैं?
स.व.: यह बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है. आधी ज़िंदगी गुज़ारने के बाद (माँ ने सौ साल जीने की दुआ दी थी) सोचा मैंने कि जीवन में कई घटनाएं मेरे साथ घटीं या शायद परमात्मा ने उन घटनाओं के एक पात्र के रूप में मुझे चुना. उन घटनाओं को सम्मान देने, उससे जुडे लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मैंने उन घटनाओं को अपनी पोस्ट का विषय बनाया. मेरी चेष्टा यही रही कि इन घटनाओं के बहाने मेरे पाठकों को अपने जीवन की ऐसी ही किसी घटना को पुनः जीने का अवसर मिले.

प्र. प्रि.: इस पूरी ब्लॉग-यात्रा में आप किसी व्यक्ति विशेष का नाम लेना चाहेंगे?
स.व.: निस्संदेह ऐसा व्यक्ति तो बस एक ही हो सकता है. मेरे मित्र चैतन्य आलोक. जिन्होंने मेरे व्यक्तित्व को एक नया आयाम दिया, मेरे ज्ञान को एक नया विस्तार दिया और मुझे दुबारा लिखने को प्रोत्साहित किया. मेरी हर पोस्ट के वे पहले श्रोता हैं और अगर किसी कारणवश वो पोस्ट उनको न सुनाई जा सकी तो पोस्ट टाल दी है मैंने, मगर सुनाना नहीं टला.

प्र. प्रि.: अंत में एक व्यक्तिगत प्रश्न... क्या आपके परिवार के लोग आपका ब्लॉग पढते हैं? उनकी क्या राय है आपके ब्लॉग के विषय में?
स.व.: मेरी पत्नी बिलकुल नहीं पढ़तीं. कभी-कभार अपनी कोइ पोस्ट पढकर ज़बरदस्ती सुना देता हूँ उनको, तो सुन लेती हैं. यह पूछने पर कि कैसी लगी, उनका एक ही उत्तर होता है कि आपने लिखी है तो बुरी हो ही नहीं सकती. पटना में मेरा पुत्र, मेरा भाई, उसकी पत्नी और मेरी माँ बहुत पसंद करते हैं. विशेष तौर पर वे पोस्ट जिनमे उनसे जुडी यादें सिमटी हों.

प्र. प्रि.: बहुत अच्छा लगा आपसे बातें करके. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!

रविवार, 4 सितंबर 2011

शिक्षक-दिवस, केमिस्ट्री और कार्बन


आज की यह पोस्ट समर्पित है उन सभी शिक्षकों को जिन्होंने इस माटी के माधो को एक इंसान बनाया.
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बहुत पहिले राज कपूर से पूछा गया कि आपको अपना बनाया हुआ सब सिनेमा में से कउन सबसे प्यारा है. ऊ बोले कि “मेरा नाम जोकर”. ई कहने पर कि ऊ फिलिम तो चलबे नहीं किया था, राज कपूर का कहना था कि अपना बच्चा अगर बिकलांग भी हो जाए त प्यारा लगता है. तब से लेकर आज तक का मालूम केतना आदमी अपना कोनों कमजोर रचना के लिए एही बात बोलता है.
हम त केमिस्ट्री के इस्टूडेंट रहे हैं. इसलिए हमरा प्यार कार्बन के लिए बहुत जादा है. प्यार काहे, सम्मान कहिये. जेतना इज्जत हम कार्बन का करते हैं, ओतने इज्जत हम अपने पुर्बज लोग का करते हैं. कार्बन का नाम सुनते ही सबसे पाहिले कोयला ध्यान में आता है. मगर हमारे लिए त कोयला अउर हीरा दुनो कार्बन है. पेन्सिल का लोखने वाला नोंक भी त ग्रेफाईट माने कार्बन का बना हुआ होता है. अब काला अउर बदसूरत होने से हमरा प्यार कम थोडो न हो जाएगा!
कार्बन का अनोखा गुन है कि ई लोगों के साथ मिलकर रहता है. खाली बाहर के लोग के साथ नहीं, अपने परिबार से भी मेल मिलाप से रहता है. परिबार का जंजीर एतना लंबा होता है कि पहिला बार देखकर लोग घबरा जाता है. मगर एही बात हमरे पुर्बज सिखाते आये हैं हमलोग को कि आपस में मिलकर रहो और समाज में भी प्यार अउर भाईचारा बनाए रखो. इनके प्यार का ‘एरोमा’ एतना फैलता है कि का कहा जाए. सबसे मिलकर रहते हैं, खाली इसलिए कि न्यूट्रल हैं. ना पोजिटिभ ना निगेटिभ. जैसी बहे बयार, पीठ तब तैसी कीजे. ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर. हमको लगता है कि इसी सोभाव के कारन जब दू आदमी के बीच बढ़िया सम्बन्ध बना रहता है तो कहते हैं कि दुनो का केमिस्ट्री बहुत अच्छा है!
जब हम एम्.बी.ए. में एडमिसन के लिए इंटरव्यू देने गए, त हमसे जो सवाल जवाब हुआ उसका बानगी देखिए:
“आपने केमिस्ट्री में एम्.एस-सी. किया है. साधारण भाषा में बताइये कि ऑर्गनिक केमिस्ट्री और इनऑर्गनिक केमिस्ट्री में क्या अन्तर है?”
“कार्बन का स्वभाव है कि अन्य तत्वों के साथ-साथ स्वयं अपने आप के साथ भी संयोग कर यौगिक का निर्माण करता है. इसके प्रतिक्रया करने के स्वभाव अलग होते हैं और यौगिकों की संख्या असीमित. इसलिए इनका एक अलग शाखा के रूप में अध्ययन करते हैं जो ऑर्गनिक केमिस्ट्री कहलाती है.”
“अच्छा! मतलब ये कि इनऑर्गनिक केमिस्ट्री में कार्बन का अध्ययन नहीं करते!”
“करते हैं. मगर यहाँ कार्बन का अलग से अध्ययन नहीं जाता, अन्य तत्वों की तरह ही इनकी भी स्टडी करते हैं”
“कमाल है! केमिस्ट्री तो बड़ा ‘फन्नी’ सब्जेक्ट है. कार्बन तो एक है, मगर सिर्फ इसके कारन दो अलग अलग ब्रांच बना दी.”
“सर! वास्तव में एक जगह कार्बन का रोल माइनर है और दूसरी जगह मेजर है. जबकि और कोइ भी तत्व ऐसा नहीं है.”
“इससे क्या हुआ. केमिस्ट्री इज अ फन्नी सब्जेक्ट!! ये अलग अलग रोल क्या होते हैं. अजीब फन्नी सब्जेक्ट है!!”
एतना बार ‘फन्नी सब्जेक्ट’ सुनकर हमरे मन में भी गुस्सा भर गया था. अउर केमिस्ट्री से तो हम मोहब्बत करते थे, ई बात सब लोग जानता था हमरे क्लास में. हमरी महबूबा को कोइ फन्नी बोले ई बर्दास्त होने वाला बाते नहीं था. सोचे कि अब एडमिसन हो चाहे नहीं हो, जवाब त देना ही होगा.
“सर! इट्स नॉट फन्नी! इट्स वेरी सिंपल, जस्ट लाइक यू एंड मी. आप अपने बच्चों के लिए पिता हैं, पत्नी के लिए पति, हमारे लिए शिक्षक और दूसरे प्रोफ़ेसर के लिए दोस्त या सहकर्मी. सबके साथ एक जैसा रोल तो नहीं निभा सकते आप. बस वैसे ही कार्बन है, जबतक इनऑर्गनिक केमिस्ट्री में रहता है, अकेला चुपचाप सबके साथ खडा होता है और जब ऑर्गनिक केमिस्ट्री में आता है तो पूरे परिवार और समाज के साथ.”
“थैंक्स! यू मे गो नाऊ!”
हम समझ गए थे कि रिजल्ट का होने वाला है. जो हो, एडमिसन पाने के लिए हम अपनी महबूबा को ‘फन्नी’ कहलाते हुए नहीं देख सकते थे. मगर कमाल देखिये, हमरे मोहब्बत में भी असर था, लिस्ट आया तो हमरा नाम भी सफलता सूची में था. हमको लगा कि ऊ प्रोफ़ेसर साहब अउर हमरे बीच कोइ केमिस्ट्री जरूर रहा होगा, नहीं त दूसरा कोई हमरा जवाब सुनने के बाद हमको यूनिवर्सिटी के गेट के बाहर फेंक देता!