सोमवार, 16 अगस्त 2010

अरे, हम भी सम्बेदनसील हो गए!

आज सबेरे सबेरे ऑफिस के लिए घर से निकलबे किए थे कि गेट पर नयनसुख जी भेंटा गए. अब उनका नाम का है, ई त हम कभी पूछबे नहीं किए, लेकिन हम उनको नयनसुख कहते हैं. काहे कि एकदम ओही टाइप के आदमी हैं. आसमान खुला देखेंगे त कहेंगे, लगता है आज धूप निकलेगी. अभी देखिएगा, हम ऑफिस जा रहे हैं त पूछेंगे कि कहाँ चल दिए.

हम सोचिए रहे थे कि हमरे बिचार पर उनका सवाल का ढेला गिरा, “और वर्मा जी! कहाँ चल दिए?”

“भाई साहब! मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक.”

एतना बोलना था कि बाबू नयनसुख परसाद एक दम हत्थे से कबड़ गए, “यही खराबी है आप बुद्धिजीवी लोगों में. खुद को प्रगतिशील बताने के लिए साम्प्रदायिक एकता के नाम पर मुसलमानों की हिमायत शुरू कर देते हैं. आप को कोई और बात नहीं मिली थी कहने को?”

“अजीब बात करते हैं आप. खादी का कुर्ता, पजामा, झोला लटकाए आप घूमिए. बाल बिखराकर, बिना पावर का काला फ्रेम का मोटा चश्मा लगाकर आप घूमिए. झोला में दिन भर पुराना अखबार लिए आप टहलिए और बुद्धिजीवी हम! अऊर हम अईसा का जुलुम बात बोल दिए हैं, जो आप एतना अलबला रहे हैं.”

“ये तो हमारा काम है. आप कौन होते हैं इस भाईचारे पर बोलने वाले.”

“ठीक है आप ही बोलिए न भाई. एहाँ लड़ कऊन रहा है, जो आप भाई चारा पर भासन देने के लिए परेसान हैं. हम त एगो मोहावरा बोले थे, आप ओकरो अंदर धार्मिक भावना अऊर एकता खोज लिए त हम का करें. पूछिए जऊन आदमी बोलिस था ई मोहावरा उससे कि काहे नहीं बोला कि पंडित की दौड़ मंदिर तक.”

अब ऊ तनी नरमा गए. बोले “वर्मा जी! मैं सम्वेदनशील आदमी हूँ. इन बातों से मेरे अंदर की सम्वेदनाएँ सुगबुगाने लगती हैं. मुझे पता है कि आप भी मेरी तरह सम्वेदनशील हैं. इसलिए आप ऐसा सोच लेते हैं.”

हमरे पास बहस का टाइम नहीं था..काहे कि अगर 9:24 का मेट्रो छूट गया त ऑफिस देरी से पहुँचेंगे अऊर तब बॉस हमरे सम्वेदना को भर दिन का वेदना में बदल देगा.

ऑफिस में हमरे अगवानी में एगो कनसल्टेंट साहब बईठे हुए थे. हमको देखते उठ कर खड़ा हो गए. हम बोले, “अरे बइठे रहिए अमित जी! हम आपका कुर्सी पर नहिंए न बईठेंगे, जो आप उठ गए. हमरा त कुर्सिया खालिए है.”

“सर ! आप भी बहुत अच्छा मजाक कर लेते हैं.”

“आप भी का मतलब का हुआ अमित जी. अभी त खाली हम ही मजाक किए हैं.”

“सर जी! आप मजाक करेंगे तो हमारे प्रोपोजल का क्या होगा.”

“ऊ सब त होइए जाएगा. बाकी आप हमरा बत को एतना सीरियसली काहे ले लिए. हम त बस आपका रिऐक्सन देख रहे थे.”

“वर्मा जी! मैं बड़ा इमोशनल आदमी हूँ. और मुझे पता है कि आप भी मेरी तरह सम्बेदनसील आदमी हैं.”

“ओफ्फोह!! अमित जी, आप के साथ हमरा सम्बंध तनी बढिया बन गया है, इसलिए बोलने में नहीं बन रहा है. नहीं तइसका हम दोसरा जवाब देते. बाकी समझ में नहीं आ रहा है, आज सबेरे से आप दूसरा आदमी मिले हैं, जो हमको बोला है कि हम उसके जइसा सम्बेदनसील हैं. अरे भाई, हम पैदाइसी सम्बेदनसील हैं, हमरे पिता जी, दादा जी तक एमोसनल थे.”

“वर्मा जी! एक बात कहूँ. इतना एमोशनल होना ठीक नहीं. बहुत तकलीफ होती है.”

“अमित बाबू! हमरे दादा जी पोस्ट ऑफिस गए थे कोनो काम से अऊर ओहीं उनका हार्ट फेल हो गया. हमरे पिता जी भी कोनो तकलीफ झेलकर नहीं मरे थे. अऊर हमरा उमर भी पचास हो गया, कोनो तकलीफ त नहिंए बुझाता है, ई सम्बेदना के कारन.”

खैर बात खतम हो गया या कहिए हम लोग घुमा दिए, लेकिन हमरे मन में सम्बेदना का खेला चल रहा था. हमरा सम्बेदना जरूर छोटा मोटा टाइप का होगा तबे तकलीफ नहीं होता है हमको. नहीं त बड़ा सम्बेदना वाला आदमी जब कहता है कि दुःख होता है इसके कारन, त होबे करता होगा. एतना लोग झूठ त नहिंए बोलेगा.

सोचे उधार माँग कर दू चार रोज के लिए देखें, होता का है ई बड़ा सम्बेदना अऊर केतना दुःख देता है. पाइरेटेड मिल जाता त नेहरू प्लेस से चाहे गफ्फार मार्केट से ले आते. कट, कॉपी भी त नहीं होता है… होता त जहाँ कोनो बहुत सम्बेदनसील आदमी मिलता, उससे कॉपी कर लेते,चाहे उसका कट करके पेस्ट कर लेते. एही बहाने उसका दुःख तनी हल्का हो जाता उसका सॉफ़्ट दिल का हार्ड डिस्क से. अमित जी चले गए, नहीं त पूछ लेते कि ब्लू टुथ से डाऊनलोड कर सकते हैं कि नहीं.

हमरा मन हमको धिक्कारा. साले सम्बेदना चाहिए त ओरिजिनल नहीं रख सकता है. जरूरी है कि एहाँ ओहाँ से कॉपी करो. एही सब पहचान है छोटा आदमी का. देखो केतना बड़ा बड़ा लोग हैं तुमरे आस पास जो अपना ओरिजिनल सम्बेदना लिए घूम रहे हैं. एही से तुमको दुःख नहीं बुझाता है.

रे मन! हम त खरीदने के लिए तैयार हैं. कोई रोता बच्चा वाला सम्बेदना मिल जाए त हँसाकर नमाज अदा कर लेंगे. एक टिकट में दू खेल, धार्मिक सद्भावना भी अऊर फ्रेस सम्बेदना भी. नहीं त गरीबी वाला दिला दो, आजकल त ई बहुत पॉपुलर भी है... मगर ठहरो,पॉपुलर है इसलिए सब बोलेगा भला मेरी सम्बेदना उसकी सम्बेदना से छोटी कैसे.

कम्बख्त सम्बेदना के चक्कर में त बर्बाद हो गए हम. साम को घर पहुँचे, त दरवाजे पर चैतन्य जी का फोन आ गया, “सलिल भाई! जालंधर से अभी अभी लौटा हूँ. आते ही सबसे पहले आपसे बात करने को फोन मिला दिया.”

“काहे भाई! कोनो आइडिया कुलबुला रहा था गर्भ में?”

“नहीं सर! आपसे बात न हो सारे दिन, तो गूँगा महसूस करने लगता हूँ.”

“चैतन्य भाई! आप भी न, बहुत सम्बेदनसील होते जा रहे हो. किसी दिन आपको भी बहुत तकलीफ होने वाली है.”

“सलिल बाबू! प्यार अपने बच्चे से और फटकार पड़ोसी के बच्चे को. सम्बेदना ने जो ओरिजिनल लिखना सिखाया है, उसका क्रेडिट हम ले रहे हैं, तो उससे मिलने वाले दुःखों को गले क्या आपके पड़ोसी लगाएंगे. कभी ख़ुद का SWOT analysis करके देखो… स्ट्रेंथः सम्बेदना, वीकनेसः सम्बेदना, ऑपोर्चुनिटीज़ः अच्छा मार्केट भविष्य और थ्रेटः बड़ी सम्वेदनाओं वालों से.”

हम दुनो जोर जोर से हँसने लगे. उनका त पता नहीं चला, बाकी हँसते हँसते हमरे आँख में आँसू आने लगा.

बतियाते बतियाते साला हम भी सम्बेदनसील हो गए. मगर दुःख काहे नहीं हुआ!!

34 टिप्‍पणियां:

  1. एही बहाने उसका दुःख तनी हल्का हो जाता उसका सॉफ़्ट दिल का हार्ड डिस्क से. अमित जी चले गए, नहीं त पूछ लेते कि ब्लू टुथ से डाऊनलोड कर सकते हैं कि नहीं

    :) :) ...बहुत बढ़िया व्यंग है इस कट - पेस्ट पर ...

    बाकी सच ही आप बहुत संवेदनशील हैं ...

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  2. संवेदनशील मन किसी गहरे समुद्र-सा होता है। अथाह जलराशि की भांति शांत-चित्त। संवेदनशीलता का अर्थ है-प्रकृति की लयबद्धता से जुड़ाव। इसके बिना सौंदर्य-बोध संभव नहीं।

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  3. ऐसन पनिहा फार मत लिखा करैं हे हो बिहारी बाबू -यी हमहूँ कुछ संवेदनशील मनई हई !

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  4. हा...हा...हा...हा....हा....हा....हा...हा......
    हा...हा...ह...हा.......
    क्या कहें.... हँसते हँसते पेट में दर्द हो रहा है संवेदनशील होने के कारण ...
    चुपचाप लाइन पर आ जाओ ! हर छोटी बात को दिल पर लगा लेते हो ........शुभकामनायें

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  5. आप वाकई में बहुत संवेदशील हैं जी, और इ एक दम ओरिजनल ही बुझाता है!

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  6. काहे कि अगर 9:24 का मेट्रो छूट गया त ऑफिस देरी से पहुँचेंगे अऊर तब बॉस हमरे सम्वेदना को भर दिन का वेदना में बदल देगा.
    :) :)

    आप संवेदनशील तो हैं ही...और संवेदना सिर्फ रोते भटकटैयों की ही थाती तो नहीं.. गुलमोहर के फूलों में भी होती है.
    तो दुःख क्यूँ हो हमेशा?

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  7. संवेदनशीलता पर बढ़िया व्यंग्य.....बधाई

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  8. चच्चाजी, आप त एकदम्मे से हमरे जईसा सम्बेदनसील आदमी हैं... :)

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  9. बड़े भैया इतने संवेदनशील मत होइए वर्ना इस अनामिका का क्या होगा ? :)

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  10. baabuji thik baat che aapne jo likho choko or saanch likhiyon i vaaste thaan ke tyin dhnyvaad . jnaab aapne apne hi andaz men bhut kuch khaas kh diyaa bdhaayi ho. akhtar khan akela kota rajsthan

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  11. हमहूं एतना सेन्टिया गए हैं कि कुच्छो लिखते ही नहीं बन रहा है।
    वैसे ई आलेख ईहो संदेस देता है कि जीवन के संबेदनसील मुद्दों पर सजग और गंभीर रहना बहुते जरूरी है ।

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  12. हमहूं एतना सेन्टिया गए हैं कि कुच्छो लिखते ही नहीं बन रहा है।
    वैसे ई आलेख ईहो संदेस देता है कि जीवन के संबेदनसील मुद्दों पर सजग और गंभीर रहना बहुते जरूरी है ।

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  13. मेरी समझ में संवेदनशील होने का मतलब है सम वेदना महसूस करना। जो महसूस करे वो संवदेनशील होगा ही। जिस दिन आप महसूसना बंद कर देंगे उस दिन शील भी चला जाएगा। इसलिए जारी रखिए। लोगों के कहे मत आइए। अब आपकी वेदना हम भी महसूस करते हैं।

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  14. जाने भी दो वर्मा जी, नाहक ये दिल मांगे 'मोर' (संवेदना) के चक्कर में क्यों पड़ते हो? बस अपनी संवेदना जैसी भी है , छोटी या बड़ी, बरक़रार रखिये.

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  15. koi kharidar mile t' hamko bhi batawal jai.....thora bech kar haldi namak ka jugar kar leb.

    bahot mitthi sambendsil post.

    pranam swikar ho.

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  16. अरे वाह वर्मा जी , बहुतैइ पते की बात बताई दिए आप तो, हम भी एक पाइरेटेड सम्बेदना ढूढ़इ रहत ! :)

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  18. एतना संबेदना देखे तो हमए तोहार टिप्पणीयां याद हो आई…॥
    एतना सच्चा बयान के लिए!! दुस्यंत कुमार जी याद आ गए
    यह आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
    चेहरे पे इसके चोट का गहरा निशान है.
    अऊर आपका चोट साफ नजर आता है!! आपको धन्यवाद

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  19. Bihari babu!! hamare samvedna ko bhi hamare officer vedna me badal dete hain, kuchh ilaj bataiye na........:)

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  20. संवेदना, ब्लू टूथ से डाउनलोड ???? कीजिये कीजिये और थोडा सा हमें भी भेजिए ! हम भी थोडा छोटा वाला संवेदना रखते है !

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  21. @सोनी बिटियाः
    2जीबी सम्बेदना में से केतना बाँटें!!चाहो त सभे ले लो,अब बच्चा लोग से का बँटवारा करें...
    दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
    या तो सब कुछ ही इसे चाहिए,या कुछ भी नहीं.

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  22. “सर ! आप भी बहुत अच्छा मजाक कर लेते हैं.”
    ..मजाक-मजाक में जिंदगी का फलसफा समझाती पोस्ट.

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  23. बहुत ही बढ़िया व्यंग्य किया है आपने संवेदनशील पर!लाजवाब प्रस्तुती!

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  24. :)
    SWOT analysis करके देखो… स्ट्रेंथः सम्बेदना, वीकनेसः सम्बेदना, ऑपोर्चुनिटीज़ः अच्छा मार्केट भविष्य और थ्रेटः बड़ी सम्वेदनाओं वालों से
    :P

    क्या बात है चचा जी :)

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  25. बहुत ही करारा व्यंग्य ....पर संवेदनशील होने में दुख ही दुख है...जितना दूर रहो उतना अच्छा...लेकिन फिर ये लिखाई भी नहीं हो सकती संवेदनशीलता के बिना...

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  26. संवेदनशिलता पर सुंदर व्यंग्य रचा है आप ने ...सही संकेत किया है आपने कि संवेदनशीलता पर भी प्रतियोगिता शुरु कर शीघ्र ही लोग स्वयं को अधिक से अधिक संवेदनशील होने का दावा करेंगे ।

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  27. जबरदस्त !

    हमहूँ कोशिश करेंगे की संवेदनशील बन जाएँ, सुना है हम जैसे छोटे आदमी का संवेदनशील होना सेहत, समाज और देश के लिए ठीक नहीं है.

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  28. चाचा जी प्रणाम
    राउर लेख बड़ा हे सवेदनशील रहे ...बाकि अईसने २,४ गो सवेदनशील लेख तनि अपने भाषा आपन अंदाज में अपने बीच में भी आशीर्वाद के रूप में दी बड़ा आभार होई राउर

    आपका तरुण आपके भोजपुरी परिवार में www.jaibhojpuri.com में थे दिल से आमंत्रित करता ....आसा बा आप अपन आशीर्वाद जरुर देब हमनी के.....

    http://tarunktiwari.blogspot.com/

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  29. सलिल भैया, आज आप की ये पोस्ट पढ़ी। हमारी तो दुखती रग पर हाथ रख दिया है इस पोस्ट ने। सही है कि हरिद्वार का रास्ता सब बता देते हैं, किराया कोई नहीं देता। तनिक खुलासा तो किये होते कि कौन है संवेदनशीलता का सोल डिस्ट्रीब्यूटर, काहे से कि हम भी सोच रहे हैं कि थोड़े से संवेदनशील हो जायें। एक ठो अर्जी हम भी लगा देते कि हमें भी थोड़ी संवेदनशीलता टांगने की परमीशन दी जाये। बहुतै रोमांटिक सा लग रहा है, जब हम संवेदनशील हो जायेंगे। देश विदेश में धूम मच जायेगी। और अगर किसी को ऐसी आशंका हो कि हम बड़े वाले संवेदनशील मान लिये जायेंगे, तो हलफ़नामा दे देंगे कि हमारी संवेदना छोटी सी है, माल मालकों का है लेकिन मशहूरी कंपनी की। कर्टेसी सोल डिस्ट्रीब्यूटर ऑफ़ संवेदनशीलता, भावुकता, सदभावना, अलाना फ़लाना एटसेट्रा-एटसेट्रा।
    मैं हैरान हूँ कि पहले ये पोस्ट कैसे छूट गई मुझसे?

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  30. संवेदना भी पाईरेटेड खरीदेंगे का चचा ??
    मुफत की मिलती है खरीद लाइए |

    सादर

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  31. बेहद संवेदनशील लेख……क्या सोच है भाई ,मान गये आपको…….

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  32. बहुत ही गहरा शानदार हास्य-व्यंग्य . आपसे ऐसी ही रचनाओं की अपेक्षा रही है . अब भी है इसे हमेशा याद रखिये .

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  33. इसी चीज की तो कमी है दुनिया में – संवेदना और संवेदनशीलता

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