शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

हरि मेहता - दीवानगी नाटक की

केतना उमर होगा हमरा उस समय... एही करीब सोलह सतरह साल. इससे जादा त नहिंए रहा होगा. पुस्पा दी, हमको अपने पास बुलाईं अऊर हमरे सामने टाइप किया हुआ एगो नाटक का स्क्रिप्ट रख दीं. हम पूछे, “दीदी क्या करना है इसका.”
“लिखना है.”
“लिखा तो हुआ है. किनका है.”
“मेहता साहब का.”
“तो फिर क्या लिखना है.”
“पढकर देखो. उनको ना भी नहीं कहा जा सकता और इस स्क्रिप्ट पर रेडियो के लिए नाटक बहुत मुश्किल है.”

अऊर जब पुस्पा दी मोस्किल बोल दीं, तब असम्भवे समझिए. गजब का विजुअलाइजेशन था उनका. स्क्रिप्ट देखते ही बता देतीं थीं कि ई नाटक किया जा सकता है कि नहीं अऊर कऊन कऊन लोग का का रोल करेगा. लेकिन इसको लेकर परेसान देखकर हम पूछे, “जब करना है तो करना है. बोलिए क्या करूँ.”
“तुम लिखो, इसको दुबारा.”
“क्या बात करती हैं. मुझसे नहीं होगा.”
“तो मैं ना कह देती हूँ मेहता साहब को.”

उनको भरोसा था हमरे ऊपर. कभी ई नहीं सोचीं कि कहाँ हम, कहाँ मेहता साहब. खैर, पूरा नाटक हमको दोबारा लिखना पड़ा. सीन ओही, सिक्वेंस ओही, लेकिन समूचा सम्बाद बदलना पड़ा. लिखते टाईम हमको बस एही ख्याल रखना पड़ा कि डायलॉग अईसा लिखा जाए कि मेहता साहब के लिखने का वजन कम नहीं हो.

असली परीक्षा अभी बाकी था. मेहता साहब, हर दिन रिहर्सल देखने आते थे, बीच में गलत बोलने वाले को दुरुस्त करते थे और सीन समझाते थे. पहिला दिन ऊ रिहर्सल पर आए, पुस्पा दी के साथ बईठ गए. पुस्पा दी सीन, डायलॉग समझाती रहीं अऊर मेहता साहब स्क्रिप्ट देखते रहे. रिहर्सल खतम, मगर ऊ कुछ नहीं बोले, चुपचाप देखते रहे. रिहर्सल के बाद हम तीन आदमी रह गए. तब पुस्पा दी बोलीं, “कैसा लगा.”
“एक बात बताओ, ये मेरा प्ले है?”
“आपका ही तो है. शक़ क्योंहो रहा है आपको.”
“शक़ नहीं, लगता तो मेरे जैसा ही है, पर जाने क्यों मेरा है नहीं.”
पुस्पा दी समझ गईं. बोलीं, “ठीक है कि बुरा है ये बताइए?”
“किसने किया है ये सब.”

पुस्पा दी खाली हाथ से हमरे तरफ इसारा कर दीं. मेहता साहब हमरे पास आए अऊर गले लगाकर बोले, “आज से मैं तुम्हें दोस्त कहूँगा.”

मेहता साहब यानि हरि मेहता.बहुत सीनियर आई.एफ.एस.,लालबहादुर शास्त्री प्रशासनिक महाविद्यालय में प्राध्यापक रहे,विदेस में रहे और जब हमसे मिले,तब पटना में सीडीए थे.उनके पिता जी नाटककार थे, बस इसीलिए नाटक का कीड़ा नस नस में था. देस भर में जहाँ भी रहे, वहाँ रेडियो नाटक लिखे, दूरदर्शन अऊर स्टेज के लिए लिखते रहे. सत्येंद्र सरत्, डॉ. बच्चन वगैरह के साथ इनका सम्बंध नाटक को लेकर बना रहा.

अपने पईसा से किताब छपवाते थे नाटक का, अऊर दोस्त लोगों को ऑटोग्राफ करके बाँट देते थे. न प्रसिद्धि का नसा, न पैसा कमाने का. एक बार सिनेमा में अपना गाड़ी सूटिंग के लिए दिए अऊर खुद डम्मी लास बनकर नदी में फेंके जाने का सीन भी करने के लिए तईयार हो गए, काहे कि ऐक्टिंग से लगाव था और ऐक्टिंग के लिए ई भी करना मंजूर था उनको. अब का कहिएगा इसको, पागलपन या जुनून.

सायद पागल थे, काहे कि जेतना सामाजिक आदमी थे मेहता साहब, ओतने अकेला आदमी भी थे. बंधन बिलकुल पसंद नहीं था उनको  किसी भी तरह का. जूता कभी फीता वाला नहीं पहनते थे, हाथ में घड़ी नहीं बाँधते थे, बनियान नहीं पहनते थे और टाई नहीं लगाते थे. कहते थे टाई जब बिलकुल जरूरी हो जाए तबे पहनते थे. और सादी भी नहीं किए. सारा जीबन अबिबाहित रहे.

पाकिट में हमेसा एगो छोटा सा नोटबुक रखते थे. किसी का बात गौर से सुनकर उसको लिख लेते थे, रिक्सा वाला, चाय वाला, बाबू, साहेब सबका का बात करने का ढंग़ नोट करते थे. इसीलिए उनका नाटक का किरदार जिंदगी से उठाया हुआ, पड़ोसी जईसा लगता था. सायरी दिल से करते थे अऊर उसमें उनका दर्द भी झलकता थाः

     कट गई इसलिए दुआ के बग़ैर
     दर्द अल्लाह के बस की बात नहीं.

न मंदिर, न मस्जिद, न पूजा, न पाठ… बस जिंदगी को सही माने में स्टेज समझकर अपना रोल अदा करते गए मेहता साहब.पटना से चले जाने के बाद उनसे बस पुस्पा दी के मार्फत खबर मिलता रहता था अऊर ऊ भी हमरे बारे में पूछते रहते थे.एक दिन पुस्पा दी का फोन आया कि मेहता साहब नहीं रहे.

बहुत गहरा सदमा लगा.नाटक बहुत किए हम जिन्नगी में अऊर हम तो आज भी कहते हैं कि हमको मरने के टाईम भी अगर कोई बोले कि एगो रोल करना है,तो जमराज से छुट्टी माँग के चले जाएँगे. लेकिन मेहता साहब तो बस नाटक को जीते रहे, सोते जागते, उमर भर!

बस कोई दर्द था अंदर जो किसी को नहीं बताए, सायद कोई हमदर्द नहीं मिला. तभी सारे दर्द से मुक्ति पा गए हरि मेहता साहब अऊर यही कहते रहे कि

       दर्द ही दर्द है दुनिया में जहाँ भी देखा
       कोई हमदर्द कहीं, कोई मसीहा मिलता.

27 टिप्‍पणियां:

  1. मार्मिक यादो से भरा संस्मरण लिख डाला आपने. आपके मेहता जी की आत्मा को शांति मिले यही दुआ करते हैं.

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  2. कट गई इसलिए दुआ के बग़ैर
    दर्द अल्लाह के बस की बात नहीं.
    बहुत खूब..

    .मेहता जी की दीवानगी और आपकी ऐसी प्रस्तुति दोनो भा गई..एक भावुक संस्मरण पर जोरदार प्रस्तुति...भोजपुरी शब्दों का सुंदर प्रयोग..

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  3. भावपूर्ण संस्मरण ...मेहता साहब की आत्मा को शांति प्राप्त हो !

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  4. करोगे याद तो हर शै याद आएगी
    वरना जिंदगी है कि कट ही जाएगी
    कामना यही है सबको मेहता साहब जैसी जिंदगी मिले।

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  5. बहुत ही खूबसूरती से लिखा गया संस्मरण...
    दर्द ही दर्द है दुनिया में जहाँ भी देखा
    कोई हमदर्द कहीं, कोई मसीहा मिलता.

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  7. महेता जी को नमन ! आपका आभार उनसे परिचय करवाने के लिए !

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  8. आपके शब्दो की गंगा में हरि मेहता जी को अर्पित यह हद्रय पुष्प एक सच्ची अभिव्यक्ति हैं.
    -चैतन्य

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  9. बहुत शानदार और भावपूर्ण संस्मरण। क्या कहने। खास बात जो मुझे लगी वह यह कि जितना शानदार संस्मरण है उतनी ही खूबसूरती से लिखा गया है। आपको अनेकानेक बधाई।

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  10. अपने संस्मरण के द्वारा मेहता जी से मिलवाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!

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  11. बहुत बढिया संस्मरण लागल। हरी साहब के आत्मा के भगवान शान्ति देय।

    अउर भोजपुरिया कय झन्डा आप बुलन्द रखी।

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  12. आपका ई रचना पढ़ के हमको भी स्वर्गीय मुकेश जी का एगो गीत या आ जाता है-

    हमारे दम से है हर गम

    न होंगे हम तो क्या होगा

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  13. कट गई इसलिए दुआ के बग़ैर
    दर्द अल्लाह के बस की बात नहीं.

    खरी बातें...
    अच्छा लगे मेहता जी को जानना..

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  14. हरि मेहता जी जैसे व्यक्तित्व से परिचय करवाने के लिए आभार । आप कितने भाग्यशाली हैं कि आपको इन जैसे अनेकों कलाकारों का सानिध्य मिला । नैसर्गिक प्रतिभा के साथ-साथ इस तरह का वातावरण मिलने से आपकी प्रतिभा में निश्चित ही निखार आया, जो हमें आपकी इन पोस्ट्स में दिखाई पड़ता है । हरि मेहता जी को सह्रदय से श्रद्धांजलि !

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  15. आपका लेखन शैली चमत्कृत कर गया।
    बड़ा ही संवेदनात्मक संस्मरण।
    इतने महान लोगों का सानोध्य हो तो बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
    श्री हरि मेहता को श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं।

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  16. संस्मरण रोचक भी है और मार्मिक भी ।

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  17. कट गई इसलिए दुआ के बग़ैर
    दर्द अल्लाह के बस की बात नहीं.
    मेहता जी को नमन !

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  18. दर्द ही दर्द है दुनिया में जहाँ भी देखा
    कोई हमदर्द कहीं, कोई मसीहा मिलता ...

    मेहता जी जैसे लोगो ही मिसाल बनते हैं ... लाखों लोगों में अपनी अलग पहचान रहते हैं, अपना रास्ता खुद बनाते हैं और उस पर चलते भी हैं ... मेरी श्रधांजलि है कलाम के ऐसे कर्मठ को ....
    आपने उनको याद रखा ... ये आपका प्यार है कला और कलाम के सिपाहियों के प्रति ....

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  19. इस सुन्दर संस्मरण के लिए साधुवाद.

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  20. दोनों शेर बहुत लाजवाब हैं , दिमाग की नसें हिला दी ||

    सादर

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  21. आपके दूसरे संस्मरणों जैसा ही जीवंत है यह संस्मरण . जीवन में पुष्पा जी और मेहता जी जैसे लोग किस्मतवालों को ही मिलते हैं .

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