शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

भगवान ने चाहा - इंशा अल्लाह!!

हम त कभी सोचबो नहीं किए थे कि देस छोड़कर बिदेस में नौकरी करने का मौका मिलेगा. अऊर जब मौका मिला त हमरे घर में मातम छा गया. कुछ चुना हुआ लोग को हर साल हमरा ऑफिस बिदेस में पोस्टिंग करता है. गलती से हमको भी चुन लिया गया अऊर शारजाह भेजने का खबर आ गया. पटना फोन करके खुसखबरी दिए त मातम छा गया घर में. एक त एतना दिन के लिए बाहर अऊर दोसरा इस्लामी देस में रहना, ऊ भी हमरा जईसा ठेठ साकाहारी आदमी के लिए. हमरी सिरीमती जी त सिया सुकुमारी, राम के साथ बनवास जाने के लिए भी तैयार, बचिया ई सब समझ बूझ से बाहर थी, उसके लिए का कलकत्ता अऊर का शारजाह.
खैर, ओहाँ पहुँचे त काम का रूटीने अलग था. सबेरे आठ बजे से दोपहर बारह बजे तक ऑफिस, फिर साम को चार बजे से नौ बजे रात तक. बीच में आराम से चार घंटा का नींद. साल का 362 दिन काम. लेकिन ई रूटीन में सबसे बड़ा नोकसान हुआ हमरी सिरीमती जी का. सोसल लाईफ त एकदमे खतम. अनजान जगह, अनजान लोग, अनजान भासा (मलयालम हमरी सिरीमती जी को नहीं आता है, अऊर पास पड़ोस में खाली मलयाली लोग रहता था). हमरा भासा सुनने के लिए उनको सारा दिन इंतजार करना पड़ता था. बेटी भी इस्कूल से आधा दिन बादे आती थी.
लेकिन पानी अपना सतह खुदे खोज लेता है. हमरी सिरीमती जी को ई दोस्ती के पानी का सतह तीन घर हिंदुस्तानी छोड़कर, एगो पाकिस्तानी परिवार में मिला. बीच का तीन घर दक्षिन भारतीय मलयाली का था, अऊर ऊ लोग कोई बतियाता भी नहीं था, काहे कि हिंदी नहीं समझता था. पाकिस्तानी परिवार में हमरी सिरीमती जी को उर्दू बोलने वाली सहेली मिल गई. उर्दू त एकदम हिंदिए जईसा भासा है, कोनो दिक्कत नहीं होता है समझने में, हमरी सिरीमती जी का कहना था.
औरत लोग का दोस्ती, फिर बच्चा लोग का दोस्ती, फिर मर्द लोग का दोस्ती. बातचीत, फिर घर आना जाना, फिर बर्थ डे, मैरेज डे, फिर साथ घूमना फिरना. दोस्ती एतना बढ गया कि उनके घर पर पाकिस्तान से आने वाला उनका रिस्तेदार लोग भी हमरे घर आने जाने लगा. बाकी साल भर बाद जो घटना हुआ, ऊ हमरा दिल को छू गया. हमलोग पटना जाने वाले थे. जाने के एक रोज पहिले रात में शह्जादी भाभी हमरे घर आईं, हाथ में एगो झोला था. ऊ झोला में पटना में हमरे माँ के लिए साड़ी, अऊर छोटा भाई की दुलहिन के लिए सूट का कपड़ा था, अऊर बेटा के लिए ड्रेस. साथ में काजू बादाम. हमरे मुँह से त आवाजे नहीं निकला, लेकिन ऊ बोलीं, “भाई जान, पहली बार जा रहे हैं आप लोग. हमारा ज़िक्र किया है आपने घर पर. हमारी तरफ से कुछ सौग़ात नहीं ले गए तो लोग क्या सोचेंगे”. हम कुछ कहिए नहीं पाए, मगर दिल भर गया हम लोगों का. दोसरा दिन जब निकलने लगे घर से तो शहज़ादी भाभी हाथ में क़ुरान पाक लेकर आईं अऊर बोलीं कि क़ुरान पाक के साए में घर से बाहर निकलिए, अल्लाह की हिफ़ाज़त में.
दीवाली के रोज साम को ऑफिस से लौटे त अपना घरे पहिचान में नहीं आ रहा था. हमरे घर का पूरा पर्दा अऊर सोफा का कभर एकदम नया हो गया था. पता चला कि दिन भर बईठ कर शहज़ादी भाभी हमरे घर का पर्दा अऊर कभर सिलाई कर दीं, बोलीं इतना ख़ूबसूरत त्यौहार है और पुराने पर्दे. उनका बच्चा लोग आकर बोला कि आण्टी हम लोगों ने दीवाली सिर्फ हिंदी फिल्मों में देखी है. आपके साथ दीवाली मना सकते हैं हम. अब ई त कोनो मना करने वाला बाते नहीं था. अपने फ्लैट के अंदर में मोमबत्ती जलाकर सबके साथ दीवाली मनाए.
हम त ऑफिसे में ओझराए रहते थे, लेकिन ऊ लोग कहीं भी घूमने जाता था त हमरा परिवार के लोग को साथ ले जाता था. पाकिस्तान से उनका कोई रिस्तेदार आया त हमए घर के लिए सौगात लेकर आता था. दुबई, अबू धबी में उनका जेतना परिवार था सब हम लोग का परिवार जईसा था, हमरी सिरीमती जी के कारन.
आज भी हमरी सिरीमती जी के गला में एक लॉकेट है जिसपर अंगरेजी का अक्षर S बना हुआ है. लोग समझता है कि ऊ हमरा नाम है, लेकिन S का माने है शहज़ादी, उनका सबसे अच्छा दोस्त, लेकिन पाकिस्तानी. अईसने एगो लॉकेट उनके गला में भी है,जिसमें हमरी सिरीमती जी का नाम है.
जब हम लोग लौट कर भारत आए, त अईसा लगा कि हम अपना पूरा परिवार छोड़कर आ रहे हैं. जावेद भाई और शह्ज़ादी भाभी, आज भी फोन करते हैं. लेकिन पाँच मिनट के कॉल में आज भी दू मिनट त ऊ दुनो औरत लोग के रोने में निकल जाता है.
आज भी ऊ लोग एक्के बात बोलता हैं, “भाई जान! अगर हालात सुधर जाएँ, तो एक बार हमारे यहाँ आप ज़रूर तशरीफ़ लाना." हमरा जवाब होता है, " इंशा अल्लाह!” मगर जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तो बस अमन का आसा लिए बैठे हैं,  अऊर मुनव्वर राना साहब का सेर पर बिचार कर रहे हैं:
              सियासत नफ़रतों का ज़ख़्म भरने ही नहीं देती
              जहाँ भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है.

24 टिप्‍पणियां:

  1. एकदम सटीक कहा था मुनव्वर राना साहब ने ...............यह एक कटु सत्य है कि दोनों देशो की आवाम मिलना चाहती है पर यह सियासतदां ऐसा होने नहीं देते!

    बेहद उम्दा पोस्ट ! दिल को छू गयी !

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  2. सारा खेल ह्रदय से जीने और दिमाग से जीने के बीच ही है, सलिल भाई!
    दिल के सामने देश, जात, धर्म आदि का कोई गणित नहीं होता है. मुस्कुराहट आमंत्रण है और आँसू प्रार्थना. खुशनसीब हैं आप दोनों!!

    चैतन्य आलोक

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  3. संवेदना को छूने वाली पोस्ट ... सदा की तरह!
    दिलों को मिलाने में भाषा की भूमिका कितनी अहम् है, यह बताती हुई।

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  4. सियासत के बात किए त एकठो सेर हमहूं मारिए देते हैं

    मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है,

    सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है।

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  5. @Manoj Kumar:
    देखिए मनोज बाबू..पहिला बार आप इंफॉर्मल हुए हैं अऊर सेर भी मारे त मुनव्वर राना साहब का हमरे जईसा..अखिर कलकत्ता का पानिए अईसा है!!
    तीनों कलकतिया एक्के साथ एक जगह!!

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  6. bahut acchee lagee aapkee ye post .relations hamesha reciprocal hote hai tabhee nibh jate hai aatmiyta ho to panap jata hai.......Ye aapka badappan hai ki saree post me shahzadee bhabhee parivar jan kee tareef kee apanee sreemateejee ke guno ko zahir hee nahee hone diya..........:)
    talee thouno hatho se bajtee hai.......
    aapne kuch nahee likha par unke snehee swabhav kee jhalak mil hee gayee........
    aap bahut bhagyshalee hai.......
    sadar aabhar.....

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  7. ई स्नेह भरा संस्मरण (पोस्ट) कितना कुछ समेटे हुए है. सियासत की बात पर हम क्या कहें... यहाँ तो दिलो की दुनिया बसी हुई है... आबाद रहे हर कोई...

    हमको भी बहुत कुछ याद आ गया... हमरे घर अररिया के पड़ोस में जब उनके एक रिश्तेदार पाकिस्तान से पुरे परिवार (बच्चो संग) आये थे, हमारी दोस्ती हुई थी करांची के लड़के से, सांस्कृतिक विचारधाराओं से लेकर मजहबी और सियासी मामले पर कितना कुछ बात हुआ, अंत में एक सहमती बनी, रास्ते आने जाने के लिए हमेशा खुले रहें, दिलो की दुनिया बसी रहे. आज नफरत के सौदागर भारी पर गए हैं सब जगह.

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  8. बहुत सुन्दर पोस्ट...पढते पढते मन भर आया...सच है प्रेम बस प्रेम की भाषा ही जनता है...ना जाति , ना देश ना धर्म...बहुत खुशनसीब हैं जो ऐसे मित्र बने....

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  9. भाईजान आपका लेख अच्छा हैं
    यह दोस्ती और भाईचारे का पैगाम देता है
    अतिउत्तम

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  10. इस आपबीती की एक एक लाइन, हिन्दू मुस्लिम सम्बन्धों पर शक करने वालों के लिए एक सबक है ! मेरा और मेरे कई मित्रों, जिनका सम्बन्ध मुस्लिम परिवारों से है सबका अनुभव इतना ही मीठा है ! मेरा यह विश्वास है कि शक सिर्फ वही करते हैं जो किसी मुस्लिम परिवार को नहीं जानते जो इन परिवारों में उठते बैठते हैं वे इनकी मुहव्वत को अच्छी तरह पहचानते हैं !

    एक बार किसी सफ़ेद दाढ़ी वाले को चचा कह कर, पैरों पर हाथ लगा कर देखिये तो शायद सारी जोड़ घटाने ही उलट जाएँ और हमें यह पछतावा होगा कि हमें इसका पता ही नहीं था ! ये बेइन्तहा प्यार के भूखे हैं, सिर्फ आपको दिल से गले मिलने की देर है !

    मेरे ख़याल से यह लेख मानवीय प्यार के उदाहरणों में सबसे अच्छा लेख माना जाना चाहिए !

    इस सार्थक लेख के लिए आपका हार्दिक आभार !

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  11. बहुत भावमय संस्मरण है। पता नही ये बीच की दिवारें कब टूटेंगी। शुभकामनायें

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  12. बहुत सुन्दर लेख. अब तक अपने बडो से सुनते आये थे की पहले कोई हिंदू मुस्लिम नहीं था..ये तो सब नेताओं के खेल हैं...आज आपकी पोस्ट से सच लगती हैं वो बाते. मन भीग गया ऐसे प्यार -व्यवहार को पढ़ कर.

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  13. क्या दिवाली और क्या ईद .........
    हर एक इबादतगाह में एक वो ही तो बसता है , बस हम ही है जो फर्क किए जाते है !!!
    हिन्दुस्तान के कई लोग आज भी पकिस्तान के लोगो से जुड़े हुए है लेकिन चाह कर भी उनकी मिलने की इक्छा पूरी नहीं हो पाती ! हमारे पड़ोस में भी एक अख्तर अंकल अपने परिवार के साथ रहते है वो अपनी शादी के बाद से यहीं है और अब वापस पकिस्तान नहीं जाना चाहते हालाँकि उनके सभी करीबी रिश्तेदार पकिस्तान में ही रहते है ! और अब उन्हें ना सिर्फ अपने करीबियों बल्कि अपने माता पिता से मिले भी सालो बीत जाते है ! पता नहीं ये सियासत का गन्दा खेल कब ख़त्म होगा !

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  14. अरे आप शारजाह रह कर चले भी गये और हम मिल भी न सके .... बहुत अफ़सोस हो रहा है ... अगली बार आप आएँ तो ज़रूर लिखें .... आपका प्रसंग पढ़ कर अच्छा लगा ... बाहर रह कर अक्सर ऐसी यादें जीवन भर के लिए क़ैद हो जाती हैं ...

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  15. itna meetha...pahli baar aaya hun, behad sukoon hua.
    man bhar aaya, shukriya kahe bina nahi raha jaayega..aapka bahut aabhar aisa pak likhne ke liye

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  16. ऐसा ही होता है साहब। पहले तो घर वाले बेटी का विवाह कर देना चाहते हैं पर जब बेटी घर से जाने लगती है तो रोने लगते हैं। वैसा ही आपके साथ भी हुआ होगा। बहुत अच्छी तरह से लिखा गया है। एक बार फिर से बढिय़ा लेखन के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें।

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  17. यह आलेख दिल को छू गया....... ! पढ़ते वक़्त स्तर वन का पुराना धारावाहिक "लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल...." जहन में चलता रहा....... लेकीन आपका संस्मरण कुछ अधिक ही मार्मिक और हृदयग्राही है !!! धन्यवाद !!!! सच में जज़्बात-ओ-मोहब्बत पर किसी सरहद का अख्तियार नहीं........ ये किसी तहजीब-ओ-तालीम के भी मोहताज़ नहीं !

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  18. दिल के रिश्ते सरहदों से कहीं बढ़कर होते हैं । आपका यह संस्मरण दिलों की खूबसूरती का सुंदर उदाहरण है ।

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  19. हमको कुछ अच्छा टिपण्णी करने नहीं आता चाचा, इसलिए बुरा मत मानियेगा,
    लेकिन वही कहेंगे जो हम कहते हैं हर पोस्ट में, बहुत अच्छा लगा..बीच में वो गिफ्ट वाली बात पे सेंटीमेंटल भी हो गए हम

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  20. आपका संस्मरण दिल को छू गया. मैं तक़रीबन 2.5 वर्ष दक्षिण कोरिया में रहा था, वहां मेरे बहुत से भारतीय पंजाबी और पाकिस्तानी दोस्त बने थे, उन दो वर्षो का अनुभव आज भी दिल में कसक पैदा करता है. जब भी कोरिया जाता हूँ उनसे अवश्य मिलता हूँ.

    वैसे मेरा तो आधा परिवार पाकिस्तान में है. मेरे नाना और मौसी क्रमश: रावल पिंडी और लाहौर में रहते हैं. दुःख होता है सियासत और धर्म के तथाकथित ठेकेदारों का रवैया देख कर. इंसानों को कुछ रेखाओं ने बाँट दिया है.

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  21. लेकिन चाह कर भी नाना जी के बुढ़ापे में भी उन्हें देखने हाल-चाल मालूम करने वहां नहीं जा सकता हूँ. कैसी विवशता है.

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  22. इस बार भी गुलजार साहब से अच्छा किसी का कविता हमको याद नहीं आ रहा डालने के लिए और उनका पिछले पोस्ट में डाले थे तो अपना ही डाल देते हैं -

    आज भी घर से निकल , कुछ छोटे बच्चे
    आवाज सरहद पार शायद दे रहे हैं ,
    आज भी सब साथ ही खेलेंगे कंचे ,
    लकीरों को पार करते दिख रहे हैं ,
    सरहदें हैं बीच में उनको फरक क्या ,
    आज भी सब एक जैसे लग रहे हैं ,
    हम भी लकीरों पर ही अब बैठा करेंगे ,
    किस तरफ के हैं बता दें , फिर लकीरें ||
    .
    हमको अंदाजा है कि आपको अच्छा नहीं लगा होगा , लेकिन ई हमरी कविता का छोटा सा हिस्सा है , बच्चे का अपूर्ण प्रयास समझ कर स्वीकार कीजियेगा |

    सादर

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