शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

गाली का आनंद!!

लगता है, अभी तक जो इज्जत आप लोग के बीच हम कमाएँ हैं, ऊ ई पोस्ट का सीर्सक देखकर मट्टी में मिल जाने वाला है. लेकिन हम भी त अपना दिमाग से मजबूर हैं. हमरे नजदीकी दोस्त लोग को मालूम है कि हमरे दिमाग में जब प्रसव पीड़ा होता है, त जब तक प्रसव न हो जाए, तब तक हम परेसान रहते हैं. अऊर प्रसव के बाद त बच्चा जईसा हो, हमरा है… परवाह भी नहीं करते कि बच्चा सुंदर है कि बदसूरत, काहे कि बच्चा त बच्चा होता है, अपना सरीर का हिस्सा. बदसूरत होगा त काट के फेंक त नहिंए देगा कोई. इसीलिए ई बचवा का नाम देखकर मत भाग जाइएगा, तनी रुककर मुँहो देख लीजिएगा.

गाली सभ्य समाज में बर्जित माना जाता है. लेकिन जगह अऊर लोग के हिसाब से गाली भी हमलोग का जिन्नगी में अईसा घुल मिल गया है कि आम बात चीत का हिस्सा लगने लगने लगता है. कलकत्ता में साला सब्द बहुत धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है. दिल्ली का लोग त घरवो में ऊ गाली बोल कर बतियाता है, जो हम लोग बाहरो बोलें त जीभ कट जाए. कमीना त आजकल लोग प्यार से भी बोलता है.

लेकिन कभी सुने हैं कि घर पर न्यौता देकर लोग बाग को बोलाइए, आदर सत्कार कीजिए, उनको प्रेम से बईठाइए, खाना परसिए अऊर जब खाना सुरू करें त जम के गारिआइए. अरे! झूठ नहीं बोल रहे हैं हम, पूरा घर भर मिलकर गाली बकता है, चुन चुन कर, एक एक आदमी को, उसका नाम ले लेकर. अगर सचो अईसा होता है, त आप सोचिएगा कि मारा पीटी हो जाता होगा. लोग खाना छोड़कर भाग जाता होगा.

लेकिन अईसा नहीं होता है. लोग बहुत प्यार से खाता है, अऊर गाली का आनंद भी लेता है… ऐसे काहे देख रहे हैं हमको, पगलाए नहीं हैं हम. ई बिहार अऊर उत्तर परदेस का घर घर में होता है. अऊर गाली का ई परम्परा, बड़ा छोटा, ऊँच नीच, अमीर गरीब का भेद भाव के बिना पालन किया जाता है. बिहार के हर सादी में लड़का वाला लोग जब बरात लेकर लड़की के दरवाजा पर जाता है, त दुल्हा को छोड़कर, सब को गाली सुनने को मिलता है, लड़की वाला के तरफ से. जहाँ एक तरफ बूढ़ पुरनियाँ लोग मसगूल रहती हैं गीत गाने में कि
                  पुरबा पछिमवा से अईलें सुंदर दुल्हा
                  जुड़ावे लगिलन हे! सासू अपने नयनवा!!
वहीं जवान लड़की लोग छोटा-छोटा बच्चा को फुसलाकर उनके चाचा, फूफा, मौसा, मामा, भाई लोग का नाम पूछने में बिजी रहती हैं. नाम पता लगाकर, सब नाम औरत लोग के हवाले. गाली देने वाला लोग का नेट्वर्क एतना तगड़ा है कि पूछिए मत. दू मिनट में लड़का वाला का पूरा कुटुम पुरान लड़की वाला के पास पहुँच जाता है.

अब जब खाने का टाईम आया, तब फायरिंग सुरू. औरत लोग अईसा अईसा गाली का गोली दागती हैं कि पूछिए मत. सब लोग का नाम त पते रहता है, बस फलनवा की बहिनी भाग गई फलनवा के साथ. कोई भी नहीं बचता है ई गाली से. जिस जिस आदमी का नाम आता है, उसका हँसते हँसते बुरा हाल हो जाता है, लेकिन कोई बुरा नहीं मानता.

केतना बार लड़का वाला लोग चलाकी से अपना सही नाम नहीं बताकर लड़कीए वाला पार्टी का नाम बता देता है. बस गाली चालू होते ही सब लोग ठठाकर हँस देता है, तब पता चलता है कि अपने अदमिया को गाली दिया जा रहा था.

ई गाली में एतना प्यार छिपा होता है कि पूछिए मत. गाली से संबंध मधुर होने का ई एकमात्र उदाहरन है. ई गाली का सबसे मधुर उदाहरन एगो रामलीला का है,जो हमरी माता जी सुनाती थीं.रामचंद्र जी जब सादी के लिए जनकपुर गए, त ओहाँ सीता जी के घर की औरत लोग राम जी से बोलीं, “ कमाल है आप के अजोध्या में. जनकपुर में त बहुत सा कुमारा लोग है, अऊर आपके पिताजी को तीन तीन रानी हैं. एगो इधरो भेजवा दीजिए. कुमारा का कल्यान हो जाएगा.”

इसी बात को हिंदी फिलिम के बिबाह इस्पेस्लिस्ट राजश्री फिलिम्स वाला लोग एगो सिनेमा में गाना में कहा था, "बता द बबुनी, लोगवा देत काहे गारी". आवाज सारदा सिन्हा का जिसमें बिहार के माटी का महँक है, जहाँ गाली बकने से ज्यादा, गाली सुनने वाला आनंद लेता है.

28 टिप्‍पणियां:

  1. दोनो पक्षों के मध्‍य झिझक समाप्‍त करने के लिए विवाह में गाली की प्रथा शुरू हुई होगी .. इसलिए लोग इसका आनंद लेते हैं !!

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  2. सर जी जब सुमन जी ने nice लिख दिया है तो आगे.. का कहिन ... बहुत बढ़िया ..

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  3. बहुत बढ़िया सलिल भाई !
    आज खूब समां बंधा है आपने ! मेरे मामा जी के लड़के की शादी में खूब गालियाँ पड़ी थी हम लोगो को और आपने सच कहा, बुरा किसी ने नहीं माना बल्कि खूब मज़ा लिया गया इस परंपरा का !!

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  4. सलिल जी का बताएं ई पढ के एक ठो बियाह अटेंड किए रहे ऊ में सुना गारी इयाद आ गया
    बरियतिया सब बिटंडी जका
    ओकर पेट हंडी जका।

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    10.07.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल करने के लिए इसका लिंक लिया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  6. हा हा , शानदार चाचा :) मस्त
    पता है, हम भी शादी में जब सुनते हैं की सब को गरियाया जाता है, तो खूब हंसी भी आता है :)

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  7. सलिलजी
    आप मेरे ब्लाग पर प्रायः आते रहे हैं
    आपके प्रोत्साहन से मैं अभिभूत भी हुआ हूं
    आपके बतियाने के अन्दाज में एक आत्मीयता लगती है. बड़ा अच्छा लगता है
    आपका परिचय भी पढ़ा उसने तो और ज्यादा गदगद कर दिया.
    आपको अच्छा लिखने से कोई इसलिए भी नहीं रोक पाएगा क्योंकि आप दिल से लिखते हैं
    और दिल से लिखने वाले लोग सीधे दिल पर उतरते हैं
    क्षमा करिएगा आपसे अनुमति लिए बगैर आपको अपने दिल में एक प्लाट हमने दिल डाला है.
    आप सोच रहे होंगे कि क्या हम प्लाट बेचने का धंधा करते हैं..
    नहीं साहब दिल काफी बड़ा.. जो कालोनी मैं वहां बनाने जहां जा रहा हूं वहां सिर्फ और सिर्फ अच्छे लोगों को ठौर मिल पाएगा.
    आप स्नेह बनाए रखें
    आपसे उम्र में छोटा हूं इसलिए सुझाव की भी जरूरत होगी.

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  8. वही तो कहूं की बिहारी बाबू की पोस्ट और गाली की चर्चा नहीं..!
    उम्दा पोस्ट लिखने के लिए आभार.
    हमारे बनारस में भी लोग हर वाक्य में एक गाली घुसेड़ने की कला जानते हैं ..दो बनारसी अगर प्रेम से बतिया रहे हों तो एक घंटे में एक हजार गाली सुनने को मिल सकती है. आप समझेंगे की वो झगड़ रहे हैं जबकी उनके प्रेम में उत्तरोत्तर विकास हो रहा होता है.

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  9. सलिल जी,
    बहुत सुन्दर मीमांसा करते हैं आप.
    आपकी टिपण्णी का ह्रदय से धन्यवाद, किन्तु मुझमे ऐसा कुछ भी विशेष नहीं.

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  10. नमस्ते बाबूजी,
    इस प्रथा के बारे में मैंने भी सुना है लेकिन देखा नहीं है अब शायद हमारे घर में ऐसा नहीं होता पर पहले शायद होता था ! एनडीटीवी इमेजिन पर एक शो आता था "जमुनिया" उसमे जमुनिया की शादी में ये देखा था ! जैसे ही सभी लड़के वाले खाने बैठे तो औरतो ने गलियों की बोछार शुरू कर दी थी ! तब मम्मी से पता चला था इस प्रथा के बारे में !
    और बाबूजी हमारी पोस्ट पर आपके कमेन्ट का जवाब पहुच गया है !

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  11. बहुत खूब सलिल भाई!
    कुछ तो है! अपने इस भारत की मिट्टी में जो इतनी निराली परम्परायें अभी तक सहेजी जाती हैं...जहां इंडिया में गाली अपमान का पर्याय भर है वहां भारत में इन्हे हँसी ठिठोली के रूप में भी जब तब उपयोग कर लिया जाता है...
    बरसाने की लठ्ठ मार होली भी प्रेम का ऐसा विरोधाभासी सा लगने वाल प्रीतिकर रूप प्रस्तुत करती है..

    प्रेम !
    चैतन्य

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  12. अहहहाहा...अईसा प्रेम से कोई गाली देगा तो कौन नहीं खायेगा...जिस गाली से प्रेम टपके उसका क्या कहना...बहुत जोर बात बताये हैं आप...
    नीरज

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  13. राम जी से पूछें जनकपुर की नारी
    बता दे बबुआ ,बबुआ देत काहे गारी

    इसका आनंद तो अलग ही होता है।

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  14. बड़ी पुरानी याद दिला दी आपने , आनंद आ गया ...इन गालियों में वाकई बहुत प्यार होता था ...गाली खा कर धन्य होते थे अगर अपना नाम छुट जाता तो बड़ा खराब लगता था ! :-) भारतीय ग्रामीण संस्कृति के मोहक यादों को अपनी रचना में शामिल करने के लिए शुभकामनायें !

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  15. rajasthan me bhee ye pratha thee .samadhee log jaise hee dwar par aate the chun chun kar ghar ke har rishtedaar ko geeto me gagakar sunaaee jatee thee galiya........pr ab ye khatam ho rahee hai pratha.........

    mere pati bata rahe the ki 65 me jab unhone IIT kanpur join kiya us samay tho hostelo ke beech galee competition hota tha jo jyada innovative galiya deta tha vo hee vijayee ghoshit hota tha.......
    Raat bhar ye silsila chalta rahta tha......
    vaise ise mamle me ye peeche hee hai.....
    kabhee inke muh se koi gaalee ine 37 varsho me sunne ko nahee milee .
    krodh kee charam seema jub hotee hai jaise kisee ko galat turn lete dekhte hai ya signal todte dekhte hai to
    FUNNY FELLOW .isse aage nahee badte......
    aapkee post badee rochak rahee.

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  16. परम्पराएँ बहुत कुछ कहती हैं ...प्यार से दी गई इन गालियों को इस पोस्ट के माध्यम से जीवंत करने के लिए आभार...

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  17. मजा आ गया.. लगा जैसे किसी शादी में ही गए हुए हैं.. :)

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  18. तो बिहारी ब‍बुआ जब अपनी तशरीफ की टुकनिया लेकें हमाए दुआरे के गुलमोहर तरे धमक ही गए तो फिर हमखों भी तो आने ही पड़ो न। बबुआ जो गारी पुरान हमाए इते सो होत रओ।माने की बुंदेलखंड में, बघेलखंड,मालवा में और माने समपूरन मध्‍यप्रदेश भर में। अभईं भी होत है। और हमने भी गारी खाईं हैं मुतकी। कायसें कि बिन्‍ना गारी खाए बिना ब्‍याह करवे में मजा नहीं आऊत ।
    सो बबुआ हम भी दो चार गारी देके ही टरेंगे। चलो आगे काजें बचा लेते हैं। काय सें कि कभऊं तो गारी को मोको परेगो ही।
    (शुक्रिया मियां कि आप तशरीफ लाए। पैदाइशी बुदेलखंडी हूं। इतनी भाषा अपनी दादी से ही सीख पाया सो बस वही लिख मारी। अब अगर गाली भी लगे तो कोई बात नहीं क्‍योंकि गालियों की चर्चा हो रही है। वैसे गाली का अपना एक समाजशास्‍त्र और मनोविज्ञान भी है। वह हमारा तनाव कम करती है। खैर यह गंभीर विमर्श का विषय है।)

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  19. गाली न हुई रंगों की पिचकारी हो गई, भीग कर तरबतर होने का अलग ही मजा!!

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  20. हरयाणा में भी इस प्रथा का चलन है जी.

    एक प्रार्थना है कुछ हिंदी में लिखे तो बेहतर होगा..

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  21. @अनमिका की सदाएँ:
    बहन अनामिका,
    मैंने पहले भी कहा था कि इस ब्लॉग की भाषा मूलतः हिंदी ही है, ऐसी हिंदी जो आम तौर पर बिहार की सारी भाषाएँ बोलने वाले लोग बोलते हैं. वस्तुतः यहाँ प्रकाशित सारी पोस्ट बोली में हैं और मैंने लोगों से बात करते हुए संवाद स्थापित करने कि चेष्टा की है... यही इस ब्लॉग की विषेशता है. मेरा प्रयास रहा है कि स्थानीय शब्दों का प्रयोग अल्पतम हो ताकि समस्त पाठक समाज तक इसकी पहुँच हो... आपने लक्ष्य किया होगा कि मेरी सारी कविताएँ हिंदी में ही हैं.
    फिर भी आपका सुझाव सम्मान सहित स्वीकार करते हुए आपको विश्वास दिलाता हूँ कि इसे और सरल करने कि चेष्टा करूँगा… बिल्कुल छोड़ देना इस ब्लॉग के शरीर से आत्मा निकाल लेने जैसा होगा.

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  22. प्यार मे तो सब कुछ अच्छा लगता है। पर गाली खाने वाले की नज़र उदार हो वर्ना लेने के देने पड जाते हैं। अच्छी पोस्ट है धन्यवाद।

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  23. सही कह रहे हैं आप .... कभी कभी कुछ ख़ास दोस्तों को जब तक गाली ना दो वो समझते ही नही है "..." .....

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  24. अरे महराज,
    किला हिला दिए.... ! सच्चे में.... एगो-एगो बराती आँख के अआगे नाच गया... ! मुकुंद भाई के बरियाती गए रहे मनिकौली.... उहाँ इहे जोगार लगाए. उ का था कि उनका लग्नपत्रिका का स्वीकृति हमहि लिखे थे... सो उस साइड का नाम सब जुबानिये याद था.... बस रोकी और रिशु को सिखा दिए... उ भूत जैसे बक दिया ! भातखाई बेला.... 'पेट हंडी जेना मुँह अंडी जेना.... तो हमलोग सुने मगर उके बाद जैसे ही नोमिनेटेद गाली शुरू हुआ... कि समझिये 'त्वदीयं वस्तु गोविन्दम.... तुभ्यमेव समर्पयेत.... !!' बरियात-सरियात में जो हंसी बजरा कि पूछिये मत! फेर फूल मामा कहिन कि ओह ई में मजा नहीं आया.... सब का असली नाम बताया गया तब जा के सेकेण्ड राउंड शुरू हुआ.... ....... की......... चने के खेत में !!! लेकिन अपने मिथिलांचल की एगो खासियत है, इहाँ गालियों देते हैं तो इतना परेम से कि.... मन लोभा जाए !! आप तो भूले-बिसरे दिन याद करवा दिए !!!!

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  25. चचा , हालाँकि ए परम्परा अब बहुत हद तक खतम हुई चुकी है लेकिन हमारी खुसकिस्मती है कि हमने इहका स्वाद चखा है , अब परीक्षा मत लीजियेगा , कहे कि हम को ज्यादा कुछ याद नहीं है , बहुत छोटे थे हम |
    लेकिन गर्व से कहते हैं कि नयी फसल के सुद्ध मसालों (नए युवाओं) में बहुत कम ही हैं जिन्होंने इहका स्वाद चखा है और "हम उनमे से एक हैं" :)

    सादर

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