रविवार, 25 नवंबर 2012

इबादत: एक नाट्य-रूपांतर


जेफरी आर्चर का एगो कहानी संकलन है जिसका नाम है “ट्विस्ट इन द टेल” माने कहानी में पेंच! ई बात त मुहावरा के तरह इस्तेमाल होने लगा है अऊर खासकर फ़िल्मी दुनिया में त बिना इसके कोनो कहानी बन ही नहीं सकता. कहानी में कोनो न कोनो पेंच होना ही चाहिए, चाहे बचपन का बिछडा हुआ भाई का पेंच, चाहे पैदा होते ही बदला गया बच्चा का पेंच, चाहे पति/पत्नी के मरकर अचानक ज़िंदा सामने आ जाने का पेंच! पेंच नहीं त कहानी नहीं. मगर कोनो घटना को पेंच बनाकर कहानी लिखने वाले कथाकार के बारे में कभी सोचे हैं! ऐसा पेंच जो कहानी के अंत में अचानक आपके सामने आता है अऊर आपको एकदम अबाक कर देता है. आँख से आंसू निकलने लगता है कभी कभी. अइसा कहानी लिखने वाले महान कथाकार हैं ओ. हेनरी! उनका कहानी The last leaf, Gift of Magi, A service of love या Green Door एही बात को साबित करता है.

हमारे बेटा अनुभव प्रिय को ई जिद था कि उनको ओ. हेनरी के एगो कहानी को नाटक में रूपांतरित करना है और उसको अपनी बुआ अर्चना चावजी के साथ नाटक के रूप में पॉडकास्ट करना है. एही नहीं हमको भी गेस्ट अपीयरेंस करना होगा. खैर सबकुछ ओही किया अऊर उसका मेहनत और बुआ-भतीजा के अभिनय से सजा हुआ नाटक को जब ठाकुर पद्म सिंह जी ने पार्श्व-संगीत से सजा दिया त नाटक जीवंत हो उठा.

हम अभी कुछ नहीं कहेंगे, बस एतना कि ई नाटक आप इहाँ पढ़ सकते हैं और “मेरे मन की” पर सुन सकते हैं. मगर सुनिए ज़रूर थोड़ा समय निकालकर. हम वादा करते हैं कि द मेकिंग ऑफ इबादत’ लेकर जल्दिये हाजिर होंगे! तब तक के लिए... मजा लीजिए एगो बेहतरीन कहानी का और चार अलग-अलग सहर में रह रहे लोग के सम्मिलित प्रयास का.



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कथा: ओ. हेनरी की A Service of Love

पटकथा व संवाद: अनुभव प्रिय

संवाद-संपादन: सलिल वर्मा

पार्श्व-संगीत संयोजन: ठाकुर पद्म सिंह

पात्र – परिचय

(जिस क्रम में वे नाटक में प्रकट होते हैं)

मकान मालिक: सलिल वर्मा
नलिनी: अर्चना चावजी
अभिनव: अनुभव प्रिय



(कमरे की चौखट पर गुस्से में चिल्लाता हुआ मकान-मालिक किराए की माँग कर रहा है और नलिनी घर के काम के बीच हाँफती हुई जवाब देती जा रही है, कुछ खीझती और कुछ झल्लाती हुई)

मकानमालिक: (चीखकर) समझी कि नहीं? हम कह देते हैं हाँ? जनाब चित्तरकार हैं और आप मैडम, गायिका हैं ना?!..हँ! बाकी देखिए, एक बात कान खोलकर सुन लीजिए, आपलोग का करते हैं और का नहीं, हमको उससे कोई मतलब नहीं है!! हमको हमारा मकान का किराया पहिला तारीख को मिल जाना चाहिए, समझीं मैडम? (रौब से) हम एकदम साफ़ बात करते हैं- बस! पतिदेव आयें तो बता दीजियेगा उनको भी...चलते हैं| अऊर हाँ, एक बात नोट कर लीजिए, अगिला बार हम इहाँ आएँगे नहीं, आप लोग इहाँ से जाएंगे!! जय राम जी की!!

नलिनी: (खिसियानी हँसी हंसते हुए) जी! मैं समझ गयी. आपको शिकायत का मौक़ा नहीं मिलेगा. (उसे जाते
हुए देखती है और कुछ गुस्से और अफसोस के साथ खुद से कहती है) उफ़!!! ये मकान-मालिक भी सिर पर
सवार हो जाता है| मगर क्या करूँ. कुछ भी सही नहीं हो रहा. (गुनगुनाने लगती है)
       न जाने क्यूँ/होता है ये ज़िंदगी के साथ
      अचानक ये मन/ किसी के जाने के बाद
      करे फिर उसकी याद/छोटी छोटी से बात
(गाने के स्वर गुनगुनाते हुए फेड आउट होते हैं. और तभी अभिनव कमरे में प्रवेश करता है)
अभिनव: नलिनी! नलिनी!! ये क्या, तुमने दरवाज़ा खुला छोड़ रखा है! क्या बात है, कोई आया था क्या?  
(दरवाज़े के बंद होने की आवाज़-खटक!)
नलिनी: (‘सब कुछ ठीक हो जाएगा’ वाला भाव लेकर थोड़ा गर्म जोशी से और हंस कर) और कौन आएगा! वही ‘यमराज’ आया था, किराया मांगने, लगता है यमलोक में भी मंदी छाई है!
अभिनव:  ओह! कल ही तो उससे बात की थी मैंने. हद्द करता है (गंभीर और परेशान होकर) अच्छा, तुम्हारे उस इश्तहार का क्या हुआ? कोई जवाब आया??
नलिनी: (सकपकाती सी) इश्श...इश्तहार? अरे हाँ हुआ ना! एक जगह से बुलावा आया था... और मैं तो हो भी आई वहाँ से|
अभिनव: कहाँ से?
नलिनी: हैं एक कर्नल जे. डब्ल्यू. एन. सिंह. (थोड़े जोश से) यहीं, पास में ही रहते हैं. उनकी बेटी को संगीत सिखाना है.
अभिनव: (थोड़ा गुम-सा होकर) क्या नाम बताया तुमने? कर्नल..
नलिनी: जे-डब्ल्यू-एन सिंह! और उनकी बेटी प्रभा | नीलिमा नाम है वैसे, पर घर में सब उसे प्रभा ही बुलाते हैं. अभी-अभी पन्द्रह की हुई है|... जानते हो, बड़ी ही अच्छी लड़की है| शालीन और सुशील...
अभिनव: (थोड़ी चिंता में) पर नलिनी! मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा कि कि मेरी आर्ट् की पढाई के लिए, तुम अपने म्यूजिक का शौक छोडकर, सौ दो सौ रुपयों की ट्यूशन के लिए भाग-दौड़ करो.. तुम भी तो आगे म्यूजिक जारी रखना चाहती थी ना? और अब मेरे लिए तुम..
अभिनव: (गर्मजोशी से) फिर वही बात, अभि! (पास आकार बैठती है) क्या मैं तुम्हारे लिये इतना भी नहीं कर सकती? पत्नी हूँ तुम्हारी! Your better half! और ये सब मैं तुम्हारे बेटरमेंट के लिए ही कर रही हूँ... एक बार पैसे आने लगें तो फिर सारी मुश्किलें खत्म हो जायेंगी... और जानते हो, कर्नल सा’ब मुझे तीन हज़ार देने को राजी हो गए हैं!
अभिनव: तीन हज़ार!!      
नलिनी: हाँ अभिनव हाँ!.. अब ज़्यादा सोचो मत. फिलहाल तुम शंकर पिल्लै की क्लासेज में अपने आर्ट को निखारने पर ध्यान दो... अच्छा जल्दी से हाथ-मुँह धो लो, मैं खाना लगाती हूँ!

(बैकग्राउंड में बजने वाला संगीत अचानक तेज हो जाता है और धीरे धीरे फेड आउट होता है)
अभिनव: नलिनी! (अचानक खुशी से) एक खुशखबरी दूं तुम्हें!! पता है, शंकर सर को मेरी पार्क-वाली पेंटिंग बहुत अच्छी लगी. उनके कहने पर राजेन ने उसे अपनी दूकान के लिए ले लिया है. कहता है वो पेंटिंग तुरत बिक जायेगी. उसके बिकने पर मुझे ज़रूर मिलेगा.. पैसा भी और मौक़ा भी!
नलिनी: (खुशी से) अरे वाह! ये तो बड़ी अच्छी बात है!! कितनी रोटियां दूं?
अभिनव: दो-तीन दे दो... और हाँ! कल सुबह-सुबह ही निकालना होगा मुझे| शंकर सर ने सनराइज़ की पेंटिंग बनाने को कहा है|
नलिनी: सनराइज़? हाउ रोमांटिक!! वैसे मुझे भी कर्नल सा’ब के बंगले पर जाना होगा, कल से ही. उनका घर जानते हो, कित्ता बडा है? बाप रे! और बंगले के आगे लॉन.. और (बीच ही में टोकता है)
अभिनव: ज़िंदगी नें ये कैसी करवट ली है, नलिनी! हमारे सपनों की नाव जैसे मझधार में ही अटक के रह गयी है.. पता नहीं हम उस पार कैसे जायेंगे?
नलिनी: (शान्ति से) अभि तुम भी ना...!! भूल गए.. ‘जो अपने हुनर को चाहता है, उसे ज़िंदगी में कोई रोक नहीं पाता!’
अभिनव: अरे! ये क्या!! बुरे वक़्त ने तुम्हें भी शेरो-शायरी सिखा दी?(दोनों हंसने लगते हैं) ये भी अच्छी बात है|

(संगीत तेज हो जाता है और आहिस्ता आहिस्ता बंद हो जाता है)

नलिनी: आ-ई-ये मेहर-बां..! बैठिये जाने जाँ! (गाते हुए स्वागत करती है अभिनव का)
अभिनव: इस गाने पर तो रुपये लुटाने का जी चाह रहा है!!
नलिनी: (बड़ी खुशी से) अरे-वाह! हज़ार रूपए?
अभिनव: हाँ! और सुनो, उस यमराज को भैसे के चारे के लिए पैसे दे आया हूँ!
नलिनी: मगर ये पैसे आये कहाँ से?? (मुस्कुराती हुई) ओह्हो!! वो पेंटिंग बिक गयी क्या?
अभिनव: ठीक समझी. और जानती हो खरीददार कौन था? जयपुर के राजघराने के एक राजा साहब.. घूमने आए हैं यहाँ.. बस रीझ गए पेंटिंग पर.
नलिनी: (विस्मय से) ‘जयपुर’ के राजघराने से? यकीन नहीं आ रहा!! हे भगवान, तेरा लाख लाख शुक्र है!
अभिनव: खैर, तुम बताओ, तुम्हारा दिन कैसा रहा?
नलिनी: ठीक ही था वैसे तो... लेकिन प्रभा सीख ही नहीं पाती है आसानी से.. और...और ऊपर से उसे सर्दी भी हो गयी है, ऐसे में ना तो वो गा ही पाती है और ना ही प्रैक्टिस कर पाती है|
अभिनव: कोई बात नहीं! अभी बीमार है.. सीख जायेगी धीरे-धीरे|
नलिनी: (एक छोटे से पौज़ के बाद) हे अभिनव!!! कहाँ खो गए तुम!!
अभिनव: हूँ....जानती हो, राजा सा’ब को एक और पेंटिंग चाहिए और वो भी फिर से वही सनराइज़ वाली| (खीज कर) क्या करूँ अब!!
नलिनी: करना क्या है! सुबह सुबह निकल जाना.
अभिनव: सुबह तो निकालना ही पडेगा... सूरज तो सुबह को ही निकलता है|

(सीन चेंज के लिए एक संगीत)

अभिनव: (विस्मय से) ओफ्फोह नलिनी! आज तो बड़ी देर कर दी तुमने? आज तो मैं तुमसे भी पहले (तभी उसकी नज़र नलिनी के हाथ पर बंधी पट्टी पर पडती है) अरे, ये क्या! ये हाथ पर पट्टी क्यों बांधी रखी है? दिखाओ? (हडबडा कर उठता है. कुर्सी के पीछे खिसकने की आवाज़)
नलिनी: (दर्द में है मगर दिखाना नहीं चाहती, हालाँकि छुपा भी नहीं पा रही)
       ओह! कुछ नहीं बस..ऐसे ही.. ठीक हो जाएगा..
अभिनव: उफ़!! आओ यहाँ बैठो! कोई दवाई लगाई है क्या? कैसे लगी ये चोट!
नलिनी: प्रभा के लिए पानी गर्म कर रही थी... उसे सर्दी लग गयी है ना और उस समय घर पर कोई भी नहीं था तो मैंने सोचा मैं ही गर्म कर देती हूँ.. बस गर्म पानी हाथ पर गिर पड़ा..
अभिनव: ओह्हो! नलिनी!! तुम भी ना...
नलिनी: अभिनव, मैं बिलकुल ठीक हूँ! प्रभा को बहुत अफसोस हो रहा था.. उसने तुरत नीचे से ड्राइवर को आवाज़ लगाई और वो ड्राइवर भी देखो ना... बैंडेज की जगह गाड़ी साफ़ करने वाले डस्टर की पट्टी बाँध दी उसने. (हंसते हुए) भला डस्टर की पट्टी बांधता है कोई..??
अभिनव: हाँ क्यों नहीं बांधता. बशर्ते कि वो तुमसे उतना ही प्यार करता हो, जितना मैं.
नलिनी: मैं समझी नहीं!!
अभिनव: (उसकी बात पर ध्यान दिए बिना) सच सच बताओ! तुम दो हफ़्तों से कर क्या रही हो..??
नलिनी: क्या कर रही हूँ? मतलब??
अभिनव: (इत्मिनान से) हाँ, क्या कर रही हो? प्रभा, कर्नल और म्यूजिक ट्यूशन???
नलिनी: अभिनव! मैं..मैं... अब नहीं छुपाऊँगी तुमसे!! दरअसल मेरे इश्तहार का कोई जवाब नहीं आया और मैं ये भी नहीं चाहती थी कि तुम अपनी क्लासेज छोडो... बस मैंने पास की लौंड्री में कपडे आयरन करने की नौकरी कर ली...
अभिनव: और कर्नल जे.डब्ल्यू.एन सिंह और प्रभा ?
नलिनी: (हंसती हुई) कर्नल जे.डब्ल्यू.एन सिंह को नहीं जानते? फिल्म ‘छोटी सी बात’ में अशोक कुमार के किरदार का नाम था.. तुम्हारे सामने कहानी बनाते वक़्त यही नाम सबसे पहले आया और प्रभा, उसी फिल्म की हिरोइन, विद्या सिन्हा का नाम.. (हंसने लगती है)
अभिनव: ( भाव शून्य) और ये हाथ कैसे जला?
नलिनी: (अनमने ढंग से) आयरन करते वक़्त गलती से... (प्यार जताते हुए) तुम नाराज़ तो नहीं हो ना मुझपर? मैं करती ही क्या? बताओ...ये कहानी ना गढी होती तो क्या तुम जयपुर के महाराजा को अपनी पेंटिंग बेच पाते?
अभिनव: वो जयपुर का था ही नहीं|
नलिनी: जहाँ का भी था!.. (अचानक चौंककर) एक मिनट, एक मिनट!! तुम्हें क्यूँ लगा कि मैं प्रभा को म्यूजिक नहीं सिखा रही?
अभिनव: वो प्यार भरी पट्टी!! बैंडेज की जगह डस्टर की. उसी ने समझाया मुझे!! वरना मैं कहाँ समझा था? और शायद समझ भी ना पाता, अगर खुद मैंने ये डस्टर की पट्टी लौंड्री से ऊपर उस लड़की के लिए नहीं भेजी होती जिसने आयरन से अपना हाथ जला लिया था.  
नलिनी: (अति विस्मय से) क्या! तुमने!! और तुम वहाँ कर क्या रहे थे??
अभिनव: मैं पिछले दो हफ़्तों से उसी लौंड्री में कपडे धो रहा हूँ|
(दोनों खूब जोर जोर से हंसने लगते हैं)
अभिनव: (हंस कर) जयपुर के महाराजा, कर्नल जूलियस विल्फ्रेड नागेन्द्रनाथ सिंह और प्रभा... कितनी अजीब कलाकृतियां हैं|
नलिनी: (हंसते हुए) पर ये कला, ना तो संगीत है और ना ही चित्रकारी..
(दोनों मिलकर हँसते हैं)
अभिनव: सच है ना, जब कोई अपने हुनर को चाहता है...
नलिनी: ( हंस कर) अ-अ! यूं कहो कि जब कोई किसी को शिद्दत से चाहता है...


(दोनों की हँसी एक मधुर संगीत में फेड आउट हो जाती है)

शनिवार, 10 नवंबर 2012

चोखेर बाली


गजब का रिस्ता था दुन्नो घर के बीच में. एक तरफ हमरा घर अऊर दोसरा तरफ दिलजान माय का घर. दिलजान माय, माने हमरी दादी की ननद की ननद. पिताजी उनको दिलजान माय और उनके पति को फूफा कहते थे. अजीब बुझाता है सुनकर कि फूआ काहे नहीं कहते थे. बाद में मालूम हुआ कि हमरी दादी की ऊ ‘दिलजान’ थीं, इसीलिये माय की दिलजान, दिलजान माय कहलाती थीं. कभी दादाजी (पिताजी के फूफा, जो ओकील थे) को कचहरी जाने का जल्दी होता था अऊर उनके इहाँ खाना नहीं बना रहता था, त हमरे एहाँ से पूरा बना बनाया भात-दाल उठाकर ले जाती थी. कोई संकोच नहीं. इसको कहते थे दिलजान होने का रिस्ता.

दुनो दादी में रिस्तेदारी से बढकर दोस्ती का रिस्ता था अऊर दुनों एक-दोसरा को दिलजान कहकर बोलाती थीं. ई नाम के बाद न कोई नाम, न कोई रिस्ता, न कोई बड़ा-छोटा का भेद. बस जिसको दिल अऊर जान से अपना लिया ऊ दिलजान हो गया.

एही बात पर आज नारो फुआ का याद आ गया. नारो फुआ का नाम था नर्मदा, मगर पुराना जमाना में लोग प्यार से पुकारने के लिये असली नाम को छोटा कर देते थे. नर्मदा को नारो, राजेश्वर को राजो, सच्चिदानन्द को साचो और ‘देवदास’ के पार्वती को पारो. हमरी नारो फुआ, पिताजी की फुफेरी बहिन थीं. मगर पिताजी की सबसे छोटकी फुआ माने उनकी मौसी उन्हीं के उमर की थीं. दुनो के बीच ‘सखि’ का रिस्ता था. ई रिस्ता के बीच कोई भेद नहीं था कि कऊन मौसी हैं अऊर कऊन बहिन-बेटी. जब भी पुकारती थीं तो सखि कहकर. आस्चर्ज का बात ई था कि कभी गलतियो से ऊ दूनो के मुँह से एक दोसरा के लिये सखि छोड़कर कोनो दोसरा नाम हम नहीं सुने. अइसहीं ऊ टाइम का लोग के बीच पान, फूल, सखी अऊर दिलजान का रिस्ता बनता जाता था.

हमरी दादी अऊर हमरे घर भर की दिलजान माय हमरे पैदा होने के पहिले स्वर्ग सिधार गईं. ऊ लोग का बस खिस्सा सुनते रहे. धीरे-धीरे ई सब बात एतना कॉमन हो गया कि कभी ध्यान भी नहीं जाता था. बचपन बीत गया अऊर जब हम कॉलेज पहुँचे त हमरा एगो दोस्त बना – एस. पी. द्विवेदी. हमरा नाम एस. पी. वर्मा. बस तब्बे से हम दुनो एक दोसरा को 'एस्पी' कहने लगे. अंजाने में हम-दुनो के बीच सखि-दिलजान वाला रिस्ता बन गया. आझो दोस्ती बरकरार है अऊर एस्पी छोड़कर कभी कोनो अऊर नाम से नहीं बोलाये हम लोग एक-दोसरा को. 
अब बाते निकला है त एगो अऊर मजेदार बात बताइये देते हैं. एक रोज हम एस्पी को फोन किये. उधर से आवाज़ आया हैलो.
हम बोले, कौन एस्पी?
जवाब मिला, नहीं सर! हम डी.एस.पी. बोल रहे हैं!
हम तुरते फोन काट दिये. असल में फोन उसके चचा उठाये थे, जो डी.एस.पी. थे अऊर उनका आवाज़ एकदम हमरे दोस्त एस्पी जैसा था. ऊ सोचे होंगे कि जऊन आदमी एतना रोब से एस्पी बोला रहा है, त उसके आगे उनके जैसा डी.एस.पी. का का बिसात. बात में ई बात पर हम दुनो दोस्त खूब हँसे.

ऐसहिं रिस्ता बना हुआ है चैतन्य आलोक जी के साथ भी. सायदे कभी हम लोग एक-दोसरा को नाम से, सलिल जी - चैतन्य जी कहकर बतियाये होंगे. हम दुनो एक दोसरा को सर-जी कहते हैं. एहाँ तक कि हमरी सिरीमती जी भी उनका फोन आने पर बोलती हैं, सर जी का फोन आया है! एकदम फॉर्मल लगने वाला सब्द सर जी भी एतना मीठा रिस्ता को बयान कर सकता है, ई कोई सोचियो नहीं सकता है.

कमाल का रिस्ता है ई दोस्ती... कभी प्रेम बन जाता है, कभी भक्ति बनकर सामने आता है. एतना मीठा रिस्ता कि जहाँ एक अऊर एक मिलकर दू नहीं, एक बनता है. जिसके होने में न सुख का पता चलता है, न दुःख का. सबकुछ भुला जाता है अऊर एगो परम सांति का अनुभव होता है.

मगर कमाल का बात है कि एही सम्बन्ध को गुरुदेव रबिन्द्र नाथ ठाकुर सखी, दिलजान, फूल अऊर पान के रूप में नहीं आँख में पड़कर, गड़ने वाला बालू के रूप में देखाए अऊर नाम दिए – ‘चोखेर बाली!’


गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

ध्रुव गाथा - एक मधुर काव्य-यात्रा


श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ का परिचय उनकी कवितायें, लघुकथायें, संस्मरण, उपन्यास और कहानियाँ हैं. उनकी रचनायें चाहे जिस भी विधा में हों, अपनी एक अलग ही पहचान रखती हैं. उनकी समस्त रचनाओं में सामाजिक सरोकार को इतनी कोमलता से दर्शाया गया है कि वे कहीं से भी चीखती-चिल्लाती हुई ध्यानाकर्षण की मांग नहीं करतीं. बल्कि पाठक के हृदय को आन्दोलित करती हैं. उनकी रचनाओं में सम्वेदनाओं का पुट इतना संतुलित होता है कि बस आपके मन को छूता है, सहलाता है और धीरे से आपके मस्तिष्क को चिंतन के लिये व्यथित करता है, विवश नहीं.

इनसे भी परे गिरिजा जी का एक और साहित्य-संसार है. जहाँ वे कहानियों, कविताओं और चित्र-कथाओं का सृजन करती हैं एक वर्ग-विशेष के लिये; वह पाठक वर्ग है बच्चे और शिक्षा से दूर प्रौढ. प्रौढ शिक्षा के क्षेत्र में इनकी लिखी कहानियाँ कार्यशालाओं में पठन-सामग्री के रूप में उपयोग में लाई जाती रही हैं. बच्चों के लिये इनका साहित्यिक योगदान अद्भुत है. बच्चों और बड़ों के लिये समान रूप से जो काम इन्होंने किया है वह गुलज़ार साहब के काम में देखने में आता है, जहाँ एक ओर वो बच्चों के लिये बच्चे बनकर कवितायें लिखते हैं, वहीं बड़ों के लिये बड़े होकर नज़्में. यह विस्तार ही किसी भी साहित्यकार की रचनाओं को विस्तार प्रदान करता है. गिरिजा जी की रचनाओं में यह विस्तार सहज ही देखने को मिलता है.


ध्रुव-गाथा बालक ध्रुव की कहानी है, जो अपनी माता के साथ पिता द्वारा निर्वासन का दुःख  भोग रहा था, एक अन्य स्त्री के कारण. राजमहल के सुख से वंचित ध्रुव, एक दिवस अपने पिता के महल में पहुँचकर पिता की गोद में बैठ अद्भुत आनन्द की अनुभूति पाता है. किंतु तभी विमाता द्वारा अपमानित कर उसे महल से निकाल दिया जाता है. बालक ध्रुव अपनी माता से इस व्यथा का वर्णन करते हैं. माता उन्हें फुसलाने के लिये कहती हैं कि तुम्हारा तो भगवान हरि की गोद में स्थान है जो सम्पूर्ण जगत के पिता हैं. और ऐसे में बालक ध्रुव एक रात्रि हरि मिलन के लिये निकल पड़ते हैं तथा अनेक कष्टों का सामना करते हुये प्रभु से मिलते हैं. प्रभु के आशीर्वाद से उन्हें ब्रह्माण्ड में एक अटल स्थान प्राप्त होता है और उन्हें दृढता का प्रतीक माना जाता है.

जैसा कि परिचय से ही स्पष्ट है, ध्रुव-गाथा एक खंड काव्य है और इसकी रचना उन्होंने बाल-पाठकों को ध्यान में रखकर की है अतः इसे उन्होंने बाल खंड-काव्य की संज्ञा दी है. इस काव्य का रचना काल 1982-86 के मध्य का है और यदि गिरिजा जी के शब्दों में कहें तो उन्हें यह रचना भारतेन्दु-काल की लगी, अत: उनके मन में स्वयम एक सकुचाहट थी कि यह काव्य प्राचीन शैली में लिखा गया है, आज के पाठक वर्ग को पसंद आएगा या नहीं. और यह रचना संदूक में दबी रही. २००१ में इसे किसी “पाठक” को सुनाया गया और प्रकाशन के बाद, यह २०१२ में हमारे सामने है. सृजन की इतनी लंबी यात्रा और कवयित्री द्वारा स्वयं अपनी रचना का आकलन (पिताश्री की शाबाशी से भी संतुष्ट न हो पाना), इस बात का प्रमाण है कि इनकी रचनाधर्मिता में कितनी ईमानदारी है.

खंड काव्य चूँकि एक पात्र के चारों ओर बुना जाता है अतः यहाँ केन्द्रीय चरित्र बालक ध्रुव हैं. घटनाक्रम, जिसे फिल्म की भाषा में पटकथा कहते हैं, इतना चुस्त कि अगली कड़ी की जिज्ञासा हमेशा बनी रहती है और वहाँ पहुंचकर आगे की. घटनाओं के वर्णन में सभी सह-चरित्रों के साथ न्याय किया गया है और उन्हें उनके स्वाभाविक रूप में दर्शाया गया है. प्रत्येक घटना के साथ बालक ध्रुव के मन में उठते विचारों और मनोभावों का चित्रण इतना सहज है मानो बाल-मनोविज्ञान की गहन समझ रखने वाला कोई व्यक्ति उनका वर्णन कर रहा है. माता, पिता, विमाता, मित्रों और प्रभु के संवाद इतने स्वतः अभिव्यक्त हैं कि लगता है एक एक शब्द अपनी पूरी प्रतिष्ठा के साथ उनकी जिह्वा पर सुशोभित हो रहा है. एक बानगी-

ध्रुव को अपने समक्ष पाकर महाराज:
कैसी हैं महारानी, वह धरती की अरुणा,
पीड़ित के प्रति न्यौछावर है जिसकी करुणा.
तेरी माँ तो वत्स भुवन की दिव्य प्रभा है,
अंधियारे में भटके को ज्यों दीपशिखा है!
ध्रुव अपने पिता से:
गोद आपकी कितनी अच्छी-कितनी प्यारी,
लेकिन माँ की बात निराली प्यारी-प्यारी,
आप यहाँ हैं लीन सुखों में, वहाँ विपिन में,
वनवासी ऋषि मुनियों के शुचि-आराधन में.
विमाता ध्रुव से:
राजकुंवर तो सिर्फ एक, जो मेरा सुत है,
दुस्साहस मत कर बालक यह मेरा मत है,
जहाँ जमा है तू, उसका उत्तम अधिकारी,
राजपुत्र जिसका सुत, केवल मैं वह नारी!

इसी प्रकार, जहाँ भी कवयित्री ने स्वयं को सूत्रधार के रूप में प्रस्तुत किया है, वहाँ भी उनका शब्द-कौशल अपने चरमोत्कर्ष पर दिखाई देता है. शब्द-कौशल को आप शब्द-साधन भी कह सकते हैं.

नयनों में था अहंकार, पद की गरिमा थी,
सुन्दर भी थी, पर जैसे प्रस्तर प्रतिमा थी.

एक खंड काव्य में चूँकि एक चरित्र विशेष के जीवन क्रम को चित्रित किया जाता है, अतः पाठक का आकर्षण बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि शब्दों का चयन घटनाक्रम के अनुरूप हों, क्योंकि काव्य की लयात्मकता लगभग सुनिश्चित होती है. अतः घटनाक्रम के उतार चढ़ाव, चरित्रों के कथोपकथन और पृष्ठभूमि के सृजन में उचित शब्द-समूह का चुनाव, काव्य में उनको बुना जाना और नाटकीयता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण सिद्ध होता है. इस कसौटी पर देखें तो गिरिजा जी कहीं भी पिछडती नहीं प्रतीत होती हैं.

स्वयं महिला होने के नाते और ध्रुव की माता तथा विमाता जैसे दो सशक्त चरित्रों का निर्वाह करने में जहाँ भी उन्हें सुयोग प्राप्त हुआ है, उन्होंने नारी को व्याख्यायित करने का अवसर नहीं गंवाया है:

नारी को नर यूं ही अब तक छलता आया,
नेह मान के झूठे जालों में उलझाया,
स्वयं प्रकृति ने ही नारी का भाग्य रचाया,
प्रणय और वात्सल्य जाल में यों उलझाया.
इनमें पुलक किलक कर निज संसार बसाती
इन पर तन-मन –धन वह दोनों हाथ लुटाती.

काव्य की प्रांजलता सर्वाधिक प्रभावित करती है. पढते हुए लगता है जैसे आप इसे पढ़ नहीं रहे “पाठ कर रहे” हैं. लगभग यही अनुभव मुझे दिनकर जी की “रश्मिरथी” का पाठ करते हुए आता था. सम्पूर्ण खंड-काव्य को पढ़ने का एकमात्र तरीका इसका सस्वर पाठ करना ही है. प्रांजलता इतनी तरलता से अनुभूत है कि शब्दों के उतार चढ़ाव भावनाओं के साथ प्रवाहित होते प्रतीत होते हैं.

श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी के परिचय में मैंने कहा था कि उनके अंदर एक बच्चा आज भी बचा है, जो उनसे इन रचनाओं का सृजन करवाता है. इसका प्रमाण स्वयं उन्होंने इस पुस्तक के विमोचन समारोह में दिया. पुस्तक के अनावरण के लिए जब सारा इंतज़ाम हो गया तब इन्हें किसी ने बताया कि पुस्तक की सारी प्रतियां तो पहले से ही अनावृत रखी हैं. ऐसे में उन्होंने मासूमियत से कहा कि क्या ऐसा होता है और तब पुस्तकों को पैक किया गया.

पुस्तक हार्ड-बाउंड में है और मूल्य है मात्र १५०.०० रुपये. प्रकाशक का नाम मैं जानबूझकर नहीं दे रहा हूँ, क्योंकि प्रकाशक ने पुस्तक के आवरण को अपना विज्ञापन-पट्ट बना रखा है. छपाई बहुत अच्छी नहीं है और बहुत सारी त्रुटियाँ हैं मुद्रण की. मुझे जो प्रति प्राप्त हुई उसमें हाथ से काटकर शब्दों को शुद्ध किया गया है. इस प्रकार की भूल पाठन में व्यवधान उत्पन्न करती है.

पुस्तक के परिचय में डॉ. अन्नपूर्णा भदौरिया, विभागाध्यक्ष (हिन्दी विभाग), जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर; डॉ. पूनम चंद तिवारी, पूर्व विभागाध्यक्ष (हिन्दी विभाग), जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर तथा कवि प्रकाश मिश्र ने अपनी बात कही है, जो इस खंड-काव्य को प्रामाणिकता की मुहर लगाता है.

अंत में यही कहना चाहूँगा कि यह पुस्तक, स्वयं कवयित्री को भारतेंदु काल की रचना लगती हो, और ऐसा लगता हो कि इसे पढने वाले विरले ही मिलते हैं, वास्तव में अपनी प्रासंगिकता के स्तर पर कभी भी पुरातन नहीं होने वाली. यह पुस्तक भले ही बाल मनोविज्ञान की आधारशिला पर रचित है, किन्तु इसमें नारी, पर्यावरण, सामाजिक विसंगतियों आदि का इतना सजीव चित्रण है कि पाठक मुग्ध हो जाता है.

यदि मुक्तछंद की कविताओं को पढते हुए एक सलिल प्रवाह से खंड काव्य को पढ़ने का शीतल अनुभव प्राप्त करना चाहें तो यह काव्य-पाठ एक सुखद अनुभूति है. 

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

पॉलीथीन और झुर्रियाँ


‘भारतीय रिजर्व बैंक’ का जारी किया हुआ सब नोट पर लिखा रहता है कि मैं धारक को .....रुपये अदा करने का वचन देता हूँ. दस्तखत – गवर्नर – भारतीय रिजर्व बैंक. जब छोटा थे त सोचते थे कि ई लिखने का का जरूरत है. अऊर ई बात सोचकर हंसी भी आता था कि दस रुपया का नोट के बदला में दस रुपया देने का वचन काहे दे रहे हैं. ई त जानले बात है कि दस रुपया के बदला में दस रुपया मिलेगा अऊर सौ रुपया के बदला में सौ रुपया, इसमें वचन देने वाला कौन बात हो गया!

जब बड़ा हुए, तब जाकर समझ में आया कि इसके पीछे का कारन है. असल में एक रुपया भारत सरकार का करेंसी होता है अऊर उसके ऊपर का सब नोट, भारत सरकार के गारण्टी पर रिजर्व बैंक जारी करता है. इसीलिये रिजर्व बैंक के गवर्नर को वचन देने का जरूरत पड़ता है कि ऊ दस रुपिया के बदला में भारत सरकार का एक रुपिया वाला दस नोट अदा करेंगे. जान जाने के बाद मोस्किल से मोस्किल सवाल भी बहुते आसान लगने लगता है. बहुत-बहुत साल पहिले ‘हिन्दुस्तान टाइम्स का एगो साप्ताहिक टैबलॉयड आता था मॉर्निंग ईको.आठ-दस पन्ना का पत्रिका जइसा अखबार. उसमें एगो कॉलम था Something you never wanted to know, but were always asked” माने अइसा बात जिसको जानना आपके लिये जरूरी नहीं, मगर जानने में नोकसान भी नहीं. कहने का मतलब कि हम जौन ज्ञान ऊपर बाँच रहे थे, उसको इग्नोर भी कर सकते हैं आप लोग.

हाँ त हम कह रहे थे कि जब गवर्नर का दस्तखत किया हुआ नोट हाथ में हो (जाली नोट को छोड़कर) त उसको सुईकार करने में त कोनो आपत्ति नहीं होना चाहिये किसी को. नेपाल में जब राजसाही था, तब नोट चाहे केतना भी गन्दा हो मगर उसको लौटा देना, चाहे लेने से मना कर देना, राजा का अपमान समझा जाता था. दुबई में भी हम देखे कि नोट चाहे केतना भी पुराना हो, चाहे कटा-फटा हो, लेने से कोनो दुकानदार, बैंक, चाहे आदमी मना नहीं करता था.

मगर अपना देस में त अजब हाल है. तनी सा पुराना नोट, कोना से कटा हुआ नोट, बीच से मुड़कर जरा सा फटा हुआ नोट, कोनो रेक्सा वाला, टैक्सीवाला, तरकारी वाला को दीजिये त तुरते मना कर देगा लेने से. बोलेगा – दूसरा नोट दीजिए, ई नहीं चलेगा. अगर आपका बात सुनकर अऊर बिका हुआ माल वापस हो जाने का डर से ऊ मानियो गया, त आपको अइसा हिकारत भरा नजर से देखेगा कि आपको अपने ऊपर ग्लानि होने लगेगा. ओइसे भी सारा दुनिया का चलन है कि नयका नोट हाथ में आते ही दबाकर रख दिया जाता है अऊर जेतने पुराना नोट हो-ओतने चलाने का कोसिस किया जाता है. अब त देस में आदमी के साथ भी एही होने लगा है. नीमन आदमी दबा दिया जाता है अऊर चोर सब खुल्ले घूमता रहता है.

ई मामला में हमरा गुजरात का अपना अलगे रंग है. एहाँ का लोग पइसा पहचानता है अऊर गवर्नर का दस्तखत. बाकी नोट त नोटे होता है. अब बताइये भला कि सोना का कंगन अगर नाली में गिरा हुआ हो त का उसका मोल कम होता है? नहीं न, तब भला गन्दा होने से रिजर्व बैंक के नोट का भैलू (वैल्यू) कइसे कम हो सकता.

हमरे भावनगर में त पाँच का नोट का अपना अलगे पहचान है. गला हुआ नोट को दो तह में मोडकर उसको एगो छोटा सा पॉलीथीन में बंद कर दिया जाता है अऊर ओही नोट बाजार में चलता है. न लेने से कोई मना करता है, न देने में कोनो आदमी को खराब लगता है. बहुत सा देस में चलता है प्लास्टिक का नोट, मगर इहाँ पर नोट को दुर्दशा से बचाने के लिए उसको प्लास्टिक में बंद करके रखा जाता है.

भावनगर में जब हम आये त लोग हमको मजाक में बताया कि इसको बरिस्ठ नागरिक का सहर कहते हैं. दू महीना में समझ में आ गया. सचमुच होटल (रेस्त्राँ) में देखिये त पूरा परिवार अपने बुजुर्ग के साथ खाना खाता देखाई देता है, पार्क में भी सब साथे. हमरे ऑफिस में भी आने वाला दस में से आठ आदमी सत्तर साल या उससे बेसी उमर का होता है. कमाल ई कि जिसको आप मुस्कुराकर प्रणाम कर दिए ऊ आपके माथा पर हाथ रखकर आसीरबाद देता हुआ जाता है.

बुजुर्गों का हमरे ऊपर हाथ होना त अनमोल बात है, लेकिन भावनगर में उनका कीमत पाँच रुपया से जादा नहीं हैं. चौंकिये मत, पाँच का नोट जइसा अपने बुजुर्ग को भी लोग हिफाजत से प्यार के पॉलीथीन में लपेट कर रखता है, उनका झुर्रियाँ समेटकर. ई लोग चाहे केतना भी पुराना हो जाएँ, इनका चलन कभी नहीं रुकता है. एही लोग त हमारा कल हैं, काहे कि हमारा आज हमको एही लोग से त मिला है.