रविवार, 11 सितंबर 2016

बधाई दो कि दो से तीन अब हम हो गए हैं

बहुत्ते अच्छा लगता है, जब कोई आपके बारे में चिंता करता है. बाकी ई चिंता करना कभी-कभी बहुत इरिटेटिंग हो जाता है. आपका बच्चा दसवाँ पास किया नहीं कि आस पड़ोस में चिंता सुरू कि आगे का करेगा. बारवाँ पास करने के बाद त ई चिंता एकदम्मे से आसमान छूने लगता है... कहाँ कहाँ अप्लाई किया, कोन कोन इंजीनियरिंग में केतना नम्बर आया, कट-ऑफ केतना था, रैंकिंग का है वगैरह वगैरह. इंजीनियरिंग में चला गया त कुछ साल त ठीक ठाक निकला, लेकिन फिर बेतलवा पेड़ पर. कैम्पस सेलेक्सन में का हुआ. अच्छा प्लेसमेण्ट मिला कि नहीं.

कुल मिलाकर आपके लिये आपसे जादा पड़ोस में चिंता फिकिर होता है लोग को. नौकरी लग गया त सादी-बियाह का चिंता अऊर बिआह सादी हो गया त – का भाई, कब तक दू से तीन हो रहे हो. माने जिन्नगी में ई चिंता का फेरा चलते रहता है. आप इरिटेट होइये, चाहे खुस होइये... पूछने वाला को कोई फरक नहीं पड़ता है.

बेटी के होस्टल चल जाने के बाद हम लोग तीन से दू रह गये. मगर तब कोनो चिंता जताने नहीं आया. दिल्ली आने के बाद भी बेटी होस्टले में है. मगर खुसी का बात ई है कि लगभग एक साल बेटी के बिना काटने के बाद हमलोग दू से तीन हो गये हैं. अब ई उमर में दू से तीन होना अजीब महसूस होता है. आदत जो छूट गया है. धीरे-धीरे अब आदत हो गया है आदत नहीं रूटीन कहिये.

सबेरे जब नींद से उसको उठाने जाइये, त बोलती है – अभी थोड़ा और सोने दो. तब समझाना पड़ता है कि हमको ऑफिस जाना है. फिर सम्भालकर उठाना, धीरे से माथा अऊर कंधा पकड़कर बैठाना पड़ता है. गोदी में उठाकर टॉयलेट ले जाना. फिर ब्रस करवाना, नहलाना, कपड़ा बदलना अऊर बाल में कंघी करके चोटी बनाने का काम सिरीमती जी का.

हम त कभी-कभी बहुत प्यार से गाल चूम लेते हैं अऊर कभी-कभी परेसान होकर गोसियाइयो जाते हैं. लेकिन बाद में अफसोस होता है. आजकल त मजेदार ट्यूनिंग हो गया है. ऑफिस से आने के बाद मजाक करना अऊर मिलकर हँसना. हर पाँच मिनट के बाद लेटा दो अऊर पाँच मिनट में बइठा दो. कभी पाँच मिनट से जादा हो गया त हमहीं पूछ लेते हैं कि बइठा दें. त हँसते हुये मूड़ी डोला देती है. हम भी कम नहीं हैं. बोलना पड़ता है – “ई छटाँक भर का जुबान नहीं हिलता है, पसेरी भर का मूड़ी हिल जाता है!” त कहती है – “हमको चिढा रहे हो? बैठा दो!”

खाना का फरमाइस एक से एक. “आज समोसा चाट खाने का मन है”... “आज दोसा बना दो”... कल नूडल्स बना देना... “मकई का रोटी अऊर बैगन का चोखा खाने का मन है”! अब सिरीमती जी का परिच्छा होता है कि ऊ फूड-फ़ूड चैनेल से केतना खाना बनाना सीखी हैं. मगर एक बात है कि उनको हमेसा पूरा नम्बर मिल जाता है.

दू से तीन होना हमेसा खुसी का बात होता है. बहुत लम्बा समय अकेलेपन में बीता है हमारा, अइसे में बहुत डर के साथ जो मधुर अनुभव हो रहा है, उसको बस नया सिरा से जी लेने का मन करता है. सुरू-सुरू में डर ई बात का था कि कइसे सम्भाल पाएँगे. मगर सब सम्भल गया.


रीढ के हड्डी में लगा चोट, पटना में डॉक्टर के लापरवाही से रिपोर्ट में बताया हुआ खराबी को नहीं देख पाना, इसलिये सही ईलाज नहीं होना अऊर एक पाँव से लाचार होकर बिछावन पर लाचार होकर पड़ जाना अऊर व्हील चेयर पर बैठ जाने को मजबूर... हमरी अम्मा.

अब अम्मा कहें कि बच्चा. आज छिहत्तर साल की हो गई. मगर जब गाल चूम लेते हैं त मुस्कुराने लगती हैं. निदा साहब का ऊ दोहा जो हमरी बहिन का पसंदीदा दोहा है आज ओही याद आ रहा है:

जादूगर माँ बाप हैं, हरदम रहें जवान|
जब बूढ़े होने लगें, बन जाएँ संतान ||

शनिवार, 3 सितंबर 2016

आशीष शुभ-आशीष

हिन्दी से हटकर अंगरेजी के अलावा जब हम कोनो दोसरा भासा के बारे में सोचते हैं, त हमको दुइये गो भासा समझ में आता है; पहिला पूरब का बंगला अऊर दोसरा दक्खिन का मलयाळ्म. एक तरफ शरत चन्द्र, रबि ठाकुर, बिमल मित्र, शंकर अऊर सिनेमा के तरफ जाइये त मृणाल सेन, सत्यजीत राय का नाम अपने आप में सम्पूर्न है. दोसरा ओर मलयाळ्म में तकषि शिव शंकर पिळ्ळै, एम. टी. वासुदेवन नायर अऊर सिनेमा में अडूर गोपालकृष्णन, मामूटी, मोहन लाल अऊर भुला गए गोपी. दुनो राज्य में एगो कला अऊर साहित्य का समानता त हइये है.

अब जऊन कलाकार का नाम हम लेने जा रहे हैं उनके अन्दर ई दुनो राज्य का माटी का मेल है. माँ बंगाली (कथक नृत्यांगना) अऊर पिता केरल से (एक थियेटर कलाकार)... जब ई दुनो प्रदेस का कला अऊर संस्कृति एक्के अदमी में समा जाए, त कलाकार के पर्तिभा का अन्दाजा लगाया जा सकता है, खासकर तब, जब उसका बड़ा होने का समय (बांगला में मानुष होबार शोमय) दिल्ली में गुजरा हो अऊर अभिनय का सिच्छा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से मिला हो. ऊ कलाकार हैं – आशीष चेट्टा. चेट्टा (बड़े भाई के लिये मलयाळी सम्बोधन) नहीं कहेंगे, हमसे साल भर छोटा हैं उमर में आशीष विद्यार्थी.

आशीष जी के ऐक्टिंग का झलक हम दूरदर्सन के जमाना में टीवी पर देख चुके थे, सई परांजपे के सिरियल में- “हम पंछी एक चॉल के” अऊर जब सई कोनो कलाकार को चुन लें, त उसके पर्तिभा में कमी होइये नहीं सकता है. उसके काफी टाइम के बाद गोबिन्द निहलाणी का “द्रोहकाल” में देखे. गोबिन्द जी का चुनाव अऊर आशीष का उनके चुनाव के प्रति न्याय देखकर दंग रह गये. पूरा तरह से चरित्र में समा जाना अऊर आवाज के उतार चढाव के साथ चेहरा का बदलता हुआ भाव से ऐक्टिंग करना एतना पर्भावित किया कि का बताएँ. ओम पुरी अऊर नसीर के बीच आशीष को इग्नोर नहीं किया जा सकता था. 


“इस रात की सुबह नहीं” त हम कभी भूलबे नहीं किये. बिना ओभरऐक्टिंग के एगो डॉन का फ्रस्ट्रेसन जो एक मामूली आदमी से पब्लिकली थप्पड़ खाने की बाद होता है, देखने लायक था. एकदम जीवंत... बोले तो असली!


आशीष का चेहरा में मलयाळी झलक है अऊर हिन्दी सिनेमा के पैमाना से उनको इस्मार्ट के कैटेगरी में नहीं रखा जा सकता है. लेकिन इनके आवाज का क्वालिटी अऊर आँख से एक्टिंग करना का कमाल का है. बाकी जो हाल है हमारा हिन्दी सिनेमा का, टैलेण्ट के साथ किस्मत का फैक्टर अइसा है कि का बताया जाए. आशीष जी का बहुत सा सिनेमा आया, मगर उनको जबर्दस्ती कॉमिक भिलेन बनाकर, कभी बिहारी बोलवाकर उनका दुरुपयोग हुआ अऊर धीरे-धीरे हमको लगा कि ई कलाकार चुक गया.

पिछला साल, जब हम गुजरात में थे, तब एगो सिनेमा देखने को मिला – “रहस्य”. ई सिनेमा आरुषि-हेमराज हत्याकाण्ड पर आधारित था. इसमें बहुत दिन के बाद देखाई दिये आशीष विद्यार्थी. सिनेमा देखने के बाद लगा कि ई कलाकार में आज भी बहुत दम है. गुस्सा, फ्रस्ट्रेसन, मजबूरी को अपने ऐक्टिंग से एतना बढिया एक्स्प्रेस किये थे कि हमको अपना फेसबुक पर एगो इस्टेटस लिखना पड़ा. संजोग से ऊ भी हमरे पोस्ट पर आकर अपना कमेण्ट किये अऊर हमको धन्यबाद बोल गये.


अऊर ई साल आया हमरा सबसे पसन्दीदा सिरियल – “24”. ई सिरियल जेतना हमको स्क्रिप्ट के कसाव के लिये अऊर सब कलाकार का अदाकारी के लिये पसन्द आ रहा है, उससे कहीं जादा हमको आशीष विद्यार्थी के अभिनय के लिये भी पसन्द आ रहा है. खतरनाक अऊर सातिर आतंकवादी के रोल में उनका सधा हुआ ऐक्टिंग से जान आ गया है.

डायलाग से जादा त उनका आँख बोलता है अऊर उनका पूरा चेहरा डायलाग का साथ देता है. जब ऊ कमीनापन पर उतरता है त आपको उससे नफरत होने लगता है. आपको बिस्वासे नहीं होता होगा कि ऊ जो पर्दा पर देखाई दे रहा है ऊ रोशन शेरचन नाम का किरदार है कि आशीष विद्यार्थी... अइसे कैरेक्टर में समा जाना कि लिखने वाले को भी दुनो में अंतर करना मोस्किल हो जाए, एही  ऐक्टर का सबसे बड़ा कामयाबी है.


ऐक्टिंग अऊर आवाज के मामला में पर्दा पर बहुत सा दोस छिप जाता है, काहे कि सामने का द्रिस्य अऊर दोसरा कलाकार भी होता है, त कोनो ऐक्टर का दोस पता नहीं चलता. लेकिन रेडियो पर बोलते समय त सब कुछ आवाजे से बताना पड़ता है. मोबाइल ऐप्प “गाना” पर खाली गाने नहीं सुनाई देता है. आपको “कहानीबाज़ आशीष” के आवाज़ में कहानी का स्रिंखला मिलेगा. अऊर उनके आवाज के जादू से कोई नहीं बच सकता है.



आशीष जी, आपको हम अपना इस  पोस्ट के माध्यम से सुभकामना भेजते हैं कि आप भले कम काम कीजिये, लेकिन अपना ऐक्टिंग के ईमानदारी अऊर आवाज के जादू को ई फिलिम इण्डस्ट्री के टाइपकास्ट करने वाला रोग से अक्छुण्ण रखिये. हमको एही खुसी है कि आपसे जो हम उम्मीद लगाए थे, ऊ अभी तक बरकरार है! “24” के लिये सुभकामना अऊर कहानीबाज़ चलाते रहिये. ऑल द बेस्ट!!

शनिवार, 27 अगस्त 2016

मुर्गी, कबूतर और हैप्पी बर्थ-डे झूमा!!

PROLOGUE:
चौक से चलकर, मंडी से, बाज़ार से होकर
लाल गली से गुज़री है काग़ज़ की कश्ती
बारिश के लावारिस पानी पर बैठी बेचारी कश्ती
शहर की आवारा गलियों से पूछ रही है
कश्ती का साहिल होता है –
मेरा भी क्या साहिल होगा??

एक मासूम से बच्चे ने
बेमानी को मानी देकर
रद्दी के काग़ज़ पर कैसा जुल्म किया है!
गुलज़ार
                      
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कोनो चीज को देखने के बाद अचानक दू अदमी के मन में एक्के साथ, एक्के तरह का बिचार आये अऊर दुन्नो कोई एक्के साथ बोल पड़े, “खरीद लें?” हो सकता है होता होगा अइसन संजोग, तब्बे तो दू अदमी एक्के साथ एक्के बात बोले तो लोग कहता है कि घर में कोनो मेहमान आने वाला है.



ऊ रोज भी रोड के साइड में एगो आदमी टोकरी में बहुत सा मुर्गी का बच्चा (चूज़ा) बेच रहा था. एकदम खेलौना जइसा मुर्गी का बच्चा देखकर, हम दुन्नू के मुँह से एक्के साथ निकला, “खरीद लें?” “खरीद लें डैडी?” और घर में हमरे दू गो मुर्गी का बच्चा मेहमान बनकर आ गया. दुन्नो को एगो गहरा प्लास्टिक के टब में रखकर उसको दाना डाल दिये. थोड़ा देर बाद जब उसको बालकनी में छोड़कर हमलोग दू मिनट के लिये घर के अंदर गये, त गजब हो गया. कहीं से एगो बाज का नजर पड़ गया था अऊर ऊ बाज एगो चूजा को लेकर भाग गया. बेटी को बहुत अफसोस हुआ. अऊर फिर सुरुआत हुआ बचा हुआ चूजा का हिफाजत करने का.

बड़ा सा डिब्बा, डिब्बा में खिड़की बनाया गया अऊर उसमें उसका रहने का इंतजाम किया गया. देखते देखते डिब्बा का साइज बड़ा होने लगा. बेटी उसका नाम रखी मुर्गी (हमारे पटना वाले घर में जो पालतू कुत्ती थी उसका नाम भी हमलोग डॉगी रखे थे) अऊर हम उसको बुलाने लगे कबूतर के नाम से. कबूतर काहे, सो मत पूछियेगा. बस मन से यही नाम निकला. जबकि बाद में पता चला कि ऊ न मुर्गी था, न कबूतर... ऊ मुर्गा था.


बड़ा होने के साथ-साथ ऊ दिन भर खुल्ला में घर में खेलने लगा. सिरीमती जी बेटी के इस्कूल जाने के बाद अकेले रहती थीं घर में. लेकिन ऊ कबूतर उनको जमीन पर बइठकर तरकारी काटने नहीं देता था. चुपके से आता था अऊर धनिया का पत्ता, पत्ता गोभी अऊर प्याज लेकर भाग जाता था. सिरीमती जी त बस दोबारा से छोटा बच्चा का माँ के अवतार में आ गयी थी. उसको प्यार करना, जब ऊ उनके गोड़ पर चोंच से मारकर खाना माँगता था, त खाना देना अऊर तरकारी लेकर भागने पर गुसियाना.

बेटी के इस्कूल से आ जाने के बाद त बेचैनी देखने लायक होता था उसका. बेटी जऊन बेड पर सोती थी उसके पास बाइठ जाता था. जब बड़ा हो गया था तब उड़कर बेड पर चला जाता था अऊर झूमा के पीठ पर या कंधा पर सो जाता था. बेटी जब पढा‌ई करती त उसके स्टडी टेबुल के कोना में बइठा रहता.


सबसे मजेदार दिरिस होता था जब हमलोग पेप्सी पी रहे होते थे. अगर ऊ अपने डिब्बा में बंद हुआ त खिड़की से झाँककर, बेचैनी में बार बार चोंच मारकर हमलोग को ईबताने का कोसिस करता कि उसको भी चाहिये. उसकोतब तब चैन नहीं आता, जब तक उसके गिलास में उसको पेपेसी नहीं मिल जाता. जेतना देर ऊ खुला रहता हमलोग में से किसी के गोदी में बइठकर टीवी देखना उनका भी काम होता. सिरीमती जी जइसे उठीं, उनसे पहले ऊ हम्रे गोदी से उतरकर किचेन में हाजिर हो जाता.

टैब पर चैट करते समय, हमारे टाइप करने के साथ ऊ भी टाइप करके सेण्ड कर देते थे जनाब. एक बार शिवम बाबू पूछ बइठे कि दादा ये आपने क्या लिखा है, तब बताना पड़ा कि ऊ कबूतर ने लिखा है. लैपटॉप पर काम करते समय जब उसका cursor भागता था, त ऊ बार-बार चोंच मारता था. हमलोग बहुत खेलवाड़ करते थे उसके साथ.

बेटी के हॉस्टल चले जाने के बाद भी ऊ उसको नहीं भूला. एक रोज हमलोग उसको सुताकर, बेटी से स्काइप पर बतिया रहे थे. बेटी का आवाज सुनकर एतना बेचैन हो गया कि का बताएँ. जब उसको निकाले त भागकर बेटी के रूम में गया देखने अऊर जब स्काइप पर देखाई दी, त बेचैन हो गया.

जब बहुत बड़ा हो गया त कुकड़ू कूँ बोलने लगा था. अऊर पटना अऊर दिल्ली जाते समय उसको किसीके पास छोड़कर आना भी समस्या था, इसलिये अपने एगो परिचित के मदद से उसको भावनगर में पक्षीशाला में दे आए. बहुत अफसोस हुआ था उस दिन. सोचे कि कइसे लोग अपना बूढ़ा माँ-बाप को बिर्धास्रम में छोड़ आता है.

बेटी उसके प्यार में चिकेन खाना छोड़ दी (हालाँकि बहुत बाद में फिर से शुरू कर दिया). केतना अच्छा होता कि जीव-हत्या के मनाही का सिच्छा देने से जीव-प्रेम का सिच्छा देते हमलोग.

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EPILOGUE

झूमा पिछला दू साल से हमसे जिद कर रही थी कि डैडी मेरी मुर्गी पर आप पोस्ट क्यों नहीं लिखते. मगर उसको अपना परेसानी कहाँ तक बताते. लिखेंगे... लिखेंगे कहकर टालते रहे.

आज झूमा का सालगिरह है, त सोचे कि चलो उसको जन्मदिन का एही तोहफ़ा दे दें. हैप्पी बर्थ डे, बिटिया रानी!

रविवार, 31 जुलाई 2016

घर वापसी - एक ममतामयी मुलाक़ात

रोज आँख के सामने का मालूम केतना घटना घट जाता है अऊर उसका गवाह अकेला एक अदमी नहीं होता. एक्के घटना का असर सब आदमी पर एक्के जइसा होता होगा, ई भी कोई निस्चित नहीं बता सकता.

२६ तारीख को अचानक १२ बजे दुपहर में फोन पर नजर गया त देखे कि एगो मेसेज था – “आज रात ९:३० बजे दिल्ली से मेरी फ्लाईट है.” हम तुरत फोन लगाए कि दिल्ली केतना बजे पहुँचना है. पता चला साम के तीन बजे तक. ई संतोस हुआ कि थोड़ा बहुत समय मिलेगा, लेकिन ई जानकर मन खिन्न हो गया कि रेलवे इस्टेसन से हवाई अड्डा तक का टैक्सी पहिले ही बुक हो चुका है. खैर मिलने का बहुत सा तरीका हो सकता था, लेकिन हमरा परेशानी का कारन कुछ अऊर था.

सबेरे से बरसात रुकने का नाम नहीं ले रहा था, दिल्ली में टैक्सी का हड़ताल था अऊर पहिले से ई प्रोगराम हमको पता नहीं था, नहीं त अपना ड्राइभर को बोलकर घर से गाड़ी मंगा लेते. फोन पर ई सब समस्या के बारे में बताए अऊर इत्मिनान भी कराए कि कोनो न कोनो उपाय हो जाएगा. लेकिन टेंसन में हम भी थे.

साढ़े तीन चार बजे फोन आया कि हजरत निजामुद्दीन इस्टेसन पर उतरकर टैक्सी तो तय किया हुआ जगह पर मिल गया, बाकी ओही हुआ जिसका डर था. टैक्सी का चारों टायर छेद दिया था उत्पाती लोग. अब न घर के न, घाट के वाला हाल. ऊ रास्ता पर अऊर हम ऑफिस में परेसान कि एयरपोर्ट कइसे छोड़ेंगे. बस फोन पर एतना निर्देस दे सके कि कोनो तरीका से सुप्रीम कोर्ट पहुंचिए.

हम ऑफिस से निकल कर रोड पर आए अऊर सक्ति सिनेमा के दिलीप कुमार के तरह हर देखाई देने वाला ऑटो रेक्सा अऊर टैक्सी को आवाज लगाए. मगर ऊ बारिस में कोई रोकने के लिये राजी नहीं हुआ. कोई बेक्ति बाहर से आया हो, जिसको सहर का भूगोल नहीं पता हो, ऊ हड़ताल में फँस जाए त कइसा लगता होगा. एही भाग-दौड़ में हम भीग गए – पता नहीं बारिस से कि पसीना से. तब्बे फोन आया कि टैक्सी मिल गया है अऊर हम पहुँच रहे हैं.

हम ओहीं इंतज़ार करने लगे तब फोन पर सूचना मिला कि टैक्सी ओहीं पर है. उसको रास्ता बताए अऊर दू मिनट में एगो टैक्सी हमरे सामने रुका अऊर उसमें से दरवाजा खोलकर निकलीं हमरी दीदी श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ. हम पैर छुए उनका अऊर सामान लेकर ऑफिस में पहुंचे. कैंटीन से चाय मंगवाए, काहे कि दीदी बोलीं कि खाना रास्ते में खा ली थीं.

चाय पीते-पीते सोचे कि कुछ बात करें, लेकिन उनके फोन का घंटी सांत होने का नामे नहीं ले रहा था. बच्चा लोग बेंगलुरु में परेसान था कि माँ कहाँ अटक गयी हैं, समधी लोग दिल्ली में परेसान थे कि हमारे घर काहे नहीं आईं, हम परेसान थे कि अगर साम में भी टैक्सी नहीं मिला त मेट्रो से पहुंचाना होगा हवाई अड्डा, अऊर दीदी परेसान थीं कि बेकार में हमको परेसान कर दीं. मगर अंदर से हम दूनों इस बात से खुस थे कि एक दूसरा से मिलने का मौक़ा मिला.


फोन के लगातार घंटी बजते रहने के बावजूद भी हमलोग घर परिवार, ब्लॉग-फेसबुक, ऑफिस-ऑफिस का बात करते रहे. संजोग से भाई चैतन्य आलोक भी हमरे सामने वाले ऑफिस में कोनो काम से आय थे. ऊ भी बीच बीच में पूछ रहे थे कि क्या हुआ. उनके लिये ब्लॉग के दुनिया से कोनो बेक्ति से मिलने का ई पहिला अबसर था. नहीं त आज तक ऊ हमरे ही जरिये सब से मिलते आए हैं.

इस पल को यादगार बनाने के लिये एकाध फोटो भी खींचे हमलोग अऊर फिर साम को टैक्सी बुक किये अऊर ट्रैफिक जाम से होते हुए साहित्य पर चर्चा करते हुए हवाई अड्डा पहुंचे. एगो बात त भुलाइये गए, रास्ते भर दीदी के गाइड भी बने रहे – ई देखिये इण्डिया गेट, ई राष्ट्रपति भवन, ई दूतावास का इलाका है. साहित्य के चर्चा में हम अपना तरफ से एगो बात कहे कि हमको इच्छा है एक ऐसा कहानी लिखने का जिसका सब पात्र कहानी के मुख्य घटना पर बारी-बारी से अपना बात कहता है. मतलब एक्के घटना का दू अलग-अलग लोग के द्वारा दिया गया ब्यौरा.

(कल गिरिजा दी हमसे मुलाक़ात का बात अपने ब्लॉग पर लिखी हैं अऊर आज हम ओही बरनन अपना तरह से कर रहे हैं.)

हवाई अड्डा आ गया था अऊर दीदी को डिपार्चर वाले दरवाजा से छोडकर लौटते समय उनका ममतामय निगाह हमको आसीरबाद दे रहा था.

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

हे मातृ रूप! हे विश्व-प्राण की प्रवाहिका!! हे नियामिका...!!!

आसमान में बनते हैं रिश्ते सारे
या पिछले जन्मों का कोई सम्बन्ध कभी होता होगा
ये सब कहने की बातें हैं
इक रोज़ मगर जाने कैसे मैं घूम रहा था आवारा
इक कविता की ठण्डी सी छाँव के नीचे थककर बैठ गया
एक बिटिया की रुख़सती की बातें थीं शायद
वो छाँव मुझे आँसू की छाँव लगी लगने
बस याद रहा कि मैं भी बाप हूँ बेटी का
उस दर्द से इक रिश्ता पनपा
जिस रिश्ते ने ना जाने कितना प्यार दिया


जिनको देखा भी नहीं
पढा भर है जिनको
जिनके ख़त हाल मेरा पूछा करते हरदम
जो डाँट लगाती हैं मुझको ख़त में लिखकर
विदुषी हैं, फिर भी मान मेरा करतीं हरदम
मेरी बातों पर ध्यान सदा देतीं बढ़कर

विद्वान बड़े, बहुतेरे देखे दुनिया में  
सम्मान सभी का करे वही विद्वान है सच्चा
उनकी सराहना पाकर दिल खुश हो जाता
उनकी रचनाएं सदा नया कुछ सिखलातीं
उनकी स्नेहिल छाया में सीख रहा हूँ मैं
लेकिन इक बात है गहरे पैठ गई मन में
रिश्ते बनते हैं आसमान पर बात ग़लत है
धरती पर मैंने ये रिश्ता पाया है
उनका परिचय - उनकी कथा कहानी है
उनका परिचय - कविता की वो रवानी है
उनका परिचय है वृहत साहित्य सम्पदा
मैं तो बस उनको प्रणाम कर सकता हूँ

जन्मदिवस है माँ प्रतिभा सक्सेना का
यही प्रार्थना है प्रभु से
दीर्घायु हों और स्वस्थ वो रहें सदा-सर्वदा
सिर पर मेरे बना रहे आशीष-छत्र
                                  प्रतिभा अम्मा का!


इस पोस्ट का शीर्षक डॉ. प्रतिभा सक्सेना की कविता की पंक्तियों से उद्धृत है! 

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

अजन्मा का जन्म-महोत्सव


रोम में एक सम्राट बीमार पड़ा हुआ था. वह इतना बीमार था कि चिकित्सकों ने अंतत: इंकार कर दिया कि वह नहीं बच सकेगा. सम्राट और उसके प्रियजन बहुत चिंतित हो आए और अब एक-एक घड़ी उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा ही करनी थी और तभी रोम में यह ख़बर आई कि एक फकीर आया है जो मुर्दों को भी जिला सकता है. सम्राट की आँखों में आशा वापस लौट आई. उसने अपने वज़ीरों को भेजा उस फ़कीर को लाने को.

वह फ़कीर आया और फ़कीर ने आकर उस सम्राट को कहा कि कौन कहता है कि तुम मर जाओगे... तुम्हें तो कोई बड़ी बीमारी भी नहीं है. तुम उठ कर बैठ जाओ, तुम ठीक हो सकोगे. एक छोटा सा ईलाज कर लो.

सम्राट जो महीनों से लेटा हुआ था, उठा नहीं था, उठकर बैठ गया. उसने कहा – कौन सा ईलाज, जल्दी बताओ, उसके पहले कि समाप्त न हो जाऊँ. क्योंकि चिकित्सक कहते हैं कि मेरा बचना मुश्किल है. वह फकीर बोला कि क्या तुम्हारी इस राजधानी में एकाध ऐसा आदमी नहीं मिल सकेगा जो सुखी भी हो और समृद्ध भी. अगर मिल सके तो उसके कपड़े ले आओ और उसके कपड़े तुम पहन लो. तुम बच जाओगे. तुम्हारी मौत पास नहीं.

वज़ीर बोले – यह तो बहुत आसान सी बात है. इतनी बड़ी राजधानी है, इतने सुखी, इतने समृद्ध लोग हैं.. महलों से आकाश छू रहे हैं महल. आपको दिखाई नहीं पड़ता. यह वस्त्र हम अभी ले आते हैं. फ़कीर हँसने लगा. उसने कहा – अगर तुम वस्त्र ले आओ तो सम्राट बच जाएगा.

वे वज़ीर भागे. वह उस फकीर की हँसी को कोई भी न समझ सका. वे गए नगर के सबसे बड़े धनपति के पास और उन्होंने जाकर कहा कि सम्राट मरण शय्या पर है और किसी फ़कीर ने कहा है कि वह बच जाएगा... किसी सुखी और समृद्ध आदमी के वस्त्र चाहिये. आप अपने वस्त्र दे दें. नगरसेठ की आँखों में आँसू आ गये. उसने कहा – मैं अपने वस्त्र ही नहीं अपने प्राण भी दे सकता हूँ, अगर सम्राट बचते हों. लेकिन मेरे वस्त्र काम नहीं आ सकेंगे. मैं समृद्ध तो हूँ लेकिन सुखी मैं नहीं हूँ. सुख की खोज में मैंने समृद्धि इकट्ठी कर ली, लेकिन सुख से अब तक नहीं मिलन हो सका. और अब तो मेरी आशा भी टूटती जाती है. क्योंकि जितनी समृद्धि सम्भव थी, मेरे पास आ गयी है और अब तक सुख के कोई दर्शन नहीं हुए. मेरे वस्त्र काम नहीं आ सकेंगे. मैं दुखी हूँ... मैं क्षमा चाहता हूँ.

वज़ीर तो बहुत हैरान हुये. उन्हें फ़कीर की हँसी याद आई. लेकिन और लोगों के पास जाकर पूछ लेना उचित था. वे नगर के और धनपतियों के पास गये. और साँझ होने लगी. और जिसके पास गये उसी ने कहा कि समृद्धि तो बहुत है, लेकिन सुख से हमारी कोई पहचान नहीं. वस्त्र हमारे... काम नहीं आ सकेंगे. फिर तो वे बहुत घबराए कि सम्राट को क्या मुँह दिखाएँगे. सम्राट खुश हो गया और यह ईलाज हमने समझा था कि सस्ता है. यह तो बहुत मँहगा मालूम पड़ता है... बहुत कठिन.

तभी उनके पीछे दौड़ता हुआ सम्राट का बूढा नौकर हँसने लगा और उसने कहा कि जब फकीर हँसा था तभी मैं समझ गया था. और जब तुम सम्राट के सबसे बड़े वज़ीर भी अपने वस्त्र देने का ख़्याल तुम्हारे मन में न उठा और दूसरों के वस्त्र माँगने चले, तभी मैं समझ गया था कि यह ईलाज मुश्किल है.

फिर जब सूरज ढल गया तो वे सम्राट के महल के पास पहुँचे. महल के पीछे ही गाँव की नदी बहती थी. अन्धेरे में नदी के उस पार से किसी की बाँसुरी की आवाज़ सुनाई पड़ रही थी. वह संगीत बड़ा मधुर था. वह संगीत बड़ी शांति की ख़बर लिये हुये था. उस संगीत की लहरों के साथ आनन्द की भी कोई धुन थी. उसके संगीत में ही ऐसी कुछ बात थी कि उनके प्राण भी जो निराशा और उदासी से भरे थे वे भी पुलक उठे. वे भी नाचने लगे. वे उस आदमी के पास पहुँचे और उन्होंने कहा कि मित्र हम बहुत संकट में हैं, हमें बचाओ. सम्राट मरण शय्या पर पड़ा है. हम तुमसे यह पूछने आए हैं कि तुम्हें जीवन में आनन्द मिला है? वह आदमी कहने लगा – आनन्द मैंने पा लिया है. कहो मैं क्या कर सकता हूँ. वे खुशी से भर गये और उन्होंने कहा कि तुम्हारे वस्त्रों की ज़रूरत है. वह आदमी हँसने लगा. उसने कहा - मैं अपने प्राण दे दूँ अगर सम्राट को बचाना हो. लेकिन वस्त्र मेरे पास नहीं है. मैं नंगा बैठा हुआ हूँ. अन्धेरे में आपको दिखाई नहीं पड़ रहा.

उस रात वह सम्राट मर गया. क्योंकि समृद्ध लोग मिले जिनका सुख से कोई परिचय न था. एक सुखी आदमी मिला जिसके वस्त्र भी न थे. अधूरे आदमी मिले, एक भी पूरा आदमी न मिला, जिसके पास वस्त्र भी हो और जिसके पास आत्मा भी हो... ऐसा कोई आदमी न मिला. इसलिये सम्राट मर गया.

पता नहीं यह कहानी कहाँ तक सच है. लेकिन आज तो पूरी मनुष्यता मरणशय्या पर पड़ी है और आज भी यही सवाल है कि क्या हम ऐसा मनुष्य पैदा कर सकेंगे जो समृद्ध भी हो और शांत भी? जिसके पास वस्त्र भी हो और आत्मा भी? जिसके पास सम्पदा हो बाहर की और भीतर की भी? जिसके पास शरीर के सुख भी हों और आत्मा के आनंद भी?

(प्रिय ओशो के जन्म-दिवस पर उन्हीं के एक प्रवचन से उद्दृत )