छोटा जगह में पढ़ा लिखा, सरीफ अऊर सरकारी ओहदेदार अदमी को बड़ा आसानी से सम्मान मिल
जाता है. अऊर अगर ऊ सरकारी अदमी गुजरात के सौरास्ट्र छेत्र में तैनात हो, तब त
बाते अलग है. लोग एतना मिलनसार हैं इहाँ पर कि का कहें. तनी सा परेम का भासा
बोलिये अऊर देखिये, तनखा से जादा सम्मान मिलता है इहाँ.
हमरे एगो गाहक हैं, योगेस भाई वनमाली भाई कानाबार. बस इस्टैण्ड पर
मैगजीन का दुकान है, साथ में मोबाइल रिचार्ज का काम, दू गो ऐम्बुलेंस है, जो 108
नम्बर पर फोन करने के साथ सेवा में हाजिर. ड्राइबर रखे है, मगर सीरियस पेसेण्ट
होने पर बिना दिन-रात देखे अपने ऐम्बुलेंस लेकर निकल जाते हैं. एक रोज बता रहे थे
हमको, “सर! दीवाली हमारे लिये
बहुत बड़ा त्यौहार है. लेकिन कई वर्षों से मैंने परिवार के साथ दीवाली नहीं मनाई! दरसल दीवाली के दिन इमर्जेंसी केस के साथ भागना पड़ता है! लेकिन क्या करें सर, यह
काम मेरे लिये कमाई से ज़्यादा सेवादारी का है!”
(योगेश वनमाली भाई कानाबार)
बुधवार को ऊ हमरे केबिन में आये.
लोन का पैसा भरना था, मगर जब ऊ हमरे केबिन में अन्दर आते हैं, त इसका मतलब कुछ खास
कहना, चाहे पूछना होता है. नहीं त केबिन के दरवाजा पर खड़ा होकर “गुड मॉर्निंग सर” का नारा लगाकर मुस्कुराते हुये चले जाते हैं. खैर, ऊ आकर हमरे सामने बइठ गए
अऊर झोला में से एगो निमंत्रन कार्ड निकालकर, उसपर हमरा नाम लिखकर, हमरे आगे कर
दिये.
“किसकी शादी है योगेश भाई!” हम हँसकर बोले.
”शादी नहीं सर! मेरे डिकरा अऊर डिकरी का जन्मदिन है.”
तबतक हम कार्ड पढ़ना सुरू कर दिये
थे.
“कमाल है, दोनों का एक
ही दिन?”
”जी सर! 9 तारीख को है.
सोमवार है और आपको ज़रूर आना है!”
”ज़रूर आउँगा!”
तबतक हमरा नजर कार्ड के नीचे में लिखा हुआ एगो नोट पर गया. निमंत्रन के
साथ-साथ लिखा हुआ था – “इस खुशहाली के अवसर पर
आप जो भी भेंट लायें वो नगद राशि के रूप में हो. इस प्रकार जमा राशि निर्धन बीमार
व्यक्तियों के उपचार पर व्यय की जायेगी तथा इससे एक नयी ऐम्बुलेंस वैन खरीदी
जाएगी, जो नि:शुल्क सेवा के लिये सदा तत्पर रहेगी!”
”बस सर! जो भी पैसे
आयेंगे, उसमें अपने पैसे डालकर ऐम्बुलेंस लेना है.”
”योगेश भाई! आप तो कमाल
के इंसान हैं!” हम अबाक थे कि ई बात
कहते हुये ऊ अदमी के चेहरा पर कोनो अहंकार का भाव नहीं था, बल्कि एतना नम्र सब्द
में ऊ ई बात कह दिया कि हम का बोलें समझे में नहीं आ रहा था.
“एक बात और सर! इसी दिन
से मैं भात खाना शुरू करूँगा, तेरह साल बाद!”
”योगेश भाई! आज तो आप
सरप्राइज़ पे सरप्राइज़ दे रहे हैं.”
”वर्मा साहब! बहुत कम
समय में आपसे बात करके लगा कि आप अपने से हैं. इसलिये जो बात मेरे घर के अलावा
किसी से नहीं कहा वो कह पा रहा हूँ.”
”...........”
”1998-99 की बात है.
मेरा भाई था सतरह-अठारह साल का. उसके पेट में बहुत दर्द रहता था. यहाँ डॉक्टर को
दिखाया, मगर सबने कहा कि भावनगर ले जाओ. वहाँ अच्छे डॉक्टर हैं. हमारे परिवार की
स्थिति बहुत खराब थी. भावनगर ले जाने को किराये के पैसे नहीं थे. एक समय का खाना
किसी तरह खा पाते थे हमलोग. जब उसकी हालत एक रोज़ बहुत बिगड़ गयी तो कुछ पैसे उधार
लेकर, उसे भावनगर ले जाने का इंतज़ाम किया. मगर रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया!”
”................” हमरा मन अजीब तरह से
कचोट रहा था.
“उसके बाद साल 2000 में
मेरी बहन, जिसका उमर 23 साल था, उसके पेट में ट्यूमर हो गया था. हमारे परिवार की
हालत में कोई सुधार नहीं था और बहन की हालत रोज खराब होती जा रही थी. पहले भावनगर,
फिर अमदावाद में उसका ईलाज शुरू हुआ. आठ महीने के ईलाज में सिर की छत सिर्फ
तिरानवे हज़ार रुपये में बिक गयी. और एक दिन उस बहन ने हम सबों को पैसे की तकलीफ से
आज़ाद कर दिया और ख़ुद शरीर की तकलीफ से छुट्टी पा गयी!”
”हे भगवान!”
”बस वर्मा साहब! उसके
मृत शरीर के सामने मैंने नेम उठाया (प्रतिज्ञा की) कि आज के बाद मैं तब तक पैर में
चप्पल नहीं पहनूँगा और भात नहीं खाउँगा, जबतक अपने गाँव के लिये एक ऐम्बुलेंस नहीं
ले लूँ.”
”मगर आपके पैर में तो
चप्पल है!”
”सात साल तक बिना चप्पल
घूमता और काम करता था सर! बाद में घर वालों ने कहा कि ऐसे कबतक चलेगा. एक नेम
निभाओ. तब मैंने सात साल बाद चप्पल पहनना शुरू किया, मगर भात खाना बन्द रहा. फिर बहुत मेहनत की सर! सिर पर छत वापस आयी. बच्चों को अच्छा पहनने-ओढ़ने को
दिया, माँ को मुख्यमंत्री ने पच्चीस हज़ार रुपये दिये थे. वो माँ ने काम में लगाये
और फिर तीर्थ-यात्रा करके आयी! नौ तारीख को बच्चों के जन्मदिन पर जो भी पैसे
आयेंगे, उससे ऐम्बुलेंस लाउँगा और तब तेरह साल बाद भात खाकर अपना नेम पूरा करुँगा!
आप आइयेगा ज़रूर! आप तो आयेंगे ही!”
जोगेस भाई एतना कहकर हमरे केबिन
से बाहर निकल गये, फिर से ओइसहिं हँसते हुये बाकी लोग से बात करते हुये. मगर हमको
छोड़ गये एक अजीब सा हालत में. ओसो कहते हैं कि तकलीफ माँजकर चमका देता है इंसान
को. आज हमरे सामने ऊ इंसान मँजकर अपना चेहरा पर जऊन चमक लिये हुये निकला है, एगो
मिसाल है. छोटा-छोटा बच्चा के जनमदिन पर लोग गिफ्ट देता है बच्चा को, मगर ई बच्चा
लोग जऊन गिफ्ट देने जा रहा है समाज को, उसपर त खड़ा होकर माथा नवाने का मन करता है!


