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रविवार, 7 अगस्त 2011

सपनों का महल - हवा महल


आकासबानी पटना का इस्टूडडियो नंबर पाँच. दरवाजा के ऊपर लाल बत्ती जल रहा है, माने अंदर रिकॉर्डिंग चालू है. तब झांककर सीसा से देखते थे कंट्रोल रूम से. पुष्पा दी नाटक रिकॉर्ड कर रही होती थीं अउर उधर सत्या सहगल और सतीस आनंद संबाद बोल रहे होते थे. आस्चर्ज होता था कि कैसे खाली अपना आवाज से पूरा का पूरा दिरिस सुनने वाले के सामने रख देते थे ऊ कलाकार लोग. मन मोताबिक एक्स्प्रेसन नहीं होने पर पुष्पा दी का गुस्सा के आगे सीनियर से सीनियर कलाकार जैसे अखिलेश्वर प्रसाद, प्यारे मोहन सहाय, मनोरमा बावा, भगवान साहू, भगवान प्रसाद, रामेश्वर प्र. वर्मा भी कुछ नहीं कह पाते थे. मगर जब काम सही हो जाता त ओही पुष्पा दी एगो बच्चा के तरह हंसते हुए सबका धन्यवाद करती थीं.

कब हम कंट्रोल रूम से निकलकर इस्टूडडियो में पहुँच गए, पते नहीं चला. पुष्पा दी का स्क्रिप्ट पर मेहनत देखकर लगता था कि उनके लिए नाटक जूनून से कम नहीं है. आज भी याद है कि पूरा स्क्रिप्ट में कलम से निसान बना रहता था, मुँह गोल करके बोलने के लिए के लिए निसान, फुसफुसाकर बोलने के लिए निसान, कुछ एक्सप्रेसन के लिए तो वो प्रस्नबाचक चिह्न लगाने को कहती थीं, जबकि उसमें सवाल नहीं होता था. आज भी उस तरह का बाक्य बोलते समय उनका याद आ जाता है. कुल मिलाकर स्क्रिप्ट में संबाद से जादा नोटेसन होता था.

फिर हम इस्टूडियो से निकलकर डबिंग रूम तक पहुँच गए उनके साथ. नाटक में संगीत, इफेक्ट अउर गलत संबाद को काटकर फाइनल रूप में लाना. पुष्पा दी को हमरे ऊपर बहुत भरोसा था. कहाँ कौन सा म्यूजिक देना है और कहाँ क्या इफेक्ट. इहाँ पर हम कुमार चंद्र गौड़ साहब का नाम भी लेना चाहेंगे. पुष्पा दी को उनके ऊपर भी गजब का भरोसा था डबिंग में. वो स्टाफ आर्टिस्ट थे अउर उनका नाम नाटक के क्रेडिट में देना जरूरी नहीं होता था, मगर पुष्पा दी का बड़प्पन था कि हमेसा उनका नाम देती रहीं.

ई सब फ्लैस बैक का जइसा मन का आँख के सामने से गुजर गया. नाटक छोड़े हुए ज़माना हो गया. आख़िरी नाटक कब किये होंगे याद भी नहीं. अपना आवाज रिकॉर्ड करने का भी कोइ इच्छा नहीं रहा मन में. एक बार आवाज की दुनिया पर पोस्ट लिखे तो अपने प्रिय चैतन्य जी के जिद में पॉडकास्ट किये. मगर झिझक महसूस होता रहता था हमेसा.

अर्चना के रूप में एगो छोटी बहिन मिली. कभी देखे नहीं, कभी मिले नहीं. अर्चना का खासियत है पॉडकास्ट. लोगों का लिखा हुआ केतना पोस्ट अर्चना के आवाज में सुना जा सकता है. समर्पित है एही साधना में, बिना इस लालच के कि परसिद्धि या तारीफ चाहिए, स्वान्तः सुखाय. एक रोज अचानक हमरा पोस्ट उसके आवाज में मेल से मिला, साथ में अनुरोध कि अनुमति दीजिए. हम घबरा गए. पहिला अनुभब था कि कोइ हमरा पोस्ट अपना आवाज में लगाने जा रहा था. आवाज में कमी बहुत था, काहे कि ई बोली के साथ बड़ा नहीं होने वाला के लिए इसमें बतियाना मोसकिल है. हम अपना आवाज में रिकॉर्ड करके भेज दिए कि इसको सुनो अउर अइसा ही बोलने का कोसिस करो. पता चला हमारे आवाज में पोस्ट उसके ब्लॉग पर लगा हुआ है. बाद में अपना आवाज में भी पॉडकास्ट की.

एक रोज फिर हमको बोली कि भैया आप तो रेडियो पर नाटक करते थे, क्यों न हमलोग मिलकर हवा महल जैसा कोइ नाटक करें. कहानी हम सोच लिए हैं. हमरे साथ मोसकिल है कि ना हमरे मुँह से निकलता नहीं है. अउर नाटक के नाम पर तो पहले भी कह चुके हैं कि मृत्यु सय्या पर भी हों अउर कोइ बोले कि ओथेलो करोगे, त हम जमराज से भी घंटा भर का टाइम मांग कर चल देंगे कि अगर अगिला जनम होता हो तो उसमें एक घंटा काट लीजियेगा.

खैर, कहानी को काट-छांट कर नाटक बनाए (ई तो आज पता चला कि अर्चना को संदेह था कि हम ई कर सकते हैं कि नहीं). मगर इसके बाद सुरू हुआ हमरा हाथ का बीमारी, फिर अर्चना बीमार, घर पर कभी बेटे का तो कभी बिटिया का एक्सीडेंट, फिर बच्चों का सगाई, फिर सादी का इंतजाम. हमरे पास भी समय नहीं था. करीब चार महीना लगा इसको पूरा होने में. मगर जब रिकॉर्ड किये त एक्के बार में फाइनल.

कहाँ रेडियो नाटक में कलाकार साथ में बैठकर आमने सामने संबाद बोलते थे, एक्स्प्रेसन समझते थे, अउर कहाँ हमरा नाटक कि एगो आदमी नोएडा में अउर दोसरा इंदौर में. फिर अनुराग शर्मा  जी का मदद से पार्श्व संगीत का सोचे मगर उनके पास समय नहीं था, फिर तारनहार बनाकर आए पदम सिंह जी. उनको भी अर्चना ही राजी की अउर बना “हवा महल.”

कमाल ई है कि जिसका कहानी है उसको नहीं देखे हैं कभी - श्री संजय अनेजा, जिसके साथ मिलकर अभिनय किये उससे भी नहीं मिले हैं कभी- श्रीमती अर्चना चावजी, जो इसका उद्घोसना किये है उनसे खाली एक बार मिले हैं अचानक, नाटक के जैसा- श्री अनुराग शर्मा, अउर संगीत संयोजक से एक बार का परिचय है – श्री पदम सिंह! (उनको त यादो नहीं होगा).

ई सब परिचय के बाद सोचते हैं कि का हम उस आदमी को भी जानते हैं अच्छा तरह से, जो इसमें अभिनय किया है – सलिल वर्मा! इस आदमी के बारे में त बस एही कह सकते हैं कि
पहचान तो थी पहचाना नहीं,
मैंने अपने आप को जाना नहीं! (गुलज़ार)