हम त कभी सोचबो नहीं किए थे कि देस छोड़कर बिदेस में नौकरी करने का मौका मिलेगा. अऊर जब मौका मिला त हमरे घर में मातम छा गया. कुछ चुना हुआ लोग को हर साल हमरा ऑफिस बिदेस में पोस्टिंग करता है. गलती से हमको भी चुन लिया गया अऊर शारजाह भेजने का खबर आ गया. पटना फोन करके खुसखबरी दिए त मातम छा गया घर में. एक त एतना दिन के लिए बाहर अऊर दोसरा इस्लामी देस में रहना, ऊ भी हमरा जईसा ठेठ साकाहारी आदमी के लिए. हमरी सिरीमती जी त सिया सुकुमारी, राम के साथ बनवास जाने के लिए भी तैयार, बचिया ई सब समझ बूझ से बाहर थी, उसके लिए का कलकत्ता अऊर का शारजाह.
खैर, ओहाँ पहुँचे त काम का रूटीने अलग था. सबेरे आठ बजे से दोपहर बारह बजे तक ऑफिस, फिर साम को चार बजे से नौ बजे रात तक. बीच में आराम से चार घंटा का नींद. साल का 362 दिन काम. लेकिन ई रूटीन में सबसे बड़ा नोकसान हुआ हमरी सिरीमती जी का. सोसल लाईफ त एकदमे खतम. अनजान जगह, अनजान लोग, अनजान भासा (मलयालम हमरी सिरीमती जी को नहीं आता है, अऊर पास पड़ोस में खाली मलयाली लोग रहता था). हमरा भासा सुनने के लिए उनको सारा दिन इंतजार करना पड़ता था. बेटी भी इस्कूल से आधा दिन बादे आती थी.
लेकिन पानी अपना सतह खुदे खोज लेता है. हमरी सिरीमती जी को ई दोस्ती के पानी का सतह तीन घर हिंदुस्तानी छोड़कर, एगो पाकिस्तानी परिवार में मिला. बीच का तीन घर दक्षिन भारतीय मलयाली का था, अऊर ऊ लोग कोई बतियाता भी नहीं था, काहे कि हिंदी नहीं समझता था. पाकिस्तानी परिवार में हमरी सिरीमती जी को उर्दू बोलने वाली सहेली मिल गई. उर्दू त एकदम हिंदिए जईसा भासा है, कोनो दिक्कत नहीं होता है समझने में, हमरी सिरीमती जी का कहना था.
औरत लोग का दोस्ती, फिर बच्चा लोग का दोस्ती, फिर मर्द लोग का दोस्ती. बातचीत, फिर घर आना जाना, फिर बर्थ डे, मैरेज डे, फिर साथ घूमना फिरना. दोस्ती एतना बढ गया कि उनके घर पर पाकिस्तान से आने वाला उनका रिस्तेदार लोग भी हमरे घर आने जाने लगा. बाकी साल भर बाद जो घटना हुआ, ऊ हमरा दिल को छू गया. हमलोग पटना जाने वाले थे. जाने के एक रोज पहिले रात में शह्जादी भाभी हमरे घर आईं, हाथ में एगो झोला था. ऊ झोला में पटना में हमरे माँ के लिए साड़ी, अऊर छोटा भाई की दुलहिन के लिए सूट का कपड़ा था, अऊर बेटा के लिए ड्रेस. साथ में काजू बादाम. हमरे मुँह से त आवाजे नहीं निकला, लेकिन ऊ बोलीं, “भाई जान, पहली बार जा रहे हैं आप लोग. हमारा ज़िक्र किया है आपने घर पर. हमारी तरफ से कुछ सौग़ात नहीं ले गए तो लोग क्या सोचेंगे”. हम कुछ कहिए नहीं पाए, मगर दिल भर गया हम लोगों का. दोसरा दिन जब निकलने लगे घर से तो शहज़ादी भाभी हाथ में क़ुरान पाक लेकर आईं अऊर बोलीं कि क़ुरान पाक के साए में घर से बाहर निकलिए, अल्लाह की हिफ़ाज़त में.
दीवाली के रोज साम को ऑफिस से लौटे त अपना घरे पहिचान में नहीं आ रहा था. हमरे घर का पूरा पर्दा अऊर सोफा का कभर एकदम नया हो गया था. पता चला कि दिन भर बईठ कर शहज़ादी भाभी हमरे घर का पर्दा अऊर कभर सिलाई कर दीं, बोलीं इतना ख़ूबसूरत त्यौहार है और पुराने पर्दे. उनका बच्चा लोग आकर बोला कि आण्टी हम लोगों ने दीवाली सिर्फ हिंदी फिल्मों में देखी है. आपके साथ दीवाली मना सकते हैं हम. अब ई त कोनो मना करने वाला बाते नहीं था. अपने फ्लैट के अंदर में मोमबत्ती जलाकर सबके साथ दीवाली मनाए.
हम त ऑफिसे में ओझराए रहते थे, लेकिन ऊ लोग कहीं भी घूमने जाता था त हमरा परिवार के लोग को साथ ले जाता था. पाकिस्तान से उनका कोई रिस्तेदार आया त हमए घर के लिए सौगात लेकर आता था. दुबई, अबू धबी में उनका जेतना परिवार था सब हम लोग का परिवार जईसा था, हमरी सिरीमती जी के कारन.
आज भी हमरी सिरीमती जी के गला में एक लॉकेट है जिसपर अंगरेजी का अक्षर S बना हुआ है. लोग समझता है कि ऊ हमरा नाम है, लेकिन S का माने है शहज़ादी, उनका सबसे अच्छा दोस्त, लेकिन पाकिस्तानी. अईसने एगो लॉकेट उनके गला में भी है,जिसमें हमरी सिरीमती जी का नाम है.
जब हम लोग लौट कर भारत आए, त अईसा लगा कि हम अपना पूरा परिवार छोड़कर आ रहे हैं. जावेद भाई और शह्ज़ादी भाभी, आज भी फोन करते हैं. लेकिन पाँच मिनट के कॉल में आज भी दू मिनट त ऊ दुनो औरत लोग के रोने में निकल जाता है.
आज भी ऊ लोग एक्के बात बोलता हैं, “भाई जान! अगर हालात सुधर जाएँ, तो एक बार हमारे यहाँ आप ज़रूर तशरीफ़ लाना." हमरा जवाब होता है, " इंशा अल्लाह!” मगर जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तो बस अमन का आसा लिए बैठे हैं, अऊर मुनव्वर राना साहब का सेर पर बिचार कर रहे हैं:
सियासत नफ़रतों का ज़ख़्म भरने ही नहीं देतीजहाँ भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है.
