सबेरे से माथा में अजीब सा दरद हो रहा था.समझे में नहीं आ रहा था का लिखें.एतना असमर्थ कभी नहीं पाए हम अपने आप को, खास कर लिखने का मामला में. मामला राखी का था अऊर भाई बहिन का, त तनी होसियारी से लिखना पड़ता है. काहे कि दुनिया में एकबार भगवान भी गुसिया जाए त हम मना लेंगे (हालाँकि उनके साथ त बहुत दिने से लड़ाई चल रहा है) लेकिन अपना एकलौती बहिन को समझाना बहुत मोस्किल है.
पिछला का मालूम केतना साल से राखी बहिन के हाथ से नहीं बँधवाए हैं. कभी ई सहर, कभी ऊ सहर, कभी देस, कभी बिदेस... खानाबदोस का जिन्नगी जी रहे हैं. ई हालत में राखी हमको कोरियर से मिलता है. अऊर राखी के साथ उसका चिट्ठी. बातचीत त होता रहता है, लेकिन बाकायदा चिट्ठी, साल में एक्के बार. अबकी साल का आप भी देखिए,
आदरणीय भईया,
सादर चरण स्पर्श.
बच्चे जब स्कूल में पत्र लिखते हैं, तो पूछते हैं कि औपचारिक लिखना है या अनौपचारिक लिखना है, क्योंकि दोनों के फॉर्मेट अलग होते हैं. ठीक उसी तरह, चिट्ठी लिखने की आदत ख़त्म होने से समझ में नहीं आता कि कैसे लिखूँ. तब मैं पत्र लेखन की पारम्परिक विधि अपना रही हूँ:
मैं यहाँ ठीक से हूँ और आशा करती हूँ कि तुम लोग भी कुशल पूर्वक होगे. आगे यहाँ का समाचार सब ठीक है. राखी भेज रही हूँ, टीका लगाकर बाँध लेना. भाभी को प्रणाम और झूमा को आशीर्वाद. बच्चों तथा इनके तरफ से प्रणाम.
तुम्हारी
विनी
चार भाई में अकेली बहिन. एकदम पागल, खानदानी बीमारी है.
हमको फोन करके एक बार पूछी, “कैसे हो?”
“ज़िंदा हैं.” ई हमरा तकिया कलाम है, लगभग सब लोग जानता है. बाकी ऊ रोने लगी तुरत. हम पूछे भी कि का हुआ, मगर काहे चुप होये.
बोली, “दूर रहते हो तो ई सब बात काहे बोलते हो.”
अब हमरा बारी था चुप होने का.माता जी भी कहती हैं कि भरली साँझ मुँह से खराब बात नहीं निकालना चाहिए. जीने मरने का बात. मगर हम आदत से बाज नहीं आने वाले थे. इसलिए ऊ अपना सवाल बदल दी. अब पूछती है कि सब ठीक है ना.
जब पढाई करती थी एम.ए. में त हमको बोली कि छुट्टी लेकर हमको पढा दो. अब बताइए, ई त मजाके न हो गया. हम ठहरे एम.एस-सी. केमिस्ट्री अऊर बहिन जी का सब्जेक्ट मनोबिज्ञान. हमको त ई हो नहीं बुझाता था कि ससुरा साइकोलॉजी P से लिखाता है कि S से. मगर बोले कौन. कह दिए कि नहीं पढाएंगे त टप टप लोर चूने लगेगा. छुट्टी लिए, पढे पहिले, फिर पढाए. पता चला कि फस्ट क्लास में पास हो गईं, बहुत बढिया नम्बर से.
हम त अबाक रह गए.मगर उसका कॉन्फिडेंस देखकर लगा कि बहिन का भरोसा भाई का सही साइकोलॉजी समझता है.
दूगो बड़ा बड़ा बच्चा है उसको,मगर हमको इस्टेसन पर,चाहे एयरपोर्ट पर छोड़ने आएगी त बिना बच्चा ऐसन रोले बिदाईये नहीं हो सकता है. बच्चा थी त घर में माता जी के नहीं रहने पर, इस्कूल से आने पर हम उसको खाना निकाल कर देते थे, उसका इस्कूल का युनिफॉर्म प्रेस करते थे. कभी लड़ाई किए होंगे, याद नहीं.
आज भी फोन पर बतियाते बतियाते हम उसका खुसी, दुःख, तकलीफ, उदासी, उमंग सब महसूस कर सकते हैं. बहिन लोग होबे करती हैं अईसने.
आइए अब दू गो अऊर बहिन से मिलिए. पहली हैं बड़की दीदी, सरिता दी. अभी लंदन में हैं. नानी बनने गई थीं, मगर बचिया बहुत इंतजार कराई. नौ तारीख का बोलकर, 20 तारीख को पैदा हुई. उनका मेल हमको मिला. आप भी देखिए. एतना दूर रहकर भी उनका प्यार अऊर स्नेह दिल को छू गया. सरिता दी, प्रणाम है आपको!!
प्रिय सलिल,
मैं भी ना..(चार्ल्स डिकेंस की ग्रेट एक्स्पेक्टेशंस पढते हुए) सोच रही हूँ कि सलिल ने ये किताब पढी होगी या नहीं...? वो भी हस्पताल में… तीन दिन बड़े ख़राब गए...पर बुरा समय भी टिकता थोड़े ही है... अब सब ठीक है. नन्ही परी आ गई एक लम्बे इंतज़ार के बाद..हम एक स्पेशियालिटी हस्पताल में थे, इसलिए कॉम्प्लीकेशंस को दूर कर लिया गया.. अब मैं नन्ही सी जान के साथ प्यारा सा समय बिताना चाह्ती हूँ.
परिवार के लोगों के अतिरिक्त तुम वो पहले व्यक्ति हो जिसको यह ख़बर दी है मैंने...लेकिन तुम भी परिवार ही तो हो..
शुभकामनाओं सहित
सरिता दी.
दूसरी बहन हैं डॉ. दिव्या श्रीवास्तव. बिना बताए बैंकॉक से लखनऊ चली आईं. अऊर हम सारा दुनिया में लोग से पूछते फिर रहे हैं कि ए, भाई!! ए भाई!!! किसी ने देखा है मेरी बहन को. कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया. एगो पता मिला.. ऊ भी डॉक्टर थी, दिव्या भी थी अऊर श्रीवास्तव भी थी. मगर हमरी बहिन वाली दिव्या नहीं थी.
आज अचानक प्रकट हो गई. बोली ज़िंदा हूँ मैं. हवाई जहाज त कोनो कसर नहीं छोड़ा था. लेकिन बच गई. देखिए जरा इनका चिट्ठीः
सलिल भाई ,
रिश्ते या तो बनाती नहीं , बनाती हूँ तो निभाती भी हूँ ! आप जैसे भाई का मिलना , मेरा सौभाग्य है ! इज्ज़त करती हूँ आपकी, प्यार करती हूँ आपसे बेहद।
विमान हादसे में शायद इसीलिए बच गए , क्यूंकि एक भाई की शुभकामनाएं , और प्यार मेरे साथ था ।
माँ को मेरा नमस्ते कहियेगा !
रक्षा- बंधन के इस पावन पर्व पर मेरी तरफ से शुभकामनाएं और मिठाइयाँ ।
मगर असली बात बताएँ... राखी त ई बाद में बाँधेंगी अऊर मिठाई खिलाएँगी, रक्षा हमसे पहिले करवा लीं. बिमान हादसा ई भाई का कारन टल गया.
अब बताइए. राखी का त्यौहार भी गजब का त्यौहार है न! अऊर ई बहिन लोग भी अजीब होती हैं. एगो विनी, जो चिट्ठी लिखने के लिए आज भी पारम्परिक फॉर्मेट ब्यवहार करती है, एगो सरिता दी, लंदन के हस्पताल में चार्ल्स डिकेंस का नॉवल पढकर याद करती हैं कि हम ऊ नॉवल पढे होंगे कि नहीं अऊर एगो दिव्या, जो हमरे हिसाब से दिल का डॉक्टर है, डॉक्टरी चाहे कोनो डिपार्ट्मेंट में करे.
पुनश्चः परिवार का सभी बहनों को राखी के दिन लिए हमारा सुभकामना, आसीस, स्नेह अऊर प्यार... ई पोस्ट कुछ चिट्ठी, जो पिछला दू दिन में हमको मिला, अऊर दिल को छू गया बस उसके लिए था.. अईसा नहीं कि हम अपने बहनों को भुला गए हैं.
