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शनिवार, 20 अगस्त 2011

बुड्ढा होगा तेरा बाप!!


पीछे एतना बिजी रहे कि ब्लॉग पर आने का समय बहुत कम मिला. मगर फेसबुक पर तनी जादा समय बीता. फेसबुक पर जेतना लोग देखाई देता है उसमें बहुत सा लोग हमारे उमर का है अउर बहुत सा नबजुबक है. हमारे लिए ऊ लोग बच्चा है. मगर हमरा इंटरैक्शन बच्चा लोग के साथ बहुत सुखद रहा है. कभी-कभी ई लोग का सोच, बिचार, लेखन देखकर ताज्जुब होता है. ई लोग के साथ मिलकर अपना समय भी याद आता है अउर अपने बड़प्पन का भी एहसास होता है. मन भर जाता है जब कोइ चचा, कोइ चाचू कहता है. कभीकभी त हमरे साथी लोग कह देते हैं हमको कि तुम कहाँ बच्चा सब के बीच फंसे हो, बुड्ढे हो रहे हो, इस सच्चाई को तो समझो. अब साथी को तो नहीं कह सकते कि बुड्ढा होगा तेरा बाप!
अमिताभ बच्चन जी का सिनेमा देखे बुड्ढा होगा तेरा बाप. सिनेमा त जो था सो था. लेकिन अमित जी एकदम सत्तर के दसक वाला बिजय बने हुए थे. कोइ कहेगा कि उमर के ई पड़ाव पर आकर अपने बेटा से मुकाबला कर रहे हैं अउर खाली मुकाबला नहीं जबरदस्त कम्पीटीसन दे रहे हैं. सत्तर साल होने को आया, दिन में फाइटिंग करते हैं अउर रात में कौन बनेगा करोड़पति खेलाते हैं. दुनो रोल में फिट. बहुत प्रेम अउर बड़प्पन के साथ खेलने वाले को बोलाते हैं, उनसे घुलमिलकर बतियाते हैं. लगबे नहीं करता है कि कहाँ इतना बड़ा सुपर-स्टार अउर कहाँ एगो साधारन आदमी. खाली एही नहीं, सत्तर साल का उमर में भी सब जवान लोग दीवाना है उनका. जब फोन लगाकर बोलते हैं जी मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ, कौन बनेगा करोड़पति से तो अच्छा-अच्छा लोग घबरा जाता है. अब आप ही बताइये अइसा आदमी को कोइ बुड्ढा बोलेगा त एही जवाब मिलेगा सुनने को कि बुड्ढा होगा तेरा बाप!
एगो अउर बुढऊ हैं, हमारे चचा गुलज़ार. अभी १८ तारीख को पछत्तर साल के हो गए. एगो टाइम था कि हम जवान थे अउर कोनों आदमी इनका कविता को बकवास बोलता था त भिड़ जाते थे उससे. हमरे पिताजी के साथ भी केतना बार बहस हुआ, मगर बाद में ऊ भी फैन हो गए गुलज़ार साहब के. कमाल का सेन्स ऑफ ह्यूमर, कमाल का रोमांटिसिज्म, कमाल का बचपना. सबसे बड़ा खासियत त हमको ई लगता था कि कहाँ कहाँ से बिम्ब लेकर आ जाते हैं और सम्बेदना को ऐसा ऊंचाई पर ले जाते हैं कि लगता है कि मोक्ष मिल गया. उनको पढ़ना अउर उनके आवाज़ के गहराई को मन में उतारना कोनो समाधि से कम नहीं है. आजकल फेसबुक अउर ब्लॉग पर नया उम्र का बच्चा लोग को जब लिखते देखते हैं अउर उसपर गुलज़ार साहब का परभाव देखते हैं तो आस्चर्ज होता है. मगर का किया जाए गुलज़ार साहब का रोमांटिसिज्म देखकर हर कोइ को अपना भावना का अभिब्यक्ति मिल जाता है.
आओ तुमको उठा लूं कंधे पर,
तुम उचककर शरीर होठों से,
चूम लेना ये चाँद का माथा.
आज की रात देखा ना तुमने
कैसे झुका-झुक के कुहनियों के बल
चाँद इतना करीब आया है!
अब बताइये भला, ई रोमांस कहीं उम्र का मोहताज है. तीस साल पहिले हम ई पढकर सातवाँ आसमान पर होते थे अउर तीस साल बाद नोएडा के मॉल में एगो जवान लड़का अपनी महबूबा का हाथ अपना हाथ में लेकर एही नज़्म सुना रहा था. अब इसके बाद भी कोइ गुलज़ार साहब को ७५ साल का बुड्ढा बोले तब तो एही जवाब दिया जा सकता है कि बुड्ढा होगा तेरा बाप!!
७४ साल के अन्ना हजारे. बैठ गए हैं अनसन करने. पकड़कर जेल में डाल दिया गया, कोइ बात नहीं, अनसन करना है त ओहीं कर लेंगे. मगर टस-से-मस नहीं होंगे. राजनीति है ई सब, ब्लैकमेल कर रहा है, बरगला रहा है लोग को, खुद भ्रस्टाचार में लिप्त है... बोलने दीजिए. ई बूढ़ा आदमी बस एही बता रहा है कि भ्रस्टाचार को खतम करना है अउर इसके लिए कोनों बिल पास करना जरूरी है. मगर बहस ई है कि ई वाला बिल से भी भ्रस्टाचार नहीं खतम होगा, फलाना को इसके दायरा से बाहर रखो, का गारंटी है कि इसमें भी लोग छेद नहीं करेगा. अरे भाई जब कोनों गारंटी नहीं है तो पास कर दो, काहे झंझट कर रहे हो. मुर्दा पर जैसे आठ मन वैसे दस मन. सैकड़ों साल पहिले का अंग्रेज का बनाया हुआ एक हज़ार क़ानून हइये है त एगो अउर क़ानून सही. मगर एक तरफ बिरोध है दोसरा तरफ नौजवान लोग का जूनून. दिल्ली, नोएडा, चेन्नई, बेंगलुरु, सब जगह नौजवान लोग का जोस देखने वाला है. कोइ सोच भी नहीं सकता है कि नौजवान लोग का सुपर हीरो एगो ७४ साल का बुड्ढा बना हुआ है आजकल. माफी चाहते हैं ई बात कहने के लिए. कहीं सबलोग मिलकर हमरे खिलाफ नारा न लगाने लगे कि बुड्ढा होगा तेरा बाप!!

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

नाम सोचा ही न था!

जेठ का गर्मी कहें कि जून का. जिसमें आपको बेसी जलन महसूस हो ओही महीना समझ लीजिए, काहे कि दुपहर का डेढ़ बज रहा था अऊर हम पिघला हुआ अलकतरा का सड़क पर ख़ड़ा होकर टेम्पो (ऑटो रिक्शा) का इंतजार कर रहे थे. इंतजार का मतलब पटना में दोसरा होता है. समझाते हैं, तब आपको समझ में आएगा. ओहाँ सेयर वाला टेम्पो चलता है. एगो टेम्पो में तीन आदमी बीच में, तीन आदमी पीछे (दूनो तरफ बईठने का सीट रहता है) अऊर तीन आदमी ड्राइवर के सीट पर. बेचारा ड्राइवर बस टिकाने भर का जगह पाता है, अऊर हैंडिल पकड़े रहता है. दूर से देखिएगा त बुझएबे नहीं करेगा कि असल में ड्राइवर कौन है.

धंधा का उसूल एकदम फिट. जब तक नौ सवारी नहीं मिलेगा, तब तक दुनिया इधर का उधर हो जाए टेम्पो का सुमधुर ध्वनी सुनने को तरस जाएगा आपका कान. अऊर कमाल ई कि ड्राइवर एकदम बहरा हो जाता है. आप केतना भी चिल्लाते रहिए कि आगे मिल जाएगा सवारी, मगर का मजाल कि आपका बात उसका कान में जाए. हाँ कोई कोई समझदार टेम्पो वाला, कभी कभी छः आदमी के साथ भी टेम्पो चला देता है, रास्ता में देखते हुए कि कोई मिल जाए.

त इंतजार करने का मतलब आप खड़ा होकर देखते रहिए कि जब पाँच आदमी बईठ जाए, त आप जाकर बईठ जाइए. इससे आपके यात्रा का सिरी गनेस होने का सम्भावना बढ़ जाता है. सड़क पर इन्तजार करने से अच्छा था कि हम बईठ गए टेम्पो में अऊर देखने लगे कि कोई पसिंजर मिल जाए त हम जल्दी से पहुँचे. काम जरूरी था इसलिए जल्दी में थे. लेकिन हमरे चाहने से का होने वाला था. चलाना तो ड्राइवर साहब को था. ऊ प्रेम से अपना हाथ जमाए हुए हैंडिल पर अऊर नजर जमाए हुए सड़क पर देख रहे थे कि एगो अऊर पसिंजर मिल जाए तो चलें.

हमरा बर्दास्त का सीमा टूट रहा था. अचानके हम बोले, “ए बाबू रामपरवेस! आगे सवारी मिल जाएगा. बढाओ यार. “हमरे मुँह से अपना नाम सुनकर ऊ गद्गद हो गया अऊर आव देखा न ताव, पट से इस्टार्ट किया अऊर झट से बोला, “घबड़ाइए नहीं हुजूर. आपको टाइमली पहुँचा देंगे.” टेम्पो इस्टार्ट, अऊर हम एकदम समय पर पहुँच गए. उतर कर उसको धन्यवाद बोले त बेचारा एकदम भाव बिभोर हो गया, “हुजूर! आप धन्यवाद भी बोल रहे हैं अऊर हमको जानते भी हैं नाम से. हम आपसे पइसा नहीं लेंगे.” मगर हम जबर्दस्ती उसके हाथ में पईसा पकड़ा कर चल दिए.
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ऊ दिन सनिबार को रात में बिनोद बाबू घर पर आए अऊर बोले, “वर्मा जी! कल पूजा की परीक्षा है. मेरा भी टेस्ट है कल.” हम समझ गए. उनको बोले, “अरे! काहे परेसान होते हैं. हम हैं न. पूजा बिटिया को हम लेकर जाएँगे परीक्षा दिलवाने.”

“लेकिन आपका सारा दिन बरबाद हो जाएगा.” हम बोले कि हमरे दिन के बरबादी का आप चिंता मत कीजिए, किताब पढ़ते रहेंगे तो टाइम बीत जाएगा.

ऊ रोज भी बहुत गर्मी था. इस्कूल का दरवाजा अभी खुला नहीं था.नतीजा सब बच्चा लोग खुला सड़क पर धूप में खड़ा था. हम पूजा बिटिया को लेकर धीरे से दीवार के छाया में चले गए. गर्मी था मगर धूप से बच गए. कुछ अऊर बच्चा बच्ची लोग भी उधर आ गया.

ओहीं धूप में एगो दुबली पतली लड़की, हाथ में पेपर लिए, उसका छतरी बनाकर अपना माथा धूप से बचा रही थी. हमको लगा कि बताओ ई बच्चा सब धूप में खड़ा है. अईसन हालत में तो जो पढा है सब भाप बनकर उड़ जाएगा. कुछ माता पिता लोग कुढ़ रहे थे मन ही मन, इस्कूल प्रसासन को खरा खोटा भी सुना रहे थे. मगर इस्कूल का दीवार एतना ऊँचा था कि उस पार कोई आवाज सुनने वाला नहीं था.

ऊ बचिया बहुत परेसान लग रही थी. सायद धूप से उसका तबियत खराब हो रहा था. अब हमसे देखा नहीं गया. हम पूजा को बोले, “ पूजा! रूची बेचारी धूप में परेशान है, उसको बुला लो इधर छाया में.”

पूजा हिचक रही थी बोलने में तो हम ही उसको बोले, “रूची बेटा! तुम इधर आ जाओ. हम उधर चले जाते हैं. ये लो पानी पी लो.” ऊ तुरत हमरे हाथ से बोतल लेकर पानी पी अऊर छाया में आ गई. बोली कुछ नहीं. धीरे से पूजा से पूछी, “अंकल को मेरा नाम कैसे पता चला.”

हम मुस्कुरा दिए. बोले, “ ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. तुम्हारे हाथ में जो पेपर है उसपर लिखा है तुम्हारा नाम. दूर से दिखाई दे रहा है. तुमने ही तो बताया मुझे अपना नाम!” रूची मुस्कुराने लगी अऊर थोड़ा देर पहिले धूप से जो ऊ परेसान हो रही थी, अब एकदम निस्चिंत लग रही थी.

ई दुनो घटना के बीच करीब बीस साल का अंतर होगा. ऊ टेम्पो वाला जब हैंडिल पर हाथ रखे हुए था तो हम देखे कि राम परवेस नाम गोदा हुआ था उसके हाथ पर. अऊर हम उसको ओही नाम से बोले. सिनेमा होता तो उसका कोई बिछड़ा हुआ भाई चाहे दोस्त का नाम हो सकता था. लेकिन ई नाम उसी का था.

ई दुनो घटना का जिकिर हम इसलिये नहीं किए कि हमको आपलोग कहिए कि वाह आप तो एकदम शर्लॉक होम्स वाला काम किए, कैसे सोच लेते हैं आप. अऊर हम भी चेहरा को तनी सीरियस बनाकर बोलें कि एलेमेंटरी माई डियर वाट्सन!

वास्तव में हम लोग अपना रोजमर्रा के जीबन में न जाने केतना लोग से मिलते हैं. लेकिन न तो कभी जरूरत हुआ कि उनका नाम पूछें, ना कभी जानने का इच्छा हुआ. एगो ऑफिस में तीन चार साल काम करने के बाद, जब ट्रांसफर हुआ एक आदमी का तो उनके बिदाई में लोग बोला कि आज श्री एस. के. सेनगुप्ता को हमलोग बिदाई दे रहे हैं. और जब ऊ बोले तब पता चला कि उनका नाम स्वपन कुमार सेनगुप्ता था. ऐसहीं केतना आदमी को हमलोग सर्मा जी, चड्ढा जी, सिन्हा जी के नाम से जानते हैं. मगर कभी फर्क देखे हैं उनके ब्यवहार में जब कोई उनको अनिल जी, तिरलोचन जी या दुर्गाशंकर जी के नाम से बुलाता है. एक बार सुरू करके देखिये. मजा आ जाएगा. अंधेरा में भी अगर इस नाम से उनको बुलाया जाए, तो उनके दिमाग में सिर्फ आपका तस्वीर बनेगा, काहे कि ई नाम से तो खाली आप ही बुलाते होंगे उनको.

कलकत्ता में प्रभात दा के घर गए तो उनकी पत्नी सिस्टाचार बस पूछ लीं, “रेणु केमौन (रेणु कैसी है)?” तो एकबारगी हमरा चेहरा खाली हो गया, मगर तुरत हम संभलकर बोले, “ भालो (अच्छी है).” जवाब देने में 15 सेकण्ड का पॉज आने का कारन ई था कि हम अपनी पत्नी को बेबी यानि उनके घर के नाम से बुलाते हैं, सब लोग उनको इसी नाम से बुलाता है. इसलिए रेणु नाम से उनको पहचानने में समय लग गया. हमको बताना पड़ा कि जब भी कोई हमको रेणु के बारे में पूछता है तो लगता है कि किसी अजनबी के बारे में पूछ रहा है.

हमरे शेख पीर साहब, नहीं पहचाने आप लोग, अरे लोग जिनको शेक्सपियेर कहता है, ऊ भले ही बोले हों कि नाम में का रखा है, गुलाब को कोनो नाम से बोलाइए, उसका खुसबू थोड़े न बदल जाएगा. लेकिन ई भी सच है कि कैक्टस नाम से भी गुलाब वाला खुसबू नहीं आ सकता. इस मामला में हम भी गुरू गुलज़ार साहब का बात मानते हैं. सुनिए उनके नाम का कहानी उनका ज़ुबानी अऊर हमरा बात पर अमल सुरू कर दीजिए.एक महीना में आस पास का दुनिया बदल जाएगा आपकेः

नाम सोचा ही न था, है कि नहीं
‘अमाँ’ कहके बुला लिया इक ने
‘ए जी’ कहके बुलाया दूजे ने
‘अबे ओ’ चार लोग कहते हैं
जो भी यूँ जिस किसी के जी आया
उसने वैसे ही बस पुकार लिया,
तुमने इक मोड़ पे अचानक जब
मुझको ‘गुलज़ार’ कहके दी आवाज
एक सीपी से खुल गया मोती
मुझको इक मानी मिल गया जैसे!

बुधवार, 18 अगस्त 2010

मेरी आवाज़ ही पहचान है!!

आज गुलज़ार साहब का जनमदिन है. उनके हज़ारों चाहने वालों के लिए तो त्यौहार सा दिन होता है, हमरे लिए भी है. पहले एक नज़्म लिखे थे उनके लिए “सम्वेदना के स्वर” पर. बस आज ओही दोबारा आपके समने लाने का मन कर रहा है.

गुलज़ार साहब कबिता का नया ब्याकरन लिखने वाले शख्स हैं. पंचम दा, यानि स्व. आर. डी. बर्मन, एक बार उनके कबिता से तंग आकर बोले कि यार तुम किसी दिन टाइम्स ऑफ इण्डिया का कोई हेडलाइन लाकर दोगे और कहोगे इसकी भी धुन बना दो. हालाँकि ऊ पंचम दा का प्यार था. अब कोई उनके कबिता को टाइम्स ऑफ इण्डिया का हेडलाइन बोले या कुछ भी, हमरे लिए त ओही साहित्त है अऊर ओही कबीर का साखी.

न कबिता लिखने का कूबत है हममें,न नज़्म लिखने का. लेकिन गुरुदेव को जियो हज़ारों साल कहने का तो जज़्बा हईये है. तो बस एक नज़्म..दिल से!!

कब सोचा था दादी नानी के सारे अफसाने बिल्कुल झूटे होंगे,
चाँद पे कोई बुढिया रहती है, ये सब बस कोरी गप्प थी.
आज ही मैंने जाना है ये
चाँद पे रहता है एक शख्स, सफेद पजामे कुर्ते
और तिल्लेवाली एक जूती पहने,
बुढिया की अफवाह उसी ने फैलाई थी सदियों पहले.
आज ही मैंने जाना है
इक नाम भला सा है उसका
और भरी हुई है सिर से लेकर पाँव तलक
भरपूर मोहब्बत, गहरा प्यार
ज़ुबाँ पे क्यों आता ही नहीं... सम्पूरन सिंह गुलज़ार.

तुम सलामत रहो हज़ार बरस!!

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

न न रहने दो, मत मिटाओ इन्हें!

न न रहने दो मत मिटाओ इन्हें
इन लकीरों को यूँ ही रहने दो
नन्हे नन्हे गुलाबी हाथों से
मेरे मासूम नन्हे बच्चे ने
टेढी मेढी लकीरें खींची हैं
क्या हुआ शक्ल बन सकी न अगर
मेरे बच्चे के हाथ हैं इनमें
मेरी पहचान है लकीरों में.

गुलजार साहब का ई नज़्म का मालूम केतना साल पहिले पढे थे. तब ना तो सादी बिआह हुआ था न बाल बच्चा का बात सोच सकते थे. लेकिन ई नज़्म में कुछ अईसा था कि बाँध लेता था. गुलज़ार साहब का कुछ नज़्म जो आज भी हमको मुँहजबानी याद है, उसमें से ई सबसे ऊपर है. काहे कि रोज इससे गाहे बगाहे मुलाकात होइए जाता है.

अब कोनो दोस्त के यहाँ गए, जिसके यहाँ छोटा बच्चा है, त कहने का बाते नहीं है कि देवाल पर खींचा हुआ अईसा टेढा मेढा लकीर देखाई देगा. बचवा त ड्राईंग रूम का मतलबे समझता है कि जहाँ ड्राईंग किया जाए. अऊर जब एतना बड़ा कनवास मिल जाए त फिर ऊ बच्चा को रोक सके त रोक ले कोई.

एगो प्लास्टिक पेंट का बिज्ञापन आता था टीवी में कि ई पेंट लगाने से इसके ऊपर कोनो लिखा हुआ आसानी से पोंछा जाता है. ऊ बिज्ञापन लिखने वाला को ई नज़्म का मर्म पते नहीं होगा. नहीं त एतना सम्बेदनहीन कॉपीराइटिंग नहीं करता.

हमरे बिचार से त बच्चा को डाँटने से अच्छा है कि ई सब फोटोखींचकर रखिए, बड़ा होगा त देखाइएगा.

एही नहीं, तनी सोचिए कि अगर कहीं गलती से आपका बचवा पेंटर बन गया, चाहे कोनो पेंटिंग का प्रतिजोगिता में पहिला प्राइज ले आया, त आपहीं सबसे पहिले माइक पर बोलिएगा कि बचपने से इसका अंदर पेंटर बनने का लच्छन था. देवाल पर पेंटिंग करता रहता था.

अईसने एगो पेंटर हैं अनुभव प्रिय. उमर 14 साल. पेन चाहे पेंसिल का स्ट्रोक देखकर लगता है कि उमर से आगे का काम है. शेड्स पर कमाल का कंट्रोल है. एक बार खुद से एगो कहानी लिखकर,काला सफेद में उस कहानी के सब चरित्र के कोलॉज से किताब का जिल्द भी बना डाले.
इनके आदर्श हैं स्व. सत्यजीत रे. जैसे सत्यजीत रे उपन्यास के अलावा, अपने सिनेमा का कहानी, पटकथा अऊर सम्बाद त लिखबे करते थे, साथ ही सब चरित्र का स्केच बनाकर उसका कॉस्च्यूम तक डिजाइन करते थे. फिल्म के स्क्रिप्ट के साथ साथ उनका स्केच बुक जिसमें सेट का चित्र, लोगों के खड़े होने का जगह सब बना रहता था. फिल्म का संगीत त बाद में जाकर खुद देने लगे थे. सही माने में जीनियस.

बस अनुभव बाबू बना लिए अपना आदर्स सत्यजीत बाबू को. पेंटिंग सुरू किए, स्केच बनाने में, ड्राइंग में मुख्य मंत्री के हाथ से पुरस्कार मिला. चौथा पाँचवाँ क्लास से इस्कूल का फंक्सन में कार्जक्रम संचालन करना, नाटक में भाग लेना, कहानी लिखना, कबिता लिखना अऊर अपने से बड़ा साइज का सिंथेसाइजर बजाना. सत्यजीत रे का सारा सिनेमा देख गए, कुछ समझे कुछ समझाना पड़ा.

भासा प्रेम अईसा कि बंगला लिखना पढना सीखे अऊर जब पूरा तरह सीख गए, त अपने इस्कूल में एगो मुसलमान दोस्त को सिखाना सुरू कर दिए. ऊ दोस्त को मौलवी घर पर उर्दू पढाने आता था. बंगला सिखाने का फीस एही था कि ऊ अनुभव को उर्दू सिखाए. देखते देखते साल भर में उर्दू लिखना पढना आ गया.

अभी उसका चौदहवाँ जनम दिन, मई महीना में था. नानी पूछीं कि क्या चाहिए? उसका जवाब था, “हिंदी उर्दू डिक्सनरी.”

हम उसको तोहफा में दिए गुलज़ार साहब का “पुखराज”.

अनुभव हमरा बेटा है, ई पुस्त में एकलौता बेटा. उसके पिता से त आप पहिले ही मिल चुके हैं.

गुलज़ार साहब एक बार टीवी ईण्टर्व्यू में बोल रहे थे कि उनका एगो कबिता (साँप और रस्सी) का सब्द आज भी ओही है, लेकिन मतलब हर उमर के साथ बदलता गया है. पढने वाला के साथ कबिता भी बड़ा होता गया है.

लेकिन हम त आज भी ओही नज़्म का उँगली थामकर बैठे हैं,अऊर सोचते हैं कि हमरा बेटा पहिला बार देवाल पर, चाहे हमरा डायरी के पन्ना पर पेंसिल से कुछ लाईन खींच दिया था, अगर हम ओही टाईम उसको डाँट कर मना कर देते त आज फख्र से ई पोस्ट नहीं लिख रहे होते.


मंगलवार, 29 जून 2010

द्रोणाचार्य अऊर एकलव्य

जब से लिखना सुरू किए हैं, तब से केतना लोग हमको बोला कि आप का लिखने का ढंग बहुत बढिया है, एक बार सुरू करने पर एक साँस में पूरा पढ़ जाते हैं. आप सोचते होंगे कि ई सुनकर हमको बहुत खुसी होता होगा, लेकिन अईसा बात नहीं है. सच पूछिए त इसका पूरा क्रेडिट हमरे तीन गुरू को जाता है, जिनके बारे में हम कभी आप लोग से सीरियसली नहीं बतिआए हैं. लेकिन ई तीन लोगों का एतना असर हुआ है हमरे लिखने पर कि अगर लिखने का ढंग कॉपीराईट कानून के अंदर आता, त हम कबका अंदर हो गए होते. ई तीन लोग हैं डॉ. राही मासूम रज़ा, गुलज़ार साहब अऊर श्री के. पी. सक्सेना.

राही मासूम साहब का सायद ही कोनो उपन्यास होगा जो हम नहीं पढे हों. ऊ अपना एक उपन्यास के पहिला पन्ना पर लिखे थे कि इस उपन्यास में जेतना लोग चलता, फिरता, बोलता देखाई दे रहा है ऊ हमरा बनाया हुआ है अऊर अल्ला मियाँ का बनाया हुआ किसी आदमी से अगर ई मेल खाता है, त ई संजोग हो सकता है, इसमें हमरा कोई गलती नहीं है. एतना सहजता से कहा जाने वाले डिस्क्लेमर कभी सुने हैं आप लोग.. नहीं न! एही खासियत है रज़ा साहब का. नॉवेल का एक एक आदमी आपको आस पास घूमता देखाई देगा, अईसा लगेगा कि आप मिले हैं उससे. उसका पहनावा, उसका बोली. पूरा नॉवेल आपसे बतियाता हुआ मालूम पड़ता है. इसलिए भासा के बारे में सोचने का कोनो जरूरत नहीं, उनका कहना है कि हमरा किरदार अगर अश्लोक बोलेगा त हम अश्लोक लिखेंगे अऊर गाली बोलेगा त गाली. उपन्यास का भासा, वास्तव में हिंदीओ नहीं है, न उर्दूए है, न भोजपुरिए. ई बस बोली है. हमरे पिताजी के एगो दोस्त उनके रिस्तेदार थे. कहे थे कि उनके घर इलाहाबाद जब ऊ आएंगे त हमसे भेंट करा देंगे, लेकिन हमारा किस्मत में नहीं बदा था मिलना. ऊ दोबारा इलाहाबाद आइए नहीं पाए.

गुलज़ार साहब, त सम्वेदना के धनी आदमी हैं. इनका भी डायलॉग एतना सहज होता है कि कहना मुस्किल है. फिलिम ‘अंगूर’ का मजाकिया सम्बाद हो चाहे ‘गृह प्रवेश’ का साहित्यिक. ई फिल्म का डायलॉग नोट करने के लिए, हम अंधेरा में डायरी लेकर देखने गए थे सिनेमा, अऊर एक हफ्ता में तीन बार देखे थे. उम्मीद नहीं था कि चलेगा, लेकिन चल गया तीन महीना. गुलज़ार साहब का कविता अईसा अईसा प्रतीक लेकर आता है कि कहना नहीं. आम आदमी के सोच से बाहर, लेकिन सुनने के बाद लगता है कि मन का बात बोल दिए हैं. इनका त सबसे बड़ा खासियत एही है कि ई एगो अलगे डिक्सनरिए बना दिए हैं. सब्द नया लगता है लेकिन वास्तव में भुलाया हुआ सब्द होता है. हर कबिता, हर फिल्मी डायलॉग आपसे बतियाता हुआ मालूम पड़ेगा. भासा उनके हिसाब से उर्दू भी है अऊर हिंदुस्तानी भी. मुम्बई में एक बार उनका फोन नम्बर मिला दिए थे, जब ओन्ने से उनका आवाज सुनाई दिया त डरे हाथ से फोन छूट गया. तनी मनी बतिआए, मन तृप्त हो गया.

के. पी. सक्सेना जी हमरे दिल के बहुत करीब हैं, काहे कि इनके साथ हमरा बचपन जुड़ा हुआ है. इस्कूल में पढ़ते थे तब ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ के पत्रिका ‘पराग’ में उनका धारावहिक कहानी छपता था “बहत्तर साल का बच्चा”. पहिला बार ओही गढ़े थे एगो अईसा करेक्टर जो “स” को “फ” बोलता था (आज ‘कमीने’ सिनेमा में लोग को ई बात नया लगता है, जो ऊ आज से तीस साल पहिले लिख दिए). देसी मुहावरा का जेतना बेहतर इस्तेमाल ऊ किए हैं, सायदे कहीं देखने को मिलेगा. भासा ठेठ लखनऊ के गुड़ में पका हुआ. एकदम नया भासा, जिसमें उर्दू का मिठास था और अवधी का अपनापन. कवि सम्मेलन में गद्य पढने वाले ऊ पहिला अऊर सायद एकलौता साहित्यकार रहे होंगे (सरद जोसीजी भी बाद में पढ़ते थे). फिलिम ‘लगान’ अऊर ‘स्वदेस’ में किसान का बोली भी ओही लिखे थे, ‘जोधा अकबर’ में जिल्ले इलाही का उर्दू भी उन्हीं का कलम से निकला था अऊर ‘हलचल’ फिलिम का कॉमेडी भी. जब हम पहिला बार लखनऊ गए त भूलभूलईया देखने बाद में गए, सबसे पहिले उनका दर्शन करके, उनका चरन छूकर आसिर्बाद लिए.
ई तीनों महान लेखक लोग में एक्के समानता है कि ई लोग लिखते नहीं हैं, बतियाते हैं. इनका किरदार डायलॉग नहीं बोलता है, बतियाता है. बस हम भी कोसिस करते हैं कि आप लोग से बतिया सकें. नहीं त लिखना हमको कहाँ आता है, न साहित्य से कोनो नाता है. बस ई तीनों द्रोणाचार्य का मूरत, अपना मन में बनाकर एकलव्य बनने का कोसिस कर रहे हैं.