तोहफा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
तोहफा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

प्यार भरा तोहफा!


इस बार पटना गए तो देखे छोटा भाई एगो इस्टील का कैबिनेट खरीदा है, किताब रखने के लिए. घर के देवाल में पहिलहीं से आलमारी बना हुआ है अऊर लकड़ी का अलगे से एगो कैबिनेट है जिसमें बहुत सा किताब रखा है. मगर किताब बढ़ता जा रहा था अऊर जगह कम हो रहा था, इसलिए नया कैबिनेट खरीदना पड़ा. सब किताब के अलावा एहाँ दिल्ली में भी हमरे पास भी एगो लाइब्रेरी बना हुआ है.
पटना में नया पुराना किताब का कलेक्सन, जब जाते हैं देखकर अजीब आनंद होता है. कुछ किताब पर दादा जी के हाथ से अंडरलाईन किया हुआ है, चाहे उनका कमेंट लिखा हुआ है. वईसे हमरे जेनरेसन अऊर हमरे बाद वाला पीढ़ी में एगो बात कॉमन है, हम लोग किताब पर कुच्छो नहीं लिखते हैं. एगो अऊर बात, बुकमार्क के लिये भी कभी किताब के पन्ना को ऊपर के कोना से मोड़कर रखने का भी आदत नहीं है हम लोग में. जहाँ तक पढ़े, वहाँ का पेज नम्बर याद रखे अऊर दोबारा ओही पेज से चालू.
हाँ,  कुछ किताब में पहिला पृष्ठ पर हम लोग के हाथ का लिखा हुआ मिल सकता है. जैसे जन्म दिन मुबारक़, अच्छा पढ़ो अच्छा बनो, इस किताब की कहानियों का अर्थ जीवन में उतारो वगैरह. सब किताब हैं, जो हम भाई  बहन एक दूसरे को जन्मदिन पर गिफ्ट दिया करते थे. हम लिखे भी थे एक बार कि बेटा को जन्मदिन पर गुलज़ार का किताब पुखराजदिए थे. बस अईसहीं कोई संदेस लिखकर जन्म दिन का तोहफा देते थे हम लोग बचपन से. जहाँ खिलौना टूट फूट जाता है या कपड़ा फट जाता है या छोटा हो जाता है, किताब बच्चा के साथ बड़ा होता जाता है.
कैबिनेट से किताब निकाले अऊर पहला पन्ना पलटते ही पुराना दिन नजर के सामने से फ्लैस बैक के जईसा घूम गया. उमर के साथ केतना पढ़ा हुआ भूल जाता है लोग, मगर एक रोज कभी पुराना किताब के पास खड़ा होकर उसको हैलोबोले नहीं कि किताब पिछला सब दास्तान सुनाने लगता है. रोज कोनों पोस्ट पर कमेंट लिखते समय केतना बात कोट कर जाते हैं, लेकिन केतना मोस्किल होता कमेंट लिखना अगर किताब नहीं पढ़े होते. अऊर सबसे बड़ा बात कि जब बचपन से कलम, किताब, कागज अऊर दवात (एक विलुप्त पात्र जिसमें मसी अर्थात काले, नीले अऊर लाल रंग की टिकिया पानी में डालकर उस घोल में कलम डुबोकर कागज पर लिखने का काम किया जाता था) के साथ ही खेलने का मौका मिले, दुनिया का किताब पढ़ने में तनी आसानी हो जाता है.
किताब का बात से याद आया. दिल्ली का नई सड़क, कलकत्ता का कॉलेज स्ट्रीट अऊर पटना का अपना बाज़ार (गाँधी मैदान के पूर्व में स्थित अपना बाज़ार आजकल उद्योग भवन के नाम से जाना जाता है) का ओसारा (बरामदा) में क्या सम्बंध है, जानते हैं आप? तीनों जगह आपको हर तरह का नया पुराना किताब मिल जाएगा. किताब का कीमत, बेचने वाला आपका मनोविज्ञान पढकर डिसाइड करता है. मगर एतना तय है कि जिस दाम में भी आप किताब खरीदिए आपको सस्ता लगेगा (अर्थसास्त्र के हिसाब  से कंज्यूमर सर्पलस). हमारे कलेक्सन में जेम्स हेडली चेज का सारा उपन्यास अपना बाजारके फुटपाथ से खरीदा हुआ है. एगो मजेदार बात याद गया. एहीं से एक बार मोपासाँका कम्प्लीट वर्क्स खरीदे थे, एकदम नया किताब, मगर कौड़ियों के मोल. कारन.. हँसी आता है याद करके... पूरा किताब का बाइण्डिंग उल्टा था (बाँई ओर  के स्थान पर  दाईं ओर से बाइण्ड किया हुआ) गलती से. यानि किताब पीछे के तरफ से पढ़ा जाता था, उर्दू किताब के तरह. केतना बार एही किताब के बीच अईसा किताब भी मिल जाता है, जिसका पन्ना भी नहीं काटा हुआ होता है जो प्रेस के गलती से आपस में जुटा रह गया होगा.
जब भी पटना में हमरा भाई या बेटा कोई नया किताब खरीदता है या कोई सिनेमा का डीवीडी, हमको फोन करके जरूर बताता है. ऐसहीं एक दिन बेटा का फोन आया कि अपना बाजार के नीचे से रस्किन बॉण्ड का चिल्ड्रेंस ओमनीबस खरीद कर लाया है. उसको पता है कि हमरे फेवेरेट हैं रस्किन बॉण्ड इसलिए, जब उनका कोई किताब खरीदता है तो हमको तुरत फोन पर बताता है. मगर उस दिन बहुत एक्साइटेड लग रहा था.
जानते हैं, उसके पहिला पेज पर उनका ऑटोग्राफ भी है.बेटा बोला.
अब बारी था हमरा एक्साइटमेण्ट का.

बाद में जो बताया, सुनकर बहुत बुरा लगा. किताब किसी को रस्किन बॉण्ड अपने से ऑटोग्राफ करके दिए होंगे (काहे कि उस ब्यक्ति के नाम संदेस लिखकर ऑटोग्राफ किये थे) अऊर आदमी बेच गया उस किताब को कौडियों के मोल जो अनमोल हो सकता था. खैर हमरे घर गया किताब हमको लगा कि बिज्ञान का सिद्धांत सही है कि पानी अपना सतह खोजिये लेता है.
इसी के साथ याद आया शारजाह में खलीज टाइम्सअख़बार का क्लासिफाएड ..  फ़ॉर सेल! कलेक्शन ऑफ वैरियस आइटेम्स रिसीव्ड ऐज़ अनवांटेड गिफ्ट्स. एक ओर किसी का दिया हुआ तोहफा को अनवांटेड कहकर बेच देना. अऊर दूसरा ओर अमित जी के ब्लॉग से एगो बात कि उनका एगो कमरा है जिसमें उनको जाने अनजाने, गाहे बेगाहे मिलने वाला सारा छोटा-बड़ा उपहार हिफाज़त से रखते हैं वो.

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

एक अनमोल तोहफा

पहली बार जब आई थी वो गोद में मेरी
मुझको लगा
भगवान का ये भी होगा कोई मज़ाक
जो मुझसे अक्सर वो करता रहता है.
यकीं नहीं था,
‘उसपर’ भी
और किस्मत पर अपनी
जिसमें थे
छेद न जाने कितने
जिनको सिलने की कोशिश भी मैंने
शायद की हो.

छूकर देखा,
खुलती और झपकती पलकों को भी देखा
गालों और गुलाबी होठों को महसूस किया मैंने
और रोते रोते मुँह बिचकाते उसको देखा.
गोद में लेते डरता था
पर लेकर देखा,
तब जाकर महसूस हुआ कि वो सब सच था.

इंतज़ार कितना लम्बा था पूछे कोई.
बरसों की तो बात ही क्या थी
जन्मों जैसा लगता था हर एक बरस
जब देखता था सूनी सी गोद
उस औरत की
और पूछता था
उस आसमान पे रहने वाले
भगवन से
क्या दोष है उसका.

जब माँगा तब नहीं दिया उसने
और पाया तब,
जब छोड़ दिया था उससे भीख मांगना.
चौदह साल गुज़रने के भी बाद
वो दिन है आज भी ताज़ा ज़हन में मेरे

आज याद तो और भी आता है वो मुझको
आज मेरी झूमा बिटिया की सालगिरह है!!